Saturday, January 26, 2013



भारत मुुक्ति के लिए जन्मा हुआ महात्मा - स्वामी विवेकानंद



भारतीय संस्कृति के उत्तुंग कीर्तिकलश के रुप में जिन्हें गिना जा सके ऐसे चुनिंदा महाभागों में जिनका समावेश किया जा सके, जिनकी महानता का वर्णन करना असंभव सा ही है, जिनका चरित्र वर्णन पढ़कर आद्यशंकराचार्य, समर्थ रामदास जैसे लोकविलक्षण पुरुषों का स्मरण हो आए ऐसे व्यक्तित्व के धनी का नाम हैं स्वामी विवेकानंद।



जब ब्रिटिश विद्वान प्रशासक, मिशनरी हिंदुत्व का समाधि लेख लिख रहे थे- मैक्समूलर मिशनरियों को सुसमाचार सुना रहे थे- 'ब्राह्मणत्व मर रहा है, बल्कि मर ही चूका है। भले ही वह अभी भी 11करोड नर-नारियों का धर्म है। लेकिन जब किसी धर्म के श्रद्धा रक्षक वीर पुरुष और अग्रगामी समर्थक सामने नहीं आते, तब वह धर्म निष्प्राण ही मानना चाहिए।" ऐसे दुर्धर समय में आविर्भाव हुआ था श्रीरामकृष्ण परमहंस के उत्तराधिकारी शिष्य स्वामी विवेकानंद का। जिन्होंने स्वयं की मुक्ति को क्षुद्र मान, भारत मुक्ति के आदर्श को सामने रख 'बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" की महत्वाकांक्षा को अपना कर्म मान हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक परिव्राजक व्रत धारण कर तीर्थाटन कर भारतवर्ष संबंधी प्रत्यक्ष ज्ञान संपादन किया था।



उन्हें लगता था कि पश्चिमी समाजों से जहां हमें बहुत कुछ सीखना है वहीं हमारे पास उन्हें सीखाने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान है। इसका अर्थ यह है- हिंदुओं को मिशनरियों और जिहादियों की नकल नहीं करनी चाहिए। हिंदुत्व अपने ही शील-स्वभाव के साथ बाहर जाएगा। विनाश और उत्पीडन के लिए नहीं, सृजन और प्रबोधन के लिए। भारत का कर्तव्य है कि वह इन समाजों के प्राचीन अध्यात्म और प्राचीन देवताओं के पुनराविष्कार में सहायक बने।



भारत मुक्ति का, भारतोन्नति का उपाय स्वामीजी को कन्याकुमारी में सूझा था। भारत की सर्वसामान्य जनता की दरिद्रता और अज्ञान का निरुपण ही भारत मुक्ति का मार्ग है। भारत के पुनरुद्धार के लिए साधनों एवं मार्ग संपादन करने के लिए पाश्चात्य राष्ट्रों में जाने का निश्चय स्वामीजी ने किया। यदि स्वयं को सुसंगठित राष्ट्र के रुप में निर्मित करना है तो अन्य देशों के विचार प्रवाहों के साथ स्वयं को मुक्त संबंध रखना होंगे। भारतोन्नति व भारत मुक्ति के लिए पैसा एवं मनुष्य संपादन करें, आधुनिक पाश्चात्य विज्ञान की सहायता से भारत के कृषि, उद्योग-व्यापार का विकास करें इस विचारानुरोध के कारण स्वामीजी सन्‌ 1893 में अमेरिका सर्वधर्म परिषद निमित्त गए थे।



उनकी दृष्टि में भारत की दुर्दशा का मूल कारण दरिद्रता है। इस दरिद्रता के निवारण के लिए स्वामीजी ने तीन मार्ग सुझाए। 1. विज्ञाननिष्ठ खेती, 2. स्वदेशी उद्योग-धंदे, 3. भारतीय माल का विदेशों में व्यापार। चूंकि भारत का प्रमुख व्यवसाय कृषि है और जब तक भारतीय कृषि आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से की नहीं जाएगी तब तक भारत की दरिद्रता नष्ट नहीं होगी। स्वामीजी ही भारत के प्रथम 'विज्ञाननिष्ठ कृषि" के उद्‌गाता हैं। स्वामीजी के विचारानुसार भारत की उन्नति के लिए भारतीय उद्योग व्यवसाय का विकास करने के लिए पाश्चात्य विज्ञान के आधार पर भारतीय पूंजी के द्वारा नए-नए उद्योग-धंदे, कारखाने भारतीय प्रारंभ करें इसके लिए भारतीय युवा जापान, अमेरिका आदि प्रगत राष्ट्रों से तांत्रिक ज्ञान संपादन कर भारत में उद्योग-व्यवसाय का विकास करें।



स्वामीजी द्वारा बतलाया हुआ तीसरा मार्ग है भारत की दरिद्रता के निवारण के लिए स्वदेशी वस्तुओं का विदेशों में व्यापार। स्वामीजी कहते हैं - 'भारत में कई तरह की विविध वस्तुएं बनती हैं। विदेशी लोग तो सारा कच्चा माल ले जाकर उसकी सहायता से सोना बना रहे हैं और तुम भारतीय गधों की भांति उन्हीं का लाया हुआ माल गले से लगाए मरे जा रहे हो। भारत में जो कच्चा माल उत्पन्न होता है वह देश विदेश के लोग ले जाते हैं, अपनी बुद्धि का उपयोग कर उससे विभिन्न प्रकार की वस्तुएं तैयार कर बडे बन रहे हैं और तुम अपनी बुद्धि को गाडकर घर का धन दूसरों को बांटकर 'अन्न-अन्न" करते हुए भीख मांगते भटक रहे हो- देशी कपडा, अंगोछा, सूप, झाडू सिर पर उठाकर यूरोप, अमेरिका के रास्तों पर घूमकर बिक्री करो तो देखोगे कि आज भी भारत में तैयार वस्तुओं की कीमत क्या है!



विदेश व्यापार के संबंध में स्वामीजी दि. 17 जनवरी 1895 को न्यूयार्क से स्वामी त्रिगुणातीतानंद को भेजे पत्र में लिखते हैंः 'मूंग की, तुअर की दालों का व्यापार इंग्लैंड एवं अमेरिका में लाभदायक ढ़ंग से चल सकेगा ऐसा रामदयाल बाबू को कहलवाओ पकाई हुई दाल का अगर योग्य तरीके से प्रचार हुआ तो लोग उसका उपयोग रुचिपूर्वक करने लगेंगे। छोटे-छोटे डिब्बों में डालकर और  उस पर उसे किस प्रकार बनाया जाता है यह छापकर अगर ये दालें घर-घर जाकर खपाई जाएं तो उनकी बहुत मांग रहेगी। उसी प्रकार यहां उनका संचय कर रखने की व्यवस्था करना चाहिए। इसी प्रकार मुंगबडी जैसी वस्तुएं यहां बडे स्तर पर खप सकती हैं, साहसयुक्त उद्योग की आवश्यकता है, आलसियों जैसे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। किसीने कंपनी निकालकर और इंग्लैंड में भारतीय माल भेजना तय किया तो अच्छा खासा व्यापार चल पडेगा, परंतु अपने लोग ठहरे जमाने के आलसी!"



स्वामीजी के उपर्युक्त उद्‌गारों पर विचार करें तो सर्वसंग परित्याग किए हुए स्वामीजी भारत दरिद्रता के निवारणार्थ किस प्रकार  का सूक्ष्म और कुशलता से व्यवहारिक विवेचन कर रहे हैं इसका सहज आकलन हो जाएगा। आज के संदर्भ में यदि हम उनके विचारों पर गौर करें तो पाएंगे कि आज भी दरिद्रता नष्ट करने का उद्‌घोष जारी ही है, अन्न के संबंध में हम आज भी थोडी बहुत मात्रा में परावलंबी ही हैं, भारत आर्थिक संकटों से घिरा होकर आर्थिक दुर्दशा की सीमा की ओर जा रहा है। इस दृष्टि से स्वामीजी के विचार आज भी प्रासंगिक नजर आ रहे हैं।



स्वामीजी की धारणा थी कि, ''भारत के समस्त दुखों का एकमेव कारण अज्ञान ही है""। अज्ञान निवारणार्थ सर्वसामान्य जनता को शिक्षित करने से ही उनकी उन्नति हो राष्ट्र निर्माण हो सकेगा। उन्हीं के शब्दों में- ''बिल्कुल सरल भाषा में विज्ञान, तत्त्वज्ञान, भूगोल आदि इतिहासादि विषयों के मूलतत्व सारी जनता में प्रसृत करो। इसीके साथ उन्हें सीधे सरल तरीके से व्यवहार, व्यापार, कृषि वगैराह गृहस्थपयोगी बातों की भी शिक्षा दो।""



स्वामीजी जब 1893 में अमेरिका 'पार्लियामेंट ऑफ रिलीजंस" में भाग लेने के लिए जा रहे थे तब उनकी जहाज पर टाटा के साथ देश की औद्योगिक दुर्दशा पर हुई चर्चा में उन्होंने टाटा का ध्यान इस ओर दिलाया था कि वे क्यों जापान से दियासलाई का आयात करते हैं, जबकि इसके उत्पादन के लिए भारत में ही व्यवस्था की जा सकती है? स्पष्ट है कि इससे जो पैसा विदेश जाता था उसके प्रति वे चिंतित थे। स्वामीजी के साथ हुई चर्चा से उत्पन्न विचारों का ही प्रभाव था कि 28 सितंबर 1898 को जमशेदजी टाटा ने एक घोषणा की थी जो 'टाईम्स ऑफ इंडिया (मुंबई)" में प्रकाशित हुई थी जिसमें उन्होंने भारत में उच्च अध्ययन के लिए एक आधुनिक संस्थान स्थापित करने का संकल्प प्रकट किया था। इस संदर्भ में उन्होंने 23 नवंबर 1898 को मुंबई से स्वामी विवेकानंदजी को एक पत्र भी लिखा था जो विस्तारभयावश यहां दिया नहीं जा रहा है। स्वाभाविक ही था कि अंग्रेजों को यह निर्णय रास नहीं आया और उन्होंने अडंगे डाल दिए। परंतु, टाटा हताश नहीं हुए उनके और उनके पश्चात उनके दोनो पुत्रों दोराबजी टाटा और नवल टाटा के अथक प्रयासों से अंततः स्वप्न साकार हुआ 1909 में और बंगलौर में आज की विख्यात भारतीय विज्ञान संस्था का उदय हुआ।



उनके भारत मुक्ति के लिए किए गए प्रयत्नों, विचारों, मार्गदर्शन के कारण ही मैसूर के महाराज ने उनका वर्णन भारत मुक्ति के लिए जन्मा महात्मा के रुप में किया है जो यथार्थ भी है।



     

Wednesday, January 16, 2013



ब्रिटिश नीति 'फूट डालो और राज करो" को सूत्ररुप में संबोधित करना योग्य होगा क्या?



अपने धक्कादायक और तल्ख बयानों के लिए प्रसिद्ध पूर्व न्यायाधीश श्रीमार्कंडेय काटजू ने विगत दिनों देश के 90% लोगों को यह कहते हुए मूर्ख ठहराया था कि वे ब्रिटिशों की 'फूट डालो और राज करो" की नीति का शिकार हैं और 1857 के पूर्व देश में सांप्रदायिकता, धर्म के नाम पर भेदभाव नहीं था या वे लडते नहीं थे। उनके यह वाक्य मु. लीग के 30वें वार्षिक अधिवेशन में जिन्ना के 24 अप्रैल 1943 के अध्यक्षीय भाषण जिसकी शुरुआत उन्होंने 'अल्लाहो अकबर" से की थी से कुछ साम्य जरुर रखते हैं। उस भाषण में जिन्ना ने अपने झगडे के लिए ब्रिटिशों को दोषी ठहराने पर अपने ही लोगों की आलोचना करते हुए कहा था- ''ब्रिटिश अपने में समझौता होने नहीं देना चाहते ऐसा कहने से कोई फायदा नहीं अर्थात्‌ अपनी मूर्खता का लाभ वे उठाते हैं यह सच है। परंतु, ब्रिटिशों की अपेक्षा अपने में ही एकता न होने के साधन अधिक हैं.... 'ब्रिटिशों की नीति 'फूट डालो और राज करो" है, यह ध्यान में आ जाने के बावजूद अपन एकत्रित होकर ब्रिटिशों को बाहर निकाल क्यों नहीं देते?""



इसके कुछ महीनों बाद मुंबई में बेव्हर्ली निकोलस ने साक्षात्कार में जिन्ना से प्रश्न किया गया था कि, ''तुम्हारे विरोधी आलोचना करते हैं कि, 'पाकिस्तान" ब्रिटिशों की 'फूट डालो और राज करो" की नीति का निर्माण है।"" इस पर कुछ क्रोधित होकर ही जिन्ना ने कहा था- ''जो मनुष्य ऐसा कहता है उसका ब्रिटिशों की बुद्धिमत्ता के विषय में और इसी प्रकार मेरी प्रामाणिकता के विषय में भी अत्यंत बुरा मत होना चाहिए ... (उल्टे) मैं पुनः कहता हूं कि, अखंड भारत यही ब्रिटिशों का निर्माण है। वह एक कल्पना है और अत्यंत धोखादायक है। इसके कारण अखंड संघर्ष होता रहेगा। यह संघर्ष रहने तक ब्रिटिशों को यहां रहने का कारण मिलेगा... (अतः) 'फूट डालो और राज करो" की नीति यहां लागू ही नहीं होती।""



जिन्ना का प्रतिपादन कुछ झूठ भी नहीं था। हिंदू-मुस्लिम संघर्ष कोई ब्रिटिशों द्वारा निर्मित किया हुआ नहीं था। इसके पूर्व से ही 800 वर्षों से वह चालू ही था। ब्रिटिशों ने सर सय्यद अहमद, अलीबंधु, जिन्ना, गांधी, नेहरु, सरदार पटेल, सावरकर आदि का सहारा लेकर यह संघर्ष लगा दिया था यह आरोप छिछला और इन महान नेताओं की बदनामी करनेवाला है। अपने में ही मूलतः और मूलभूत संघर्ष था और उसका लाभ ब्रिटिशों ने न उठाया होता तो ही आश्चर्य की बात होती या यूं कहें कि, वह न उठाना राजनैतिक दृष्टि से मूर्खतपूर्ण ठहरता।

डा. आंबेडकरजी ने कहा थाः ''हिंदू-मुस्लिम ... इनमें विरोध के मूल कारण ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक घोर शत्रुता है; राजनैतिक जानीदुश्मनी तो उसका प्रतिबिंब है ... ये दो धर्म परस्पर विभिन्न हैं... उनके विरोध अंगभूत हैं और सदियों से वे मिट न सकें हैं।""


वस्तुतः हिंदू-मुसलमानों में फूट डालने की आवश्यकता ब्रिटिशों को थी ही नहीं। उन्हें तो केवल इस फूट का उपयोग अपने राज्य को स्थिर करने के लिए करना भर था। डॉ. पी. हार्डी के अनुसार ब्रिटिशों की नीति 'फूट डालो और राज करो" की नहीं थी, बल्कि 'संतुलन साधो और राज करो" (balance & rule) की थी।

इस नीति के संबंध में प्रा. फॅ्रान्सिस रॉबिनसन ने अपने ग्रंथ 'सेपरेटिज्म अमंग इंडियन मुस्लिमस्‌" में अत्यंत वस्तुनिष्ठ एवं मार्मिक विश्लेषण किया हुआ है। उनके कहने के अनुसार ''(1857 के बाद) भारत के ब्रिटिश राज्य के लिए मुस्लिम समाज सबसे बडा धोखा है ऐसा मानकर उनके विषय में ब्रिटिश शासन ने नीति तय की... बाद के काल में भी ब्रिटिशों को दूसरे मुस्लिम विद्रोह का भय सताता रहता था। मुस्लिम समाज उनकी सर्वाधिक चिंता का विषय बन गया था और इसीको दृष्टि में रख वायसराय लॉर्ड मेयो ने मुस्लिमों के संबंध में अपनी नीति तय की ... (उन्हें निकट करना प्रारंभ हुआ। उनके लिए विशेष शिक्षा प्रसार की योजना 1871 में तैयार की गई) .... लॉर्ड मेयो की (मुस्लिम) शिक्षा योजना और हंटर के ग्रंथ में आई हुई मुस्लिम पिछडेपन की चर्चा को अखिल भारतीय महत्व प्राप्त हुआ ... मुसलमानों का विचार करते समय पहले राजनीति का विचार किया गया और उसअनुसार नीति तय की गई और उसके दूरगामी परिणाम हुए।"" लॉर्ड मेयो का विचार था कि राजनैतिक दृष्टि से मुसलमान अत्यंत धोखादायक हैं और उनसे तालमेल बैठा लेने में ही समझदारी है। परंतु, इस प्रकार के विचार व्यक्त करने के कुछ ही दिनों बाद एक वहाबी मुसलमान ने उनका कत्ल कर दिया और वे स्वयं समन्वय बैठा लेने की नीति के लाभ से वंचित रह गए ।


फ्रांसिस यह भी स्पष्ट करते हैं कि, इस प्रकार से ब्रिटिश शासन ने 1871 के बाद अपनी नीति मुसलमानों के लिए कितनी भी अनुकूल बनाई हो तो भी ''खुला सच यह था कि, ब्रिटिशों को मुसलमान कभी भी विश्वसनीय नहीं लगे।"" वे दिखला देते हैं कि, 1877 में लॉडॅ नॉर्थब्रुक ने 'हाउस ऑफ लॉर्ड्‌स" में कहा था कि, ''कोई भी धार्मिक मुसलमान मुस्लिम राज्य के बगैर संतुष्ट रह ही नहीं सकता।"" ''वस्तुस्थिति यह थी कि, ब्रिटिश मुसलमानों के प्राणघातक हमलों से डरते थे। उनकी दृष्टि में इस्लाम के अनुयायी ब्रिटिश राज्य की सुरक्षा के लिए सर्वाधिक धोखादायक थे। इसीलिए (1857 के) विद्रोह के बाद उनके विरुद्ध बदले का अभियान चलाया गया था। परंतु, जब ध्यान में यह आया कि, (बदले का दंड) गले पडनेवाला सिद्ध होनेवाला है तो उन्हें निकट करने की नीति अपनाई गई।"" वे स्पष्ट करते हैं कि, ''इस प्रकार से (निकट) करने का उनका उद्देश्य मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध खडा करने का नहीं था बल्कि (उनका) ब्रिटिश राज्य से समन्वय बैठा लेने का था। (उनमें भेदभाव निर्मित करना यह उद्देश्य नहीं था) परंतु, भले ही उद्देश्य ना हो तो भी उसका परिणाम कुछ मुसलमानों को राजनीति में मुसलमान के रुप में व्यवहार करने के लिए प्रोत्साहन मिलने में हुआ।""



निश्चय ही विश्लेषण सत्य के निकट है ब्रिटिश यहां राज करना चाहते थे उसके लिए अपने राह की बाधाओं को हटाना, धोखों को कम करना जरुरी था इसलिए उन्होंने मुसलमानों को खुष करने का मार्ग चुनकर अपना मार्ग आसान करना चाहा तो उसमें उनकी दृष्टि से कुछ भी गलत नहीं था। वे यहां कोई हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने तो आए नहीं थे, हिंदू-मुस्लिमों के बीच के भेद का लाभ उठाकर अपना राज्य स्थिर करना उनका राजकर्तव्य था, प्रजा के भेदों का लाभ न उठाकर अपना राज्य गमानेवाला राज्यकर्ता मूर्ख ही कहलाता है। स्वतंत्र भारत के धर्मनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक शासक भी चुन कर आने और स्थिर रहने के लिए इसी भेदनीति को अपनाते हैं। ब्रिटिश राज्यकर्ताओं की तरह ही उन्हें भी मुसलमानों का भय सताता है और इसलिए उन्हें खुश करने की नीतियां और कार्यक्रम अपनाए जाते हैं। हिंदुओं को दुखाने का इस प्रजातंत्र के दलों को जरा भी डर नहीं लगता। यह 'फूट डालो और राज करो" की नीति न होकर विद्रोहियों को शांत और खुश करने की सामान्य राजनीति है।



वैसे भी ब्रिटिश जानते थे कि हिंदू कोई अनंतकाल तक उनका राज्य सहन करनेवाले नहीं थे। इंग्लिश विद्या सीखकर उनकी राज्यपद्धति अवगत और आत्मसात करने, उनके शक्तिस्थान समझकर स्वयं जब प्रजातांत्रिक शासन चलाने योग्य हो जाएंगे ऐसा समझने लगेंगे वैसेही हिंदू स्वराज्य-स्वतंत्रता के लिए संघर्ष छेड देंगे। यह ठीक है कि हिंदू कोई मुसलमानों के समान विद्रोही नहीं थे फिर भी सातसौ वर्षों तक मुसलमानों द्वारा शासित रहने के बावजूद बहुसंख्यक थे और प्रजातांत्रिक पद्धति से आंदोलन चलाकर  प्रजातंत्र की भाषा उपयोग में लानेवाले ब्रिटिशों को स्वतंत्रता देने के लिए बाध्य कर सकते थे। अतः ब्रिटिशों के लिए संभावित विरोधक हिंदू ही रहनेवाले थे ऐसी परिस्थिति में नई नीतियों के अनुसार हाल ही में मित्र बने मुसलमान उपयोगी ठहरनेवाले थे।



उधर मुस्लिम नेताओं को भी केवल मुसलमानों का हित चाहिए था। वह हित साध्य होने में जब तक हिंदुओं की सहायता मिलेगी तब तक चाहिए थी जैसीकि 1857 में अपना राज्य वापिस लाने के लिए उन्होंने हिंदुओं की सहायता ली थी। परंतु, अब परिस्थितियां बदल गई थी ब्रिटिशों ने मुसलमानों को दबाना, कुचलना प्रारंभ कर दिया था। मुसलमान भी समझ चूके थे कि अब ब्रिटिशों के विरुद्ध विद्रोह करना सरल नहीं बल्कि उनके साथ तालमेल बैठा लेने में ही अपना हित है। यह समझ विकसित हो इसके लिए सर सय्यद अहमद आगे आए। उन्होंने इतना अध्ययन कर लिया था कि 1857 का विद्रोह हिंदुओं के कारण ही ब्रिटिशों द्वारा कुचला जा सका था। आगे इस प्रकार के विद्रोह के कारण मुसलमानों का ही अहित होगा यह भी उनकी समझ में आ गया था। मुसलमानों का सच्चा हित ब्रिटिशों का विरोध नहीं मित्रता करने में ही है। इधर ब्रिटिशों ने भी अपनी नीतियां बदल दी थी। अंग्रेजी पढ़े-लिखे धर्मनिष्ठ मुसलमानों को न तो पराये ब्रिटिशों से कोई लगाव था न ही एतद्देशीय हिंदुओं के साथ प्रेम और उसमें उन्हें सर सय्यद जैसा उच्चशिक्षित न्यायाधीश,उदारवादी विचारक नेता ब्रिटिशों को हिंदुओं की अपेक्षा निकट मानने का उपदेश कुरान के आधार पर कर रहा था। ब्रिटिशों को भी तो यही चाहिए था अतः दोनो में गठबंधन हो गया और कल के सहयोगी हिंदू अब विरोधी हो गए।



मुसलमानों के लिए भी सच्चे विरोधी एवं प्रतिस्पर्धी हिंदू ही थे, उन्हें भय भी हिंदुओं से ही लगता था, क्योंकि वे बहुसंख्यक थे, उनसे ज्यादा पढ़े-लिखे एवं आधुनिक भी थे। यह भी वे जानते थे कि ब्रिटिशों के जाने के बाद इस देश में प्रजातंत्र आएगा और बहुसंख्य होने के कारण राज्य हिंदुओं का ही आएगा। हिंदुओं का बहुसंख्यकत्व ही उनके लिए धोखा था। इसलिए हिंदुओं के बहुसंख्यकत्व और वर्चस्व से बचने के लिए ब्रिटिश ही उनके तारणहार ठहरनेवाले थे। यही विचारसरणी आगे जाकर 'द्विराष्ट्रवाद" बनी और देश के विभाजन का कारण भी बनी। विभाजन का आधार भी इसी काल में तैयार हुआ।



डॉ. आंबेडकर अपने पाकिस्तान इस ग्रंथ में कहते हैं ः ''छःसौ वर्षों से मुसलमान इस देश के राज्यकर्ता (मालिक) रहे थे। ब्रिटिशोंें का राज्य आने के बाद उनका दर्जा कम होकर वे हिंदुओं की बराबरी में आ गए। राज्यकर्ता का दर्जा जाकर सामान्य प्रजा का दर्जा मिलना यह पर्याप्त मानहानी थी; परंतु (हिंदुओं के साथ रहने पर प्रजातंत्र के तत्त्वानुसार) हिंदू राज्यकर्ता हो जाएंगे और अपन उनके प्रजाजन बनेंगे यही उनकी दृष्टि में सच्ची मानखंडना थी।"" इससे छूटने के लिए ही उन्होंने विभाजन की मांग की थी।



विभाजन की दृष्टि से पहला चरण था 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना तो दूसरा चरण था मुस्लिमों के लिए स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र मान्य करना जिसे 1909 में ब्रिटिश शासन ने मान्य किया था और1916 में लखनऊ करार द्वारा कांग्रेस (यानी हिंदुओं) ने। यह समझौता करते समय और मान्यता देते समय कांग्रेस की ओर से लोकमान्य तिलक तो मु. लीग की ओर से मोहम्मदअली जिन्ना थे। इसका स्पष्ट अर्थ इस प्रकार से होता है कि लो. तिलक और कांग्रेस ने मुस्लिमों के स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र को मान्यता दी थी। इधर एक ओर तो हम लखनऊ समझौते को हिंदू-मुस्लिम एकता का करार मानकर इसके लिए तिलक-जिन्ना को 'हिंदू-मुस्लिम एकता के दूत" कहकर उनको गौरवान्वित करते हैं और उधर हम ब्रिटिशों ने स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र को मान्यता देकर 'फूट डालो और राज करो"  की नीति उपयोग में लाई इसके लिए दोषी ठहराते हैं। क्या यह हास्यास्पद नहीं है।  निष्कर्ष यही है कि, ब्रिटिश नीति 'फूट डालो और राज करो" को सूत्ररुप में संबोधित करना अयोग्य होगा।


Wednesday, December 26, 2012


शौचकूप तर हवेच हवे पण मंदिर देखील हवेत

काही दिवसांपूर्वी केंद्रीय मंत्री श्रीजयराम रमेश यांनी मंदिरांपेक्षा शौचकूप अधिक आवश्यक आहे असे वक्तव्य दिले होते. हे वक्तव्य दिल्या बरोबरच कित्येकांच्या कपाळावर आठ्या उमटल्या आणि त्यांचा विरोध सुरु झाला। तसे तर त्यांचे हे कथन सारपूर्णच आहे परंतु कां की हा मुद्दा श्रद्धेशी निगडित आहे म्हणून या प्रकारचे कथन जरा सांभाळून केले पाहिजे या प्रकारची टीका एक संपादकानी केली, ती योग्यच होती. परंतु, हे देखील तितकेच सत्यच आहे की या सत्यास कोणीही नाकारु शकत नाहीं की जगात उघड्यावर शौचेस जाणारे 60% लोक या हिंदुस्तानातच वसतात, देशाच्या अर्ध्या लोकसंख्येस शौचकूपांची सोयच प्राप्त नाही. आधी आपण शौचकूप म्हणजे काय हे समझून घेवू या- शौचकूप एक अशा सोयीचे नाव आहे जे मानवाचे मळ आणि मुतराची योग्य ती व्यवस्था करण्या करिता उपयोगात आणली जाते किंवा त्या युक्ति करिता देखील पण.

श्रीरमेश यांनी भारतीय रेल्वेला एक मोठ्या शौचकूपाचे नाव दिले आहे ते खरेच आहे. रेल्वेच्या प्रवासाच्या दरम्यान सकाळी-सकाळी जर आपण खिडकी बाहेर झाकून बघाल तर आपल्याला दर्शन होतील ते रुळाच्या किनाऱ्यावर शौचेस बसलेल्या लोकांचेच, हेच दृश्य बसनी प्रवासाच्या दरम्यान देखील बघावयास मिळते. शहरांमधून पण उघड्या जागांवर प्रातःकाळी शौचेस बसलेले लोक हातात टमरेल घेतलेले किंवा पाण्याची भरलेली बाटली घेऊन शौचेकरिता जागा शोधण्याच्या गडबडीत दिसून पडतील.

जरा विचार करा परदेशातून येणाऱ्या पर्यटकांसमोर आमच्या लोकां बद्दल त्यांच्या मनात काय विचार येत असतील. किती घाणेरडी लोक आहेत ही. या देशातील लोक वाटेल तिथे घाण करित असतात आणि या बाबतीत दुमत होऊ शकत नाही की आम्ही नम्बर एकचे घाणेरडे म्हणवले जाऊ शकतो. आता तर मुंबई जी या देशाची आर्थिक राजधानीच आहे ला जगातल्या सगळ्यात जास्त घाण नगरात मोजले गेले आहे. वस्तुस्थिति तर ही आहे की जर कां आम्ही केवळ स्वच्छ राहवयास आणि स्वच्छता ठेवावयास शिकलो तर फक्त पर्यटन या उद्योगा मुळेच आमच्या येथील रोजगार समस्या सोडवली जाऊ शकते.

परंतु, स्वच्छतागृहांच्या कमतरतेच्या चालता हे कसे शक्य आहे? तसेच या करिता सगळ्यात आधी आम्हावयास आपल्या शौच निवृत्तिच्या सवयींना बदलाव लागेल. आमच्या येथे आज देखील उघड्यावर शौचेस जाण्याची मानसिकता ठेवणारे कांही कमी नाही. कांही लोक तर या समस्येस इतक्या हलक्याने घेतात की ते हे देखील म्हणवयास चूकत नाही की असे वाटते या देशात सगळ्या समस्या सोडवल्या गेल्या आहेत आणि आता एकच समस्या राहिली आहे आणि ती आहे शौचकूपांची.

हे पण एक कटु सत्य आहे की कमी होत चालेल्या जमीनी आणि त्यांच्या वाढ़त्या किमतींनी शहरात सगळ्यात जास्त कहर या मुतारींवरच आणलेले आहे. त्यांना तोडून पार्किंग, व्यापार आदिंकरिता उपयोगात आणले जाऊ लागले आहे व असे वाटते की या नेचरलकॉलपासून निवृत्त होण्याकरिता शहरात जागाच उरली नाही आहे. या मुळे लोक वाटेल तीथे उभे राहून लघ्वी करित असतात. परंतु, बायकांने काय करावे? बाहेरुन किंवा छोट्या गांवा-शहरातून कांही कामांनी सकाळी येऊन संध्याकाळी परत जाणाऱ्यांचा एक मोठा वर्ग आहे ज्यांस आपण फ्लोटिंग-क्लास देखील म्हणू शकतो च्या समोर पण हीच समस्या आहे. छोट्या शहरां किंवा गांवातल्या बसस्टैंडवर पण एकतर ही सोयच नसते किंवा असली तरी अत्यंत कमी आणि तेवढ़ीच घाण ज्यांत बायकांकरिता कांही जागाच नाही जणू कांही बायका प्रवासच करित नाही वा त्यांना या सोयींची गरजच पडत नाही. बस निघून ना जाओ म्हणून लौकरात-लौकर मोकळे होण्याच्या गडबडीत धावणारे प्रवासी दिसून पडणे या बसस्टैंडवर नित्याचेच असते. काय शौचकूपांची ही कमतरता भयानक नाही? चीन मध्येंतर बायकांनी या न्यूनतेच्या समाधानाकरिता ऑक्यूपाय वॉलस्ट्रीटच्याच धर्तीवर ऑक्यूपाय मॅन्स टॉयलेटचीच चळवळ सुरु करून दिली आहे इथे या चळवळीचा उल्लेख केवळ या विकट प्रश्नाचे गांभीर्य दाखविण्याकरिता केले आहे.

पाहणीनुसार कित्येक कार्यालयांमधून बायकांकरिता टॉयलेटची वेगळ्यांने व्यवस्थाच नाही आहे, कुठे-कुठे तर टॉयलेटच नाही किंवा असले तरी स्वच्छतेच्या उणीवेमुळे कित्येक बायकां यांचा उपयोग घृणेमुळे किंवा यूरीन इंफेक्शनच्या भीतीने करु इच्छितच नाही. मुंबई सारख्या जागेवर तर कित्येत बायकां सकाळी घरुन आटपून निघतात ते संध्याकाळीच घरी येऊन जातात. मुंबईच कां अन्य कित्येक नगरांमधून पण हीच समस्या विद्यमान आहे. सार्वजनिक शौचकूपांच्या उणीवेमुळे व अस्वच्छतेमुळे बायकांचा एक मोठा वर्ग यूरीन इंफेक्शन किंवा अन्य घातक संक्रमणांपासून पीडित आहे. खेड्यांची समस्या तर आणखिन पण गंभीर होत चालली आहे वाढ़त्या लोकसंख्येच्या दाबापासून खेडी सुद्धा सुटली नाहीत। पूर्वी गावांच्या जवळपास झाडझुडपांची जाळी असत पण वाढ़त्या लोकसंख्येमुळे आता ते पण नसल्या सारखेच होत चालली आहेत गावांतल्या बायकांना जेव्हां त्या शौचेस जात असत ते आडचे काम करित असत.

आयुर्वेदात सात वेगांचा उल्लेख आहे ज्यांना थांबवले न पाहिजे त्यात शौचनिवृत्ति सुद्धा आहे. शौच निवृत्त होण्याचे सुख चेहऱ्यावरच दिसून पडते. काय तुम्ही या सुखास कधीच उपभोगले नाही! आणि ज्यांच्या जवळ सोय नाही, ज्यांना सकाळ-संध्याकाळच्या नैसर्गिक पडद्याचा आश्रय घ्यावा लागतो आणि तो पर्यंत या आवेगास थांबवून ठेवण्याचे कष्ट आणि या आवेगापासून मुक्त होण्याच्या प्रयत्नांमध्यें झेलण्याकरिता बांधलेला होण्याची अपमानास्पद स्थिति आणि कष्टांची कल्पना विपरीत ऋतुमानांमध्यें- पूर इत्यादिना दृष्टित ठेवून करु तेव्हांच या शौचकूपांची आवश्यकता किती निकडची आहे व लोकांचे लक्ष या समस्येकडे आकर्षिले जावे याकरिता श्रीजयराम रमेश यांनी दिलेले स्फोटक, मन व बुद्धिला हिसडा देणाऱ्या कथनात काहींच आपेक्षार्ह नाही हे लक्षात येईल.

सुप्रीमकोर्टाने पण या समस्येवर आज्ञा दिली आहे आहे की सहा महिन्यांत सगळ्या शाळांमधून शौचकूपांची व्यवस्था केली जावी, विशेषः मुलींकरिता शौचकूप बनविले जावे. केंद्र सरकाराने पण लोकसभेत सांगितले आहे की एकलाखपेक्षा अधिक शाळांमध्यें शौचकूपांची सोय नाही. स्वच्छता नसण्यामुळे कित्येक पाण्यांने होणारे रोग आणि शौचसंबंधी रोग उत्पन्न होतात, पसरतात, जे रोगांच्या साथीपेक्षा कमी नाही. पूर्ण जगात या सोयीच्या नसण्यामुळे दरवर्षी 40लाख मुले डायरिया सारख्या रोगाने मरुन जातात.

तुम्हांस आश्चर्य वाटेल की 20व्या शतकाच्या सुरुवातीपर्यंत आमच्या नेत्यांना शौचकूप पण एक समस्या आहे याचे भान सुद्धा नव्हते. ही एक समस्या आहे याकडे सगळ्यात आधी कोणी लक्ष वेधिले असेल ते गांधीजींनी. गांधीजी कांग्रेसच्या प्रत्येक अधिवेशनात सगळ्यात आधी शौचालयांच्या व्यवस्थेकडेच लक्ष देत असत की तेथे पाणी इत्यादिची योग्य व्यवस्था आहे की नाहीं. गांधीजींचे एक अनुयायी अप्पा पटवर्धन, गांधीजींने जे असहकार आंदोलन छेडले होते त्यापूर्वीपासून त्यांच्या आश्रमात राहून चूकले होते त्यांनीच 1928 मध्यें शेतकऱ्यांकरिता शौचकूपाचा प्रचार यशस्वीरित्या केला होता आणि 1930 मध्यें त्यांनी पूढ़े होऊन स्वतः मागून भंगीकाम न केवल स्वतःनी केले होते परंतु याकरिता बारा लोकांना तय्यार देखील केले होते. गांधीजी पण स्वतःचा संडास स्वतः स्वच्छ करित असत.

देशाचे पूर्वपंतप्रधान राहून चूकलेले चौधरी चरणसिंहने देखील या समस्येकडे लक्ष वेधिले होते. परंतु, त्यांचे कार्यकाळ फारच अल्प राहिले. इतक्या वर्षांपासून या समस्येकडे लक्ष वेधिले जात असून देखील परिस्थिती काय आहे तर - हे वरती वर्णिले गेले आहेच. अशा भयंकर परिस्थितीत जर जनतेचे ताबडतोब लक्ष ओढ़ले जावे याकरिता जर कां असे स्फोटक, कोणालाही हादरवून सोडणारे कथन मंत्री श्रीरमेश यांनी देऊन दिले तर त्यात असे कोणते संकट कोसळून पडले! आमच्या मताप्रमाणे तर ते प्रशंसेचे पात्र आहेत जे निर्मल भारतच्या मोहीमेत शौचकूपांच्या आवश्यकतेवर एवढ़ा जोर देऊन राहिले आहेत, याकरिता जोरदार प्रयत्न देखील करित आहेत. ज्यांस आजपर्यंत या देशात कोणीही केले नाही अपवाद आहे तो सुलभ इंटरनेशनलच्या श्रीबिंदेश्वरी पाठक व त्यांच्या स्वयंसेवकांचा आणि हो हेच ते श्रीबिंदेश्वरी पाठक आहेत जे एकटे श्रीरमेश यांच्या समर्थनाकरिता पुढ़े आलेत जेव्हाकी श्रीरमेश यांचा स्वतःचा पक्ष कांग्रेसने देखील त्यांच्या या कथनापासून स्वतःस दूर करुन घेतले होते.

कांकी आमचा देश धर्मप्रधान होण्याबरोबरच मंदिरांचा देश देखील आहे आणि आमच्या मंदिर या संकल्पनेत जैनमंदिर, शीखांचे गुरुद्वारे, ख्रिस्तींचे चर्च, मशीदी व अन्य धर्मांचे-संप्रदाय-पंथांचे धर्मस्थळ यांचा देखील समावेश होतो. श्रीरमेश यांच्या कथनाच्या मंदिराला पण याच संदर्भात बघितले तर अधिक योग्य होईल, कांकी भारत हिंदूबहुलतेचा देश आहे यामुळे हे स्वाभाविकच आहे की जेव्हा पण कांही उल्लेख होईल तर तो सगळ्यात आधी हिंदुंशीच संबंधित राहिल, यांस समझणे पण आवश्यक आहे. आता आम्ही आमच्या या मुद्यावर येतो की आम्हांस शौचकूपांबरोबरच मंदिर देखील हवेत पण ते मंदिर कसे असले पाहिजेत हाच खरा मुद्दा आहे.

वर्तमानकाळात मंदिर म्हणा किंवा धर्मस्थळ म्हणा अळंब्यांप्रमाणे फोफावत चालले आहेत. दिसली जागा की बनविले मंदिर मग तो एकाध्या गल्लीचा कोपरा असो किंवा कोणते मैदान, रस्ता इ. कुठे-कुठे तर लोकांच्या कंपाउंड मध्येंच संधिसाधून धर्मस्थळ बनवून दिले गेले आहे. जिथे धंद्या शिवाय आणखिन काहीही होत नाही. या धंदेवाईक लोकांनी तर नाल्यांवरच, कोणत्याही सार्वजनिक प्रसाधनाजवळ किंवा येथपर्यंत की उकिरड्यावर देखील मंदिर उभे केले आहेत. याकरिता एकाधा चबुतरा बनवायचा एकाध मूर्ति ठेवायची किंवा शेंदूर फासून दगड ठेवायचा की झाले आणि हळू-हळू लोकांच्या अंधश्रद्धेचा फायदा उचलून मंदिर बनवायचे की झाली भंडाऱ्याच्या नावावर वर्गणी, पोटपाण्याची सोय.

श्रद्धेची आवश्यकता प्रत्येक मनुष्याला असते कोणत्यातरी मंदिरात गेल्या नंतर मूर्ति समोर हाथ जोडून उभे राहण्याने त्याला एक आत्मिक शांतिचा संतोष प्राप्त होतो, तो एक प्रकारची शक्ति प्राप्त करतो. समस्येचे निदान होईलचा विश्वास त्यास प्राप्त होतो. पण या धंदेवाईकांच्या मंदिरात हे कसे प्राप्त होऊ शकते. केवळ श्रद्धेचे क्षेत्र आहे म्हणून कोणालाही धर्माच्या नावावर काहीही करण्याची स्वीकृती कशी दिली जाऊ शकते. याकरिता तर हे हवे की समाजातल्या लोकांनीच अशा प्रकारच्या धार्मिक स्थळानां प्रोत्साहन दिले न गेले पाहिजे. मंदिराचे स्वरुप कसे हवे याचा पण तर विचार केला गेला पाहिजे. कोणत्याही चबुतऱ्यावर एक मोठासा दगड शेंदूर पोतून ठेवून देण्याने ते मंदिर होऊन जात नाही.

याच प्रकारे कोठे-कोठे तर घरातच मोठे मंदिर बनवून दिले गेले आहे जिथे दर आठवड्याला भंडारा-प्रसाद वितरण, आरती ती पण जोरा-जोराने जरी त्यामुळे जवळपास राहणाऱ्यांना त्रास कां होईना, वेळोवेळी होणारे यज्ञ, अखंड पारायण, प्रवचन आदि चालत राहतात ते पण रस्ते अडवून आणि कार्यक्रमानंतर जी घाण होते ती रसत्यांवर तशीच सोडून दिली जाते किंवा ड्रेनेजच्या हवाली केली जाते, ड्रेनेज चोक झाली तरी पर्वा नाही. कुठे-कुठे तर मध्य रसत्यावरच मंदिर स्थित आहेत किंवा रस्ते अडवून राहिले आहेत. या मंदिरांपैकी जास्तकरुन तर बेकायदेशीर आहेत ज्यांना अतिक्रमण करुनच बनविले गेले आहे. जर शास्त्रांमध्यें सांगितले गेले आहे की सगळ्यात मोठे पाप भूमि अतिक्रमण करणे आहे तर या मंदिरांना स्वीकृती कशी दिली जाऊ शकते.

जेव्हा विश्वनिर्मिती संबंधीचे तत्त्वज्ञान अस्तित्वात आले, श्रद्धाळु आले, श्रद्धा राहवी म्हणून त्याकरिता कर्मकांडांची निर्मिती झाली तेव्हा या श्रद्धा राहल्या पाहिजेत या करिता काही अभिनिवेश पण आले. यातूनच शिल्प, संगीत, चित्रकला, नाटक इत्यादी आले. परंतु, आज या कला ज्या मंदिरांमधून व्यवस्थितशील चालत असत त्या या नाममात्रच्या मंदिरांतून तर कुठेच दिसून पडत नाहीत. निश्चितच अशा मंदिरांची काय आवश्यकता आहे?

कांही मंदिर जे व्यक्तिविशेष किंवा समाज विशेष यांनी निर्मिलेले आणि संचालित केले जात आहेत ते तर निश्चितच या प्रकारच्या देखाव्यांना, शोभायात्रा काढून समस्या उत्पन्न करण्याच्या प्रवृत्ति, उत्सवांच्या नावावर फालतू खर्च करण्या पासून परावृत्त होऊ शकतात, समाजाच्या लोकांना जागरुक करुन याप्रकारच्या प्रवृत्तिंवर अंकुश लावू शकतात. आपला दृष्टिकोण विस्तीर्ण करुन समाजहिताकरिता सुधाराच्या दृष्टिने पाऊल पुढ़े टाकू शकतात. परंतु, याप्रकारचे मंदिर आणि याप्रकारच्या प्रवृत्तिवाले पण जरा कमीच आहेत. तरी पण आशेचे काही किरण दिसून पडतात, या वाढ़ाव्या.

वर्तमानकाळात उदारीकरण-वैश्वीकरण किंवा बाजारावाद म्हणाची जी लाट चालून राहिली आहे तीने प्रत्येक गोष्टीला बाजाराचे रुप देऊन दिले आहे त्यातून मंदिर कसे सुटू शकतात. आजच्या तारखेत जर कां सगळ्यात मोठा बाजार कसला असेल तर तो मंदिरांचाच आहे. जरा कल्पना करा देशात किती गांव आहेत, किती विभिन्न स्तरांचे नगर आहेत, महानगर आहेत आणि मग यांना नजरेत ठेऊन किती मंदिर या देशात आहेत आणि त्या मंदिरांमधून येणारी बिदागी, दान-दक्षिणेची कल्पना पण जर हातोहात करुन घेतली तर हा आकडा अब्जांमध्यें जातो. काही वर्षापूर्वी वर्तमानपत्रांमधून छापून आले होते की एकट्या मुंबईतच साईबाबांचे किती मंदिर कायदेशीर-बेकायदेशीर आहेत आणि त्यांतून येणारी दक्षिणा कशाप्रकारे कोट्यवधी रुपयांची आहे तर हा मार्केट किती मोठा आहे याची कल्पना सहजच येते आणि येथे हे स्मरणात ठेवायला हवे की मंदिर ना नफा क्षेत्र आहे.

आणि भारताचा हा सगळ्यात मोठा र्स्वस्पर्शी क्षेत्र सर्वथा अनियोजित आहे व हाच मुख्य मुद्दा आहे. या क्षेत्रात आधुनिक म्हणावे असे व्यवस्थापनच नाही. प्रमुखतेने जी बिदागी, दान आदि येतात त्याचे व सुरक्षिततेचा प्रश्न. सुरक्षितते करिता आणिबाणीची व्यवस्था काय आहे? भाविक जो पैसा दानच्या रुपात परमेश्वराच्या सत्कार्याकरिता देतात त्याचा उपयोग त्यांच्या श्रद्धेचा सन्मान ठेऊन तितक्याच पवित्रतेने होतो की नाही? हा आस्थेचा, पवित्रतेचा क्षेत्र आहे तेव्हा यावर योग्य लक्ष देणारी, नियंत्रण ठेवणारी मशीनरी कोणती? हा एक अभ्यासाचा विषय आहे. या मशीनरीची गरज म्हणून देखील आहे कांकी, दानपेटीत दिलेले दान किंवा ताटात ठेवलेले पैसे कोठे जातात हे विचारण्याची हिंमत तर साधारण मनुष्य करुच शकत नाही. पण जर कां एकाधी ऍथारिटी असेल तर तो कमीतकमी तीस तक्रार करुन आपला पक्ष तर ठेऊ शकेल. जसे बैंक वा इंश्योरेंसच्या क्षेत्रात लोकपाल ज्यांना तक्रार करुन आपण न्याय मागू शकतो तसेच या क्षेत्रात देखील कोणी असावा असे तुम्हास वाटत नाही कां? जर कां असा विचारणारा कोणी असेल तर या क्षेत्रात येणाऱ्याला पण हे ठरवावे लागेल की तो 'फीलगुड" करिता येत आहे की श्रद्धा ठेऊन भाविकांना फायदा पोहचविण्याकरिता येत आहे.

आज आम्ही ग्लोबलाइजेशन-उदारीकरणाच्या युगातुन भ्रमण करित आहोत तेव्हा या व्यवस्थेस प्राच्य स्थितीत कसे ठेऊ शकतो. जुन्याकाळी मंदिरांची व्यवस्था राजेमहाराजे, सुभेदार इत्यादी करित असत वे जे पण कार्य संपादित होत असे ते परंपरागत पद्धतीने होत असे. तसेतर 1860पासून आजपर्यंत मंदिरांकरिता ट्रस्ट नोंदणी, त्याची व्यवस्था, येणाऱ्या दानाचे उपयोजन इ. करिता कायदा उपलब्ध आहे. परंतु, या क्षेत्रात पण आधुनिक व्यवस्थापनाची, टेक्नॉलॉजीची गरज आहे हा विचार पण तर झाला पाहिजे तो जरा कमीच आहे.
आजच्या या नव्या युगात जेव्हा नियामकांचे महत्व वाढ़त चाललेले आहे व ज्या क्षेत्रात नियामक (नियमनकर्ता) नाही तिथे किती अव्यवस्था, गोंधळ आहे हे जगजाहिर आहे. उदाहरणाकरिता रियल्टी सेक्टरलाच घेऊ या जिथे एकाद्या अथॉरिटीची मागणी खूप दिवसांनी पासून चालू आहे आणि आता सरकार देखील यावर लौकरच कारवाई करणार आहे. एक उदाहरण आणखिन आहे टेलीकॉम सेक्टरचे जिथे नियामक ट्रायला जेव्हा अधिकार कमी होते तेव्हा आम्हांस कोणत्या विकट प्रश्नांना सामोरी जावे लागले आणि आता अधिकार प्राप्ती नंतर परिस्थितीत किती बदल झाला आहे ते सगळ्यां समोरच आहे. तेव्हा धर्मस्थळांच्या क्षेत्रात पसरलेल्या गोंधळास थांबविण्याकरिता पण एकाद्या नियामक कां नको?

जर श्रद्धेच्या या क्षेत्रात अनियोजन, कुव्यवस्था म्हणा वा अव्यवस्थापनामुळे माजलेल्या गोंधळास ज्यास भ्रष्ट आचरण देखील म्हटले जाऊ शकते ला दूर करण्याकरिता, नियमनाकरिता या क्षेत्रात देखील एकाद्या नियामक कां म्हणून नको! जो भाविकांच्या हितांची, भावभावनांची कदर करेल, त्यांच्या काय गरजा आहेत, त्यांना कोणत्या दर्ज्याची सेवा हवी आहे इ.चे लक्ष ठेवेल, त्यांच्या तक्रारींची दखल घेईल. ज्या जागेच व्यवस्थापन ग्राहकाभिमुख असते, जिथे बायका-मुल, वृद्धां बरोबर आदराचा, सहकाराचा व्यवहार होतो तिथे तुम्हास प्रसन्नता, आनंद प्राप्त होतो कां नाही! खरे सांगा काय एकाद्य मुजोर व्यवस्थापन कोणास आनंद देऊ शकते! अंतर्मनापासून सांगा की वर वर्णिलेल्या अव्यवस्थित मंदिरांत काय तुम्हास आत्मिक सुख-शांति मिळते, तर कां नाही यावर सविस्तर चर्चा व्हावी की त्या नियमनकर्त्याचे स्वरुप कसे असावे, त्याच्या नियंत्रण मंडळात प्रतिनिधींच्या रुपात सरकारी, असरकारी, धर्माचार्य, समाजसेवी इत्यादी कोण लोक असतील, किती सभासद असतील, त्यांची योग्यता इत्यादी. कां की मंदिरांतून येणाऱ्या भाविकांमध्यें सगळ्याच वर्गांची लोक खेळाडू, व्यापारी, उद्योगपती, सरकारी-प्रायव्हेट सेक्टरची लोक इ. येतात.
                       

Tuesday, December 18, 2012


शौचालय तो चाहिए ही चाहिए, परंतु साथ ही मंदिर भी चाहिए !

गत दिनों केंद्रिय मंत्री श्रीजयराम रमेश ने मंदिर से अधिक शौचालय आवश्यक हैं से संबंधित बयान क्या दिया देश में कइयों की भवें टेढ़ी हो गई और वे निशाने पर आ गए। वैसे उनका यह बयान तथ्यपूर्ण है परंतु चूंकि यह आस्था से संबंधित है इसलिए इस प्रकार के बयान जरा सावधानीपूर्वक देना चाहिए इस प्रकार की एक टिप्पणी भी एक संपादक द्वारा की गई, जो योग्य भी है। परंतु सत्य तो यह है कि इन तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता कि आज विश्व के खुले में शौच जानेवाले 60% लोग हिंदुस्थान में ही बसते हैं, देश की आधी से अधिक आबादी के पास शौचालयों की सुविधा नहीं है। पहले हम शौचालय का अर्थ भी समझ लें- शौचालय एक ऐसी सुविधा है जो मानव के मल-मूत्र की समुचित व्यवस्था के लिए प्रयुक्त किया जाता है या उस युक्ति के लिए भी।

श्री रमेश ने भारतीय रेल को एक बहुत बडे शौचालय का नाम दिया है जो सच ही है। रेलयात्रा के दौरान सुबह-सबेरे यदि आप खिडकी से झांककर देखें तो आपको दर्शन होंगे पटरी किनारे शौच के लिए बैठे लोगों के ही, यही दृश्य बस यात्रा के दौरान भी देखने को मिल जाता है। शहरों में भी खुले स्थानों पर प्रातःकाल में शौच के लिए बैठे लोगों के हाथ में डिब्बा या पानी से भरी बोतल लिए शौच के लिए स्थान तलाशते लोग नजर आ ही जाएंगे।
जरा सोचिए विदेशों से आनेवाले पर्यटकों के सामने हमारी क्या छवि बनती है। कितने गंदे लोग हैं इस देश के जो चाहे जहां गंदगी करते हैं और इसमें भी कोई दो मत हो नहीं सकता कि हम अव्वल दर्जेे के गंदों मेें गिने जा सकते हैं। अब तो मुंबई जो हमारे देश की आर्थिक राजधानी है को दुनिया के सबसे गंदे शहरों में गिना गया है। वस्तुस्थिति तो यह है कि, यदि हम केवल स्वच्छ रहना और स्वच्छता रखना भी सीख जाएं तो मात्र पर्यटन ही हमारे देश में रोजगार का एक बहुत बडा साधन बन सकता है।

परंतु, स्वच्छतागृहों की कमी के चलते यह कैसे संभव है? वैसे इसके लिए हमें सबसे पहले अपनी शौच निवृत्ति संबंधी आदतों को भी बदलना पडेगा। हमारे यहां आज भी खुले में शौच जाने की मानसिकता रखनेवाले लोगों की कमी नहीं। कुछ लोग तो लगता है कि इस समस्या को इतने हल्के से लेते हैं कि वे यह तक कहने से बाज नहीं आते कि लगता है इस देश में सारी समस्याएं हल हो गई हैं और इस देश में एक ही समस्या बची है और वह है शौचालयों की।

यह भी एक कटु सत्य ही है कि घटती जमीनें और उनकी बढ़ती कीमतों ने शहरों में सबसे अधिक कहर मूत्रालयों पर ही ढ़ाया है, जहां उन्हें तोडकर पार्किंग, व्यापार आदि के लिए उपयोग में लाया जाने लगा है। और लगता है कि, इस नेचरल कॉल से निवृत्त होने के लिए शहरों में स्थान ही शेष नहीं रहे हैं। इस कारण लोग चाहे जहां खडे होकर लघुशंका निवृत्त होते रहते हैं परंतु, महिलाएं क्या करें? बाहर से या छोटे गांवों से शहरों में किसी काम के सिलसिले में सुबह आकर शाम को वापिस चले जानेवाला एक बहुत बडा वर्ग जिसे फ्लोटिंग वर्ग भी कहा जा सकता है के सामने भी यही समस्या है। वर्तमान में छोटे शहरों-कस्बों के बसस्टैंड पर भी या तो सुविधा ही नहीं है और यदि है भी तो अति अपर्याप्त वह भी गंदी जिसमें महिलाओं के लिए कोई स्थान ही नहीं मानो महिलाएं यात्रा ही नहीं करती या उन्हें इस सुविधा की आवश्यकता ही नहीं पडती। बस छूट न जाए इसलिए शीघ्रताशीघ्र निवृत्त हो आए कि आपाधापी में दौड लगाते यात्री इन बसस्टैंडों पर दिख पडना आम है। क्या शौचालयों की यह कमी भयावह नहीं है? चीन में तो महिलाओं ने इस कमी के समाधान के लिए ऑक्यूपाय वॉलस्ट्रीट की तर्ज पर ऑक्यूपाय मॅन्स टॉयलेट का आंदोलन ही छेड दिया है यहां इस आंदोलन का उल्लेख केवल इस समस्या की गंभीरता को दर्शाने के लिए ही किया है।

सर्वेक्षणों के अनुसार कई कार्यालयों में महिलाओं के लिए टॉयलेट की अलग से व्यवस्था ही नहीं है, कहीं-कहीं तो टॉयलेट ही नहीं हैं या हैं भी तो स्वच्छता की कमी के कारण कई महिलाएं इनका उपयोग घृणावश या यूरीन इंफेक्शन के डर से करना नहीं चाहती। मुंबई जैसी जगह पर तो कई महिलाएं सुबह घर से निवृत्त हो निकलने के पश्चात शाम को घर लौटकर ही टॉयलेट में जाती हैं। मुंबई ही क्यों अन्य कई शहरों में भी यही समस्या मौजूद है। सार्वजनिक शौचालयों की कमी एवं अस्वच्छता के कारण महिलाओं का एक बडा वर्ग यूरीन इंफेक्शन या अन्य संक्रमणों से पीडित हैं। गांवों की समस्या तो और भी गंभीर होती चली जा रही है बढ़ती आबादी के दबाव से गांव भी अछूते नहीं रहे हैं। पहले गांवों के पास ही झाडियों के झुरमुट हुआ करते थे लेकिन बढ़ती आबादी के कारण अब वे भी ना के बराबर होते चले जा रहे हैं गांव की महिलाएं जब शौच के लिए जाती थी तो वे आड का काम करते थे।

आयुर्वेद में सात वेगों का उल्लेख है जिन्हें रोका नहीं जाना चाहिए उनमें शौच निवृत्ति भी है। शौच निवृत्त होने का सुख चेहरे पर ही झलकता है। क्या आप इस सुख से परिचित नहीं हैं? और जिनके पास इनकी सुविधा नहीं है, जिन्हें सुबह-शाम के प्राकृतिक परदे का सहारा लेना पडता है और तब तक इस आवेग को रोके रखने का कष्ट और इस आवेग से मुक्त होने के प्रयत्नों में झेलने के लिए बाध्य होने की जिल्लत और कष्टों की कल्पना विपरीत मौसम जैसे बाढ़ आदि को दृष्टि में रख कर करें तभी इन शौचालयों की आवश्यकता कितनी अहम्‌ हैऔर लोगों का ध्यान एकदम से इस समस्या की ओर आकर्षित हो इसके लिए श्रीजयराम रमेश द्वारा दिए गए स्फोटक, दिलो-दिमाग को झकझोर देनेवाले बयानों में कुछ आपत्तिजनक नहीं है यह महसूस होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस समस्या पर निर्देश दिए हैं कि छः माह के भीतर सभी स्कूलों में शौचालय की सुविधा प्रदान की जाए, विशेषकर लडकियों के लिए शौचालय बनाए जाएं। केंद्र सरकार ने ही लोकसभा में बतलाया है कि एक लाख से अधिक स्कूलों में शौचालयों की सुविधा नहीं है। सफाई के अभाव में कई जलजनित और शौच संबंधी बीमारियां जन्म लेती हैं, फैलती हैं, जो किसी महामारी से कम नहीं। पूरी दुनिया में इस सुविधा के अभाव में प्रतिवर्ष 40 लाख बच्चे डायरिया जैसी बीमारी से मर जाते हैं।

आपको आश्चर्य होगा कि 20 शताब्दी के आरंभ तक हमारे नेताओं को शौचालय भी कोई समस्या है इसका भान तक न था। यह एक समस्या है इस ओर सबसे पहले यदि किसीने ध्यान आकर्षित किया तो वह थे गांधीजी। गांधीजी कांग्रेस के हर अधिवेशन में सबसे पहले शौचालयों की व्यवस्था की ओर ही ध्यान देते थे कि पानी आदि की समुचित व्यवस्था है कि नहीं! गांधीजी के एक अनुयायी अप्पा पटवर्धन, गांधीजी द्वारा जो असहयोग आंदोलन छेडा गया था उसके पूर्व ही उनके सत्याग्रह आश्रम में रह चूके थे ने ही 1928 में किसानों के लिए शौचकूप का प्रचार सफलता पूर्वक किया था और 1930 में उन्होंने जेल में आगे होकर, मांगकर भंगी काम न केवल स्वयं ने किया था अपितु इसके लिए बारा लोगों को और तैयार भी किया था। गांधीजी स्वयं भी अपना संडास स्वयं स्वच्छ किया करते थे।

देश के प्रधानमंत्री रह चूके चौधरी चरणसिंह ने भी इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया था परंतु, उनका कार्यकाल बडा ही अल्प रहा। इतने वर्षों से इस समस्या की और ध्यान आकर्षित किए जाने के बावजूद परिस्थिति क्या है तो - यह ऊपर बयान कर ही दी गई है। ऐसी विकट परिस्थितिमें यदि जनता का तत्काल ध्यान आकर्षित हो सके इसके लिए कोई स्फोटक, किसीको भी हिला देनेवाला बयान मंत्री महोदय श्री जयराम रमेश ने दे दिया तो कौनसा पहाड टूट पडा हमारी दृष्टि में तो वे बधाई के पात्र हैं जो निर्मल भारत अभियान के तहत शौचालयों की आवश्यकता पर इतना जोर दे रहे हैं, इसके लिए जोरदार प्रयास भी कर रहे हैं। जिसे आजतक इस देश में किसीने भी नहीं किया अपवाद है तो सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक श्री बिंदेश्वरजी पाठक और उनके स्वयंसेवकों का और यही श्री बिंदेश्वरजी हैं जो अकेले श्री रमेश के समर्थन में आगे आए जबकि उनकी स्वयं की कांग्रेस पार्टी ने भी उनके वक्तव्य से किनारा कर लिया था।

लेकिन चूंकि हमारा देश धर्मप्रधान होने के साथ ही मंदिरों का देश भी है। और हमारी मंदिर इस संकल्पना में जैन मंदिर, सिक्खों का गुरुद्वारा, ईसाइयों का चर्च, मस्जिद तथा अन्य धर्मों-संप्रदायों-पंथों के धर्मस्थल भी समाहित हैं। श्रीरमेश के बयान के मंदिर को भी इसी संदर्भ में देखें तो अधिक योग्य होगा, चूंकि भारत हिंदूबहुल देश है इसलिए स्वाभाविक ही है कि जब कोई उल्लेख होगा तो वह सबसे पहले हिंदुओं से संबंधित ही होगा इसे भी समझना आवश्यक  है। अब हम अपने इस मुद्दे पर आते हैं कि हमें शौचालयों के साथ ही मंदिर भी चाहिए लेकिन वह मंदिर कैसे होने चाहिए यही असली मुद्दा है।

वर्तमान में देखें तो मंदिर कहें या धर्मस्थल कहें कुकुरमुत्तों की तरह उगे चले जा रहे हैं। जहां दिखी जगह वहीं बना दिया मंदिर फिर वह गली के नुक्कड हों या फिर कोई मैदान, सडक आदि। कहीं-कहीं तो लोगों के कंपाउंड में ही मौका देखकर धर्मस्थल बना दिए गए हैं। जहां धंधेबाजी के सिवा और कुछ नहीं हो रहा। इन धंधेबाजों ने तो नालों के ऊपर, किन्हीं सार्वजनिक प्रसाधनगृह के पास तक मंदिर बना डाले हैं। इसके लिए एक चबूतरा बनाया एक मूर्ति रखी या सिंदूर पोतकर पत्थर रख दिया और धीरे-धीरे लोगों की अंधश्रद्धा का लाभ उठाकर धीरे से मंदिर बना  दियाऔर हो गई चंदे, भंडारे की दुकान चालू।

श्रद्धा की आवश्यकता हर मनुष्य को होती है किसी मंदिर में जाने के बाद मूर्ति के आगे हाथ जोडकर खडे होने से उसे आत्मिक शांति की संतुष्टि प्राप्त होती है, वह एक प्रकार की शक्ति प्राप्त करता है। समस्या का समाधान हो जाएगा का उसे विश्वास प्राप्त होता है। लेकिन इन धंधेबाजों के मंदिर में ये कैसे प्राप्त हो सकती है केवल श्रद्धा का क्षेत्र है इसलिए किसीको भी धर्म के नाम पर कुछ भी करने की अनुमति किस प्रकार से दी जा सकती है। इसके लिए तो चाहिए कि समाज के लोग ही इस प्रकार के धार्मिक स्थलों को प्रोत्साहन ना दें। मंदिरों का स्वरुप क्या हो इसका भी विचार किया जाना चाहिए। किसी चबूतरे पर एक बडा सा पत्थर पोतकर रख देने से वह मंदिर तो नहीं हो सकता।

इसी प्रकार से कहीं-कहीं तो घरों में ही बडे मंदिर बना लिए गए हैं जहां हर सप्ताह भंडारे-प्रसाद वितरण, आरती वह भी जोर-जोर से भले ही आसपास के रहवासियों को कष्ट हो, समय-समय पर होने वाले यज्ञ अखंड पाठ, प्रवचन आदि चलता रहता है वह भी सडकों को घेरकर और आयोजन के पश्चात जो गंदगी होती है उसे या तो सडकों पर ऐसे ही छोड दिया जाता है या ड्रेनेज के हवाले कर दिया जाता है भले ही पूरी ड्रेनेज व्यवस्था चरमरा जाए। कहीं-कहीं तो बीच सडक पर ही मंदिर स्थित हैं या सडक को बाधित कर रहे हैं। इन मंदिरों में से अधिकांश तो अवैध ही होते हैं जिन्हें अतिक्रमण कर ही बनाया जाता है। जब शास्त्रों में कहा गया है कि सबसे बडा पाप भूमि अतिक्रमण है तब इन मंदिरों को मान्यता कैसे दी जा सकती है।

जब विश्वनिर्माण संबंधी तत्त्वज्ञान अस्तित्व में आया, श्रद्धालु आए, श्रद्धा बनी रहे इसके लिए कर्मकांडों की निर्मिती हुई तो यह श्रद्धा सतत बनी रहे इसके लिए कुछ अभिनिवेश भी आए। इसीसे शिल्प, संगीत, चित्रकला, नाटक आदि आए। परंतु आज यह कलाएं जो मंदिर के माध्यम से सुचारु रुप से चला करती थी वह इन तथाकथित मंदिरों में तो कहीं नजर ही नही आती। निश्चय ही ऐसे मंदिरों की क्या आवश्यकता?

कुछ मंदिर जो व्यक्ति विशेष या समाज विशेष द्वारा निर्मित एवं संचालित किए जा रहे हैं वे तो निश्चय ही इस प्रकार की झांकीबाजी, शोभायात्राएं निकालकर समस्याएं पैदा करने की प्रवृत्ति, उत्सवों के नाम पर बेजा फिजूलखर्ची से बाज आ सकते हैं, समाज के लोगों को जागरुक कर इस प्रकार की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगा सकते हैं। अपना दृष्टिकोण व्यापक कर समाजहित समाज सुधार की दृष्टि से कदम बढ़ा सकते हैं। परंतु, इस प्रकार के मंदिर और इस प्रकार की प्रवृत्तिवाले भी कुछ कम ही हैं। फिर भी आशा की कुछ किरणें तो हैं ही वैसे ये बढ़े यह भी आशा है।  
   
यदि वर्तमान में उदारीकरण-वैश्विकरण या बाजारवाद कहें की जो लहर चल रही है उसने हर चीज को बाजार का रुप दे दिया है तो मंदिर भी क्यों कर इससे अछूते रह सकते हैं। आज की तारिख में यदि सबसे बडा बाजार किसी का है तो वह मंदिरों का ही है। जरा कल्पना कीजिए देश में कितने गांव है, कितने विभिन्न स्तरों के नगर हैं, महानगर हैं और फिर इनको मद्देनजर रख कितने मंदिर इस देश में हैं और उन मंदिरों में आनेवाले चढ़ावे की कल्पना भी लगे हाथ कर ही लें तो यह आंकडा अरबों-खरबों में जाएगा। कुछ वर्ष पूर्व समाचार पत्रों में छपा था कि अकेले मुंबई में ही सांईबाबा के कितने मंदिर वैध-अवैध हैं और उनमें आनेवाला चढ़ावा किस प्रकार से करोडों का है तो यह मार्केट कितना बडा है इसकी कल्पना सहज ही आ जाएगी। और यह स्मरण रहे कि मंदिर तो ना नफा का क्षेत्र है।

और भारत का यह सबसे बडा सर्वस्पर्शी क्षेत्र नितांत अनियोजित है। और यही मुख्य मुद्दा भी है। इस क्षेत्र में आधुनिक कहा जाए ऐसा व्यवस्थापन ही नहीं है। मुख्यतः जो दान-चढ़ावा आदि आता है वह और सुरक्षा का प्रश्न। सुरक्षा के लिए आपातकालीन व्यवस्था क्या है? श्रद्धालुगण जो पैसा दान के रुप में परमेश्वर के सामने सत्कार्य के लिए देते हैं उसका उपयोग उनकी श्रद्धा का सम्मान रखते हुए उतनी ही पवित्रता से हो रहा है कि नहीं? जब यह आस्था का, पवित्रता का क्षेत्र है तो इस पर समुचित ध्यान देनेवाली, नियंत्रण रखनेवाली मशीनरी कौनसी? यह एक अध्ययन मांगता है। इस मिशनरी की आवश्यकता इसलिए भी है क्योंकि, दान पेटी में दिया हुआ दान, या थाली में रखे पैसे कहां जा रहे है यह पूछने की हिम्मत तो साधारण व्यक्ति जुटा ही नहीं सकता लेकिन यदि कोई अथारिटी हो तो वह कम से कम उसे शिकायत कर अपनी आवाज तो उठा सकेगा। जैसे बैंक या इंश्योरेंस सेक्टर में लोकपाल जिन्हें शिकायत कर आप न्याय मांग सकते हैं उसी प्रकार से इस क्षेत्र में कोई हो क्या ऐसा आपको भी नहीं लगता। यदि ऐसा कोई पूछनेवाला होगा तो इस क्षेत्र में आनेवाले को भी यह तय करना पडेगा कि वह 'फीलगुड" के लिए आ रहा है कि श्रद्धावश श्रद्धालुओं को लाभ पहुंचा सके इसलिए आ रहा है।

आज जब हम वैश्वीकरण के दौर से गुजर रहे हैं तब इस व्यवस्था को पुरातन स्थिति में कैसे छोडा जा सकता है। पुराने जमाने में मंदिरों की व्यवस्था राजे-रजवाडे, उनके सरदार आदि करते थे और जो भी कार्य संपादन होता था वह परंपरागत रुप से होता था वैसे तो 1860 से लेकर आज तक मंदिरों के लिए ट्रस्ट पंजीकरण, उसकी व्यवस्था, मिलनेवाले चढ़ावे का विनियोग आदि के लिए कानून उपलब्ध हैं। परंतु, इस क्षेत्र में भी आधुनिक प्रबंधन की, टेक्नालॉजी की आवश्यकता है यह सोच भी तो होना चाहिए जो जरा कुछ कम ही है।
आज के इस नए दौर में जब नियामकों का महत्व बढ़ता चला जा रहा है और जिस क्षेत्र में नियामक नहीं है वहां कितनी गडबड है यह जगजाहिर है उदाहरणार्थ रीयल्टी सेक्टर को ही लिया जा सकता है जहां नियामक की मांग एक लंबे समय से की जा रही है और अब सरकार भी इस पर शीघ्र ही कारवाई करने जा रही है। एक और उदाहरण है टेलीकॉम सेक्टर का जहां नियामक ट्राय को जब अधिकार कम थे तो हमें किन समस्याओं का सामना करना पडा और जब अधिकार मिले तो परिस्थितियां कैसे बदल गई यह सबके सामने ही है। तो धर्मस्थलों के क्षेत्र में व्याप्त गडबडियों को रोकने के लिए भी नियामक क्यों नहीं होना चाहिए?

यदि आस्था के इस क्षेत्र में अनियोजन, कुप्रबंधन कहें या अव्यवस्थापन के कारण मची गडबडी जिसे भ्रष्ट आचरण भी कहा जा सकता है को दूर करना है तो क्यों ना इस क्षेत्र में भी कोई नियामक हो। जो श्रद्धालुओं के हितों की, भावनाओं की कदर करे, उसकी क्या आवश्यकता है, उसे किस दर्जे की सेवा प्रदान की जाए, आदि का ध्यान रखे, उसकी शिकायतों की सुनवाई करे। जिस स्थान का प्रबंधन ग्राहकाभिमुख होता है, जहां महिलाओं, बच्चों, वृद्धों के साथ आदर का, सहयोगात्मक व्यवहार होता है क्या वहां प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती। क्या मुजोर प्रबंधन किसीको आनंद दे सकता है। दिल पर हाथ रखकर कहिए कि ऊपर वर्णित अव्यवस्थित मंदिरों में क्या आप आत्मिक शांति पाते हैं, तो क्यों नहीं व्यापक चर्चा इस बात पर भी आयोजित की जाए कि उस नियामक का रुप किस प्रकार का होगा, उसके नियंत्रण मंडल में प्रतिनिधि के रुप में सरकारी, गैर-सरकारी, धर्माचार्य, समाजसेवी आदि कौन लोग होंगे, कितने सदस्य होंगे, उनकी योग्यता आदि। क्योंकि, मंदिर में आनेवाले श्रद्धालुओं में सभी वर्गों के लोग, खिलाडी, व्यापारी, उद्योगपति, सरकारी-निजी क्षेत्र के लोग आदि आते हैं।

Sunday, December 9, 2012


क्या जिन्ना सेक्लूर थे? क्या जिन्ना सेक्यूलर स्टेट की स्थापना करना चाहते थे?

11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान समिति के सामने अपने अध्यक्षीय भाषण में जिन्ना ने जो विचार व्यक्त किए थे उन्हें उद्‌धृत कर जिन्ना को सेक्यूलर बतलाने के रिवाज ने आजकल एक फॅशन का रुप धर लिया है। अब लगता है कि, अडवानीजी के बाद बिहार के मुख्यमंत्री श्रीनीतिश कुमार द्वारा जिन्ना की मजार के दर्शन शायद एक नई परंपरा का रुप धर ले। वैसे जब अडवानीजीे जिन्ना की मजार के दर्शनों के लिए गए थे तो उन पर यह आरोप भी लगा था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात आज तक कोई जिन्ना की मजार पर श्रद्धांजली देने के लिए नहीं गया, ऐसी कोई परंपरा भी नहीं तो, श्री अडवानीजी वहां क्यों गए यह आरोप उन पर आरोप लगानेवालों का अज्ञान दर्शाता है। क्योंकि, सन्‌ 1953 में भारत के केंद्रिय मंत्री रहते कराची में मौ. आजाद ने जिन्ना की कब्र को भेंट दे वहां प्रार्थना की थी।

अब हम अपने मूल मुद्दे 11 अगस्त 1947 के भाषण में जो विचार जिन्ना ने व्यक्त किए थे उन पर आते हैं जिन्हें उद्‌. कर उन्हें सेक्यूलर बतलाने की, या जिन्ना पाकिस्तान को एक सेक्यूलर स्टेट बनाना चाहते थे पर आते हैं। उन्होंने अपने भाषण में कहा था-

''अब तुम स्वतंत्र हो। तुम तुम्हारे मंदिरों में ... मस्जिदों में ... जाने के लिए स्वतंत्र हो। फिर तुम्हारा धर्म, जाति, पंथ कुछ भी हो। देश के राजकाज से उसका कोई संबंध नहीं... धर्म प्रत्येक का व्यक्तिगत मामला रहेगा। राजनैतिक अर्थ से सभी इस देश के समान नागरिक रहेंगे।"" इस विचार से अनेक लोग चौंक गए थे और अनेकों को लगा कि 1920 के पूर्व के जिन्ना फिर से सेक्यूलर हो गए हैं। और आज इसी भाषण के आधार पर उन्हें सेक्यूलर ठहराने की होड लगी हुई है। परंतु, वस्तुस्थिति क्या थी?

पहली बात यानी जिन्ना के इस सेक्यूलिरिज्म या सर्वधर्म समभाव का आधार कौनसा था? तो वह था इस्लाम का तत्त्वज्ञान। इस आधार के संबंध में तीन दिन के संविधान समिति के उद्‌घाटन प्रसंग पर माउंटबॅटन के उपस्थिति में किए हुए भाषण में उन्होंने कहा था ः ''सारे गैर-मुस्लिमों के प्रति सहिष्णुता और सद्‌भावना ... का जन्म तेरासौ वर्ष हुआ है, कि जब हमारे पैगंबर ने यहूदियों और ईसाइयों को जीतने के बाद उनके साथ न केवल शब्दों से अपितु कृति से भी कमाल की सहिष्णुता का व्यवहार किया था और उनकी धर्मश्रद्धाओं का आदर और सम्मान रखा था।* जहां कहीं भी मुसलमानों ने राज्य किया वहां का सारा मुस्लिम इतिहास इसी प्रकार के उदार और महान मूल्यों से ओतप्रोत भरा हुआ है। उसीका अनुकरण कर अपन ने वह आचरण में लाना चाहिए।"" अर्थात इस्लाम की सीख को ही जिन्ना सेक्यूलिरिज्म की परिभाषा में प्रस्तुत कर रहे थे।

(*. यहां जिन्ना को 'मदीना-करार" अभिप्रेत है। सन्‌ 622 में हिजरत कर मदीना पहुंचने पर पैगंबर ने वहां अपने नेतृत्व में इस्लामिक राज्य की स्थापना की। वहां यहूदियों को अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता देना का 'करार" किया। वस्तुतः वह करार नहीं था बल्कि राजा ने दी हुई 'सनद" थी। उसमें यहूदियों को दूसरे दर्जे की नागरिकता थी। वे राजकाज में भाग ले नहीं सकते थे। उन्हें अधिकार कम और बंधन अधिक थे। पैगंबर की अनुमति के बगैर वे हाथ में शस्त्र ले नहीं सकते थे। किसी भी प्रकार का विवाद होने पर अंतिम निर्णय पैगंबर का ही रहनेवाला था। यह करार भी केवल तीन वर्ष ही रहा। इस अवधि में ही सभी यहूदियों को करार भंग किया कहकर मदीना से खदेड दिया गया। करार समाप्त हो गया। यह 'मदीना करार" यानी सामर्थ्य प्राप्त होने तक मदीना के यहूदियों का विरोध कम करने की राजनीति थी। सिवाय यह करार 'ग्रंथधारक" यहूदियों से था, अनेकेश्वरवादियों से नहीं था। विशेष यानी इसी करार के आधार पर पाकिस्तान समर्थक द्विराष्ट्र के सिद्धांत का समर्थन करते हैं। पाकिस्तान के ब्रिगेडियर गुलजार अहमद इस करार की एक धारा के विषय में निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं कि ''यह धारा जब से अस्तित्व में आई तभी से द्विराष्ट्र-सिद्धांत की उत्पत्ति हुई है।)

नए राष्ट्र के रुप में 'संयुक्त राष्ट्र" का सदस्य होने के लिए भी यह परिभाषा आवश्यक थी। दूसरे ही दिन यानी 15 अगस्त को पाकिस्तान आकाशवाणी के उद्‌घाटन प्रसंग पर दिए संदेश में उन्होंने कहा था कि, ''हम 'संयुक्त राष्ट्र" की सनद से बंधे हुए हैं ... अल्पसंख्यकों में ... विश्वास निर्मित करो कि ... यहां डरने का कोई भी कारण नहीं।"" दि. 24 अगस्त को पाकिस्तान का उल्लेख उन्होंने गर्वपूर्वक 'विश्व का सबसे बडा इस्लामिक राज्य" के रुप में किया था। उनका 'सेक्यूरिज्म" द्विराष्ट्रवाद से सुसंगत था, विरोधी नहीं था। 25 अक्टूबर 1947 को एक साक्षात्कार में उन्होंने स्पष्ट किया था कि, ''द्विराष्ट्रवाद सिद्धांत न होकर वास्तविकता है। इसी आधार पर विभाजन हुआ है। पिछले दो महीनों की (हिंसाचार की) भयानक और दुखदायक घटनाओं ने तो यह निस्संदेह रुप से सिद्ध किया है। भारत एक हिंदू राज्य है।"" उपर्युक्त पर से स्पष्ट रुप से यह दिख पडता है कि, सेक्यूरिज्म और द्विराष्ट्रवाद दोनो ही विचार इस्लाम के तत्त्वज्ञान के भाग के रुप में ही जिन्ना प्रस्तुत कर रहे थे। फरवरी 1948 में आकाशवाणी पर दिए अपने भाषण में उन्होंने पाकिस्तान का उल्लेख 'इस्लामिक राज्य" करते हुए उसके संविधान के विषय में कहा था-''पाकिस्तान का संविधान ... अभी तैयार होना है ... वह निश्चित ही इस्लाम के प्रमुख तत्त्वों को अंर्तभूत करने वाला (इस्लामिक) प्रजातांत्रिक पद्धति का होगा।"" 1 जुलाई को 'स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान" का उद्‌घाटन करते हुए पाश्चात्य अर्थरचना की आलोचना और इस्लामिक अर्थरचना के संशोधन का स्वागत करते हुए जिन्ना ने कहा थाः ''अपने को सच्ची इस्लामिक संकल्पना की ... अर्थव्यवस्थानुसार चलना चाहिए और संसार को वह (व्यवस्था) देना चाहिए।""

दूसरी बात है यह है कि, जिन्ना इस प्रकार के विचार कब से प्रस्तुत कर रहे थे? 11 अगस्त 1947 को संविधान समिति में पहली बार ही और अचानक ही इस प्रकार के विचार प्रस्तुत किए थे क्या? इसका स्पष्ट उत्तर है कि, विभाजन का प्रस्ताव हुआ तब से लेकर पाकिस्तान की स्थापना होने तक और उसके बाद पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष के रुप में मृत्यु पर्यंत उन्होंने इसी प्रकार के  विचार सतत प्रस्तुत किए थे। उदा. 5 अगस्त 1939 को मुंबई में जिन्ना ने घोषित किया था कि, ''मैं ने मुसलमान के रुप में जन्म लिया है, मैं मुसलमान के रुप में जी रहा हूं और मुसलमान के रुप में ही मरुंगा।"" इस प्रकार की घोषणा करने के लिए स्वयं को कोई धार्मिक करने की या होने की आवश्यकता नहीं होती।

उपर्युक्त भाषण में ही उन्होंने कहा था- ''हिंदू और मुसलमानों की संस्कृति इतनी भिन्न हैं कि, जिसके पास अधिक शक्ति है वह स्वाभाविक रुप से दूसरे पर दूसरे पर चड्‌ढ़ी गांठता है। भिन्न राष्ट्रीयत्व वाले इस देश में लोकसत्ताक संसदीय पद्धति का शासन असंभव है।'' इसके सात दिन बाद इस्माईल कॉलेज में बोलते समय उन्होंने पुनः स्पष्ट किया कि, ''हिंदू और मुसलमान धर्मश्रद्धा, शिक्षा, संस्कृति और तत्त्वज्ञान इस दृष्टि से दो (विरुद्ध) ध्रुवों पर हैं। वे दो स्वतंत्र राष्ट्र हैं ....भारत में कांग्रेस प्रजातंत्र की बात करती है क्योंकि, वह हिंदुओं की हित की है। उनके लिए यह सिर गिनने का प्रश्न है ... इस देश में प्रजातंत्रात्मक संसदीय शासन पद्धति .... असंभव है।""

प्रजातंत्र पर उनके प्रहार जारी ही रहे। 29 अक्टूबर को दिल्ली में 'मॅंचेस्टर गार्डियन" इस वृत्तपत्र को दिए हुए साक्षात्कार में उन्होंने कहा ः ''यह सिद्ध हो गया है कि, भारत में प्रजातांत्रिक संसदीय पद्धति चलाना असंभव है। इसके कारण अल्पसंख्यकों पर सांप्रदायिक बहुसंख्यकों का राज हमेशा के लिए आ जाएगा ... भारत में प्रजातंत्र का अर्थ 'हिंदूराज्य" ही होता है। यह बात मुसलमानों को कभी भी मान्य नहीं होगी।""

जिन्ना का विरोध पाश्चात्य संसदीय प्रजातंत्र के प्रति था, उन्हें इस्लामिक प्रजातंत्र चाहिए था। उन्हें जो प्रजातंत्र मान्य था उसे वे इस्लाम का आधार देते थे। 7 नवंबर 1939 को मुंबई में भाषण में उन्होंने कहा कि मुस्लिम लीग प्रजातंत्र विरोधी नहीं। इस्लाम स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर विश्वास रखनेवाला धर्म है। यह कहने के लिए उन्हें इस्लाम का अध्ययन करने की कोई जरुरत नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि, ''हिंदू बंधुओं के साथ संपूर्ण समानता के आधार पर चर्चा करने के लिए मैं हमेशा से ही इच्छुक रहा हूं।"" आगे स्पष्ट करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि, मुस्लिम अल्पसंख्य न होकर हिंदुओं की बराबरी के और समान हैं, हमें हिंदू और मुस्लिमों के बीच तीन एक के अनुपात में जनसंख्या का विचार करने वाला पाश्चात्य प्रजातंत्र मान्य नहीं।

दिसंबर 1938 और फरवरी 1939 में इस प्रकार से दो बार देवबंद के विख्यात मौ. अशरफ अली थानवी के नेतृत्व में उलेमाओं का प्रतिनिधि मंडल जिन्ना से मिला था। इस शिष्टमंडल को जिन्ना ने स्पष्ट आश्वासन दिया था कि, भावी पाकिस्तान में शरीअत कानून को अमल में लाया जाएगा। वह अधार्मिक (ला दिनी) राज्य नहीं होगा। जिन्ना ने यह भी मान्य किया था कि, इस्लाम में धर्म और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता। ''नवंबर 1945 में उन्होंने मंकी शरीफ के पीर (धर्मगुरु) को आश्वासन दिया था कि, पाकिस्तान कुरान के कानून पर आधारित रहेगा और वहां शरीअत की स्थापना की जाएगी।"" उन्होंने भेजे हुए पत्र में कहा था, ''यह जोर देकर कहना अनावश्यक है कि, मुस्लिमों की (संख्या) प्रभुत्व वाली (पाकिस्तान की) संविधान समिति  मुस्लिमों के लिए शरीअत से सुसंगत न रहनेवाले कानून बना सकेगी। और (बनाने पर) गैर-इस्लामी कानून मानने के लिए मुसलमान पाबंद नहीं रहेेंगे।"" व्हायसराय वेव्हेल को भारत सचिव लॉरेन्स ने सूचित किया था कि, लीग इस चुनाव में (जो 1945 में हुए थे) पाकिस्तान के लिए जनमतसंग्रह कहकर ही चुनाव लड रही है।

 अतः जिन्ना सेक्यूलर थे, उन्हें धर्म और राजनीति का घालमेल पसंद नहीं था, उन्हें इस्लामी नहीं सेक्यूलर राज्य चाहिए था का किया जानेवाला प्रचार नितांत झूठा है, असत्य है। सच तो यह है कि, उन्होंने पूरी तरह इस्लामनुसार जीने के लिए शरीअत आधारित राज्य यानी पाकिस्तान चाहिए कहकर मुस्लिम जनता का समर्थन हासिल किया था, पाकिस्तान का निर्माण किया था। स्वतंत्रता, बंधुता, सामाजिक न्याय, प्रजातंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सभी को समान व्यवहार इसी प्रकार द्विराष्ट्रवाद आदि मूल्यों का उन्होंने सभी कालों में, फिर वह 1920 के पहले का जब वे सेक्यूलर कहलाते थे तब का हो या बाद का हो, एक जैसा ही समर्थन किया था और इन सबका आधार इस्लाम का तत्त्वज्ञान ही था। हिंदूधर्म इन मूल्यों को न माननेवाला और विषमतावादी होने के कारण तो, इस्लाम इस प्रकार के मानवीय मूल्यों की सीख देनेवाला होने के कारण पाकिस्तान सभीको समान अधिकार और न्याय देनेवाला होगा, यह उनका दावा था। बाद में 1956 में संविधानानुसार 'पाकिस्तान" को इस्लामिक राज्य घोषित कर उसका नाम 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान" रखा गया। संविधान की उद्देश्यिका में घोषित किया गया कि, ''इस्लामानुसार बताए हुए प्रजातंत्र में, समानता, सहिष्णुता और सामाजिक न्याय के तत्त्व पूरी तरह से अमल में लाए जाएंगे।"" और यह सब जिन्ना द्वारा प्रस्तुत विचारों से पूरी तरह सुसंगत हैं।

Sunday, November 25, 2012


मौलवियों को राजनीति में कौन लाया?

विभाजन और मुस्लिम प्रश्न का अध्ययन करते समय हम अलीगढ़ आंदोलन के संस्थापक सर सय्यद अहमद से आरंभ करते हैं। इस आंदोलन से ही आगे मुस्लिम लीग की स्थापना और हिंदुस्थान का विभाजन हुआ। इस आंदोलन की मुस्लिम मंडली ब्रिटिशों की ओर से और कांग्रेस के विरोध में थी। मुस्लिम धर्मांध न बने, पाश्चात्य शिक्षा ग्रहण करें और आधुनिक बनें, ऐसा इस मंडली का कहना था। तथापि धार्मिक मुल्ला-मौलवी-उलेमाओं को यह मान्य नहीं था। वे इस आंदोलन से और कुल मिलाकर ऐसी राजनीति से दूर ही रहे।

हिंदुस्थान के इस प्रकार के मुल्ला-मौलवियों को एकत्रित कर राजनीति में लाने का कर्तृत्व और अग्रमान मौलाना अबुल कलाम आजाद को ही जाता है। इसके लिए उन्होंने 1912 में 'अल हिलाल" नाम से उर्दू साप्ताहिक शुरु किया। राजनीति में धर्म को लाने की आवश्यकता पर उन्होंने 'अल हिलाल" के माध्यम से प्रचार शुरु किया। ब्रिटिश शासन पर और अलीगढ़ आंदोलन पर उन्होंने कठोर प्रहार शुरु किए। उन्हींकी प्रेरणा से 'जमियत उलेमा हिंद" नाम का हिंदुस्थानी उलेमाओं का संगठन स्थापित हुआ। वे इन सबको खींचकर राजनीति में लाए। धर्म का आवाहन कर मुस्लिमों को उत्तेजित करने की शुरुआत की। ब्रिटिशों का शासन होने के कारण हिंदुस्थान दार-उल-हरब बन गया है इसलिए उन्हें भगाकर कुरान और शरीअत पर आधारित शासन लाने का आवाहन करना शुरु किया। इसके लिए कांग्रेस से मित्रता की। इसी कारण से इस मंडली को 'राष्ट्रवादी मुसलमान" कहा जाता है। आज की युवा पीढ़ी को ऐसे राष्ट्रवादी मुसलमानों के विचारों की तनिक भी जानकारी नहीं है। इस बारे में अल्प परिचय हो इसलिए मौलाना आजाद के विचारों का थोडा सा दर्शन हम यहां करवा रहे हैं।

मौ. आजाद 'पॅन इस्लाम" के समर्थक !

उनके एक पाठक ने पूछा था कि, मुस्लिम किस दल के पीछे जाएं? मौ. आजाद ने 'अल हिलाल" में उत्तर दिया था कि ः मुस्लिम किसी भी दल के पीछे न जाएं। उन्होंने गतकाल में अनेक सदियों तक नेतृत्व किया है और आगे भी कर सकेंगे। वे केवल इस्लाम का अनुकरण करें। ऐसा होने पर उन्हें राजनीति में हिंदुओं के पीछे जाने की आवश्यकता नहीं पडेगी। कुरान की सीख है किः 'किसी के सामने भी (अल्लाह के सिवाय) न झुकें।"

दूसरे एक अंक में उन्होंने लिखा ः 'हिंदुओं से मत डरो। केवल अल्लाह से डरो। तुम अल्लाह के सैनिक हो। तुमने अल्लाह ने दिया हुआ गणवेश त्याग दिया है। उसे पहनो सारा संसार तुमसे डरने लगेगा .... तुम अल्लाह ने भेजे हुए पृथ्वी के शासक हो। 'अल हिलाल" में सीख दी जाती थी कि ः ''एक हाथ में 'धर्म" और दूसरे हाथ में 'राजनीति" होनी चाहिए! और 'कुरान" दोनो ही स्थानों पर होना चाहिए। 'चलो कुरान की ओर" यह हमारी घोषणा है!""

इस संबंध में मुशीर-उल्‌-हक कहते हैं ः ''धर्म और राजनीति की अविभाज्यता आजाद के कार्य का निचोड था। आजीवन उन्होंने इस मुद्दे पर समझौता नहीं किया। 'लूंगा तो दोनो, नहीं तो कुछ भी नहीं चाहिए", इस प्रकार की उनकी भूमिका थी।""

आजाद ने लिखा था ः 'पैगंबर के अनुयायी धार्मिक दृष्टि से कोई मृत नहीं हो गए हैं जिससे कि, वे राजनीति के लिए धर्म का आधार न लें। जो धर्म केवल विवाह या अंत्यसंस्कार के समय ही काम में आता हो, उस धर्म की हमें आवश्यकता ही क्या?" उन्होंने कहा था ः ''राष्ट्र" और मातृभूमि इन शब्दों से अन्य संसार पर जो परिणाम होता है, वही परिणाम 'अल्लाह" अथवा 'इस्लाम" इन शब्दों का मुसलमानों पर पडता है। इन शब्दों द्वारा मुसलमानों के ह्रदय भडकाए जा सकते हैं... धर्म की शक्ति अमर्यादित होती है।"

1921 में खिलाफत कमेटी के सामने भाषण करते समय उन्होंेने कहा था ः 'कुरान गैर-मुस्लिमों को दो भागों में विभाजित करती है। एक मुसलमानों से मित्रता का व्यवहार करनेवाला और दूसरा, उनसे संघर्ष करनेवाला। इनमें से पहले वर्ग के साथ सहयोग करने के लिए कुरान को कोई आपत्ति नहीं। इसलिए (दूसरे वर्ग के) ब्रिटिशों से संघर्ष करते समय मुस्लिमों द्वारा (पहिले वर्ग के) हिंदुओं के साथ सहयोग करना उनका धर्म कर्तव्य है।"

इसके लिए पैगंबर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा ः 'जब पैगंबर मक्का से हिजरत कर मदीना रहने गए, तब उन्होंने वहां के यहूदियों से करार किया था। उस करार में मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों का एक राष्ट्र होगा, ऐसा कहा गया था।" (परंतु, जब मुस्लिमों की शक्ति बढ़ी, तब मुस्लिम न बने यहूदी टोलियों को मदीना से किस प्रकार से भगा दिया गया था, यह भर उन्होंने भाषण में बतलाया नहीं।)

हिजरत (देश त्याग) का धर्मादेश

मौ. आजाद पॅन-इस्लाम (विश्व बंधुत्व) के कट्टर समर्थक थे। इस संबंध में उन्होंने 1912 में लिखा था कि ः 'अलीगढ़ आंदोलन ने मुस्लिमों को अपंग किया है। इस्लाम का सच्चा ध्येय 'पॅन-इस्लाम" है। इस्लाम में सुधार और प्रगति का आधार वही है। आज कोई सा भी स्थानीय अथवा राष्ट्रीय आंदोलन मुस्लिमों के हित का नहीं। जब तक संपूर्ण मुस्लिम जगत एकत्रित नहीं आता तब तक विश्व के चालीस करोड मुस्लिमों का भला होनेवाला नहीं।" इसीलिए उन्हें पाकिस्तान का निर्माण नहीं चाहिए था। क्योंकि, इससे मुसलमानों का विभाजन होनेवाला था।

1946 में विभाजन का विरोध करते समय उन्होंने कहा था ः ''पाकिस्तान की योजना विशेष रुप से मुसलमानों के लिए अत्यंत हानिकारक है। 'पाकिस्तान" शब्द से यही सूचित होता है कि, संसार का कुछ भाग पवित्र और कुछ अपवित्र है। इस प्रकार से विश्व का विभाजन अइस्लामिक है और इस्लाम के मूल उद्देश्य को ही ध्वस्त कर देनेवाला है। इस्लाम को इस प्रकार का भौगोलिक विभाजन मान्य ही नहीं है। पैगंबर ने कहा है कि, 'अल्लाह ने यह सारा विश्व ही मुस्लिमों के लिए मस्जिद के रुप में निर्मित किया है।" मुस्लिम के रुप में मैं क्षण भर के लिए भी मेरा समूचे हिंदुस्थान पर का अधिकार छोडने के लिए तैयार नहीं।"" पूरे हिंदुस्थान को ही इस्लाम भूमि बनाने का मुस्लिमों का अधिकार विभाजन के कारण मारा जाएगा इसकी आजाद को चिंता थी। सारे विश्व पर इस्लाम का शासन उनका ध्येय था।

कुरान पर आधारित न होने के कारण ब्रिटिश शासित हिंदुस्थान 'दार-उल-हरब" है और मुसलमानों के रहने योग्य नहीं, ऐसा तय करके हिंदुस्थान से मुस्लिम मुस्लिम देश के लिए हिजरत (देशत्याग) करें, इसके लिए 1920 में मौ. आजाद ने 'हिजरत का फतवा" जारी किया था। उस फतवे में उन्होंने कहा था ः 'शरीअत की आज्ञा, वर्तमान परिस्थितियों और मुस्लिमों के हित को ध्यान में लेते मेरे संदेह का निरावरण हो गया है कि, शरीअत के दृष्टिकोण से हिंदुस्थान के मुसलमानों को यहां से मुस्लिम देश में स्थानानंतरण करने के सिवाय अन्य कोई विकल्प नहीं।" इस आदेशानुसार 5 से 20 लाख मुसलमानों ने अफगानिस्तान के लिए स्थानानंतरण किया था।

'जिहाद" की तैयारी

धार्मिक उलेमा मुस्लिमों का राजनैतिक नेतृत्व करें, ऐसा आजाद का कहना था भर इसके लिए उन्हें योग्य उलेमा चाहिए था। वे लिखते हैं ः 'मगर आज के उलेमाओं से मुझे कुछ भी आशा नहीं .... इसके लिए उलेमाओं की नई पीढ़ी तैयार करना पडेगी।" उनमें सच्ची 'इस्लामिक मानसिकता" निर्मित करना पडेगी।" इस प्रकार का उत्तम इस्लामी ज्ञान रखनेवाले उलेमा तैयार करने के लिए उन्होंने 1914 में कलकत्ता में 'दार-उल्‌-इर्शाद" शिक्षण संस्था की स्थापना की। वहां केवल विश्वविद्यालयीन स्नातकों को ही प्रवेश दिया जाएगा। परंतु, यह मदरसा बहुत अधिक समय तक चल नहीं पाया। आजाद का ध्येय साध्य न हो सका।

'स्वतंत्रता के लिए लडना मुस्लिमों का धार्मिक कर्तव्य है, वह जिहाद है", ऐसा मानकर उन्होंने जिहाद की तैयारी की थी। इसके लिए उन्होंने 1913 में 'हिजबुल्लाह" (अल्लाह का पक्ष) नामके गुप्त संगठन की स्थापना की थी। उसमें भर्ती होने के लिए उन्होंने युवाओं का आवाहन किया था। 'अल्लाह की राह में लडने के लिए मेरे सहयोगी कौन हैं?" इस शीर्षक से पत्रक निकाले गए थे। प्रवेश आवेदन पत्र पर जिहाद की आज्ञाएं देनेवाली कुरान की तीन आयतें छपी थी। कुछ दिनों में ही 800 सैनिकों की भरती हो गई। खलीफा की नियुक्ति भी की गई थी। अल्लाह की कुरान की इच्छानुसार रहनेवाला शासन हिंदुस्थान में स्थापित करना यह इस गुप्त संगठन का अंतिम ध्येय था। परंतु, मौ. आजाद को इस मार्ग में भी सफलता नहीं मिली।

सभी मुस्लिमों को आदेश देनेवाला सर्वाधिकारी 'इमाम" होना चाहिए, ऐसी मौ. आजाद की योजना थी। इस प्रकार का एकाधिकारी इमाम न होने के कारण ही मुस्लिम पिछडे हुए हैं, ऐसा उनका कहना था। उनका यह भी कहना था 'इमाम के अधिकार के बिना मुस्लिमों का जीवन अइस्लामी है।" 'इमाम के सिवाय अन्य कोई भी न बोले। उसकी आज्ञा मुस्लिमों के सिरआंखों पर होना चाहिए। धर्मशास्त्र का योग्य अर्थ निकालकर उस अनुसार इमाम द्वारा फतवे निकाले जाना चाहिए। ऐसा इमाम हिंदुओं से करार कर ब्रिटिशों के विरुद्ध जिहाद करेगा," ऐसी उनकी योजना थी। परंतु, इस प्रकार का इमाम किसे मानें? उनका शिष्य मलीहाबादी कहता है ः 'यह स्पष्ट है कि, मौ. आजाद के अतिरिक्त इस पद के लिए हिंदुस्थान में अन्य कोई अधिक योग्य नहीं था। मैं भी इसी मत का था।" स्वयं आजाद को भी ऐसा इमाम होना था।

परंतु, इसके लिए मुस्लिम समाज से मान्यता मिलना आवश्यक था। परंपरानुसार उलेमा-इमाम होने के लिए 'मदरसा" में धार्मिक शिक्षा लेना आवश्यक था। आजाद कभी भी किसी भी मदरसे में शिक्षा ग्रहण करने गए नहीं थे। उनकी शिक्षा घर पर ही हुई थी। अब क्या करें? इसके लिए आजाद इजिप्त के 'अल-अजहर" मुस्लिम विद्यापीठ के स्नातक हैं इस प्रकार की समझ निर्मित की गई। विद्यार्थी काल में कुछ समय तक आजाद इजिप्त में थे। इस कारण हिंदुस्थान में यह समझ रुढ़ भी हो गई।1940 में महादेव देसाई द्वारा लिखे गए आजाद के चरित्र में भी यह घटना बतलाई गई है। 1958 में आजाद की मृत्यु के समय लोकसभा द्वारा सम्मत की हुई श्रद्धांजली के प्रस्ताव में भी यह घटना बतलाई गई है। मृत्य तक आजाद ने इस बारे में कोई खुलासा किया नहीं था। उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुए उनके आत्मचरित्र में अपन 'अल्‌-अजहर" के स्नातक नहीं होने का खुलासा उन्होंने किया हुआ है।

'इमाम" के रुप में मान्यता प्राप्त करने के लिए उन्होंने मान्यवर मौलवियों के पास प्रयत्न शुरु किए। इन प्रयत्नों की जानकारी उनके शिष्यों ने ही लिखकर रखी हुई है। देवबंद के मौ. हसन और लखनऊ के मौ. बारी (अलीबंधुओं के गुरु) ने उन्हें मान्यता दी थी। 1921 में उलेमाओं के संगठन 'जमियत उलेमा हिंद" का अधिवेशन लाहौर में आजाद की अध्यक्षता तले होना तय हुआ उस समय इसका निर्णय लेने के लिए एक उपसमिति नियुक्त की गई। परंतु, अधिकृत रुप से मौ. आजाद को हिंदुस्थानी मुस्लिमों के इमाम में रुप में मान्यता कुछ मिली नहीं। इमाम बनकर मुस्लिमों के सर्वाधिकार स्वयं के पास लेने का आजाद का ध्येय भी सफल न हो सका।

ये सारे विचार और ध्येय मन में रखकर मौ. आजाद जीवनभर कांग्रेस के साथ रहे। 1940 के रामगढ़ के कांग्रेस अधिवेशन के  अध्यक्ष पद पर बोलते समय उन्होंने स्पष्ट रुप से जाहीर किया था कि ः '(हिंदू-मुस्लिम प्रश्न के संबंध में) 1912 में मेरे जो विचार थे आज भी वे वैसे ही हैं.... मैं आज उनकी पुनरावृत्ति करता हूं कि, 1912 में मैं ने जो मार्ग दिखलाया था उसे अधिक योग्य मार्ग हिंदुस्थान के 9 करोड मुसलमानों के लिए अन्य कोई सा भी नहीं।" ऐसे थे मौलाना आजाद। इस प्रकार से आधुनिक काल में मुल्ला मौलवियों को और धर्म को राजनीति में लाने का अग्रमान उनकी ओर जाता है।

लेखक -शेषराव मोरे (अप्रिय पण)
अनुवाद ः शिरीष वसंत सप्रे

Thursday, November 8, 2012


11 नवंबर 'शिक्षा दिवस"
राष्ट्रवादी मुसलमानों के सर्वोच्च नेता मौलाना आजाद

मौ. आजाद नाम है आजादी की लडाई के दौरान कांग्रेस श्रेष्ठियों पर प्रभाव रखनेवाले, जिन्होंने कभी भी कांग्रेस का त्याग नहीं किया, जो सेक्यूलर-राष्ट्रवादी के रुप में जाने जाते हैं, जिन्हें गांधीजी अपना मार्गदर्शक मानते थे, ऐसे व्यक्तित्व का। उनके 'सेक्यूलर" होने और 'भारत की स्वतंत्रता के एक प्रमुख शिल्पकार" होने के फलस्वरुप (सन्‌ 2011 से) उनका जन्मदिन 'शिक्षा दिवस" के रुप में मनाया जाए का आदेश केंद्रशासन ने निकाला हुआ है। 1939 से 1946 तक का कालखंड जो देश विभाजन का निर्णायक कालखंड था के दौरान कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। वे अखंड भारतवादी थे और जब गांधी-नेहरु-पटेल इस त्रयी ने विभाजन को स्वीकार किया तो उनका खिन्न होना स्वाभाविक ही था। क्योंकि, उनका मत था कि विभाजन से मुसलमानों को अपरिमित हानी होगी। मुस्लिम दो भागों में विभाजित होकर उर्वरित भारत में अल्पसंख्य और दखलशून्य बनकर रह जाएंगे।

स्वतंत्रता पश्चात जब वे शिक्षा मंत्री थे तब 23 अक्टूबर 1947 को दिल्ली की जामा मस्जिद में दिए हुए अत्यंत भावनोत्कट  भाषण में हमने यानी मुसलमानों ने क्या गमाया यह बतलाते हुए कहा था-

''मेरे बंधुओं! .... तुम्हें याद है क्या? मैंने तुम्हारी जयजयकार की परंतु तुमने मेरी जबान छांट दी। मैंने हाथ में लेखनी ली परंतु तुमने मेरे हाथ काट दिए। मुझे आगे जाना था परंतु तुमने मेरे पैर तोड डाले। पीछे देखने का प्रयत्न किया परंतु तुमने मेरी पीठ पर वार किया ... बीते सात वर्षों में ..... हर एक बार मैंने तुम्हें धोखे का इशारा दिया .... तुमने ध्यान नहीं दिया ... आज मैं मेरी मातृभूमि में अनाथ बन गया हूं .... मेरा ह्रदय विदीर्ण हो गया है ... क्षणभर के लिए विचार करो। कौनसा मार्ग तुमने पकडा है? तुम कहां पहुंच गए हो? ... तुम्हारे कर्मों का यह फल है।
''मैंने तुम्हारे इशारा दिया था कि, द्विराष्ट्र-सिद्धांत तुम्हारे लिए मृत्यघंटा है ... तुमने वह बहरे कानों से सुना ... कुछ तो भी अच्छा तुममें से निकल गया है और उसका स्थान बुरे ने ले लिया है ... बुरे को तुम स्वर्ग का मेवा समझे ....

''भारत का विभाजन मूलभूत गलती थी ... उसके प्रलयंकारी परिणाम तुमने अपनी आंखों से देखे हैं ... भारतीय मुसलमानों की यह दुर्दशा लीग के मार्गभ्रष्ट नेतृत्व ने की हुई गंभीर गलतियों का परिणाम है।""

भारतीय मुसलमानों का इस्लामी अभिमान जागृत कर उन्हें प्रेरित करते हुए वे आगे कहते हैं कि, ''अपने सामने आई हुई यह उदासी क्षणिक है। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि, तुम्हें पराजित तुम्हारे बगैर अन्य कोई कर नहीं सकेगा ... स्वयं की बुद्धि से विचार करना सीखो ... मानस को दृढ करो....

''तुम कहां जा रहे हो? और क्यों? जरा उधर ऊपर देखो। इस जामा मस्जिद की मीनारें तुम्हें प्रश्न पूछ रही हैं। तुम्हारे वैभवसंपन्न इतिहास के पन्ने तुम गुमा बैठे हो? बिल्कूल कल-परसों तक तुम्हारे काफिले इस यमुना तट पर वुजू करते नहीं थे क्या? ... ध्यान में रखो! दिल्ली तुम्हारे खून से सींचकर तुमने खडी की है .... सच्चा मुसलमान डर या लालच में नहीं फंसता ... 1300 वर्ष पूर्व निरक्षर पैगंबर मुहम्मद द्वारा अल्लाह ने घोषित किया है कि, 'जो अल्लाह पर श्रद्धा रखते हैं और उस श्रद्धा पर अटल रहते हैं, उन्हें  डर नहीं लगता, पीडा नहीं होती।" (तो) तेज हवा बहने दो, तुफान आने दो। वे अल्पजीवी होंगे ....

''इतिहास से संकेत लो .... ये सारे आसपास के तेजस्वी निशान तुम्हारे पूर्वजों ने (तुम्हारे लिए) छोड रखे हैं। उन्हें भूलो मत। उन्हें छोडना मत। उनके पात्र उत्तराधिकारी बनो ... यह देश तुम्हारा है ... तुम्हारे भविष्य से संबंधितका कोई सा भी मूलभूत निर्णय  तुम्हारी मान्यता के सिवाय अपूर्ण रहेगा।

''आज तुम्हें भूकंप का डर लगता है; परंतु एक जमाने में तुम स्वयं ही भूकंप थे। आज तुम्हें अंधेरे से डर लगता है; परंतु एक जमाने तुम स्वयं ही तेजोस्त्रोत थे ... तुम्हारे पूर्वजों ने समुद्र में न केवल गोते मारे थे, बल्कि पर्वतों को कुचल दिया था। बिजली की कडकडाहट से वे घबराए नहीं; उन्होंने तूफानों को लौटा दिया। जिन्होंने एक जमाने में बडे-बडे सम्राटों के कॉलर पकडे, वे आज घबराकर एक दूसरे के गले पकड रहे हैं। यह (इस्लाम पर) श्रद्धा नष्ट होने के लक्षण हैं ....

''बंधुओं! तुम्हारे लिए मेरे पास कोई सा भी नया उपाय नहीं .... मेरे पास वही पहले का उपाय है, ... जो कुरान में बतलाया हुआ है ः डरो मत, दुख मत करो। अगर तुम्हारे पास सच्ची श्रद्धा होगी तो विजय तुम्हारी ही होगी ... अल्लाह की तुम पर कृपा रहे।""

मौलाना आजाद इस प्रकार के भावुक भाषण द्वारा अनेक सदियों तक मुगल साम्राज्य का राजवाडा रहे लालकिले के परिसर में स्थित जामामस्जिद में उपस्थित मुस्लिम श्रोताओं के सामने कौनसा चित्र उपस्थित करना चाह रहे थे तो, वह था अपना (यानी मुस्लिम) साम्राज्य, वह कीर्ति, वह वैभव, वह दर्जा, वह धाक, वह सेना, वे काफिले, अपने पांवों में लौट रहा हिंदुस्थान। लेकिन हाय जिन्ना ने विभाजन की मांग कर और कांग्रेस ने उसे मान्य कर उस हसीन सपने को चूरचूर कर दिया!

जब सारा हिंदुस्थान समता और बंधुत्व के आधार पर एक समन्वित राष्ट्र के निर्माण के लिए कृतसंकल्पित हो रहा था तब ये राष्ट्रवादी मुसलमान मौ. आजाद अपने मुसलमान बंधुओं को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह उपदेश नहीं दे रहे हैं कि प्रजातंत्र को मान्यता दो, मानवनिर्मित संविधान के सार्वभौमत्व को मान्य करो, अब समय आ गया है कि,सेक्यूलर राज को स्वीकारें बल्कि वे तो इस्लामी प्रेरणाओं को प्रज्वलित कर रहे हैं। शीघ्र ही तैयार होने जा रहे भारतीय संविधान पर अपनी निष्ठा रखो का उपदेश देने की बजाए वे उन्हें चलो कुरान की ओर का संदेश दे रहे हैं। विभाजन हो गया तो क्या अपनी इस्लामी श्रद्धाओं को मत छोडो, अंतिम विजय तुम्हारी ही है की प्रेरणा दे रहे हैं।

वैसे तो स्वतंत्रता पूर्वकाल में ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को भी इन राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं (इनमें मौ. आजाद भी शामिल हैं) पर शंका होने लगी थी कि ये वास्तव में राष्ट्रवादी हैं भी कि नहीं? सरदार पटेल ने तो 19 जुलाई 1946 को नेहरुजी को लिखा भी था कि, ''(राष्ट्रवादी मुसलमानों में के) सर्वोत्कृष्ट पर भी विश्वास रखना कठिन है।""

डॉ. आंबेडकरजी ने राष्ट्रवादी मुसलमानों के संबंध में 1945 में कहा था, ''मुस्लिम लीग के सांप्रदायिक मुसलमान और (अन्य) राष्ट्रवादी मुसलमान इनमें कुछ सच्चा फर्क दिखना कठिन है ....सचमुच अनेक कांग्रेसी इस प्रकार से मानते हैं। ऐसा कहा जाता है, उनमें (लीगवादी और राष्ट्रवादी मुसलमानों में) कुछ भी फर्क नहीं और कांग्रेस के राष्ट्रवादी मुसलमान सांप्रदायिक मुसलमानों के केवल पहरेदार हैं।""

गांधीजी भी इस वास्तविकता से अवगत थे। 29 अप्रैल 1946 को मौ. आजाद को लिखे पत्र मेें उनके द्वारा आजाद को आदेशनुमा यह सूचना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है ः ''1940 से आप (मौ. आजाद) कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। ज्ञात हुआ है कि, आपकी इच्छा है कि आगे भी आप इस पद पर बने रहें। आप कांग्रेस के अध्यक्ष के रुप में नहीं रहना चाहते यह आप कृपया जाहिर करें और इस पद पर पंडित नेहरु का नाम सूचित करें। इस विवक्षित समय पर कांग्रेस का अध्यक्ष मुसलमान ही हो, ऐसा कुछ लोगों को लगता है, परंतु मुझे ऐसा नहीं लगता।"" और गांधीजी ने उन्हें अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर नेहरुजी का नाम जाहिर करने के लिए बाध्य किया था। इसके बावजूद जब मौ. आजाद ने पुनः उम्मीदवारी का निवेदन किया तो गांधीजी ने उन्हें फिर से 31 अगस्त को कठोर भाषा में पत्र लिखकर ताकीद दी थी कि, '' ... मंत्री पद की अपेक्षा कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी बहुत बडी है। (वह आपसे निभेगी नहीं) इसके सिवा अन्य कारण भी हैं। परंतु (फिलहाल) इतना कारण ही पर्याप्त है।""

उस काल में मौ. आजाद को सर्वाधिक दुख इसी बात का हो रहा होगा कि, आजीवन कांग्रेस में और अंतिम सात वर्ष उसके अध्यक्ष रहकर भी और राष्ट्रवादी होने का इतना बडा त्याग करने के बावजूद भी अपन कांग्रेस को अखंड भारत स्वीकारने के लिए बाध्य न कर सके। इसके लिए की हुई सारी पराकाष्ठा को कांग्रेस ने तितर-बितर कर दिया। और इसी दुख को उन्होंने अपने उपर्युक्त भाषण में प्रकट किया होगा।

वैसे सर्वोच्च राष्ट्रवादी मुस्लिम नेता होने के कारण उनके बतलाए मार्ग पर चलने का संकल्प लेने वाले आज भी मौजूद हैं। महाराष्ट्र शासन के 'मौ. आजाद अल्पसंख्यक आर्थिक विकास महामंडल" की ओर से मौलाना के छायाचित्र सहित दिनांक 11-11-2009 को समाचार पत्रों में प्रकाशित विज्ञापन में कहा गया है ः 'भारतीयों के प्रेरणास्त्रोत ..... मौ. आजाद द्वारा दिखलाए हुए मार्ग पर से हमारी सच्ची यात्रा चालू है....."" (महाराष्ट्र टाईम्स, दिनांक 11-11-2009)