Sunday, December 9, 2012


क्या जिन्ना सेक्लूर थे? क्या जिन्ना सेक्यूलर स्टेट की स्थापना करना चाहते थे?

11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान समिति के सामने अपने अध्यक्षीय भाषण में जिन्ना ने जो विचार व्यक्त किए थे उन्हें उद्‌धृत कर जिन्ना को सेक्यूलर बतलाने के रिवाज ने आजकल एक फॅशन का रुप धर लिया है। अब लगता है कि, अडवानीजी के बाद बिहार के मुख्यमंत्री श्रीनीतिश कुमार द्वारा जिन्ना की मजार के दर्शन शायद एक नई परंपरा का रुप धर ले। वैसे जब अडवानीजीे जिन्ना की मजार के दर्शनों के लिए गए थे तो उन पर यह आरोप भी लगा था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात आज तक कोई जिन्ना की मजार पर श्रद्धांजली देने के लिए नहीं गया, ऐसी कोई परंपरा भी नहीं तो, श्री अडवानीजी वहां क्यों गए यह आरोप उन पर आरोप लगानेवालों का अज्ञान दर्शाता है। क्योंकि, सन्‌ 1953 में भारत के केंद्रिय मंत्री रहते कराची में मौ. आजाद ने जिन्ना की कब्र को भेंट दे वहां प्रार्थना की थी।

अब हम अपने मूल मुद्दे 11 अगस्त 1947 के भाषण में जो विचार जिन्ना ने व्यक्त किए थे उन पर आते हैं जिन्हें उद्‌. कर उन्हें सेक्यूलर बतलाने की, या जिन्ना पाकिस्तान को एक सेक्यूलर स्टेट बनाना चाहते थे पर आते हैं। उन्होंने अपने भाषण में कहा था-

''अब तुम स्वतंत्र हो। तुम तुम्हारे मंदिरों में ... मस्जिदों में ... जाने के लिए स्वतंत्र हो। फिर तुम्हारा धर्म, जाति, पंथ कुछ भी हो। देश के राजकाज से उसका कोई संबंध नहीं... धर्म प्रत्येक का व्यक्तिगत मामला रहेगा। राजनैतिक अर्थ से सभी इस देश के समान नागरिक रहेंगे।"" इस विचार से अनेक लोग चौंक गए थे और अनेकों को लगा कि 1920 के पूर्व के जिन्ना फिर से सेक्यूलर हो गए हैं। और आज इसी भाषण के आधार पर उन्हें सेक्यूलर ठहराने की होड लगी हुई है। परंतु, वस्तुस्थिति क्या थी?

पहली बात यानी जिन्ना के इस सेक्यूलिरिज्म या सर्वधर्म समभाव का आधार कौनसा था? तो वह था इस्लाम का तत्त्वज्ञान। इस आधार के संबंध में तीन दिन के संविधान समिति के उद्‌घाटन प्रसंग पर माउंटबॅटन के उपस्थिति में किए हुए भाषण में उन्होंने कहा था ः ''सारे गैर-मुस्लिमों के प्रति सहिष्णुता और सद्‌भावना ... का जन्म तेरासौ वर्ष हुआ है, कि जब हमारे पैगंबर ने यहूदियों और ईसाइयों को जीतने के बाद उनके साथ न केवल शब्दों से अपितु कृति से भी कमाल की सहिष्णुता का व्यवहार किया था और उनकी धर्मश्रद्धाओं का आदर और सम्मान रखा था।* जहां कहीं भी मुसलमानों ने राज्य किया वहां का सारा मुस्लिम इतिहास इसी प्रकार के उदार और महान मूल्यों से ओतप्रोत भरा हुआ है। उसीका अनुकरण कर अपन ने वह आचरण में लाना चाहिए।"" अर्थात इस्लाम की सीख को ही जिन्ना सेक्यूलिरिज्म की परिभाषा में प्रस्तुत कर रहे थे।

(*. यहां जिन्ना को 'मदीना-करार" अभिप्रेत है। सन्‌ 622 में हिजरत कर मदीना पहुंचने पर पैगंबर ने वहां अपने नेतृत्व में इस्लामिक राज्य की स्थापना की। वहां यहूदियों को अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता देना का 'करार" किया। वस्तुतः वह करार नहीं था बल्कि राजा ने दी हुई 'सनद" थी। उसमें यहूदियों को दूसरे दर्जे की नागरिकता थी। वे राजकाज में भाग ले नहीं सकते थे। उन्हें अधिकार कम और बंधन अधिक थे। पैगंबर की अनुमति के बगैर वे हाथ में शस्त्र ले नहीं सकते थे। किसी भी प्रकार का विवाद होने पर अंतिम निर्णय पैगंबर का ही रहनेवाला था। यह करार भी केवल तीन वर्ष ही रहा। इस अवधि में ही सभी यहूदियों को करार भंग किया कहकर मदीना से खदेड दिया गया। करार समाप्त हो गया। यह 'मदीना करार" यानी सामर्थ्य प्राप्त होने तक मदीना के यहूदियों का विरोध कम करने की राजनीति थी। सिवाय यह करार 'ग्रंथधारक" यहूदियों से था, अनेकेश्वरवादियों से नहीं था। विशेष यानी इसी करार के आधार पर पाकिस्तान समर्थक द्विराष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन करते हैं। पाकिस्तान के ब्रिगेडियर गुलजार अहमद इस करार की एक धारा के विषय में निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं कि ''यह धारा जब से अस्तित्व में आई तभी से द्विराष्ट्र-सिद्धांत की उत्पत्ति हुई है।)

नए राष्ट्र के रुप में 'संयुक्त राष्ट्र" का सदस्य होने के लिए भी यह परिभाषा आवश्यक थी। दूसरे ही दिन यानी 15 अगस्त को पाकिस्तान आकाशवाणी के उद्‌घाटन प्रसंग पर दिए संदेश में उन्होंने कहा था कि, ''हम 'संयुक्त राष्ट्र" की सनद से बंधे हुए हैं ... अल्पसंख्यकों में ... विश्वास निर्मित करो कि ... यहां डरने का कोई भी कारण नहीं।"" दि. 24 अगस्त को पाकिस्तान का उल्लेख उन्होंने गर्वपूर्वक 'विश्व का सबसे बडा इस्लामिक राज्य" के रुप में किया था। उनका 'सेक्यूरिज्म" द्विराष्ट्रवाद से सुसंगत था, विरोधी नहीं था। 25 अक्टूबर 1947 को एक साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया था कि, ''द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत न होकर वास्तविकता है। इसी आधार पर विभाजन हुआ है। पिछले दो महीनों की (हिंसाचार की) भयानक और दुखदायक घटनाओं ने तो यह निस्संदेह रुप से सिद्ध किया है। भारत एक हिंदू राज्य है।"" उपर्युक्त पर से स्पष्ट रुप से यह दिख पडता है कि, सेक्यूरिज्म और द्विराष्ट्रवाद दोनो ही विचार इस्लाम के तत्त्वज्ञान के भाग के रुप में ही जिन्ना प्रस्तुत कर रहे थे। फरवरी 1948 में आकाशवाणी पर दिए अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान का उल्लेख 'इस्लामिक राज्य" करते हुए उसके संविधान के विषय में कहा था-''पाकिस्तान का संविधान ... अभी तैयार होना है ... वह निश्चित ही इस्लाम के प्रमुख तत्त्वों को अंर्तभूत करने वाला (इस्लामिक) प्रजातांत्रिक पद्धति का होगा।"" 1 जुलाई को 'स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान" का उद्‌घाटन करते हुए पाश्चात्य अर्थरचना की आलोचना और इस्लामिक अर्थरचना के संशोधन का स्वागत करते हुए जिन्ना ने कहा थाः ''अपने को सच्ची इस्लामिक संकल्पना की ... अर्थव्यवस्थानुसार चलना चाहिए और संसार को वह (व्यवस्था) देना चाहिए।""

दूसरी बात है यह है कि, जिन्ना इस प्रकार के विचार कब से प्रस्तुत कर रहे थे? 11 अगस्त 1947 को संविधान समिति में पहली बार ही और अचानक ही इस प्रकार के विचार प्रस्तुत किए थे क्या? इसका स्पष्ट उत्तर है कि, विभाजन का प्रस्ताव हुआ तब से लेकर पाकिस्तान की स्थापना होने तक और उसके बाद पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष के रुप में मृत्यु पर्यंत उन्होंने इसी प्रकार के  विचार सतत प्रस्तुत किए थे। उदा. 5 अगस्त 1939 को मुंबई में जिन्ना ने घोषित किया था कि, ''मैं ने मुसलमान के रुप में जन्म लिया है, मैं मुसलमान के रुप में जी रहा हूं और मुसलमान के रुप में ही मरुंगा।"" इस प्रकार की घोषणा करने के लिए स्वयं को कोई धार्मिक करने की या होने की आवश्यकता नहीं होती।

उपर्युक्त भाषण में ही उन्होंने कहा था- ''हिंदू और मुसलमानों की संस्कृति इतनी भिन्न हैं कि, जिसके पास अधिक शक्ति है वह स्वाभाविक रुप से दूसरे पर दूसरे पर चड्‌ढ़ी गांठता है। भिन्न राष्ट्रीयत्व वाले इस देश में लोकसत्ताक संसदीय पद्धति का शासन असंभव है।'' इसके सात दिन बाद इस्माईल कॉलेज में बोलते समय उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि, ''हिंदू और मुसलमान धर्मश्रद्धा, शिक्षा, संस्कृति और तत्त्वज्ञान इस दृष्टि से दो (विरुद्ध) ध्रुवों पर हैं। वे दो स्वतंत्र राष्ट्र हैं ....भारत में कांग्रेस प्रजातंत्र की बात करती है क्योंकि, वह हिंदुओं की हित की है। उनके लिए यह सिर गिनने का प्रश्न है ... इस देश में प्रजातंत्रात्मक संसदीय शासन पद्धति .... असंभव है।""

प्रजातंत्र पर उनके प्रहार जारी ही रहे। 29 अक्टूबर को दिल्ली में 'मॅंचेस्टर गार्डियन" इस वृत्तपत्र को दिए हुए साक्षात्कार में उन्होंने कहा ः ''यह सिद्ध हो गया है कि, भारत में प्रजातांत्रिक संसदीय पद्धति चलाना असंभव है। इसके कारण अल्पसंख्यकों पर सांप्रदायिक बहुसंख्यकों का राज हमेशा के लिए आ जाएगा ... भारत में प्रजातंत्र का अर्थ 'हिंदूराज्य" ही होता है। यह बात मुसलमानों को कभी भी मान्य नहीं होगी।""

जिन्ना का विरोध पाश्चात्य संसदीय प्रजातंत्र के प्रति था, उन्हें इस्लामिक प्रजातंत्र चाहिए था। उन्हें जो प्रजातंत्र मान्य था उसे वे इस्लाम का आधार देते थे। 7 नवंबर 1939 को मुंबई में भाषण में उन्होंने कहा कि मुस्लिम लीग प्रजातंत्र विरोधी नहीं। इस्लाम स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर विश्वास रखनेवाला धर्म है। यह कहने के लिए उन्हें इस्लाम का अध्ययन करने की कोई जरुरत नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि, ''हिंदू बंधुओं के साथ संपूर्ण समानता के आधार पर चर्चा करने के लिए मैं हमेशा से ही इच्छुक रहा हूं।"" आगे स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि, मुस्लिम अल्पसंख्य न होकर हिंदुओं की बराबरी के और समान हैं, हमें हिंदू और मुस्लिमों के बीच तीन एक के अनुपात में जनसंख्या का विचार करने वाला पाश्चात्य प्रजातंत्र मान्य नहीं।

दिसंबर 1938 और फरवरी 1939 में इस प्रकार से दो बार देवबंद के विख्यात मौ. अशरफ अली थानवी के नेतृत्व में उलेमाओं का प्रतिनिधि मंडल जिन्ना से मिला था। इस शिष्टमंडल को जिन्ना ने स्पष्ट आश्वासन दिया था कि, भावी पाकिस्तान में शरीअत कानून को अमल में लाया जाएगा। वह अधार्मिक (ला दिनी) राज्य नहीं होगा। जिन्ना ने यह भी मान्य किया था कि, इस्लाम में धर्म और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता। ''नवंबर 1945 में उन्होंने मंकी शरीफ के पीर (धर्मगुरु) को आश्वासन दिया था कि, पाकिस्तान कुरान के कानून पर आधारित रहेगा और वहां शरीअत की स्थापना की जाएगी।"" उन्होंने भेजे हुए पत्र में कहा था, ''यह जोर देकर कहना अनावश्यक है कि, मुस्लिमों की (संख्या) प्रभुत्व वाली (पाकिस्तान की) संविधान समिति  मुस्लिमों के लिए शरीअत से सुसंगत न रहनेवाले कानून बना सकेगी। और (बनाने पर) गैर-इस्लामी कानून मानने के लिए मुसलमान पाबंद नहीं रहेेंगे।"" व्हायसराय वेव्हेल को भारत सचिव लॉरेन्स ने सूचित किया था कि, लीग इस चुनाव में (जो 1945 में हुए थे) पाकिस्तान के लिए जनमतसंग्रह कहकर ही चुनाव लड रही है।

 अतः जिन्ना सेक्यूलर थे, उन्हें धर्म और राजनीति का घालमेल पसंद नहीं था, उन्हें इस्लामी नहीं सेक्यूलर राज्य चाहिए था का किया जानेवाला प्रचार नितांत झूठा है, असत्य है। सच तो यह है कि, उन्होंने पूरी तरह इस्लामनुसार जीने के लिए शरीअत आधारित राज्य यानी पाकिस्तान चाहिए कहकर मुस्लिम जनता का समर्थन हासिल किया था, पाकिस्तान का निर्माण किया था। स्वतंत्रता, बंधुता, सामाजिक न्याय, प्रजातंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सभी को समान व्यवहार इसी प्रकार द्विराष्ट्रवाद आदि मूल्यों का उन्होंने सभी कालों में, फिर वह 1920 के पहले का जब वे सेक्यूलर कहलाते थे तब का हो या बाद का हो, एक जैसा ही समर्थन किया था और इन सबका आधार इस्लाम का तत्त्वज्ञान ही था। हिंदूधर्म इन मूल्यों को न माननेवाला और विषमतावादी होने के कारण तो, इस्लाम इस प्रकार के मानवीय मूल्यों की सीख देनेवाला होने के कारण पाकिस्तान सभीको समान अधिकार और न्याय देनेवाला होगा, यह उनका दावा था। बाद में 1956 में संविधानानुसार 'पाकिस्तान" को इस्लामिक राज्य घोषित कर उसका नाम 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान" रखा गया। संविधान की उद्देश्यिका में घोषित किया गया कि, ''इस्लामानुसार बताए हुए प्रजातंत्र में, समानता, सहिष्णुता और सामाजिक न्याय के तत्त्व पूरी तरह से अमल में लाए जाएंगे।"" और यह सब जिन्ना द्वारा प्रस्तुत विचारों से पूरी तरह सुसंगत हैं।

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