Wednesday, February 29, 2012

शहीद नहीं हुतात्मा कहिए ! ! !

जिस प्रकार से सेक्सी शब्द हाल ही में दिए गए एक बयान के कारण चर्चा में है और उसे घोर आपत्तिजनक माना जा रहा है जो सत्य ही है। किसी भी सुंदर स्त्री को सेक्सी शब्द से संबोधित करना निश्चय ही अत्यंत आपत्तिजनक है। इसी प्रकार से एक और भयानक आपत्तिजनक शब्द जो बहुतायत से प्रयोग में लाया जाता है वह है अरबी शब्द 'शहीद"।

वस्तुतः हमारी सभी भारतीय भाषाएं कम-अधिक प्रमाण में विदेशी भाषाओं से आक्रमित हैं। और खेद यह है कि, हम आप सभी इस आक्रमित भाषा को स्वीकार चूके भी हैं तथा अपने व्यवहारिक जीवन में इस अशुद्ध, भ्रष्ट भाषा का प्रयोग निःसंकोच एवं सहजता से करते भी हैं। इस बहाव में बहते हुए हम आज यहां तक आ चूके हैं कि, 'शहीद" शब्द का भी प्रयोग धडल्ले से करे जा रहे हैं।
भारतीय भाषाओं पर विदेशी भाषाओं का आक्रमण विदेशी सत्ताओं के कारण हुआ। हिंदवी स्वराज्य संस्थापक वीर शिवाजी ने इस सांस्कृतिक आक्रमण को समाप्त करने के उद्देश्य से विद्वान श्री रघुनाथपंत हणमंते को 'राज्य व्यवहार कोष" की रचना का आदेश दिया था। इधर विगत शती में वीर सावरकरजी ने हिंदूजन की अस्मिता जागरण को अभियान के रुप में भाषा शुद्धि का उपक्रम चलाया। उनके द्वारा गढ़े गए महापौर, दिनांक, संकलन आदि विशुद्ध भारतीय शब्द सांप्रति हमारे व्यवहार में हैं। दुर्भाग्य से अस्मिता जागरण का अभियान शिथिल पडा। फलतः सर्वथा अवांछित विदेशी भाषा-संस्कृति का प्रभाव पुनः बढ़ते चला गया।

इंदौर में 1938 में संपन्न हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में महात्मा गांधी, काका कालेलकर आदियों ने हिंदी की परिभाषा में उसे 'हिंदुस्तानी" बनाने की चालें चली। तथापि, हिंदी साहित्य सम्मेलन के 1940 के पुणे अधिवेशन में स्वागताध्यक्ष हिंदी के ख्यात विद्वान पंडित ग. र. वैशंपायन के सामने हिंदुस्तानीवाले गांधी-काका को मुंह की खानी पडी। जुझारु स्वभाव के पं. वैशंपायन  ने 1941 में अबोहर (पंजाब) में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन परिषद में इंदौर अधिवेशन में हिंदी की परिभाषा में उलट फेर कर उसे 'हिंदुस्तानी" बनाने की जो राजनीति की गई थी उसे पटकनी देते हुए हिंदी के विशुद्ध स्वरुप की पुनर्स्थापना की। फलतः महात्मा गांधीजी, काका कालेलकर ने पलायनवाद को अपनाकर अलग से हिंदुस्तानी प्रचार सभा का गठन किया।

परंतु, आज हमें इस इतिहास का स्मरण नहीं। इसी कारण से किसी भी हौतात्म्य को 'शहादत" और हुतात्मा को 'शहीद" कहने की लत हमें पड गई है। यंत्रणाएं सहकर भी इस्लाम का स्वीकार न करते हिंदू के रुप में मृत्यु स्वीकारनेवाले धर्मवीर हकीकतराय को भी 'शहीद" कहा जाता है। इसी लत के कारण धर्मवीर संभाजी (छावा) के बलिदान को 'शहादत" कहने से भी हम दूर नहीं रह पाते। इसी प्रकार से स्वतंत्रता के लिए लडी गई लडाई में फांसी चढ़ गए हुतात्माओं को भी 'शहीद" कहा जाता है। इस घोर अज्ञान के कारण इन वीरों की अवहेलना होती है इसका तनिक सा भी भान हिंदुओं को नहीं है।

कुरान भाष्य के अनुसार ''शहीद वह है जो अल्लाह की राह में (यानी जिहाद करते हुए) मारा जाए। उसे शहीद का लकब (उपाधि) इसलिए दिया गया है कि वह इस्लाम की सत्यता की गवाही (साक्ष्य) जान (प्राण) दे कर पेश करता है। शहादत अत्यंत बुलंद दर्जा है।"" (दअ्‌वतुल कुरान भाष्य खंड 1, पृ. 219) शहादत यानी अल्लाह के एकत्व और मुहम्मद साहेब के पैगंबरत्व पर श्रद्धा की साक्ष्य देना। यह इस्लाम का पहला स्तंभ मूलभूत और अनिवार्य होकर इससे किसी भी मुस्लिम को छूट नहीं। 'लाइलाहइल्लल्लाह मुहम्मदुर्ररसूल्लाह" अर्थात्‌ अल्लाह एकमेव है और मुहम्मद उसके रसूल हैं यानी पैगंबर हैं। इस शब्दसमुच्च्य को 'शहादत" कहते हैं। इसे ही 'कलमा" भी कहते हैं।

जिहाद अल्लाह के बोल (कलिमे) को बुलंद करने के लिए किया जाता है अर्थात्‌ अल्लाह के धर्म (यानी इस्लाम) का प्रभुत्व निर्मित करने के लिए किया हुआ युद्ध। और यह युद्ध अर्थात्‌ जिहाद करते हुए जो मारा जाता है उसके विषय में कुरान कहती है ''जो लोग  अल्लाह की राह में कत्ल हुए उन्हें मुर्दा खयाल न करो बल्कि वे जिंदा हैं, अपने रब के पास रिज्क पा रहे हैं।"" (3ः169) इस आयत पर कुरान भाष्य कहता है - ''अल्लाह की राह में शहीद होना अमर एवं अनंत जीवन की जमानत है। यूं तो महसूस यही होता है कि अल्लाह की राह मेें कत्ल होनेवाले मर गए लेकिन हकीकत यह है कि मृत्य तो शरीर को आती है, रुह को नहीं। शहीद होनेवाले की रुह को स्वर्गलोक में एक विशेष प्रकार का जीवन प्राप्त होता है और यह जीवन आनन्द और उन्माद से इतना भरा होता है कि इसकी कल्पना भी इस दुनिया में नहीं की जा सकती।"" (दअ्‌वतुल कुरान खंड 1, पृ. 231) ''जबकि काफिरों (इस्लाम से इंकार करनेवाले) की रुहें दुखों और यातनाओं में पीडित रहती है।"" (67)

पैगंबर ने का कथन (हदीस) है - '"'शहीदों" की रुहें हरे परिंदों के खोल (घेरे) में होती है और उनका ठिकाना अर्श (ऊपरी आसमान) से लटकते हुए किंदीलों (दीप-पात्रों) के पास होता है। वे जन्नत में जहां चाहती हैं सैर करती हैं उसके बाद उन किंदीलों के पास वापस आ जाती हैं। उनका रब उन से पूछता है, तुम्हें किस चीज की इच्छा है? वे कहती हैं हमें किस चीज की इच्छा हो सकती है जबकि हम जन्नत की जिस तरह चाहें सैर कर सकती हैं अल्लाह उनसे तीन बार यह सवाल करता है। वे जब देखती हैं कि  उनसे बार बार सवाल किया जा रहा है तो कहती हैं, ऐ हमारे रब हम चाहते हैं कि हमारी रुह हमारे शरीर में लौटा दी जाए ताकि हम दोबारा तेरी राह में कत्ल किए जाएं। अल्लाह जब देखता है कि इनकी कोई जरुरत बाकी नहीं रही तो उन्हें उनकी हालत पर छोड देता है।"" (231) 
 
यह ठीक है कि जब तक हम इस विदेशी शब्द 'शहीद" का अर्थ कुरान भाष्यानुसार क्या निकलता है के संबंध में अनभिज्ञ थे तब तक इस शब्द को प्रयोग में लाते रहे परंतु, अब जब हम इस शब्द के वास्तविक अर्थ से अवगत हो गए हैं तो हमारे द्वारा अब 'शहीद" के स्थान पर हमारे अपने 'हुतात्मा" शब्द को ही प्रयोग में लाना उचित होगा। हुतात्मा का अर्थ होता है वह जिसने किसी अच्छे श्रेष्ठ कार्य के लिए अपना सर्वस्व होम कर दिया हो या अपने प्राण तक भी न्योछावर कर दिए हों। हुतात्मा शब्द वीर सावरकरजी का दिया हुआ है। 'हुतात्मा" शब्द सावरकरजी को अंदमान में रहते अपने बंधु से बातचीत करते हुए सुझा था और शहीद या ारीींूी से भी अधिक समर्पक, अत्युदार, अधिक व्यापक और अधिक पवित्रता सूचक होने के कारण वह मन को अधिक भा गया; तभी से उन्होंने उसे प्रचलित किया। इस हुतात्मा शब्द की शक्ति तो देखिए कि 26/11 का जिहादी कसाई कसाब के हाथ को पकडने वाले पुलिसमेन तुकाराम ओंबले ने मरणोपरांत भी उस कसाब का हाथ नहीं छोडा और इस कारण वह कसाब भाग भी न सका और पकडा गया। यह है हुतात्मा की पकड। लेकिन खेद है कि हम आज इस पवित्र शब्द को भूल विदेशी शब्द 'शहीद" को गले से लगाए बैठे हैं और अनभिज्ञतावश इसका प्रयोग धडल्ले से कर रहे हैं।

अंत में यही कहना है - सोच बदल लो नजारे बदल जाएंगे, शहीद नहीं हुतात्मा कहिए सारे भाव बदल जाएंगे।

4 comments:

  1. बहुत ही रोचक जानकारी है

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  2. शिरीष जी आपका यह लेख अत्यन्त विचारणीय एवं सराहनीय है..सम्भव हुआ तो मैं इसे अपने आगामी अंक ''ज्योतिष का सूर्य''मासिक पत्रिका में प्रकाशित करूंगा ..कृपया सन्दर्भ ग्रन्थों का भी उल्लेख करें ताकि इस उपयोगी साहित्य का शोध-छात्र भी लाभ ले सकें...धन्यवाद

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    1. da avtul kuran ka ullekh diya hua hai, baki to sarvavadit itihas has hai

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