Friday, July 26, 2013

गंभीर स्थिति शौचालयों की - आवश्यकता है मानसिकता बदलने की

गांधीजी खुले में शौच की आदत को पसंद नहीं करते थे। बच्चों को फिराना तो असभ्यता मानते थे। गांधीजी एक व्यवहारवादी जननेता थे। उन्होंने भारतीयों की मानसिकता को भली-भांति समझा था, उससे परिचय प्राप्त किया था। इसे ही जनता की नब्ज पकडना भी कह सकते हैं और यही उनकी सफलता का राज भी था। इसके लिए उन्होंने अफ्रीका से लौटने के पश्चात पूरे भारतवर्ष का भ्रमण ट्रेन के तृतीय श्रेणी के डिब्बे से किया था। शौच से उत्पन्न होनेवाली गंदगी और समस्या के हल के लिए वे कहते थे- यदि जंगल हो आना हो (यानी खुले में शौच) तो गांव से एक मील दूर जहां आबादी ना हो, वहां जाना चाहिए। टट्टी करने से पूर्व एक गड्ढ़ा खोद लेना चाहिए और निबटने के पश्चात मल पर खूब मिट्टी डाल देना चाहिए। समझदार किसानों को तो चाहिए कि अपने खेतों में ही पूर्वोक्त प्रकार के पाखाने बनाकर अथवा गड्ढ़े में मैला गाडकर बिना पैसे की खाद लें।

श्रीजयराम रमेश जिन्होंने शौचालयों की समस्या के लिए मानो एक जनजागरण अभियान सा ही छेड रखा है का कहना है कि खुले में शौच जाने की मानसिकता को बदलने में दस वर्ष लगेंगे यह समस्या कितनी गंभीर है इसकी बानगी इस प्रकार के समाचारों से ही लग सकती है कि पचास हजार की आबादी वाले उ.प्र. के कस्बे रुदौली में एक भी शौचालय नहीं। वर्ष 2000 में बने पांच सीटर शौचालय की दशा जर्जर है। हाल ही में हुई जनगणना के आंकडों के मुताबिक 53.1 प्रतिशत घरों में शौचालय सुविधा ही नहीं है। कुछ समय पूर्व ऑस्ट्रेलिया के एक उद्घोषक ने भारत को शौचालय का छेद करार दिया था। यह बात अलग है कि बाद में विरोध होने पर उसने माफी मांग ली। परंतु, फिर भी शौचालयों और स्वच्छता के प्रति हमारी कितनी अनास्था है को तो निश्चय ही नकारा नहीं जा सकता।

महिलाओं के लिए शौचालय होने को कितनी उपेक्षा प्राप्त है इसका पता इसी बात से लगता है कि आजादी के इतने वर्षों पश्चात देश की संसद के परिसर में लोकसभा अध्यक्ष मीराकुमार द्वारा महिलाओं के लिए अलग से प्रसाधनकक्ष बनाए जाने के पूर्व वहां तैनात महिला पुलिस कर्मियों, आनेवाली महिला पत्रकारों या दूसरी कर्मचारियों के लिए यह एक बुनियादी जरुरत है कि आवश्यकता ही समझी नहीं गई थी।

नोएडा में तो कई कारखाने ऐसे हैं जहां संयुक्त टॉयलेट में दरवाजे तक नहीं हैं, ऐसा इसलिए क्योंकि महिलाएं टॉयलेट में ज्यादा समय ना बीताएं और काम में जुटी रहें। यह तो अमानवीयता की पराकाष्ठा है। ऐसी भीषण परिस्थिति में कोई महिला कैसे अपने महिला होने पर गर्व कर सकती है। महिलाओं के लिए टॉयलेट की उपेक्षा इतनी अधिक है कि कई बडे-बडे संस्थान अपने रिसेप्शन की सजावट पर तो भरपूर खर्च करते हैं पर वहां बैठनेवाली महिला रिसेप्शनिस्ट और वहां कार्य करनेवाली अन्य महिला कर्मचारियों के लिए अलग से प्रसाधन कक्ष होना चाहिए को कोई प्राथमिकता ही नहीं देते हैं।

वैसे शौचालयों के लिए किए जा रहे जनजागरण का इतना असर तो अब साफ दिखाई पडने लगा है कि लोग विशेषकर महिलाएं इस संबंध में जागरुक होने लगी हैं। कई स्थानों पर शौचालय नहीं है इसलिए लडकियों ने विवाह करने से इंकार कर दिया तो कहीं शौचालय नहीं है इसलिए महिलाओं ने प्रदर्शन का सहारा लिया है। कहीं शासन ही घोषणा कर रहा है कि ग्राम पंचायत का चुनाव लडना हो तो उम्मीदवार के पास घर में शौचालय है का प्रमाणपत्र संलग्न करने को कहा जा रहा है तो कहीं बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद शौचालय निर्मित नहीं किए गए इसलिए कइयों के ग्रामपंचायत सदस्यत्व निरस्त कर दिए गए हैं। म. प्र. में तो मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत दुल्हे टॉयलेट सीट के साथ फोटो खिंचवाते नजर आ रहे हैं क्योंकि इस योजना के तहत विवाह के लिए यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उ. प्र. सरकार ने तो शौचालय निर्माण के लिए धनराशी 1000 से बढ़ाकर 1400 करने का निर्णय लिया है।

एक तरफ तो इतना उत्साह एवं उतावलापन दूसरी तरफ इस योजना के तहत हो रहा अंधाधुंध भ्रष्टाचार जिस पर मानो कोई अंकुश ही नहीं। उ.प्र. में सूचना के अधिकार के तहत यह खुलासा हुआ है कि शौचालय निर्माण में 2856 लाख का घोटाला हुआ है। बुंदेलखंड में 14 करोड खर्च होने के बावजूद नतीजा सिफर है फिर भी अनुदान रेवडियों के माफिक बंट गया। भ्रष्टाचारियों ने इस अच्छी योजना को धोखे और लूट का माध्यम बनाना प्रारंभ कर दिया है। परिस्थिति को इतना दयनीय बना दिया गया है कि कहीं शौचालय निर्माण लक्ष्य से पीछे चल रहा है तो कहीं लाखों की लागत से निर्मित शौचालय अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। महिला शौचालयों पर ताले जड महिलाओं को उनकी मूलभूत सुविधा से वंचित किया जा रहा है। लक्ष्य प्राप्ति के लिए बी.ओ.टी के तहत भी प्रयत्न किए गए किंतु ठेकेदार इस डर से सामने नहीं आ रहे कि निर्माण के बाद यदि लोगों ने पैसे नहीं दिए और मुफ्त में सुविधा दो के लिए आंदोलन छेड दिया तो पैसे कौन देगा।

सरकारी धन का इस योजना में दुरुपयोग इस प्रकार से भी किया जा रहा है कि पहले तो योजना के तहत शौचालय बना लिए  जाते है परंतु उनका उपयोग शौचालय की बजाए स्नानगृह अथवा जानवरों का भूसा रखने या जलावन लकडी आदि रखने के लिए उपयोग में लाया जाने लगता है। कहीं-कहीं इसके लिए तर्क यह दिया जाता है कि पीने के लिए तो पर्याप्त पानी नहीं तो शौचालय के लिए पानी कहां से लाएं। यह भी तो समस्या ही है कि जो शौचालय बन गए उनका उपयोग किस प्रकार से किया जा रहा है उसे देखेगा कौन? महाराष्ट्र में जलप्रदाय एवं स्वच्छता विभाग एवं जनगणना के आंकडों में 31 लाख का अंतर है यानी 31 लाख शौचालय गायब हैं और यह अंतर यूनीसेफ ने अपने अध्ययन से निकाला है। जबकि महाराष्ट्र स्वच्छता के मामले में अग्रसर माना जाता है और प्रतिवर्ष निर्मल ग्राम योजना का पुरस्कार प्राप्त करता चला आ रहा है।


इतने प्रचार-प्रसार, अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद निर्मल भारत योजना से अभी तक मात्र 9प्रतिशत गांव जुडे हैं और आगामी 10 वर्षों में देश की सभी ग्रामपंचायतें जुड जाएंगी ऐसा केंद्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्री भरतसिंह सोलंकी ने एक कार्यक्रम में कहा है। वस्तुतः इस एक अच्छी योजना का पूरा लाभ उठाना है तो लोगों की मानसिकता को बदलना होगा, स्वच्छता के संबंध में जागरुकता बढ़ाने के साथ ही साथ इसे शिक्षा पाठ्यक्रम से जोडना होगा क्योंकि जो लोग पीढ़ियों से खुले में शौच करते चले आ रहे हैं रातो-रात उनकी मानसिकता बदलना भी तो इतना आसान नहीं। लोगों के अपने तर्क भी अपने स्थान पर हैं खाने को तो है नहीं शौचालय निर्माण के लिए पैसे कहां से लाएं? सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद स्कूलों में शौचालय बन भी गए तो उनके रखरखाव का खर्च कहां से आएगा। इतनी सारी समस्याओं का अंबार और लोगों की विचित्र मानसिकता को देखते लक्ष्य प्राप्त करना मुश्किल ही नहीं तो असंभव सा ही है। वास्तव में सबसे बडा कटु सत्य तो यह है कि देश की सारी समस्याओं की जड में है सामाजिक संस्कारहीनता और बेतहाशा बढ़ती आबादी जिसकी ओर से सभी लोग आंखें मूंदे हुए हैं।

Wednesday, July 17, 2013

आशाओं का सौदागर नेता - नरेंद्र मोदी

नेपोलियन का कहना था 'लीडर इज ए डीलर इन होप" अर्थात्‌  नेता वह है जो आशाओं का सौदा करना जानता हो। आज यह कहावत मोदी पर उपयुक्त ठहरती नजर आ रही है। मोदी वो नेता हैं जो इस समय देश में चरम पर पहुंच चूके अथाह भ्रष्टाचार एवं कुशासन से पीडित देश की जनता के सामने बडी तेजी से आशा की किरण बनकर उभर रहे हैं। युवाओं में तो उनका क्रेज था ही अब तो पार्टी के भीतर भी उनका विरोध कमजोर पडता नजर आ रहा है। पार्टी के दूसरे, तीसरे, चौथे स्तर के नेता भी यह जानते हैं कि अब नहीं तो कभी नहीं की परिस्थितियां बन गई हैं। और मोदी इन सबसे वाफिक होने के कारण अब इस तरह के कदम उठा रहे हैं कि पार्टी तो क्या सारे देश की राजनीति उनके इर्दगिर्द केंद्रित हो जाए। इसके लिए वे कभी 'कुत्ते का पिल्ला" जैसे जुमले उछालते हैं तो कभी 'सेक्यूलर बुर्के" की बात कर सबको आंदोलित कर देते हैं और चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं।

इसमें उन्हें सफलता और लाभ भी मिलता नजर आ रहा है पार्टी में उनके विरोध के स्वर मंद होते जा रहे हैं। जो कांग्रेस और दिग्विजयसिंग यह कहते फिर रहे थे हम नरेंद्र मोदी को कोई महत्व नहीं देते वे उनके वक्तव्यों पर प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य होते जा रहे हैं। उनकी स्वयं की पार्टी भी उनके वक्तव्यों पर होनेवाली प्रतिक्रियाओं का उत्तर देने में व्यस्त है, शिवसेना भी इस मामले में पीछे नहीं रही जो कभी दबे स्वरों में उनका विरोध दर्शा चूकी है। उ.प्र. जहां सबसे अधिक उनकी सफलता की परीक्षा है वहीं मुख्य प्रतिद्वंदियों में से एक बसपा के सांसद विजयबहादुर ने न उनके 'कुत्ते के पिल्ले" वाले वक्तव्य का पुरजोर समर्थन किया बल्कि मोदी की आलोचना करनेवालों को आडे हाथों लेने से भी नहीं चूके। फलस्वरुप मायावती को विजयबहादुर को चेतावनी देना पडी।

मोदी की सफलता इससे भी नजर आती है कि पार्टी में उठी यह आवाजें कि कांग्रेस मोदी को निशाना बनाकर अपनी असफलता को नैपथ्य मेें ले जाना चाहती है, मुद्दे से भटकाना चाहती है को कोई महत्व मिलते नजर नहीं आया, मोदी तो चाहते ही हैं कि सारी चर्चाओं के केंद्र में वे अकेले ही रहें बाकी सभी मुद्दे गौण हो जाएं। वैसे भी जनता इस कांग्रेस सरकार के नाकारापन से इतनी आजीज आ चूकी है कि अब उसे कुछ भी कहने की जरुरत नहीं। रोज गिरते रुपये के दुष्परिणामों से बचना मुश्किल होता जा रहा है को जनता समझ भी रही है और भोग भी रही है व यह जान चूकी है कि यह सब पिछले पांच वर्षों के निकम्मेपन का परिणाम है।

मोदी की सफलता इस बात से भी जाहिर होती है कि जो कांग्रेस रातोरात 'खाद्य सुरक्षा बिल" लाकर उसे चुनावी मुद्दा बना गरीबों की हमदर्द होने की इमेज बनाना चाहती थी और उसकी रणनीति थी कि सोमवार (15जुलाई) से यही मुद्दा चर्चा का विषय बन जाए को असफल करने में मोदी सेक्यूलर बुर्के की चर्चा छेड सफल रहे हैं। क्योंकि, 'खाद्य सुरक्षा बिल" को छोड कांग्रेस मोदी पर पिल पडी और आंकडों की बाजीगरी में उलझ कर रह गई और मोदी आगे हैदराबाद बढ़ गए जहां उन्हें सुनने के लिए टिकट लेना पडेगा। जिसका उपयोग वे उत्तराखंड की आपदा के प्रभावित लोगों की सहायता के लिए करेंगे। यह विचार लोगों में राजनेताओं को गंभीरता से लिया जाए की ओर बढ़ाया गया एक पग माना जाना चाहिए जिसकी आवश्यकता भी थी, की पूर्ति करेगा। अमेरिका में तो यह प्रचलन में है कि वहां लोग सुनने के लिए आते भी हैं और पैसे भी खर्च करते हैं। बिल क्लींगटन तो राष्ट्रपति पद से निवृत होने के बाद जहां भाषण देने जाते हैं वहां से बाकायदा फीस लेते हैं। आपातकाल के बाद जनता पार्टी द्वारा 'नोट भी और वोट भी" की अपील सफल रही थी। उसके वर्षों बाद अब यही प्रयोग अब एक अलग रुप में किया जा रहा है। परंतु, कांग्रेस इसे समझने की बजाए फिर से आलोचना में जुट गई।

मोदी का इतिहास बतलाता है कि दूसरों से अलग दिखने, करने की चाह उनमें हमेशा से ही रही है उसका एक प्रतीक है उनकी आधी बांह का कुर्ता जो उनके समर्थकों में अब फैशन का रुप धरता जा रहा है। प्रतीकों का उपयोग करने में मोदी निश्चय ही लाजवाब हैं और इसके लिए वे धार्मिक प्रतीकों का उपयोग करने से भी कोई गुरेज नहीं करते। जैसेकि अभी हाल ही में सेक्यूलर बुर्का शब्द का प्रयोग। इसके पूर्व भी यह प्रयोग चुनाव आयुक्त लिंगदोह के मामले में उनके पूरे नाम जेम्स माइकल लिंगदोह का उच्चारण कर उनके ईसाई होने के प्रतीक के रुप में कर चूके हैं तो, कांग्रेस नेता अहमद पटेल को उनके नाम का उच्चारण अहमद मियां पटेल से करना, आदि।

हिंदू भावनाओं की लहरों पर सवार होना भाजपा की रणनीति का हमेशा से एक अहम हिस्सा रहा है। यहां भी मोदी हटके हैं वे अच्छी तरह से जानते हैं कि चाहे जो हो जाए अल्पसंख्यक उन्हें वोट नहीं देंगे इसलिए उनका पूरा ध्यान हिंदू वोटों के धु्रवीकरण पर है इसलिए वे सद्‌भावना उपवास कार्यक्रम रखते हैं परंतु, मुस्लिम टोपी नहीं पहनते जबकि उनके पूर्ववर्ती लालकृष्ण आडवाणी तो अजमेेर की दरगाह पर हाथ जोडकर खडे हैं के चित्र उपलब्ध हैं। मोदी के इस प्रकार के व्यवहार से अपने आप वे जो चाहते हैं वह उन्हें हासिल हो जाता है हिंदू भावनाएं तुष्ट होती हैं और वे उनके कट्टर समर्थक बनते चले जाते हैं। मुंबई में तो उनके हालिया हिंदुत्व संबंधी बयान के बाद जगह-जगह पर होर्डिंग लगे हैं जिनमें मोदी के फोटो के साथ लिखा है 'हां मैं हिंदू राष्ट्रवादी हूं"।


परंतु, कांग्रेस जो भारतीय राजनीति की सबसे पुरानी और शातिर खिलाडी है जो पहले तो नई-नई समस्याएं स्वयं ही खडी करती है फिर बाद में उद्धारक की भूमिका में आकर उन्हें हल भी स्वयं ही करने आ धमकती है और श्रेय ले जाती है। लगता है इस समय अपनी सारी चालाकियां भूल मोदी फोबिया से ग्रस्त हो गई है तभी तो अपने स्वयं के मुद्दे जिन्हें लेकर उसे चुनावी मैदान में जाना है को ठीक से जनता के सामने लाने का कार्य छोड मोदी-मोदी का जाप करने में लगी है और मोदी इसीका लाभ उठा कांग्रेस को बडी ही होशियारी से भ्रमित करने में सफल हो रहे हैं।     

Thursday, July 4, 2013

चीन में मुस्लिम अलगाववाद

चीन में मुस्लिम अलगाववाद

पिछले महीने जून में चीन के सबसे संवेदनशील प्रांत शिनजियांग में हिंसा भडक उठी थी जिसमें 27 लोग मारे गए थे। यह प्रांत रुस, मंगोलिया, कजाकिस्तान, किर्गिजिस्तान, ताजकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत की सीमा पर है और तेल व गैससंपदा से भरपूर है। यह संघर्ष तुर्की मूल के मुस्लिमों जिन्हें 'उइघर" कहा जाता है उनमें और चीन वंश के 'हान" समुदायों में हुआ। चीनी वंश के मुसलमानों को 'हुई" कहा जाता है। अप्रेल में भी हुए सीरियल बम विस्फोटों में कम से कम 21 मारे गए थे और 8 घायल हुए थे। इसके पूर्व भी जुलाई 2009 में भडकी हिंसा में 156 से अधिक लोग मारे गए थे, 1500 घायल और 1000 लोग गिरफ्तार हुए थे। दंगे इतने गंभीर थे कि राष्ट्रपति जीन्ताहो को जी8 की बैठक छोडकर स्वदेश लौटना पडा था।

वहां सक्रिय ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट का संबंध अल कायदा से है। इस संगठन को चीन सरकार ने प्रतिबंधित कर रखा है। चीन सरकार के आग्रह पर अमेरिका ने भी इसको आतंकवादी संगठनों की सूची में डाल रखा है। चीन सरकार उनसे चिंतित है। इस मुस्लिम उइघर आबादी में तालिबान के प्रति समर्थन है। तालिबानी शासन के दौरान 300 उइघर मुस्लिम अफगानिस्तान जाकर तालिबानी प्रशिक्षण ले चूके हैं। मुस्लिम आबादी में उग्रवादी भावनाओं के पनपने के लिए एकाधिक बार चीन पाकिस्तान पर भी उंगली उठा चूका है। यहां विद्रोहों का लंबा इतिहास रहा है चीन की नीति वहां के मुसलमानों को इन उइघर मुसलमानों से दूर रखने की है।

चीन में बाहर से आए दो कट्टरपंथी मुस्लिम पंथों 'वहाबी" और 'नक्शबंदी" के प्रसार के बाद बडे पैमाने पर विद्रोह होकर यूनान प्रांत में अल्पसंख्य मुसलमानों की सत्ता भी स्थापित हो गई थी। यह 19वीं शताब्दी के मध्य की बात है। चीनी सत्ता ने इन सारे प्रयत्नों को कठोरतापूर्वक कुचल दिया था। अल्पसंख्य होकर सत्ता प्राप्ति के यह प्रयत्न चीनी शासकों को धोखादायक लगे और यह इतिहास पर से सिद्ध भी हो गया। उसी इतिहास को अब हम देखेंगे।

तेरहवीं शताब्दी में मंगोलों ने चीन को जीत लिया। वांशिक दृष्टि से मंगोल और चीनी भिन्न हैं। मंगोलों ने राजपाट चलाने एवं अपने को समर्थन मिले, स्थानीय चीनी हावी ना हो जाएं इसलिए मध्य एशिया से तुर्कों को बुलाया इनके बहुसंख्य अधिकारी मुस्लिम थे। उन्हें बडे पद मिले। सारी चीनी जनता मंगोलों की सत्ता से जबरदस्त नफरत करती थी साथ ही इन मुस्लिम तुर्क अधिकारियों से भी। ये अधिकारी चीनियों के साथ गुलामों सा व्यवहार करते थे। इन तुर्क नौकरशाहों ने ही चीन में बडे पैमाने पर धर्मांतरण करवाया। इसके कारण चीन के हर प्रांत में मुसलमान नजर आने लगे। मंगोल आने के पूर्व यूनान में तो एक भी मुस्लिम नहीं था परंतु, मंगोलों के पहले प्रशासक सय्यद शम्सुद्दीन के काल से इस्लाम के प्रसार की शुरुआत हुई।

पहले चीनी स्त्रियों से विवाह करना और अकाल में और अनाथालयों से चीनी बच्चों को खरीदना, कभी बलपूर्वक तो कभी प्रलोभनों से सेना में सैनिकों का धर्मांतरण करना, आदि । अब सत्ताबल मिल गया। जैसे-जैसे संख्याबल बढ़ने लगा वैसे-वैसे मुसलमानों की राजनैतिक आकांक्षाएं परवान चढ़ने लगी विद्रोह होने लगे और चीनी सत्ता के ध्यान में धोखा आने लगा। अठराहवीं शताब्दी से शुरु हुए इन मुस्लिम आंदोलनों का उद्देश्य देश से अलग होकर स्वतंत्र इस्लामी राज्य की स्थापना करना था। कट्टरपंथियों के प्रभाव में आकर हजारों चीनी मुसलमान हज यात्रा पर जाने लगे।

अभी तक चीन में जो इस्लाम परंपरागत था उसमें यह नई लहर 1761 के आसपास आई। इस नई लहर का नेता था नक्शबंदी मामिंगसिंन तब तक चीन ने पूर्व तुर्कस्तान, शिनजियांग प्रांत को जीत लिया था। नक्शबंदी संपर्क उधर से ही आया होना चाहिए। मामिंगसिन ने पूर्व तुर्कस्तान के यार्कद और काशगर के धार्मिक विद्यापीठों में अध्ययन किया था। वहां से लौटकर कान्सू प्रांत में उसने अपने संप्रदाय की स्थापना की। पारंपरिक धर्म में आक्रमकता प्रविष्ट कराने का यह प्रयत्न था। चीनी इस्लाम में चीनियों के संपर्क से जो रुढ़ियां घुस आई थी उन पर हमला बोला गया। यह स्वाभाविक ही था कि पुराने और नए में संघर्ष प्रारंभ हो गया, दंगों की शुरुआत हो गई।

नए पंथ के आक्रमक पैतरे से उत्पन्न धोखे को चीन ने पहचान लिया और कान्सू में कडे प्रतिबंध लागू कर दिए- 1. चीनियों के इस्लाम स्वीकार पर बंदी, 2. चीनी बच्चों को गोद लेकर उनके इस्लामीकरण पर बंदी, 3. प्रार्थना के लिए एक गांव से दूसरे गांव जाने पर बंदी, 4. प्रांत के बाहर के धर्मप्रचारकों के प्रांत में आने पर बंदी, 5. नई मस्जिद बनाने पर पाबंदी। मामिंगसिन के विद्रोह को कुचल दिया गया। परंतु, उसका पंथ कभी भूमिगत रुप से तो कभी खुलकर कार्य करता ही रहा। उसके इस कार्य के पीछे जिहाद की भूमिका थी। यह विद्रोह बरसों चला।

उसके बाद चीनी मुसलमानों को नया नेता मिला माहुआलुंग। जिहाद की भूमिका के साथ उसने एक और कल्पना जोड दी। वह थी महदी (उद्धारक) की 'संपूर्ण रुप से मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हारा उद्धार करुंगा"। वह स्वयं को 'त्सुंग ता आहुंग" यानी सेनापति और आचार्य कहलवाने लगा। लोगों को वह चमत्कार लगने लगा। चीनी सामग्री कहती है- उसके अनुयायी शिष्यत्व स्वीकारने के बाद एकदम कट्टर बन जाते हैं। 'कोई उनका शिष्यत्व स्वीकारने को तैयार ना हो तो उस पर सशस्त्र हमला किया जाता है। जबरदस्ती धर्मांतरण से भी उनको परहेज नहीं।" चीनी सत्ता ने पराकाष्ठा के प्रयत्न कर यह विद्रोह कुचल डाला। उसे उसके अनुयायियों सहित मार डाला गया। स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के उसके प्रयत्नों का इस प्रकार अंत हुआ। अल्पसंख्यक होकर भी सत्ता प्राप्त करने के सतत प्रयत्नों को चीनी सत्ता ने हमेशा धोखादायक महसूस किया है और यह इतिहास सिद्ध है।

शेनजियांग (काशगर) प्रांत जहां तुर्क बहुसंख्य थे। जिन्हें चीनी मुसलमान नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनकी मातृभाषा तुर्की है को चीन के मंचू राजघराने ने जीत लिया। इस प्रांत के सत्ताधारी खोजा (ख्वाजा) चीन के मांडलिक थे। 1757 में उन्होंने विद्रोह किया उसे कुचल दिया गया। तुर्कस्तानी बेग सरदारों को चीन ने सत्ता में हिस्सा दिया। 1820 में पहले के सत्ताधारी खोजाओं ने विद्रोह किया उनके नेता जहांगीर खोजा को 1828 में पकडकर मार डाला गया। पडोस के खोकंद प्रांत के अमीरों ने सतत 1830 से 1862 तक हमले किए। 1862 में शेन्सी और कान्सू प्रदेशों में हुए प्रखर मुस्लिम विद्रोहों के कारण काशगर बिल्कूल अलग-थलग पड गया इसका लाभ उठाकर खोकंद प्रदेश के तुर्क नेता याकूब बेग ने काशगर पर हमला कर स्वतंत्र मुस्लिम राज्य की स्थापना की। यह राज्य 1878 तक टिका। इस काल में चीनी सत्ता विद्रोहियों का जबरदस्त सामना करने में जुटी रही। 1876 में कान्सू प्रदेश के विद्रोह को समाप्त करने के बाद चीनी सत्ता ने काशगर पर हमला कर उसे फिर से जीत लिया। और रशिया व मध्यपूर्व की नीतियों को देखते उन्हें मांडलिक ना रखते उस प्रदेश को चीन में शामिल कर डाला।

चीन के यूनान प्रदेश का मुस्लिम विद्रोह जिसका नेतृत्व तेहसीन के पास था 19वीं शताब्दी के शेनजियांग, कान्सू, शेन्सी के संघर्षों के समान ही एक बडी घटना है। 1839 में रंगून के मार्ग से उसने मक्का की यात्रा की थी। भारत के नक्शबंदी और मुजाहिद  तथा अरबस्थान के वहाबी आंदोलनों से वह पूरी तरह परिचित था। भारत के नक्शबंदी नेता सय्यद अहमद सरहिंदी (मृ.1624), उसका पोता (औरंगजेब का गुरु घराना), शाहवलीउल्लाह जिसने नजीब द्वारा अफगानिस्तान के अब्दाली को भारत पर आक्रमण के लिए बुलावा भेजा था, जिहाद कर पंजाब में स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की चाह रखनेवाला सय्यद अहमद (मृ.1831) के जिहाद आंदोलनों का उस पर पूरा प्रभाव था। इसीने कुरान का अनुवाद चीनी भाषा मंें करना प्रारंभ किया था जिसे उसके शिष्य तूवेन सियू जो बडा ही करतबी नेता था ने पूरा किया।

इसकी यूनान में सशस्त्र लढ़ाई सफल हुई। ब्रह्मदेश के मुसलमान और भारत के मुजाहिदीनों ने इसे हथियारों की पूर्ति की थी। तूवेन सियू ने यूनान में स्वतंत्र इस्लामी राज्य की स्थापना की। 1853 से 1873 तक  यह राज्य टिका। इस राज्य में मुस्लिम अल्पसंख्यक होकर बहुसंख्य चीनियों को 'जिम्मी" बनाया गया। वातावरण को धर्मांतरणाकूल बनाया गया। कुरानप्रणीत शरीअत ही राज्य का सामान्य कानून बन गया। चीनी संस्कृति के समाजजीवन के आचार-विचारों की पहचानों को मिटाया जाने लगा। चीन के मध्य एक मुस्लिम राज्य ऐसा कभी हुआ नहीं था। चीनी राज्य सत्ता को यह सहन नहीं हुआ उसने पूरी ताकत से इस राज्य पर हमला कर उसे नष्ट कर डाला। इस संघर्ष में हजारों लोग मारे गए। चीन का अखंडत्व बना रहा।

इन सब बातों के उद्रेक का कारण था- इस्लामी जगत से संपर्क, उच्चगंड, यजमान संस्कृति के प्रति तुच्छता की और अलगाव की भावना, महदी, जिहाद की घोषणाओं का अज्ञजनों पर हुआ परिणाम, शासन का अज्ञान, उपेक्षा और अव्यवहार्य निर्बंध।

कम्यूनिस्ट शासन आने के बाद कम्यूनिस्टों की नीति मुसलमानों के बारे में बडी सख्त और सावधानता की रही। एक नीति के रुप में शेनजियांग और अन्य मुस्लिम बस्तियों वाले प्रदेशों में चीनियों को बडे पैमाने पर बसाया गया। इस पर मुस्लिमों की प्रतिक्रिया तीव्र हुई। 1958 का यह समाचार देखिए- कान्सू राष्ट्रांक समिति ने मत व्यक्त किया है कि, हुई (मुस्लिम) लोगों में स्थानीय राष्ट्रवाद बहुत फैला हुआ है। कान्सू प्रदेश में तो वह चरम पर है। मुस्लिमों के मतानुसार मुस्लिम कम्यूनिस्ट और उनके साथ सहानुभूति रखनेवाले मुस्लिम राष्ट्र के शत्रु हैं।

हुई (मुस्लिम) लोगों ने चीनी पितृभूमि और चीनी राष्ट्र इन कल्पनाओं की खिल्ली उडाई। उन्होंने घोषित किया कि, 'हुई राष्ट्र (मुस्लिम) की चीन पितृभूमि हो नहीं सकती। हुई (मुस्लिम) लोगों की मातृभाषा अरबी है। संसार के सारे हुई (मुस्लिम) एक ही परिवार के घटक हैं।" सरकारी विवरणों से जानकारी मिलती है कि- 'हुई (मुस्लिम) का कहना है कि, चीन में रहें ऐसी परिस्थिति नहीं। उन्होंने देशत्याग करने की अनुमति (परमिट) खुल्लमखुल्ला मांगी। उनका कहना है हम अरबस्तान में जाकर वहीं रहेंगे। उनमें से कुछ लोग कहते हैं कि, इस्लामी राज्य की स्थापना होकर इमाम की सत्ता चालू होगी।"

1958 में 'पीपुल्स डेली" इस समाचार पत्र ने गोपनीय जानकारी प्रकाशित की- होनान प्रांत में हुई (मुस्लिम) लोगों ने 1953 में दो बार विद्रोह किए। उनका उद्देश्य इस्लामी राज्य की स्थापना करना था। 1958 के अप्रेल और जून में निंघसिया के हुई इमाम मा चेन वू ने विद्रोह की नेतृत्व किया, उसका उद्देश्य एक चीनी मुस्लिम प्रजासत्ताक राज्य बनाएं था। उसकी घोषणा थी- 'इस्लाम का तेज चमके", 'ग्लोरी टू इस्लाम"।

वैश्विक कारणों से और वैश्विक तनावों के कम ज्यादा होने के अनुसार चीन में भी अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियों में कम या अधिक बदलाव होते रहते हैं परंतु जिस प्रकार से रशिया या मध्यपूर्व के देशों के बारे में समाचार मिलते रहते हैं वैसा चीन के संबंध में हो नहीं पाता। वहां के समाचार चीन की अभेद दीवारों को लांघकर बहुत कम ही बाहर आ पाते हैं।


Friday, June 28, 2013

तुर्की में दरकती दीवारें प्रजातंत्र की
तुर्की पूरी दुनिया में एकमात्र ऐसा इस्लामी देश है जो धर्मनिरपेक्ष है यहां की 99% जनता मुस्लिम है । वर्तमान में तुर्की युवाओं एवं मजदूर संगठनों द्वारा पिछले दो सप्ताह से भी अधिक समय से किए जा रहे 'तकसिम एकजुटता" आंदोलन और इस आंदोलन को कुचलने के लिए प्रधानमंत्री एर्दोगान की इस्लामी पार्टी द्वारा अपनाए जा रहे दमनकारी रवैये के कारण अंतरराष्ट्रीय पर चर्चा में है। बडे शहरों के युवा व्यक्तिगत आजादी एवं अनुदारवादी इस्लामी सरकार के बढ़ते नियंत्रण के विरोध में हैं। तुर्की का हर दूसरा नागरिक एर्दोगान के रवैये को निरंकुश बता रहा है। सरकार विरोधी प्रदर्शन तब प्रारंभ हुए जब सरकार ने इस्तंबूल के प्रसिद्ध गेजी पार्क में ऑटोमन काल की सैनिक बैरेक बनवाना चाहा। इस आंदोलन के फलस्वरुप हजारों जख्मी हो गए हैं व कुछ लोग मारे भी गए होकर यह आंदोलन तुर्की के सभी प्रमुख शहरों में फैल गया है।

ये एर्दोगान वही नेता हैं जिन्होंने 2007 में हिजाब (परदा) बंदी हटाएंगे का आश्वासन अपने घोषणापत्र में दिया था। उन्होंने यह भूमिका ली थी कि हिजाब पहना इसलिए नौकरी नहीं मिलेगी, पढ़ने नहीं दिया जाएगा मानवाधिकार विरोधी है। उस समय भी हजारों धर्मनिरपेक्षवादियों ने मतदान के दौरान भारी विरोध प्रदर्शन किया और सुप्रीम कोर्ट की ़शरण ली व कोर्ट ने हिजाबबंदी को कायम रखा। आंदोलनकारियों को डर है कि कहीं सरकार तुर्की का धर्मनिरपेक्ष रुप बदल ना दे। एर्दोगान तुर्की के सामाजिक जीवन में इस्लामी परंपराओं को फिर से स्थापित करने के पक्षधर हैं और विरोधियों का कहना है कि तुर्की आज जो कुछ भी है वह धर्मनिरपेक्ष होने के कारण ही है। एक इस्लामी देश में धर्मनिरपेक्षता का इतना जोर कहां से व किस प्रकार आया तथा वह धर्मनिरपेक्ष किस प्रकार से बना इसके लिए तुर्की के इतिहास का अवलोकन करना पडेगा।

इस्तंबूल तुर्की की सांस्कृतिक राजधानी। पूर्वी भाग यानी एशिया का भाग को 'अनातोलिया" (एशिया मायनर) यानी 'सूर्योदय का", 'प्रकाश का प्रदेश" तो, पश्चिम की ओर का भाग यानी 'यूरोप"शब्द का अर्थ 'सूर्यास्त का" यानी 'अंधेरे का प्रदेश"। ईसा पूर्व इसका नाम था बायजंटाईन। यहां की प्रजा में विविध उपासना पद्धतिवाले लोग थे। उनमें संघटित उपासना पद्धतिवाला समाज यानी यहूदी समाज। बाकी के समाजों के ईश्वर, कर्मकांड आदि भिन्न-भिन्न होने के बावजूद वे एकत्रित रहते थे व प्रजातांत्रिक थे।

ई.पू. 546 में पर्शियन राजा ने बायजंटाईन को जीत लिया और प्रजातंत्र नष्ट होकर एकतंत्री शासन हो गया। सन् 300 में रोमन राजा कांस्टंटटेनियस ने बायजंटाईन को जीतकर इसका नाम कांस्टंटाईन कर दिया इसका और चर्च का झगडा था और चर्च के काम में वह हस्तक्षेप किया करता था इसने स्वयं ही एक बिशप को नियुक्त कर दिया चर्च द्वारा विरोध भी हुआ परंतु इसने कुचल दिया। सन् 361 में ज्यूूलियन राजा हुआ इसने सत्ता हिजडों के हाथ में सौंप दी। सन् 390 के आसपास थियोडोसियस राजा बना वह यहूदियों के मामले में उदार था उसने ईसाइयों द्वारा उनके ध्वस्त किए गए सायनागॉग के पुनःनिर्माण की अनुमति दी और एक कानून बनाकर मूर्तिपूजा बंदी लागू कर मूर्तिपूजकों के मंदिरों को नष्ट कर दिया। इसीके काल में ईसाई परंपराओं, धर्म के विविध अर्थ निकाले जाने लगे। सन् 691 में जस्टियन के कार्यकाल में 120 फतवे निकाले गए। फतवों में अभिनय की बंदी की गई थी, स्त्रियां खुले में नाच नहीं सकती थी, स्त्रियां पुरुषों के और पुरुष स्त्रियों की पोशाक पहन नहीं सकते थे, आदि। सन् 717 में लिओ मूर्तिभंजक शासक था। ईसाई मूर्तिभंजक उसने ईसा के एक तेलचित्र को नष्ट कर दिया। सन् 1180 में कांस्टंटटिनोपल में 2500 यहूदी व उनके सायनागॉग भी थे। कोई अमीर तो कोई गरीब परंतु उनके साथ व्यवहार अपमानजनक ही किया जाता था।

सन् 1453 में ऑटोमन सुलतान दूसरे महमूद (1429-81) ने कांस्टंटटिनोपल को जीतकर उसका नाम इस्तंबूल कर दिया और वहां के चर्च 'हागिया सोफिया" का रुपांतरण 'सोफिया कबीर मस्जिद" में कर दिया। बाद में कबीर मस्जिद चर्च को रुपांतरित कर बनाई गई थी इसलिए उसने सोफिया कबीर मस्जिद के सामने ही भव्य नीली मस्जिद का निर्माण किया। पैगंबर मुहम्मद ने मदीना में जो परंपरा स्थापित की थी वह ही इस्तंबूल में टिकी। मस्जिद के आसपास इमामों के रहने के स्थान, हमामखाने निर्मित किए गए, दुकानें खुली।

तुर्की के राष्ट्रीय समाज की रचना सुलेमान (1494-1566) के काल में हुई। उसे यूरोप में मॅग्निफिसेंट और उसके साम्राज्य को 'कानूनी" यानी कानून निर्माता के अभिधान प्राप्त हुए। यह इस्लामी मान्यता के विरुद्ध था क्योंकि इन कानूनों का उद्गम 'शरीअत" से नहीं था। इस प्रकार सुलेमान मौलवियों से मुक्त हो गया। वह स्वयं ही मुफ्ती की नियुक्ति करने लगा। मस्जिदों के इमाम, कुरान पाठक आदि पगारदार सरकारी नौकर हो गए। उसने मदरसों को भी अपने अधीन ले लिया। यूरोप के लोगों पर ऑटोमन कानून लागू न करने के कारण वहां तद्देशीय व्यापारी वर्ग का उदय हुआ और व्यापार पर विदेशियों का नियंत्रण रहा।इन सुधारों का इमामों और मुल्लाओं ने विरोध किया।

सुलतान दूसरे मुहम्मद (1808-39) के काल यानी 1830 के आसपास उसने पश्चिमी पद्धति की शिक्षण पद्धति को इस्तंबूल की पाठशालाओं में लागू किया। इस शिक्षा पद्धति से निकले हुए लोग सेना और सुलतान के कामकाज में ऊंचे पदों पर जाने लगे। समाज में उनका दबदबा निर्मित हुआ और सुधारों को प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इन सुधारवादी विचारों में धर्म, सेक्यूरिज्म का प्रवाह था। मुहम्मद के पुत्रों पहला अब्दुल (1839-61) और अब्दुल अजीज (1861-76) के कार्यकाल में सुधारों को अमल में लाया गया। इन सुधारों के आंदोलन को तंजीमात कहते हैं। सुधारों का स्वरुप विविध था। कानूनों को अमल में लाने का काम उलेमाओं से छिनकर सरकारी न्यायलयों को सौंप दिया गया। मस्जिदें और शिक्षा सरकार के हाथों मे आ गई।

इन तंजीमात के एक परिणाम के रुप में युवा तुर्क के नाम से बुद्धिवादी देशभक्तों का संगठन सामने आया। इनमें से नामिक कमाल (1840-88) के सुधारों का व्यापक परिणाम हुआ। उसीने सबसे पहले देश का एक ही संविधान होना चाहिए की कल्पना लोकप्रिय की। राष्ट्रभक्ति व निष्ठा ऑटोमन पितृभू के प्रति होना चाहिए का विचार लोगों के सामने रखा। 1867 में इस्तंबूल के 'तस्वीर इ एफकार" इस वर्तमान पत्र में उसने स्त्री-पुरुष समानता के संबंध में एक लेख लिखा उसे इस्लाम विरोधी समझने के कारण वह लोगों का कोपभाजन बन गया और उसे देश छोडना पडा। 1870 में वह वापिस लौटा परंतु, उसे स्त्री स्वतंत्रता का विषय छोडना पडा। वह राष्ट्रवाद एवं स्वतंत्रता पर लिखने लगा। इस प्रकार से तंजीमात और उदार मतों का तुर्की में सूत्रपात हुआ उसकी पूर्णता 2 अप्रेल 1924 को हुई।

जिस समय ऑटोमन साम्राज्य अस्त हो रहा था उस समय तुर्कस्तान के लोग स्वयं को ऑटोमन के स्थान पर तुर्क कहने लगे। पहला महायुद्ध समाप्त होने के बाद तुर्की मित्र राष्ट्रों के चंगुल से छूटकर स्वतंत्र हुआ। इस स्वतंत्रता आंदोलन का नेता था कमालपाशा। 1922 में उसकी सत्ता दृढ़ हुई, 1923 में तुर्की एक स्वतंत्र रिपब्लिक राष्ट्र के रुप में सामने आया और विश्व पटल पर एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र के रुप में अवतरित हुआ। इसी वर्ष चुनावों में स्त्रियों का अंतर्भाव किया जाए का प्रस्ताव विधिमंडल में पारित हुआ। कमाल पाशा ने स्त्रियों के मामले में जरा सावधानी बरती उसे मालूम था कि मुसलमान स्त्रियों के संबंध में अपने पुराने विचार छोडने के लिए इतनी आसानी से तैयार नहीं होंगे।

एक जाहिर भाषण में उसने कहा 'स्त्रियों को शिक्षा मिलनी ही चाहिए केवल शिक्षा ही नहीं अपितु अच्छी शिक्षा। यदि अपने को अच्छे पुरुष, नागरिक चाहिए हों तो उनका माताएं अच्छी शिक्षित होना ही चाहिए...समाज का एक भाग पुरुष प्रगति करे और दूसरा स्त्रियों का भाग पिछडा रहा तो समाज की प्रगति कैसे होगी? ... अपन ने शुरु की हुई क्रांति तभी सफल होगी जब स्त्री-पुरुष समान स्तर पर हों, उनमें मित्रत्व का नाता निर्मित होना आवश्यक है।" तुर्की के लोगों के लिए यह सबकुछ नया था परंतु, कमालपाशा बोल रहा है इसलिए उन्होंने सुन लिया। आगे उसने कहना प्रारंभ किया कि 'यात्रा के दौरान मैंने देखा कि स्त्रियां टॉवेल या किसी कपडे से मुंह ढ़ककर बैठती हैं, पुरुष सामने आने पर चेहरा घूमा लेती हैं। एक सुसंस्कृत समाज में माता-बहनों का इस प्रकार के व्यवहार  का क्या अर्थ निकलता है। इससे अपना देश, समाज हास्य का पात्र बनता है।... स्त्रियां बुरका छोड दें। उसने स्त्री-पुरुष पाश्चात्य संगीत के ताल पर नृत्य करें इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करना प्रारंभ किए। प्रसंग ढूंढ़कर वह इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करता था। आश्चर्य की बात यह है कि नृत्य वह शुक्रवार जो मुसलमानों का पवित्र दिन है उसी दिन आयोजित करता था।

कमालपाशा ने स्त्रियों को समान अधिकार देने की व्यवस्था संविधान में 1926 में शरीअत को दूर कर एवं यूरोपीय पद्धति का एक स्वतंत्र नागरिक कानून जारी कर विवाह-तलाक-उत्तराधिकार विषयक व्यवस्थाएं उसमें की। इस कानून का आधार कोईसा भी धर्मग्रंथ नहीं था। इस कानून के अनुसार सिविल मेरिज पद्धति से विवाह करना और उसका पंजीकरण सरकार के पास करना बंधनकारक था। इसी कानून में एकपत्नीत्व की व्यवस्था भी थी, बहुविवाह गैरकानूनी था। तलाक भी न्यायालय के माध्यम से ही होते थे मुल्लाओं का कोई स्थान न था। 1928 में स्त्रियों को नगरपालिका चुनावों में मतदान का अधिकार मिला। 1933 में लोकसभा चुनावों में मतदान का अधिकार मिला। उसीके प्रयत्नों से 1935 के चुनावों में 17 स्त्रियां लोकसभा में चुनकर गई। विरोध भी बहुत हुआ क्योंकि, इस्लामी मानस के लिए यह सबकुछ एकदम नया ही था। अल्लाह, पैगंबर, धर्म इन सबको उसने ताक पर रख दिया और विरोध प्रदर्शन करनेवालों को जेल की हवा खिला दी। कानून बनाना, लागू करना प्रजातांत्रिक पद्धति से होने के कारण वह मौका आने पर पुलिसबल का उपयोग करने से भी नहीं चूकता था।

2 अप्रैल 1924 को कानून बना मदरसों पर बंदी ला दी। कमालपाशा केवल यही नहीं रुका बल्कि उसने ढूंढ़-ढूंढ़कर मदरसे बंद कर दिए। उसके पूर्व के सुलतानों ने सेक्यूलर शिक्षा देनेवाली स्कूलें जरुर खोली पर मदरसों पर पाबंदी नहीं लगाई थी।परंतु, कमालपाशा ने यह कदम उठाया। सरकार ने एक स्वतंत्र धार्मिक कामकाजों का विभाग खोलकर मस्जिदों के इमामों को सरकारी नौकर बना दिया उनके लिए भी स्कूलें खोलकर उनको विज्ञान, गणित की शिक्षा दी जाती है। कॉलेजेस में धर्मविषयक शिक्षा का गहन ज्ञान दिया जाता है, संसार के अन्य धर्मों की शिक्षा भी दी जाती है। कुरान, कुरानपठन विषय रहते हैं परंतु, कुरान का क्या अर्थ लगाना यह सरकार तय करती है। अतिरेक, आतंकवाद, गुलामगिरी का समर्थन करनेवाली कालबाह्य बातों का समर्थन करना नहीं सीखाया जाता। प्रारंभ में मुल्लाओं ने विरोध किया परंतु उन्हें बाकायदा मुकदमे चलाकर दंडित किया गया।


आज तक यह व्यवस्थाएं तुर्की में टिकी हुई हैं। इस्लामी पक्ष जरुर सिर उठा रहे हैं, परंतु जनता यह व्यवस्था भंग की जाए की मांग नहीं करती। धर्मनिरपेक्षता, संसद द्वारा बनाए कानूनों के आधार पर की गई व्यवस्था जनता में रच-बस गई है इसीलिए  एर्दोगोन जिन्होंने तुर्कस्तान के कृषकों व छोटे उद्यमियों के लिए कष्टकारी कानूनों को हटाकर विकास में आर्थिक निवेश किया। सीरिया, आर्मेनिया, यूनान जैसे शत्रु राष्ट्रों के साथ करार कर शत्रुता समाप्त की। रक्षा खर्च कम कर गांवों के विकास में खर्च किया जब वही उनकी धर्मनिरपेक्षता के आडे आने लगे तो वे आज उनके विरुद्ध अपनी स्वतंत्रता व धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए खडे हो विरोध प्रदर्शन के नए-नए तरीके अख्तियार कर रहे हैं।   

Thursday, June 20, 2013

सूत ना कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा क्यों?

भारत के फिल्म इतिहास के दो लीजेंड हैं दिलीपकुमार और देवआनंद। दिलीपकुमार जिन्होंने अपने लाजवाब अभिनय से ट्रेजेडी किंग का खिताब हासिल किया और देवआनंद जो सदाबहार ऐव्हरग्रीन चाकलेटी हीरो के रुप में जाने गए, मेटिनीकिंग के रुप में नवाजे गए। लेकिन दिलीपकुमार ने उम्रदराज होने के बाद भी अपने आदर-सम्मान को बरकरार रखा क्योंकि कब रिटायर हो जाना चाहिए इसका भान उन्होंने समय रहते रखा। वहीं देवआनंद भले ही अपने अंतिम समय तक फिल्म निर्माण के काम में लगे रहे और लोगों ने उनके बिना थके या निराश हुए फ्लाप फिल्मों की झडी (1980 में अपनी अंतिम सफल फिल्म देस-परदेस के बाद उनकी कोई भी फिल्म सफल नहीं हुई) लगाने के बावजूद अपनी लगन व समर्पण के कारण फिल्में बनाते रहने की जीजीविषा की सराहना की। परंतु अपनी नाती की उम्र की हीरोइनों के साथ हीरो के रुप में काम करते रहने और बुढ़ापे का असर चेहरे चाल-ढ़ाल में दिखने के बावजूद हीरो के रुप में डटे रहने के कारण अंततः वे हास्य के पात्र ही बने और अपना वह सम्मान जिसके वह वास्तव में हकदार थे खो बैठे।

जो हाल देवआनंद का हुआ वही हाल अब आडवाणी का हो रहा है। माना कि वे आज भी पूरी तरह स्वस्थ एवं कार्यक्षम हैं परंतु, जमाना बदल गया है, वे अब चूक गए हैं समय रहते उन्हें रिटायर हो स्वयं होकर पार्टी के मार्गदर्शक की भूमिका में आकर युवा नेतृत्व के लिए स्थान रिक्त कर देना था। परंतु उन्होंने किया क्या जब स्पष्ट दिख रहा था कि पार्टी धीरे-धीरे मोदी के पीछे लामबंद होती जा रही है, ऐसे समय में बीमारी का बहाना बनाकर कोपभवन में जा बैठना, बाद में इस्तीफे का ब्रह्मास्त्र चलाना फिर पीछे घूम की स्थिति में आ जाना, अपन पराजीत हो गए हैं कि स्थिति में स्वयं को लाना आडवाणी जैसे तपे-तपाए राजनीतिज्ञ ने जो इतना विचारवान और कुशाग्र हो कि आठ माह पूर्व साक्षात्कार में दिए हुए उत्तर के बाद आज की तारीख में दिए हुए उत्तर में ऐसा कोई विरोधाभास नजर आए कि कोई स्पष्टीकरण देना पडे या गलतफहमी पैदा हो, ऐसा कभी होते दिखा नहीं ऐसा परिपक्व आजीवन अपने ध्येय के लिए समर्पित रहनेवाला राजनेता स्वयं को हंसी का पात्र बनवा लेनेवाला इस प्रकार का उपक्रम, जब स्पष्ट दिख रहा था कि मोदी का प्रभाव बढ़ गया है करेगा ऐसा लगा नहीं था। परंतु ऐसा हुआ और वे फजीहत को प्राप्त हुए।

लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को कराची में एक खुशहाल उच्चमध्यमवर्गीय परिवार में ज्येष्ठ पुत्र के रुप में हुआ। उनका मूल नाम लाल और पिता का कृष्ण परंतु कालांतर में उसका हो गया लालकृष्ण। उनकी शिक्षा कराची के प्रसिद्ध सेंट पॅट्रिक्स स्कूल में हुई इस कारण प्रारंभ में उन पर फादर एवं नन्स के संस्कार हुए। उनके एक मामा रामकृष्ण मीरचंदानी थे जो कांग्रेस का कार्य करते थे परंतु उनके जीवन पर मामा के विचारों का कोई प्रभाव नहीं पडा। घर में किसी भी तरह का सामाजिकता का भान न होने के बावजूद वे रा.स्व.से. संघ की ओर आकृष्ट हुए। 1942 में 15 वर्ष की अवस्था में आडवाणी अपने ननिहाल हैदराबाद आए और वहां राम कृपलानी के घर की छत पर लगनेवाली संघ की शाखा में अपने चचेरे भाई प्रीतम और एक अन्य रिश्तेदार हीरु के साथ मात्र उत्सुकतावश गए। वहां शामलाल का बौद्धिक था और विषय था 'हिंदुत्व"। आडवाणी को संघकार्य का महत्व समझ में आया और वे हमेशा के लिए संघ के सच्चे स्वयंसेवक बन गए।

इसी दौरान उन्होंने एक पुस्तक पढ़ी 'ऐ वार्निंग टू द हिंदू सोसायटी" जिसे मूलतः एक ग्रीक परंतु विवाहोपरांत हिंदू बन चूकी विद्वान महिला 'सावित्रीदेवी" ने लिखा था। इस ग्रीक महिला ने इस पुस्तक में इशारा दिया था कि, 'तुम जाग जाओ। अभी भी समय गया नहीं है। ब्रिटिशों (ईसाई) के केवल राजनैतिक ही नहीं तो सांस्कृतिक आक्रमण के कारण जिस प्रकार से ग्रीक संस्कृति रसातल में चली गई उसी प्रकार से हिंदू संस्कृति भी रसातल में चली जाएगी। इसलिए हिंदुओं अब तो भी जाग जाओ। सामने की परिस्थिति का सामना करो।" इस पुस्तक एवं शामलाल के बौद्धिक के विचारों के कारण आडवाणी के जीवन की दिशा ही बदल गई। और शिक्षा छोड संघ प्रचारक बनने का निर्णय उन्होंने 1946 में ले लिया। उस समय वे इंजीनियरिंग के द्वितीय वर्ष में पढ़ रहे थे। इसी वर्ष वे नागपूर में संघ के तृतीय वर्ष के शिविर के लिए आए थे उनके साथ केदारनाथ साहनी, के. आर. मलकानी भी थे। संघ के घोष पथक में वे बांसुरी बजाया करते थे। अधिकाधिक बच्चों पर संघ संस्कार हो सके इसके लिए वे कराची के मॉडल हायस्कूल में शिक्षक की नौकरी करने लगे।

विभाजन के पश्चात 12 सितंबर 1947 को चोरी-छिपे हवाई मार्ग से भेस बदलकर हमेशा के लिए भारत आ गए और 1952 में जनसंघ की स्थापना के पश्चात राजस्थान में जनसंघ का कार्य करने लगे। बाद में प्रचारक का कार्य छोडकर 'ऑर्गनायजर" में पत्रकारिता करने लगे। आपको आश्चर्य होगा परंतु,1964 में ऑर्गनायजर में वे सिनेमा विषयक स्तंभ लिखने लगे। आयु के 37वें वर्ष 1965 में वे कमलाजी से विवाहबद्ध हो गए। उन्हें एक पुत्र जयंत एवं पुत्री प्रतिभा है। उनके परिवार से कोई भी राजनीति में  सक्रिय नहीं है।

उनका इतिहास गवाह है कि वे परास्त जरुर होते रहे हैं परंतु, हताश नहीं। इसलिए वर्तमान में नजर आ रही उनकी हार को हार मान लेना भूल करना होगा। जिन्होंने विभाजन की त्रासदी भोगने के बाद निर्वासित के रुप में भारत आकर 1948 में गांधी हत्या के बाद संघ पर आए भयंकर संकट का सामना एक प्रचारक के रुप में किया हो, 1952 में 3, 1957 में 4, 1962 में 14 सांसद पार्टी के चुने गए, ऐसे संघर्षपूर्ण काल में अडिग रहकर सतत बिना विचलित हुए कार्य करते आपातकाल रुपी विपरीत काल भी देखा और भोगा भी। 1984 में 2 सीटों पर पहुंच गई पार्टी को 2 से 186 तक का सफर तय करवाया हो जिनकी पार्टी पर इतनी पकड थी कि पार्टी में अटल टू आडवाणी और आडवाणी टू आडवाणी के अलावा अन्य कोई पार्टी अध्यक्ष वह रुतबा ही हासिल नहीं कर पाया जो आडवाणी का था। वह निश्चय ही इतनी जल्दी हार मानकर हताश हो, अपनी उपेक्षा सह अपमान का घूंट पीकर चुप बैठ जाएंगे, प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी छोड देेंगे लगता नहीं।

जिन मुद्दों को उठाकर आडवाणी ने इस्तीफा दिया था वे तो उनके कार्यकाल में भी मौजूद थे लेकिन तब वे उन्हें नजर नहीं आए और आज अचानक नजर आने लगे। राजनीति के इस माहिर खिलाडी द्वारा इस्तीफा देकर पार्टी को धर्मसंकट में डालना फिर वापिस लेना एक सोची समझी रणनीति ही नजर आती है भले ही इससे पार्टी की साख को बट्टा लग गया हो । इस बदलते परिवेश में पार्टी के अंदर अपने समर्थन में कौन, किस प्रकार के और कितने हैं तथा पार्टी के बाहर अपने पक्ष में कौन खडे हो सकते हैं, अपनी मान्यता कितनी है का जायजा लेने के लिए अपनाई गई एक रणनीति है। मोदी की प्रधानमंत्री के लिए चल रही घुडदौड में बाधा डालना मात्र है। हां उनके इस कदम से यह जरुर हो गया है कि मोदी को तत्काल प्रधानमंत्री पद का पार्टी प्रत्याशी घोषित करना हालफिलहाल टल गया है और भविष्य में लिए जानेवाले फैसलों में उनकी सलाह जरुर ली जाए ऐसी परिस्थिति निर्मित करने में वे सफल हो गए हैं। वर्तमान में वे सभी पदों पर बने हुए हैं।

इसके पूर्व सन् 2005 में जिन्ना की तारीफ में कसीदे पढ़ना भी अपनी छबि बदल स्वयं को सेक्यूलर कहलवा पार्टी के बाहर अपनी मान्यता बढ़ाने का एक उपक्रम ही तो था। परंतु यह प्रयास सफल हो, चर्चित हो उसके पूर्व ही पार्टी में हुए भारी विरोध के कारण वे अपनी छबि को धक्का जरुर पहुंचा बैठे। वैसे अभी उन्होंने जो रणनीति अपनाई है उसका परिणाम तो चुनाव बाद ही नजर आएगा। परंतु, अब परीक्षा की घडी तो मोदी की है जिन्हें चुनाव प्रचार प्रमुख के रुप में पार्टी को इतनी सीटें जीतवाकर लाना है कि सरकार बनाने के लिए अन्य छोटी-मोटी पार्टियां उनके साथ स्वयं होकर जुडें और एक वृहत्तर एनडीए का गठन हो उनका प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो सके। वरना इतिहास फिर से दोहराए जाने कि संभावना है कि गठबंधन के लिए सर्वमान्य नेता के रुप में आडवाणी को ही चुना जाए। भले ही आज एनडीए विघटित होते दिख रहा हो परंतु, भाजपा को सबसे अधिक सीटे मिलने की स्थिति में हालात बदल भी सकते हैं। नए दल जुड भी सकते हैं। वैसे जो भी होगा वह तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा हुआ है।

लेकिन अपनी अतिमहत्वाकांक्षा की जद में आकर वह यह भूल बैठे कि जिस आक्रमकता के लिए वे जाने जाते थे वह आक्रमकता अब गायब हो गई है। पार्टी मूलतः ही जुझारु एवं आक्रमक प्रवृत्ति की है और जब भी वह आक्रमक स्थिति में आती है आपसी फूट, विवादों को भूलकर एकजुट हो विजय के पथ पर अग्रसर होती है। 90 के दशक की आक्रमकता अब आडवाणी में रही नहीं है, वे पार्टी कार्यकर्ताओं में वह जोश भी नहीं भर सकते जो वे भर दिया करते थे और पार्टी अब पुनः 90 के दशक के मार्ग पर बढ़ चली है इसलिए अब पार्टी कार्यकर्ता भी उनके पीछे नहीं आक्रमक मोदी के पीछे हैं।

'गांधीनु गुजरात को मोदीनु गुजरात" में बदलनेवाले नरेंद्र मोदी के बारे में सबसे पहले विहिप के अशोक सिंघल ने कहा था- 'मोदी आज नेहरु जितने ही लोकप्रिय हैं।" यह लोकप्रियता मोदी ने लोगों की इच्छाओं आकांक्षाओं पर सवार होकर हासिल की है और जब कोई नेता यह सफलता हासिल कर लेता है तो उस नेता की इच्छाएं आकांक्षाए, संकल्पनाएं जनता की हो जाती हैं और वह नेता के पीछे चलना प्रारंभ कर देती है। यह सफलता हासिल करनेवाले मोदी का जन्म गुजरात के मैहसाणा जिले के वडनगर में 17 सितंबर 1950 को हुआ था। शालेय जीवन में ही वे संघ के प्रचारक बन गए। शीघ्र ही वे अ.भा. विद्यार्थी परिषद के अध्यक्ष बने। आपातकाल में उन्होंने सरकार विरोधी पत्रक बांटने का काम किया। पॉलिटिकल साइंस में वे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त है। 1987 में गुजरात भाजपा में प्रवेश कर एक ही साल में पार्टी महासचिव बने। 1995 में भाजपा को सत्ता प्राप्त होने पश्चात वे राष्ट्रीय  सचिव बने और पांच राज्यों की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। 1998 में दिल्ली की सत्ता भाजपा को दिलाने में उनका अहम योगदान था। आडवाणी की अयोध्या यात्रा और मुरलीमनोहर जोशी की एकता यात्रा के प्रबंधन की धुरा उन्होंने ही सफलतापूर्वक संभाली थी। गुजरातियों की अस्मिता जागृत करने में सफलता प्राप्त करने के कारण ही आज मोदी गुजरात में अजेय है इसके लिए उन्होंने महान स्वतंत्रता सेनानी श्यामजीकृष्ण वर्मा के अस्थि कलश की यात्रा निकालने जैसा कार्य भी किया। 

मोदी गुजरात में अजेय कैसे बने और आज राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें जो भारी लोकप्रियता प्राप्त है वह उन्हें कैसे मिली उसके भी कुछ कारण और विश्लेषण इस प्रकार हैं-

1. भुज के भूकंप के समय केशुभाई मुख्यमंत्री थे और कुशासन-भ्रष्ट प्रशासन के कारण लोग इतने बेहाल हो गए थे कि लोग कटाक्षपूर्वक कहने लगे थे कि, यदि कांग्रेस को जीतना है तो वह प्रतिदिन प्रार्थना करे कि केशुभाई मुख्यमंत्री बने रहें वे अपनेआप चुनाव जीत जाएंगे। परंतु, नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बन गए और पासा पलट गया भाजपा फिर से सत्ता में आ गई। इसके बाद उन्होंने विकास और सुशासन की वो लहर चलाई कि उनके विरुद्ध सांप्रदायिकता कासतत धुआंधार प्रचार करनेवाले भी इस मामले में उनके मुरीद हो गए।

2. मोदी कभी पार्षद का चुनाव तक नहीं लडे बल्कि सीधे मुख्यमंत्री बने लेकिन संगठन पर पकड और संगठन को खडा करने के लिए वे गांव-गांव घूमे थे और इसी कारण 1984 में चली राजीवगांधी की आंधी में भी उन्होंने पार्टी को गुजरात में टिकाए रखा। अपनी इसी क्षमता एवं योग्यता के कारण मुख्यमंत्री बनने के बाद सफलता पूर्वक प्रशासन पर अपनी पकड बना ली और गुजरात को विकास की राह पर ले आए।

3. उनके द्वारा गुजरात में किए गए चौतरफा विकास, दंगारहित एवं शांत गुजरात, जहां कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्तम है महिलाएं आम जनता अपनेआपको सुरक्षित महसूस करते हैं, औद्योगिक शांति एवं बिजली, पानी, सडक, शीघ्र भूमि उपलब्ध हो जाती है के कारण देश के शीर्ष उद्योगपति एवं युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध होने के कारण युवा तक आज उनके सबसे बडे समर्थक बन गए हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार युवाओं के समर्थन के तीन कारण हैं- अ). वे एकमात्र नेता हैं जो पाकिस्तान द्वारा की जा रही हरकतों का करारा जवाब दे सकते हैं। ब). वे एकमात्र नेता हैं जो निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। स). वे ही ऐसे नेता हैं जो देश को प्रगति के पथ पर ले जा सकते हैं।

लेकिन यह भी एक बहुत बडा सच है कि गुजरात पहले से ही एक विकसित एवं सुसंपन्न राज्य रहा है, अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थित का भी उसे बहुत लाभ मिलता चला आया है, लेकिन विपक्ष एवं तथाकथित सेक्यूलर मीडिया द्वारा सांप्रदायिकता के नाम पर उनके खिलाफ इतना शोर मचाया गया कि सारे देश-विदेश के लोगों का ध्यान मोदी और गुजरात की आकर्षित हो गया और इसीके कारण उनके द्वारा किए गए विकास के कार्य लोगों की नजरों में चढ़ गए। इसमें मोदी का मीडिया प्रबंधन कौशल भी बहुत काम आया जिसमें वे अत्यंत माहिर हैं यह उनका मीडिया प्रबंधन कौशल ही है कि उन्होंने खुद होकर कभी भी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं पर मीडिया एवं विपक्ष ही सबसे अधिक शोर मचा रहा है कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, वे प्रधानमंत्री बन गए तो बडा भारी अनर्थ हो जाएगा।

जब भी किसी राजनेता के विरुद्ध सब लोग लामबंद होकर गरियाने लगते हैं तो जनता का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो जाता है और लोग आगे होकर दोनो ही पक्षों के ही कार्यों पर नजर रख उनका मूल्यांकन करने लगते हैं, उसके साथ सहानुभूति रखने लग जाते हैं। याद कीजिए जनता पार्टी का शासन काल उस समय इंदिरा गांधी के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया था नतीजा क्या हुआ इंदिराज सत्ता में ढ़ाई साल में ही लौट आई। यही सोनिया गांधी के मामले में भी हुआ। लेकिन इससे सबक सीखने की बजाए वही इतिहास मोदी के साथ दोहराया जाने लगा उसका लाभ भी मोदी को मिला। परंतु, यही लाभ वे अपने अतिअहंकार, गर्वोक्तियों एवं अशालीन तथा अतिआक्रमक भाषा के कारण कहीं गंवा ना दे।

4. मोदी पर आरोप है कि उन्हें बडी जल्दी मची है प्रधानमंत्री बनने कि तो इसके भी कारण हैं हर अपने आपको योग्य समझनेवाला राजनेता प्रधानमंत्री बनने की चाह रखता है और ऐसी चाह रखनेवालों में आडवाणी, नीतिशकुमार से लेकर कई राजनेता शामिल हैं। परंतु, इस दौड में मोदी भारी इसलिए नजर आ रहे हैं क्योंकि इस समय सबसे बडे करिश्माई व्यक्तित्व के धनी वे ही हैं उनके पीछे जनाधार भी नजर आ रहा है, सर्वेक्षणों में भी उन्हें ही बढ़त मिलती नजर आ रही है। आज की तारीख में उन्हें जितनी लोकप्रियता हासिल है वह अटलजी को तो प्रधानमंत्री बनने के बाद ही हासिल हुई थी। इसीका लाभ वे उठाना चाहते हैं।

सोशल साईट्‌स पर भी मोदी ही छाए हुए हैं। ऊपर जिन कारणों की चर्चा की गई है वे गुजरात के संदर्भ में तो ठीक हैं परंतु वे ही कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी सटिक बैठेंगे क्या, यह एक प्रश्न ही है! सबसे पहली बात तो यह है कि आज जो मोदी मोदी का शोर चारों तरफ है वह चुनावों तक यथावत रह भी पाएगा क्या? जिस जनाधार की चर्चा की गई है वह देश के कई प्रदेशों में जबरदस्त जातिगत राजनीति के चलते बरकरार रह पाएगा? वह मतदानवाले दिन मतों में बदलकर मोदी को समर्थन दिला पाएगा? यह सब तो नतीजों के आने के बाद ही पता चल पाएगा। कांग्रेस कौनसे मुद्दों पर चुनाव लडेगी, कौनसी रणनीति अपनाएगी यह भी सामने आना है, यह भी देखना पडेगा कि तीसरा मोर्चा बनता भी है या नहीं उसमें कौन-कौन से दल होंगे, वे क्या रणनीति अपनाते हैं, चुनावों से पहले व चुनावी नतीजों के बाद कौन किस पाले में जाता है, आदि।

सबसे वरिष्ठ नेता आडवाणी 2009 में असफल सिद्ध हो चूके हैं, भाजपा में मोदी जितने जनाधारवाले राजनेता नजर भी नहीं आ रहे हैं। सत्तारुढ़ दल के कुशासन एवं घोटालों से लोग तंग आ चूके हैं इसीका लाभ उठाने के लिए मोदी ने आक्रमक रुख अख्तियार कर लिया। परंतु, आडवाणी भी अपनी वरिष्ठता, पार्टी के लिए किए गए त्याग, तपस्या, बलिदान का प्रतिफल चाहते हैं, वे यह भी जानते हैं कि मिलीजुली सरकारों के युग में एनडीए में अपनी सेक्यूलर छवि बनाने के लिए एवं स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए किए प्रयत्नों के कारण गठबंधन के नेता के रुप में उनकी स्वीकार्यता मोदी से अधिक है और मोदी भी वर्तमान हालात को अपने लिए सुनहरा मौका मान दौड में सबसे आगे निकलने की फिराक में हैं इसीलिए आज जब कब चुनाव होंगे तक का किसी को पता नहीं है फिर भी 'सूत ना कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा जारी" की कहावत चरितार्थ की जा रही है।


Friday, June 7, 2013

इस्लाम में मूर्तिभंजन की परंपरा
इस्लाम मूर्तिपूजा का निषेध करता है। क्योंकि, इस्लाम की मान्यता है कि, ईश्वर एक ही है और वह अल्लाह है, इसके अलावा अन्य कोई ईश्वर नहीं इस एकेश्वरवाद पर श्रद्धा रखना यह इस्लाम का पहला और मूलभूत सिद्धांत है। मूर्तिपूजा का विरोध इस सिद्धांत का उपसिद्धांत है। क्योंकि, मूर्ति को मानना मतलब एकमेव अल्लाह के सिवाय अन्य देवी-देवताओं को मानना है अथवा अल्लाह के एकाध प्रतिस्पर्धी को मानना है यानी अनेकेश्वरवाद/बहुदेववाद को मानना है और यही विवाद का मुद्दा भी है।

कुरान मूर्तिपूजा को सबसे बडा धर्मद्रोह, गंदगी मानती है और उसका कठोरता से निषेध करती है। कुरान की आयत 22ः30 में कहा गया है- ''बुतों (मूर्तियों) की गंदगी से बचो।"" इस आयत पर दअ्वतुल कुर्आन का भाष्य इस प्रकार है : ''बुतों की गंदगी से तात्पर्य आस्था एवं आचरण की वह गंदगी है जो मूर्तिपूजा के फलस्वरूप पैदा होती है। ऐसे लोेग व्यर्थ के भ्रमों, अंधविश्वासों और मानसिक निकृष्टता में लिप्त रहते हैं। मनुष्य के अंतर्मन को पाक साफ रखने वाली चीज एकेश्वरवाद की धारणा और ईमान ही है। बहुदेववाद तो मनुष्य के अंर्तमन को गंदगियों से भर देता है।'' (दअवतुल कुरान खंड 2 पृ. 1131) इसीलिए कुरान का सम्पूर्ण और मुख्य जोर शिर्क (अनेकेश्वरवाद) एवं मूर्तिपूजा नष्ट करने पर है।

एकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा विरोध इन दोनो ही प्रमुख बातों को मुहम्मद साहेब उन्हें पैगंबरत्व प्राप्त होने के पूर्व से ही मानते थे। एक बार उन्होंने स्पष्ट किया था कि, 'जन्म से ही मैंने मूर्ति के प्रति गहरा द्वेष और बैरभाव पाल रखा है।" मक्कावासी कट्टर मूर्तिपूजक थे और उन्हें मूर्तिपूजा का विरोध कदापि सहने होनेवाला नहीं था यह बात मुहम्मद साहेब अच्छी तरह जानते थे इसलिए प्रारंभ में उन्होंने अपने इस्लामधर्म का प्रचार अपने निकटस्थों में गुप्त रुप से किया। तीन वर्षों में उन्हें केवल 33 अनुयायी मिले। तीन वर्षों पश्चात उन्हें खुले प्रचार का संदेश अल्लाह से प्राप्त हुआ जो इस प्रकार से है

 ः ''ऐ (वही यानी आयत के प्रभाव से) चादर ओढे हुये (पैगंबर!) उठो और लोगों को सचेत करो, और अपने परवरदिगार की बडाई (का बखान) करो, और अपने कपडों को पाक रखो, और (मूर्तिपूजा की) नापाकी से अलग रहो। और (इहसान से) जियाद: बदला पाने के लिए किसी पर इहसान न करो, और अपने परवरदिगार (की कुदरत) पर सब्र रखो। फिर (उस कियामत के दिन) जब सूर (नरसिंहा) फूंका जायगा, तो वह दिन (श्रद्धाहीनों के लिए) बडा कठीन होगा। कि उसमें श्रद्धाहीनों को (यानी गैर-मुस्लिमों के लिए) आसान न होगा।"" (74:1-10)

असत्य धर्म के विषय में तटस्थ रहकर अथवा गुप्त रुप से प्रचार करके नहीं चलेगा बल्कि सत्य धर्म की विजय के लिए खुले रुप से प्रचार करना होगा। ऐसा अल्लाह का संदेश था। इसी समय आगे का संदेश भी अवतरीत हुआ : ''(नहीं), बल्कि हम (यानी अल्लाह) सच को झूठ पर खींच मारते हैं तो वह उसके सिर को कुचल देता है फिर वह (झूठ) उसी दम मटियामेट हो जाता है। (और लोगों !) तुम जैसी बातेें बनाते हो उससे तुम्हारी ही खराबी है ।'' (21:18) ''पस जो तुमको आज्ञा हुई है उसे खोलकर सुना दो । ''(15:94) इस प्रकार के प्रचार की परिणिती मूर्तिभंजन में होना थी और आगे चलकर शक्ति संपन्न होने पर वह हुई भी।

वैसे भी मूर्ति के प्रति द्वेष और भंजन तो सेमेटिक (यहूदी, ईसाई, मुस्लिम) धर्मों की परंपरा ही है और इन तीनों के ही समान पूर्वज हैं इब्राहीम जिनकी सारे पूर्व पैगंबरों में सर्वाधिक प्रशंसा कुरान में की गई है। मुहम्मद साहेब, इब्राहीम के चालीसवें वंशज थे, ऐसा माना जाता है। इब्राहीम के दो लड़के थे, इस्माईल और इसहाक। दोनों ही बाद में पैगंबर बने। इस्माईल से आगे जो वंश तैयार हुआ वह मुस्लिमों का था। वे मुस्लिमों के पैगंबर बने। इसहाक से जो वंश तैयार हुआ वह यहूदी लोगों का था। वे यहूदियों के पैगंबर बने। बाइबल में उनका नाम अब्राहम है। इस प्रकार ये तीनों ही धर्मों के श्रद्धेय पैगंबर हैं। कुरान का कहना है :''और कौन है जो इब्राहीम के दीन से मुंह फेरे, सिवा उसके जो अपने को बिल्कुल बे अकली के सुपुर्द कर दे । और बेशक हमने इब्राहीम को दुनिया-लोक में चुन लिया, और आखिरत (परलोक) में (भी) वह सदाचारियों में होंगे । जब उनसे उनके पालनकर्ता ने कहा कि (मेरे) आज्ञाकारी (मुस्लिम) बनो, (तो जवाब में) निवेदन किया कि मैं सारे संसार के स्वामी का आज्ञाकारी (मुस्लिम) हुआ... इब्राहीम अपने बेटों को वसीयत कर गए, कि ऐ मेरे बेटो! बेशक अल्लाह ने इस दीन को तुम्हारे लिए पसंद फरमाया है तो तुम मुस्लिम (अल्लाह के अनुवर्ती) होने की हालत ही में मरो।'' (2:130-132) अर्थात् इस्लाम धर्म मूलत: इब्राहीम को बताया हुआ है।

उन्होंने मार्गदर्शन स्वरुप क्या किया वह कुरान में इस प्रकार से आया हुआ है ः''फिर (इब्राहीम ने एक दिन उन लोगों की गैर मौजूदगी में उन)बूतों को (तोड़-फोड़कर) टुकड़े-टुकड़े कर दिया""(21ः58) जब मूर्ति एवं मूर्तिपूजा से इतनी घृणा है तो स्पष्ट है कि, उसके पूजकों से घृणा होगी ही होगी वे निंदा के पात्र, घृणास्पद होंगे ही। कुरान में कहा गया है ः''अल्लाह के नजदीक सबसे खराब वह जीव है (worst of beasts) जो कुफ्र (इस्लाम से इंकार) करते हैं, फिर वह श्रद्धा नहीं लाते ।""(8:55) वैसे ही (8:22) ''(अल्लाह को छोड़कर) शैतान को पूजनेे लगे थे, तो यही लोग दर्जे में खराब ठहरे, और सीधी राह से बहुत दूर भटक गए।""(5:60) ''उन्होंने (इब्राहीम ने) अपनी कौम (मूर्तिपूजक लोगों) से कहा कि हम तुमसे और जिनको तुम अल्लाह के सिवाय पूजते हो उनसे विमुख हैं । और हममें और तुममें दुश्मनी और बैर हमेशा के लिए खुल पड़ा।""(60:4) इसी कारण से इब्राहीम के वंशज ईसाई और मुसलमान हम मूर्तिपूजकों को पैगन-काफिर कहकर हमें निकृष्ट समझते हैं, नरकगामी समझते हैं और दोनो ने ही हिंदुस्थान में मूर्तिभंजन किया है।

इतने स्पष्ट आदेश होने के बावजूद तथाकथित सेक्यूलर विद्वान इस्लाम और उसके अनुयायियों को पाक साफ समझते हैं तथा उनको मूर्तिभंजन के आरोपों से बचाने के लिए नए-नए और अजीबोगरीब तर्क गढ़ने से बाज नहीं आते। विगत दिनों जब दक्षिण भारत में एक प्रसिद्ध मंदिर से अकूत खजाना मिला तो इन्हीं तथाकथित सेक्यूलरों में से एक ने एक लेख लिखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मंदिरों के इस प्रकार के अकूत धन को लूटने के लिए ही मुहम्मद गजनी जैसे इस्लामधर्मी हिंदुस्थान में आए, आक्रमण किया और रही बात मूर्तिभंजन की तो वह कश्मीर में राजा हर्षवर्धन और उसके मंत्री ने भी किया था।

यहां हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि यह राजा हर्षवर्धन अपवाद है जिसने मूर्तिभंजन किया और मंदिरों को लूटा और उसने जो कुछ किया उसके लिए उसे कोई धार्मिक आदेश नहीं था। यह हमारी परंपरा नहीं। हमारे यहां तो आद्य शंकराचार्य इधर तो अद्वैत का दर्शन देते हैं उधर मूर्तिपूजकों के लिए भी सिद्ध मंत्रों की रचना करते हैं किसी तरह का कोई द्वेष नहीं। आर्य समाज के स्वामी दयानंद सरस्वती एकेश्वरवादी होकर मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं परंतु, मूर्तिभंजन करो का न तो कोई आदेश देते हैं ना ही स्वयं करते हैं। जबकि इसके विपरीत स्वयं मुहम्मद साहेब ने मूर्तिभंजन किया भी और मूर्ति को लूटने का कार्य भी उन्हीं के पैगंबरत्व काल में हुआ था जो उन्हीं के इस्लाम के अनुयायियों ने इस प्रकार से दर्ज कर रखा है-

मक्का विजय के बाद पैगंबर तत्काल ही पवित्र काबागृह गए । वहां पवित्र 'काले पत्थर" का भक्तिभाव से अभिवादन किया, प्रेम से चुंबन लिया, 'अल्लाह हो अकबर' (अल्लाह सर्वश्रेष्ठ है) की घोषणा की। उसके बाद उन्होंने परंपरानुसार काबागृह की सात बार परिक्रमा की काबागृह में कुल 360 मूर्तियां थी। अनेक देवी-देवताओं के, पूर्व पैगंबरों के चित्र थे। पैगंबर ने उनके हाथ की लकड़ी से निर्देश किया। उस अनुसार उनके आदेश पर प्रत्येक मूर्ति इस तरह फोड़ डाली गई कि तोडी गई मूर्ति नीचे जमीन पर मुंह के बल   गिरे। भग्न मूर्तियों का ढ़ेर हो गया। प्रत्येक मूर्ति को तोड़ते समय और नीचे गिराते समय पैगंबर बड़ी जोरों से कुरान की यह आयत कहते थे :'सत्य प्रकट हो गया और असत्य मिट गया, बेशक असत्य तो मिटनेवाला होता ही है।" (17ः81, 34:49) 

इस प्रकार सारी मूर्तियां कुछ ही समय में मिट्‌टी में मिला दी गई,  इस्लाम के अनुसार मूर्ति याने अल्लाह को आव्हान था; अल्लाह से स्पर्धा करना था, वह अल्लाह से विद्रोह था; वह अल्लाह विरोधी गुनाह था। इस कार्य में आज काबागृह तक ही सफलता मिली थी। वहां हुबल की जो प्रमुख और प्रचंड मूर्ति थी, वह पैगंबर ने अली के कंधों पर खड़े रहकर स्वयं के हाथों से फोड डाली। उसके जमीन पर गिरने पर टुकड़े कर दिए गए। उसके बाद इस स्थान पर के चित्र नष्ट किए गए। उनमें इब्राहीम, इस्माईल, इन पैगंबरों के और मेरी के चित्र भी थे। चित्र नष्ट करते समय पैगंबर ने प्रार्थना की : 'अल्लाह इन श्रद्धाहीनों का नाश करेे।" इसके बाद शहर भर में डोंडी पिटवाई गई कि : 'जो कोई अल्लाह पर और अंतिम निर्णय दिन पर श्रद्धा रखता है, वह उसके घर में कोई भी मूर्ति न रखे यदि हो तो उसे नष्ट कर डाले।" पैगंबर ने मक्कावासियों का आवाहन किया कि, वे एकमेव अल्लाह को मानें; उन्हें अल्लाह के पैगंबर के रुप में मान्य करें; श्रद्धा अर्पण करें, उनकी आज्ञा का पालन किया जाए। 

संक्षेप में,लोग श्रद्धावान बनें; इस्लाम का स्वीकार करें ऐसा आवाहन किया गया। मक्का विजय के संबंध में वे आगे बोले : 'अल्लाह ने अपना वचन पूर्ण किया और उसके दासों की मदद की। उसने अकेले ही सारी शत्रु सेना को धूल चटा दी। सभी पुराने गर्व, बदला लेने के और रक्त के बदले के सभी अधिकार आज मेरे पैरों तले हैं ...ऐ कुरैश लोगों ! अल्लाह ने श्रद्धाहीनता का अभिमान नष्ट किया है। तुम्हारे अज्ञान काल का सारा अभिमान और उच्च कुल का गर्व आज मिट्‌टी में मिल गया है। सभी मनुष्य इसी मिट्‌टी से जन्मे हुए आदम के ही वंशज हैं।"

इसी प्रकार से तायफ शहर की जीत के बाद पैगंबर ने निर्णय दिया था कि, 'इस्लाम और मूर्ति एक साथ रह नहीं सकते। (सभी) मूर्तियों को एक दिन के अंदर मटियामेट कर दिया जाए।" मूर्ति और मंदिर नष्ट करने के लिए भूतपूर्व मक्का प्रमुख अबू सुफियान और एक को नियुक्त किया गया। उन्होंने तायफ जाकर वहां स्थित अल-लात की भव्य मूर्ति गेंती की चोटें मारकर चकनाचूर कर दी। अपनी इस मूर्ति की यह दशा देखकर शहर की औरतें छाती पीटकर आक्रोश करके रो रही थी। उस मंदिर में बहुत सारी संपत्ति और मूर्ति पर बहुत कीमती ऊंंचे दर्जे के जेवरात थे। मूर्ति फोड़ी जाने वाली है यह मालूम होते हुए भी मूर्ति को दु:ख पहुंचेगा इसलिए वे जेवरात वहां के लोगों ने नहीं उतारे। मूर्ति फोड़ने के लिए गए हुओं ने वह संपत्ति और जेवरात अपने कब्जें में ले लिए। मूर्ति फोड़ने के बाद वहां की संपत्ति लूटने का यह पहला ही उदाहरण था। मक्का विजय के समय भी वहां की सम्पत्ति लूटी नहीं गई थी। पैगंबर के बाद के समय में भर इस्लाम का प्रसार, मूर्ति का भंजन और वहां की संपत्ति की लूट इन तीनों घटनाओं का एक दूसरे में मिश्रण हो गया था।


मुहम्मद साहेब ने जो कुछ किया वह सुन्नत है और उस सुन्नत का पालन करना मुस्लिमों का आदर्श है। इसीलिए आज भी मुसलमान जब भी मौका मिलता है मूूर्तिभंजन से बाज नहीं आते और समय-समय पर होेनेवाले दंगों या होनेवाली सांप्रदायिक घटनाओं में इस आदर्श को आचरण में लाकर दिखलाते रहते हैं। वैश्विक स्तर पर तो ऐतिहासिक महत्व की अफगानिस्तान की बामियान मूर्तियों को ध्वस्त करने का और हाल ही में मालदीव के संग्रहालय की प्राचीन मूर्तियों को भग्न करने का पराक्रम दिखाने का श्रेय भी इन्हीं इस्लाम के बंदों को जाता है।

Monday, May 27, 2013

सावरकरजी के बुद्धिवाद की उपेक्षा क्यों?

जिस प्रकार से सूर्य के प्रकाश में विविध रंगों की छटा समाई होती है उसी प्रकार से बहुमुखी प्रतिभा के धनी सूर्य समान सावरकरजी के तेजस्वी विचारों में भी विविध प्रकार की समाजहितकारी बुद्धिगम्य विचारों की छटा बिखरी हुई दृष्टिगोचर होती है और वह भी इतनी कि क्या ये विचार एक ही व्यक्ति के हैं का प्रश्न किसी के भी सम्मुख उपस्थित हो सकता है। उनके भक्तों एवं अनुयायियों के लिए तो वे एक श्रद्धास्थान ही हैं और वे प्रायः हिंदुत्वनिष्ठ ही हैं और वे आग्रहपूर्वक उनकी हिंदुत्वनिष्ठा को ही बताने में लगे रहते हैं व उनके बुद्धिवाद के बारे में बोलना टालते हैं जबकि सावरकरजी एक प्रखर बुद्धिवादी थे।

सावरकरजी के बुद्धिवादी विचारों का आकर्षण इन हिंदुत्ववादियों को कभी भी नहीं रहा है। क्योंकि, शुरु में ही उनके यह ध्यान में आए बगैर नहीं रहता कि बुद्धिवाद और हिंदुत्ववाद परस्पर विरोधी हैं। इसलिए उनके बुद्धिवाद पर वे मौन रहना ही पसंद करते हैं। और रही बात विरोधियों की तो उनके लिए सावरकरजी का हिंदुत्वनिष्ठ होना ही पर्याप्त होता है। इस प्रकार से सावरकरजी का बुद्धिवाद दोनो ही पक्षों द्वारा उपेक्षित है।

सावरकरजी का हिंदुराष्ट्र धर्माधिष्ठित (चातुर्वर्णाधिष्ठित हिंदूधर्म पर) ही होगा यह मानकर चलने के कारण और सावरकरजी के विज्ञाननिष्ठ निबंधों में भी हिंदूराष्ट्र शब्द आने के कारण ये विरोधी यह मानकर ही चलते हैं कि सावरकरजी इस राष्ट्र को मध्ययुग में ले जाना चाहते थे और ऐसा व्यक्ति भला बुद्धिवादी हो ही कैसे हो सकता है? इसी सोच के कारण ये विरोधी सावरकरजी का समावेश बुद्धिवादी विचारकों में करने को तैयार नहीं होते और इसका कोई खेद भी उनके भक्तों-अनुयायियों को नहीं होता यह एक विडंबना ही है।

सावरकरजी एक तत्त्वज्ञ होने के साथ ही साथ एक नेता भी थे। एक तत्त्वज्ञ अपने विचार सुसूत्रबद्ध और सुसंगत पद्धति से प्रस्तुत करता है जो उसके तत्त्वों से संलग्न होते हैं और उनको प्रस्तुत करने के स्तर की भाषा कितनी भी उंचे स्तर की हो सकती है। परंतु, एक नेता की भाषा, उसके विचारों की प्रस्तुति के स्तर को एक तत्त्वज्ञ का स्तर नहीं लगाया जा सकता नेता को उसके अनुयायियों की बोली भाषा में बोलना पडता है। यदि नेता के व्यवहारिक विचारों को तात्त्विक विचारों की कसौटी पर कसा जाने लगे तो उसे बडे ही निचले स्तर का तत्त्वज्ञ ठहराया जा सकता है और यही सावरकरजी के साथ भी हुआ है।

भारत में विचारकों की दो परंपराएं हैं। पहले में वे आते हैं जिन्होंने प्रखर बुद्धिवाद का समर्थन किया और समाज की रचना को आमूलाग्र रुप से बदलना चाहिए की भूमिका ली। इनमें महात्मा फुले, आगरकर, नेहरु, अंबेडकर आदि आते हैं। समाज को धर्ममुक्त करना चाहिए इस विचार का उन्होंने समर्थन किया। इस मंडली को भारत के इतिहास, धर्म, परंपराओं पर प्रखर गर्व नहीं था। ये प्रखर राष्ट्रवाद के प्रति नहीं अपितु उदारवाद की ओर झुकाव रखनेवाले लोग थे।

दूसरी परंपरा में लोकमान्य तिलक, स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविंद जैसे धार्मिक व प्रखर राष्ट्रवादी आते हैं। इस मंडली को अपने भारत के इतिहास पर बडा जबरदस्त गर्व था। राष्ट्रवाद जिस इतिहास, संस्कृति, परंपरा पर खडा होता है उसे पहली परंपरा वाले संकुचित समझते थे। उन्होंने राष्ट्र क्या है, राष्ट्र का आधार कौनसा होता है, एकात्म राष्ट्र के घटक कौनसे होते हैं आदि का कभी गंभीरतापूर्वक विचार ही नहीं किया। राष्ट्र, राष्ट्रवाद का विचार तो अपरिहार्य होने के कारण उन्हें करना पडा। उनका विश्वास तो इस पर था कि, समता, बंधुता, न्याय आदि के तत्त्वों पर सभी मानवों को एकत्रित किया जा सकता है। कुछ का तो विश्वास केवल आर्थिक समता या समाजवाद के आधार पर सभी को एकत्रित किया जा सकता है पर था। एकात्म राष्ट्र इन्हीं तत्त्वों के आधार पर खडा किया जा सकता है, ऐसा यह समझते थे। ये प्रादेशिक राष्ट्रवाद को माननेवाले हैं। धर्म, वंश, जाति संस्कृति, भाषा आदि के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव करने को अपने देश में वे बुद्धिवाद के विरोध में और संकुचित समझते थे।

परंतु, प्रखर राष्ट्रवादियों की भूमिका इनके ठीक उलट थी। ये धर्म, संस्कृति, परंपरा, इतिहास में गहरी श्रद्धा रखते थे, इस पर उन्हें गर्व था। इनकी भूमिका यह थी कि, हमारा धर्म, तत्त्वज्ञान, संस्कृति विश्व में सबसे श्रेष्ठ है। धर्मचिकित्सा इन्हें मान्य नहीं थी। उन्हें इस बात पर गर्व था कि, हमारे तत्त्वज्ञान में मानव को अध्यात्म के सर्वोच्च स्तर पर ले जाने का सामर्थ्य है।ये मामूली से सुधारों के साथ पुराने को टिकाए रखने की प्रवृत्ति रखते थे। इनके प्रखर राष्ट्रवाद का आधार धर्म, संस्कृति, इतिहास था यानी जिसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है उसका समर्थन इन्होंने किया। इनके द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत के अनुसार देश प्रेम यानी इस देश के इतिहास, धर्म, संस्कृति, परंपराओं से प्रेम। ये दोनो ही परंपराएं मोटे तौर पर परस्पर विरोधी हैं।

सावरकरजी इनमें से किसी भी परंपरा में नहीं आते। सावरकरजी ने पहली परंपरा के प्रखर बुद्धिवाद को स्वीकारा तो दूसरी परंपरा के हिंदुत्वनिष्ठ राष्ट्रवाद को स्वीकारा। जैसाकि हमने ऊपर देखा ये दोनो ही परंपराएं परस्पर विरोधी होने के कारण सावरकरजी के बुद्धिवाद के संबंध में अनेक भ्रांतियां निर्मित हो गई हैं। और सावरकरजी को दूसरी परंपरा में मान लेने के कारण उनके बुद्धिवाद की घोर उपेक्षा हुई है।

आज समाज को बुद्धिवाद की ओर ले जाने की नितांत आवश्यकता है। इस दृष्टि से सावरकरजी ने बुद्धिवाद का जो मार्ग अपनाया था उसका अध्ययन कर उसे समाज के सामने लाने की जिम्मेदारी निश्चय ही उनके हिंदुत्त्वनिष्ठ अनुयायियों की बनती है और जब अब पूरा सावरकर साहित्य हिंदी में भी उपलब्ध है तो भ्रांत धारणाएं दूर करने के लिए अनुयायी उनके साहित्य के प्रचार-प्रसार के कार्य को हाथ में ले तो अधिक उचित होगा। क्योंकि, सावरकरजी का बुद्धिवाद समझना हो तो, जो उनके सारे साहित्य और जीवनकार्य में बिखरा हुआ है, का अध्ययन करना होगा।

लोगों में सबसे अधिक भ्रांत धारणा यह व्याप्त है कि, हिंदू राष्ट्र धर्माधिष्ठित होगा यह सर्वथा असत्य है यह समझने के लिए उनकी पुस्तक 'हिंदुत्व" जिससे स्वामी श्रद्धानंद, पंडित मदनमोहन मालवीयजी तक प्रभावित हुए थे का अध्ययन करें तो समझ सकेंगे कि सावरकरजी का हिंदू राष्ट्र धर्माधिष्ठित नहीं था।

उनके हिंदूराष्ट्र का व्यापक अर्थ यह है कि, हिंदुओं के न्याय्य अधिकार सुरक्षित रखनेवाला राष्ट्र। उनकी दृष्टि में हिंदू राष्ट्र एक भावनिक संकल्पना है। यदि मुसलमान यह मानते हैं कि, वे एक राष्ट्र हैं तो हिंदू भी यह क्यों नहीं मान सकते कि वे भी एक राष्ट्र हैं वैसे भी हिंदू राष्ट्र पुरातन है। हिंदुओं की राष्ट्रीय भावना मुस्लिम भावना की प्रतिक्रिया नहीं। जब तक मुसलमान उनकी स्वतंत्र राष्ट्रीयत्व की भावना का त्याग नहीं करते तब तक हिंदू भी अपनी हिंदू राष्ट्र की भावना को रखने के लिए बाध्य हैं। सावरकरजी का यह दृष्टिकोण क्या व्यवहारिक नहीं और यहीं सावरकरजी दूसरे बुद्धिवादियों से अलग पड जाते हैं। सावरकरजी मानते हैं कि एक शासन तले दो राष्ट्र रह सकते हैं इसके लिए हर एक को एक मत, धर्मनिरपेक्षतापूर्वक सभी को समान अधिकार तथा अल्पसंख्यकों के धर्म और संस्कृति को संरक्षण का विश्वास।

हिंदूराष्ट्र का दूसरा अर्थ बहुसंख्यकों का राष्ट्र और इसी आधार पर 'बहुसंख्यकत्व ही राष्ट्रीयत्व है" का सिद्धांत वे प्रतिपादित करते हैं। हिंदू बहुसंख्य होने के कारण 'हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है" का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। परंतु, इसका अर्थ यह नहीं कि अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीयत्व नहीं होता यह सिद्धांत केवल वस्तुस्थिति को दर्शाता है कि अहिंदू अल्पसंख्य हैं। और बहुसंख्य को अल्पसंख्य बनाना अराष्ट्रीय है। इन अर्थों से भी हिंदुत्व का हिंदूधर्म से कोई संबंध नहीं आता। उपर्युक्त अर्थों से कोई भी बुद्धिवादी इंकार नहीं कर सकता, हिंदू एक राष्ट्र है, बहुसंख्यकों का राष्ट्रीय जीवन पर प्रभाव पडता ही है लेकिन यही बातें ये सेक्यूलर विद्वान हिंदू के स्थान पर भारतीय कहकर प्रस्तुत करते हैं।