Friday, January 31, 2014

""सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखो ।- यजुर्वेद''

हिन्दू धर्म वेद आधारित है। जो यह सीखाता है कि मनुष्य तो मनुष्य, प्राणी मात्र को भी मित्र की दृष्टि से देखो अर्थात प्राणियों के साथ अच्छा प्रेम भरा व्यवहार करो। दूसरी ओर प्रेम, दया और (तथाकथित) सेवा का उद्‌घोष करने वाला ईसाई धर्म है। जिसके धर्मगुरू पोप जॉन पॉल।। का यह वक्तव्य ध्यान देने योग्य है ''My Religion Takes You to Heaven, Yours to Hell (Oraganiser-9-1-2005).  सोचने योग्य बात यह है कि क्या ईश्वर इतना पक्षपाती है ? निश्यच ही नहीं। नैतिकता की दृष्टि से यह कथन असहिष्णु और तिरस्करणीय है जो ईसाइयत के असली दर्शन को दर्शाता है। तो इससे भी बढकर इसी सेमेटीक परंपरा का धर्म "इस्लाम' है जो अपने आपको "दीन-ए-कामिल' (संपूर्ण धर्म) बतलाता है। अर्थात्‌ संसार के अंत तक इसमें किसी भी तरह का बदलाव संभव नहीं। कुरान का अधिकृत भाष्य कहता है कि ""अब इस दीन (धर्म) को इसी रूप में कियामत (प्रलय) तक बाकि रहना है और संपूर्ण जगत की सारी की सारी कौमों के लिए यही हिदायत का स्तंभ है।''(दअ्‌वतुल कुर्आन खंड। पृ. 339) यह इस्लाम तो सीधे-सीधे मनुष्य जगत को ही ईमानवाले (यानी मुसलमान) और काफिर (गैर-मुस्लिम) इन दो भागों में बांटकर रख देता है। कुरान की सूर "मुजादलति' में स्पष्ट रूप से इंसानों को दो समूहों में बांटकर काफिरों को ""शैतानों का लश्कर'' (शैतानों की पार्टी ) (Hisb-Ush-Shaitan) (आयत 19) तो मुसलमानों को ""खुदाई लश्कर (अल्लाह की पार्टी) (Hizbulla)'' (आयत 22) कहा गया है। ईमानवालों (मुसलमानों) को हमेशा के लिए जन्नत (स्वर्ग) का वादा, तो काफिरों को हमेशा के लिए दोजख की आग (नरकाग्नि) में रहने का फरमाना सुनाता है। जिसे कुरान में बारम्बार दोहराया गया है और यह फरमान इसलिए है कि "अल्लाह ने संपूर्ण जगत की सारी कौमों के लिए इस्लाम को हिदायत (शिक्षा, निर्देश) का स्तंभ' कह दिया है फिर भी काफिर इस्लाम कुबूल करने के लिए तैयार नहीं हैं।

कुरान का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि कुरान की कुल 114 सूरहों (अध्यायों) में से 101 सूरहों में जन्नत (स्वर्ग) और दोजख (नर्क) मिलने के संदर्भ का उल्लेख है ।  कुरान की कुल 6239 आयतों में से 1590 आयतों (श्लोकों) में इस प्रकार के वर्णन हैं। विश्वास नहीं होता ना ?  तो देखिए कुर्आन-शरीफ की ये चंद आयतें जिनमें काफिरों को मिलने वाले अजाब (पापों का वह दंड जो यमलोक में मिलता है) का वर्णन है, ""उसके लिए दोजख है और उसको पीप का पानी पिलाया जाएगा। वह उसको घूंट-घूंट पियेगा और उसको गले से उतारना कठिन होगा और मौत उसको हर तरफ से आती हुई दिखाई देगी  और वह मरेगा नहीं (कि चैन पा जाए) और उसके पीछे दुखदाई सजा होगी।''(इब्राहीम 16,17) वह दुखदाई सजा किस प्रकार की होगी उसका वर्णन आगे इस प्रकार से है, ""(ऐ पैगंबर !) मैं उसको जल्दी ही सकर (दोजख की आग) में झोंक दूंगा.. वह न बाकी रखती है न छोड़ती है, शरीर को झुलसाती छायी रहती है ।'' (मुद्‌दस्सरि 26-29) (ये उपर्युक्त आयतें प्रकट रूप से सार्वजनिक स्थानों पर धर्म प्रचार करने के लिए पैगंबर को संदेश देने के लिए जो पहली सूरह अवतरित हुई थी उसमें कही गई थी।) ""जब उनकी खालें जल (कर पक) जावेंगी, हम उनको दूसरी खाल बदल देंगे ताकि (वह बराबर) अजाब का मजा चखते रहें।'' (सूर निसा आयत 56) "" उनके लिए आग (दोजख) का बिछौना होगा और उनके सिरों पर खौलता पानी डाला जाएगा। जिससे जो कुछ उनके पेट में है और (उनकी) खालें गल जाएंगी और उनके (मारने के) लिए लोहे के गुर्ज होंगे। (इस दोजख के दु:ख और) घुटन से जब निकलना चाहेंगे तो उसी में फिर ढकेल दिए जावेंगे। और (कहा जाएगा कि बस हमेशा) जलने की सजा का अजाब चखते रहो।'' (हज्जि19-22) कुरान में कहा गया है काफिरों को खाने के लिए सेहुंड का पेड दिया जाएगा। जो ""दोजख (नरक) की जड में (से) उगता है उसके गाभे जैसे शैतानों के सिर सो (दोजखी) उसी में से खाएंगे और उसी से पेट भरेंगे। फिर उस पर उनका खौलता हुआ पानी दिया जाएगा। फिर इनको (नरक की) तरफ लौटना होगा।'' (सूर तुस्साफ्फाति 62-68 ) इस स्वरूप की आयतों से कुरान भरपूर है।

काफिरों के नरक में जाने का नियम इतना अचूक है कि इसमें से पैगंबर मुहम्मद के पूर्वज, माता-पिता तथा पिता समान चाचा अबू तालिब जिऩ्होंने मुहम्मद साहेब की 40 साल तक साज-सम्हाल की थी भी अपवाद स्वरूप बच नहीं सके। इससे संबधित हदीसेें भी उपलब्ध हैं। और कुरान की सूर तौबा की आयात 113 में स्पष्ट रूप से ही कहा गया है कि: ""पैगंबर के लिए और मुसलमानों के लिए यह जेब (शोभा) नहीं देता कि वे मुशरिकों (मूर्तिपूजक) के लिए माफी चाहें, गो वह रिश्तेदार (संबंधी ही क्यों न) हों, जबकि उन्हें मालूम हो चुका है कि वे मुशरिक (मूर्तिपूजक) दोजख की भड़कती आग वाले हैं।'' कुरान का तो यह भी कहना है कि : ""और उनमें से जो मरे उसकी नमाज (जनाजा) तुम हरगिज न पढ़ना और न कभी उसकी कब्र पर खड़े होना। क्योंकि उन्होंने अल्लाह के साथ कुफ्र किया और इस हाल में मरे कि वे फासिक (अवज्ञाकारी) थे।'' (सूर तौबा आयत 84) इस आयात पर दअवतुल कुर्आन खंड 1 के अधिकृत भाष्य मेें कहा गया है : ''कब्र पर खड़े होने का मतलब कब्र पर जाकर क्षमा की प्रार्थना करना और दया की भावना को प्रकट करना है। यह मनाही जिस प्रकार मुनाफिकों (दांभिक मुसलमान) के लिए है उसी प्रकार काफिरों (गैर-मुस्लिम), मुश्रिकों (मूर्तिपूजक, अनेकेश्वरवादी), मुहफिदों (नास्तिकों) के लिए भी है क्योंकि जो लोग मरते दम तक काफिर रहे वे अल्लाह के दुश्मन हैं और अल्लाह के दुश्मनों के लिए एक मोमिन के दिल में दया भाव नहीं हो सकता।'' (पृ.657) और हो भी क्यों जब कुरान ही सीखाती है कि काफिर अल्लाह की नजर में ''जियादती करने वाले'' (बकर 190) ""फसादी'' (बकर 205) ''कृतघ्नी (नाशुके)'' (हाज्जि38) ""दगाबाज'' (अंफालि 58) ""कसूरवार'' (निसा 107) ""जालिम (अन्यायी)'' (इमरान 57) ""इतराने वालेे'' (निसा 36) ""गुनहगार'' (बकर 276) ''नापाक (गंदे) ""(तौबा 28)'' अल्लाह का हुक्म न मानने वाले (अवज्ञाकारी) है ""(इमरान 32) अर्थात इस्लाम न कुबूल करने वाले है, इसलिए पसंद नहीं करता।

यही अल्लाह उसके दीन-इस्लाम को मानने वाले उसके बंदो यानी मुसलमानों पर अपने सद्‌गुणों रहमान और रहीम के कारण इतना मेहरबान है कि बेझिझक, बिना किसी विशेष रोक टोक के उन्हें सीधे जन्नत की नेमतें प्रदान करता है। ये नेमतें कौन सी हैं यह जानना भी बड़ा दिलचस्प होगा जिनका वर्णन कुरान में बहुतायात से मौजूद है। जन्नत की खुशखबरी सुनानेवाली कुछ आयतें अवलोकनार्थ प्रस्तुत है: ""उसको (ईमानवाले को) (बिहिश्त के) दो बाग मिलेंगे ......जिसमें बहुत सी टहनिया हैं इनमें दो चश्में बहते होंगे....उनमें हर मेवे की दो किस्में होंगी ......यह (जन्नत वाले) बिछौनों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे जिनके अस्तर ताफते के होंगे और दोनों बागों के मेवे (बहुतायत से) झुक  रहे होंगे..... उनमें (लजाती) नीचे निगाहवाली (पाक हूरें) होंगी, उनसे और पहले न तो किसी मनुष्य ने उन पर हाथ डाला होगा और न किसी जिन्न ने ।'' (तुर्रहमानि 46 से 56) आगे और वर्णन सुनिए: ""निअमतों के बागों में जडाऊ तख्तों के ऊपर आमने-सामने तकिए लगाए (बैठे होंगे) उनके पास लड़के जो हमेशा नौजवान बनें रहेंगे। उनके पास आबखोंरें गडुए और साफ शराब से भरे प्याले लाते और ले जाते होंगे। (वह शराब) जिससे न तो उनके सिर दुखेंगे और न बकवाद लगेगी और जिस किस्म के पक्षी का मांस उनकी इच्छा हो और हूरें बड़ी-बड़ी आँखो वाली जैसे जतन से सजाए आबदार मोती........ हमने हूरों की एक खास सृष्टि बनाई है फिर इनको कंवारी बनाया है (कि किसी जिन्न या इन्सान नें उन्हें हाथ नहीं लगाया) प्यारी और समान अवस्था वाली।'' (वाकिअति 12 से 36)  ""बड़ी-बड़ी आँखों वाली (गोरी) हूरों से हम उनका ब्याह कर देंगे।'' (सूरतुद्‌दुखानि 54) सूर बकर की आयात 25 में कहा  गया है "" वे जन्नत में अपनी पाक साफ बीवियों के साथ सदैव रहेंगे।'' 

संक्षेप में इस्लाम की संकल्पना मानव जगत को दो भागोंं ""काफिर और ईमानवाले'' (गैर मुस्लिमों और मुस्लिमों) में बांटकर हमेशा के लिए प्रदान किए जाने वाले नरक तथा स्वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। जिसमें काफिर की भूमिका संसार के निकृष्टतम प्राणी की है जैसा कि कुरान की सूर अंफालि की आयत 55 में कहा है ''निश्चय ही अल्लाह के निकट बदतरीन जानवर वे लोग हैं जिन्होंने कुफ्र  (इस्लाम से इंकार) किया और वे ईमान (श्रद्धा) नहीं लाते।'' द.कु.खंड। के अधिकृत भाष्य में पृ.595 पर ऐसे काफिरों को ""बहरा, गूंगा और अंधा तथा बेसमझ'' (बकर 171) ""अज्ञानी, हृदय हीन (बिना सिंग-पूछ के) पशुओं की तरह है बल्कि उनसे भी जियाद: भटका हुआ'' (अरफि 179) कहा गया है। कुर्आन इतने पर ही बस नहीं करते हुए काफिरों को चेतावनी देती है'' जो शख्स अल्लाह के दीन (इस्लाम) के सिवा किसी ओर दीन (धर्म) को तलाश करेगा तो (अल्लाह के यहां) उसका वह दीन हरगिज कबूल नहीं और वह आखिरत (अंतिम निर्णय दिन) में नुकसान उठाने वालों में से होगा।'' (इमरान 85) कुरान कियामत का वर्णन करते हुए आगे कहती है: ''यह बदले का दिन है यह वही फैसले का दिन है जिसे तुम झूठलाते थे जमा करो जालिमों (काफिरों) को और उनके साथियों को और उनको साथियोंें को और उनको भी जिनकी ये पूजा करते थे। अल्लाह को छोड़कर (जिनकी ये पूजा किया करते थे) फिर इन सबको जहन्नम (नर्क) का रास्ता दिखाओं।'' (तुस्साफ्फति 19-23)

धर्म तो सभी के लिए यानी विश्व के परमार्थ के लिए, विश्व कल्याण के लिए होता है लेकिन यह दीन-ए-इस्लाम तो ऐसा निराला धर्म है कि जो कहने को तो अपने आपको "भाईचारे' का धर्म बतलाता है लेकिन उसका भाईचारा केवल इस्लाम के अनुयायियों तक ही सीमित है। क्योंकि वह केवल अपने ही अनुयायियों को ""खैर-उम्मत'' (बेहतरीन गिरोह) ""(इमरान 110)'' उम्मते वसत (उत्तर समुदाय) बकर 143) इस आधार पर कहता है कि ""यही उम्मत (समाज) सत्यधर्म (इस्लाम) पर चल रही है।'' (द.कु.खंड1पृ.211पर का भाष्य) खुद को दीन-ए-अकिब यानी अंतिम सत्यधर्म और अपने पैगंबर को अकिब यानी आखरी पैगंबर मानता है। जिसके बाद अब न तो कोई नया धर्म आने वाला है न ही कोई पैगंबर जैसा कि कुरान की सूर अल-अहजाब की आयत 40 में कहा गया है ""मुहम्मद अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक है।'' अर्थात दीन अब पूर्णत्व को पहुंच चुका है, और अब किसी भी तरह के सुधार या बदलाव की गुंजाईश ही नहीं है। इसीलिए कुर्आन भाष्य में कहा गया है ""इस्लाम के सिवा जो शुद्ध रूप से एकेश्वरवादी जीवन प्रणाली है किसी भी धर्म की ओर मामूली सा झुकाव भी ईमान को प्रभावित कर देता है और सभी धर्मो के सही होने की बात तो सरासर गुमराही की बात है। '' (द.कु.खंड 3 पृ. 1413) या जो यह कहता है कि ""समस्त धर्म उसके (यानी अल्लाह के) नजदीक पंसदीदा हैं बड़े ही दुस्साहस की बात है और ऐसा व्यक्ति बड़ा ही गलतकार, दुष्कर्मी और सबसे बड़ा जालिम है।'' (पृ.1647) ""अत: जीवन को धर्म और संसार के खानों में विभक्त कर अल्लाह और उसके रसूल के कितने ही फैसलों को जो पारिवारीक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन से संबंधित हैं रद्द कर देना और  तथाकथित धर्म निरपेक्ष जीवन पद्धति को अपनाना इस्लाम से खुली विमुखता है।'' (पृ.1457) अंत में भाष्य चेतावनी देता है कि ""सारे धर्म समान है उनमें सत्य और असत्य का कोई फर्क नहीं'' के सिद्धांत को जो लोग तैयार करना चाहते है वह हरगिज यह आशा न रखें कि उन्हें कुर्आन का समर्थन प्राप्त हो सकेगा।'' (पृ.2368) अब पाठक स्वयं ही सोचें कि "सब धर्म समान' का कथन कितना थोथा और हास्यास्पद है।

Thursday, January 30, 2014

तनाव


आज की इस भागभागभरी जिदंगी में तनाव यानी टेंशन ने सर्वत्र एक बडी गंभीर समस्या का रुप धारण कर लिया है। जिससे सभी को दो - चार होना पड रहा है। यह शब्द इतना अधिक सामान्य हो गया है कि साधारण से लेकर असाधारण, साक्षर-उच्चशिक्षित से लेकर निरक्षर-अशिक्षित तक सभी इस शब्द को एक जुमले के रुप में उपयोग में लाने लगे हैं। छोटे से लेकर बडे तक शालेय विद्यार्थी से लेकर वृद्धजनों तक सभी इस तनाव की समस्या से पीडित हैं। हर कोई अपनी - अपनी समस्याओं के कारण तनावग्रस्त है जैसेकि किसीको अत्याधिक काम का तनाव है, तो किसी को पढ़ाई का, किसीको बच्चों का, किसीको बीमारी का आदि। तनाव की समस्या के कारण कई लोग अवसाद के शिकार होकर रोगी हो रहे हैं तो, कुछ लोग आत्महत्या तक के प्रयास कर लेते हैं। कभी कुछ इसमें सफल भी हो जाते हैं।



तनाव कई समस्याओं एवं रोगों उदा. मधुमेह, रक्तदाब आदि की जड है। तनाव का एक सबसे बडा कारण तेज रफ्तार जिंदगी है। इसके अलावा आर्थिक व सामाजिक कारक भी बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। बढ़ती कीमतें घटती सीमित आय। आम तकलीफों के रुप में वायु एवं ध्वनि प्रदूषण, विकराल रुप धारण करता यातायात और यातायात नियमों का उल्लंघन भी तथा समय - समय पर जगह - जगह पर होनेवाली चक्काजाम की स्थितियां भी जो व्यक्ति पर पडनेवाले विपरीत प्रभावों के कारण तनाव में बढ़ौत्री करती हैं। ऐसे इस घातक प्रभावों वाले तनाव से मुक्त होने या कुछ हद तक उसे नियंत्रण में लाने के लिए निम्न कुछ उपायों को कुछ हद तक सिद्धांतों के रुप में आजमाकर जीवन का अंग बनाकर इस कठीन समस्या का निदान कुछ सीमा तक तो निश्चय ही किया जा सकता है।


1). जीवन में घटित होनेवाली प्रत्येक घटना हमारे लाभ के लिए ही घटित हो रही है यह मानकर हर घटना को निरपेक्ष भाव से लें।


2). अपने जीवन की तुलना दूसरे के साथ करके चिंता में न पडें। क्योंकि, संसार एक रंगमंच है और हम एक पात्र मात्र हैं। हमारे हिस्से में आए हुए पात्र का हमें अभिनय करना है। यह न भूलें कि हर व्यक्ति की एक विशिष्टता होती है। हर व्यक्ति हर काम में तज्ञ नहीं हो सकता। हर काम हर कोई कर भी नहीं सकता। इसलिए हर किसी मामले में दूसरे की बराबरी करना और तनावग्रस्त होना व्यर्थ है।


3). तनाव मुक्त होने का अर्थ जिम्मेदारी से मुंह मोडना या कर्तव्य विमुख होना नहीं अपितु सामान्य रहकर आत्मविश्वासपूर्वक मुकाबला करना होता है।


4). व्यवहारिकता के धरातल पर जीएं, इसके लिए ध्यान में रखें कि निंदा करनेवाला मित्र ही सच्चा हितेषी है। जो आपको वास्तविकता का भान करता रहता है जैसाकि रहीम ने कहा है 'निंदक नियरे राखिए"।


5). यदि कभी एक साथ कई समस्याओं का सामना करना पडे तो बारी - बारी शांति से स्वयं पर नियंत्रण रखकर एक - एक समस्या को हल करने की कोशिश करें। विश्वास रखें समस्याएं जरुर हल होंगी।


6). दूसरों के साथ सहयोग की भावना रखें स्वयं की समस्याओं को भूलने में व हल करने में सहायता मिलेगी, सामाजिक बनें।


7). जीवन की समस्याओं की ओर सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें मनःस्थिति बदलने में आसानी होगी। जिन परिस्थितियों को हम बदल नहीं सकते उन पर विचार करके दुःखी होना व्यर्थ है। ध्यान में रखें समय सबसे अच्छा मरहम है, अच्छे समय की प्रतीक्षा करें।


8). बदले की भावना से काम न लें, स्वयं को ही बदलने की कोशिश करें, जीवन में प्रगति होगी।


9). ईर्ष्या न करेें, ईश चिंतन करें। ईर्ष्या से मन जलता है (स्वास्थ्य की हानि होती है), ईश चिंतन से शांति मिलती है (मनोबल बढ़ता है), ईर्ष्या से दुःख उत्पन्न होता है, ईश चिंतन से प्रसन्नता मिलती है। हमेशा याद रखें दुःख का कारण यह है कि 'हम अपने दुःखों से इतना दुःखी नहीं हैं जितना कि दूसरों के सुखों से"। हमेशा प्रसन्न रहने का और स्वयं को व्यस्त रखने का प्रयत्न करें।


10). जब भी समस्याग्रस्त हों तो ऐसा विचार करें कि भूतकाल की गलतियों का हिसाब चुकता हो रहा है।


11). अहंकार का त्याग करें। अहंकार से मानसिक संतुलन बिगडता है।


12). भगवान की कृपा में विश्वास रखें निश्चय ही तनाव की समस्या से निजात पाएंगे।


13). किसी बात या घटना पर अधिक विचार न करें। अधिक विचार चिंता का जनक है। चिंता तनाव का सबसे बडा कारण है। चिंता से बचें, चिंता को दूर रखें। चिंता शरीर को खोखला करती है।


14). प्रतिदिन थोडा सा तो भी समय ईश्वर की आराधना में बिताएं व योगासन करें । इस कारण शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होकर तनाव दूर होगा व स्वास्थ्य लाभ होगा।


15). सात्विक जीवन बिताएं, सादा, कम एवं सात्विक आहार लें। आवश्यकताएं सीमित रखें, फिजूलखर्ची से बचें। समय का सदुपयोग करें। व्यसन से बचें। अच्छी रुची विकसित करें जैसेकि पुस्तकें पढ़ना।

Friday, January 24, 2014

तिरंगे ध्वज के तीन रंग

तिरंगा ध्वज के तीन रंगों का अर्थ सांकेतिक है। वे योग्य हैं। धार्मिक दृष्टि से हरा रंग मुसलमानों को अपना लगनेवाला है। तो, हिंदुओं के हाथ की फूलों की डलिया - लाल सुर्ख पुष्प, हरी दूब या दूर्वा, तुलसी, बेल और शुभ्र जूही के फूलों से भरी हुई होती है। अतः उसे कोईसा भी रंग पराया नहीं लगता. शुभ्र रंग तो समता का द्योतक है। अतः रंग के विषय में मतभेद नहीं। 
- (1928 हिंदूसमाज संरक्षक स्वातंत्र्यवीर सावरकर) (रत्नागिरी पर्व) - सावरकर बालाराव 

वर्तमान में अनायास जो राष्ट्रीय ध्वज बनने जा रहा है, उसमें व्यत्यय ना लाएं इस बुद्धि से और वर्तमान के रंगों का समुच्चय यह राष्ट्रीय ध्येय उत्तम प्रकार से व्यक्त करने में समर्थ होने के कारण हम इन रंगों को सहमति दे रहे हैं। अंत में यह भी ध्यान में रखना चाहिए कोई से भी रंग लिए तो भी उसमें इस तिंरगे के समान यह नहीं तो वह ऐसी कुछ न्यूनता रहेगी ही. वह न्यूनता इस तिरंगे में कुलमिलाकर बहुत ही अल्प है। यही उसका विशिष्ट समर्थ है। - (1928 श्रद्धानंद 2 अगस्त)
तिरंगी ध्वजातील तीन रंग

तिरंगी ध्वजातील तीन रंगांचे अर्थ हे सांकेतिक आहेत. ते योग्य आहेत. धार्मिक दृष्टीने हिरवा मुसलमानांना आपला वाटणारा आहे. तर हिंदुंच्या हातातील फुलांची परडी - तांबडी लाल पुष्पे, हिरव्यागार दुर्वा, तुळशी, बेळ आणि पांढ़ऱ्या जाई जुई यांनी भरलेली असते. तेव्हा त्याला कोणताच रंग परका वाटत नाही. पांढ़रा रंग हा समतेचा द्योतक आहे. तेव्हा रंगा विषयी मतभेद नाही. 
- (1928 हिंदूसमाज संरक्षक स्वातंत्र्यवीर सावरकर) (रत्नागिरी पर्व) - सावरकर बाळाराव 

सध्या अनायासे जो राष्ट्रीय ध्वज होऊ पाहत आहे, त्यात शक्यतो व्यत्यय आणू नये या बुद्धीने आणि, सध्याच्या रंगाचा समुच्चय हे राष्ट्रीय ध्येय उत्तम प्रकारे व्यक्त करण्यास समर्थ असल्याने आम्हीं या रंगास संमती देत आहोत. शेवटी हे ही ध्यानात ठेविले पाहिजे की कोणते ही रंग घेतले तरी त्यात या तिरंगाप्रमाणे ही नाही ती अशी काही न्यूनता ही राहणारच. ती न्यूनता या तिरंगात एकंदरीने फारच अल्प आहे. हेच त्याचे विशिष्ट समर्थन होय. - (1928 श्रद्धानंद 2 ऑगस्ट)

गुलामी की जड में हम हैं - महात्मा गांधी

करोडों लोगों को अंगरेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी। उसने इसी इरादे से अपनी योजना बनाई थी, ऐसा मैं नहीं सुझाना चाहता, लेकिन उसके काम का नतीजा यही निकला है। कितने दुख की बात है कि हम स्वराज्य की बात परायी भाषा में करते हैं।


और हमारी दशा कैसी है? हम एक दूसरे को पत्र लिखते हैं, तब गलत अंगरेजी में लिखते हैं। एक एम. ए. पास आदमी भी ऐसी गलत अंगरेजी से बचा नहीं होता। हमारे अच्छे से अच्छे विचार प्रकट करने का जरिया है अंगरेजी। हमारी कांगे्रस का कारोबार भी अंगरेजी में चलता है। अगर ऐसा लंबे अरसे तक चला तो मेरा मानना है कि आनेवाली पीढ़ी हमारा तिरस्कार करेगी और उसका शाप हमारी आत्मा को लगेगा।


आपको समझना चाहिए कि अंगरेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है। अंगरेजी शिक्षा से दंभ, राग, जुल्म वगैरह बढ़े हैं। अंगरेजी शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी उठा नहीं रखा है। अब अगर हम अंगरेजी शिक्षा पाए हुए लोग उसके लिए कुछ करते हैं तो उसका हम पर जो कर्ज चढ़ा हुआ है, उसका कुछ हिस्सा ही हम अदा करते हैं।


यह क्या कुछ कम जुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इंसाफ पाना हो तो मुझे अंगरेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए। बैरिस्टर होने पर मैं स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता। दूसरे आदमी को मेरे लिए तरजुमा कर देना चाहिए, यह कुछ कम दंभ है? यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है? इसमें अंगरेजों का दोष निकालूं या अपना? हिंदुस्तान को गुलाम बनानेवाले तो हम अंगरेजी जाननेवाले लोग ही हैं। राष्ट्र की हाय अंगरेजों पर नहीं पडेगी, बल्कि हम पर पडेगी।


मुझे तो लगता है कि हमें अपनी सभी भाषाओं को उज्जवल, शानदार बनाना चाहिए। हमें अपनी भाषा में ही शिक्षा लेनी चाहिए। इसके क्या माने हैं, इसे ज्यादा समझाने का यह स्थान नहीं है। जो अंगरेजी पुस्तकें काम की हैं, उनका हमें अपनी भाषा में अनुवाद करना होगा। बहुत से शास्त्र सीखने का दंभ और वहम छोडना होगा। सबसे पहले तो धर्म की शिक्षा या नीति की शिक्षा दी जाना चाहिए। हर एक पढ़े लिखे हिंदुस्तानी को अपनी भाषा का, हिंदू को संस्कृत का, मुसलमानों को अरबी का, पारसी को फारसी का और सबको हिंदी का ज्ञान होना चाहिए। कुछ हिंदुओं को अरबी और कुछ मुसलमानों और पारसियों को संस्कृत सीखनी चाहिए। उत्तर और पश्चिमी हिंदुस्तान के लोगों को तमिल सीखनी चाहिए। सारे हिंदुस्तान के लिए जो भाषा चाहिए वह तो हिंदी ही होनी चाहिए .... और यह सब किसके लिए जरुरी है? हम जो गुलाम बन गए हैं उनके लिए। हमारी गुलामी की वजह से देश की प्रजा गुलाम बनी ैहै। अगर हम गुलामी से छूट जाएं तो प्रजा तो छूट ही जाएगी। ('हिंद स्वराज्य" से साभार)

Thursday, January 23, 2014

कथा हैदराबादच्या निजामाची 

आजकाल भाजप-कांग्रेस मध्यें चाललेल्या पटेल-नेहरु विवादामुळे हैदराबाद व त्याचा निजाम चर्चेत आहेत. देशाला स्वतंत्र होऊन 66 वर्षे व निजामाला मरुन कित्येक वर्षे झाली आहेत. परंतु आज देखील निजामासंबंधी आकर्षण कमी झालेले नाही. कोणत्या ना कोणत्या कारणांवरुन निजाम चर्चेत येतच राहतो. काही वर्षांपूर्वी लंडनच्या वेस्टमिनिस्टर बॅंके मध्यें गोठवलेल्या कित्येक लक्ष रुपयांची संपत्ती व त्यावर दावा करणाऱ्या चारशे पेक्षा जास्त वारसदारांमुळे हा निजाम चर्चेत आला होता. त्यापूर्वी 2002 मध्यें हैदराबादेत रत्नालंकारांच्या प्रदर्शनामुळे तो मीडियात चर्चित झाला होता.

ज्या निजाम मीर उस्मानअली खानवरुन चर्चा चालली आहे तो निजाम असफजाही खानदानाचा असून त्याच्या खानदानाने दख्खनवर सव्वादोनशे वर्षे राज्य केले आहे. शेवटचा निजाम उस्मानअली जे सोडून गेला आहे त्यात अफाट धन-संपत्ती, भव्य महाल, संग्रहणीय रत्नालंकार व बहुमूल्य पैंटिंग्स तर आहेतच त्याशिवाय 2700 पेक्षा जास्त औरस-अनौरस वारसदार देखील आहेत जे या स्थावर मत्तेच्या वाटणी साठी न्यायालयाची दारे ठोठाऊन राहिले आहेत. आणि या सगळ्याला कंटाळून अधिकृत वारस नातू प्रिंस मुकर्रमजाह तुर्कीत दोन रुमच्या फ्लॅट मध्ये राहत आहे. जेव्हां हैदराबाद संस्थान खालसा केले गेले तेव्हां सरकारने निजामाला सन्मानाची वागणूक देत करमुक्त सालाना 50लाख रुपयांचा तनखा मंजूर केला होता. त्या बरोबरच 25लाख जहागिरीच्या उत्पन्नाच्या बदल्यात व 25लाख राजप्रासादाच्या देखरेखीसाठी व 25लाख दोन राजपुत्रांकरिता अशाप्रकारे कुल 75लाख त्यांना मिळते ते वेगळे. 1950-56 ते राजप्रमुख होते.

पण आता निजामाचे 150पेक्षा जास्त नातवंड जे कधी रुबाबात राहत असत आज हैदराबादच्या विभिन्न भागातून विखुरलेले असून गरीबीत निर्वाह करित आहेत. त्यांची आर्थिक परिस्थिती इतकी लाजिरवाणी आहे की त्यांना स्वतःस निजामाचे वंशज म्हणविण्याची देखील लाज वाटते. तुटक्या-फुटक्या घरांमधून राहत असलेल्या या निजामांच्या वंशजांपैकी कांही सायकली दुरुस्त करुन तर काही फळ विकून पोट भरित आहेत.

या उध्वस्त झालेल्या निजामाच्या वंशजांचे पूर्वज जे एकेकाळी आपल्या संपन्नतेकरिता ओळखले जात असत तसेच ते आपल्या कद्रूपणाकरिता पण प्रसिद्ध होते. शेवटचा निजाम उस्मानअली 185 कॅरेटचा जेकब डायमंड पेपरवेट सारखा उपयोगात आणित असे.  उत्तम मोटारींचा ताफा बाळगूनही तो स्वतः मात्र एक खटारा गाडीतून फिरे. चिक्कू तर इतका होता की 'किंग कोठी" पॅलेस मध्यें फाटके व फडतूस कपडे घालून स्वस्त चारमीनार सिगारेटी ओढ़त वावरत असे. आपल्या शेवटच्या काळात स्वतः जवळच्या सोन्याच्या प्रचंड साठ्याला विशेष पेट्यांमध्यें लादून हैदराबादहून मुंबईस नेऊन 150 रुपये तोळ्याला विकले होते व त्यावेळेस निर्देश केला होता की रिकाम्या पेट्या व त्यांचे कुलुप परत आणले जावे.
सन्‌ 2002 मध्यें हैदराबादेत जेव्हां त्याच्या रत्नालंकारेचे प्रदर्शन भरविले गेले होते तेव्हां त्याच्या अफाट दौलतीचे व कंजूषीचे कैक कहाण्या-किस्से यांची रसभरीत वर्णनं वृत्तपत्रातून झळकली की जणू 54 (आजपासून 65) वर्षांपूर्वी मुस्लिम राज्याची दिवास्वप्ने पाहणारा निजाम ही कोणी दुसरीच आसामी होती की काय असा भास व्हावा! ज्यांने पंडित नेहरु व सरदार पटेलांसारख्या श्रेष्ठ राजकीयां वाटाघाटीच्या गुऱ्हाळात वर्षभर गुंगवत ठेवले होते. ज्या लोकांना ऐतिहासिक घटनांच फारस भान नसेल त्यांना तर आश्चर्यच वाटेल की हा निजाम संपूर्ण इस्लामी जगताचा खलिफा होण्यास उत्सुक होता. त्याचा जगभरच्या मुसलमान जनतेवर चांगला प्रभाव होता. ब्रिटिशांनी आपल्याला खलिफा म्हणून मान्यता द्यावी असा त्याचा प्रयत्न होता. ब्रिटिशांनी यास मान्यता दिली नाही. शेवटी भारतीय मुस्लिम नेत्यांनी निजामला भारताचे 'शेख उल इस्लाम" हे पद धारण करण्याची विनंती केली. ब्रिटिशांच्या विरोधामुळे निजामाने हे पद स्वीकारण्यास नाकारले. पण 1933 मध्यें निजामाने आपल्या एका मुलाचे लग्न पदच्युत खलिफाच्या मुलीशी, तर दुसऱ्या मुलाचा विवाह खलिफाच्या नातीशी घडवून आणला.

निजामनी खलिफा पद स्वीकारावेचे प्रयत्न तेव्हां केले गेले होते जेव्हां कमाल अतातुर्कने 1924त खिलाफतच नष्ट करुन टाकली. तत्पश्चात भारतीय मुस्लिम नेते आगाखान, अमीरअली हे कमालपाशांना भेटले व अब्दुल मझिदची खिलाफत कायम ठेवावीची विनंती केली. 
कमालपाशानी ही विनंती फेटाळून लावल्यावर त्यांनी विनंती केली की त्यांनी स्वतः खलिफा व्हावे. कमालपाशानी त्यांना विचारले, 'तुम्ही ब्रिटिशांचे गुलाम नागरिक आहात. मी जगाचा खलिफा झाल्यावर तुम्ही माझ्या आज्ञा पाळणार आहात काय?  जर पाळणार नसाल तर मग मी खलिफा बनून काय अर्थ आहे?" आता इस्लाम व भारतीय मुसलमानांचे काय होईल या चिंतेेने व भीतीने ते बैचेन झाले व लगेच जगात नवी खिलाफत स्थापन करण्याच्या प्रयत्नास भारतीय मुस्लिम नेते लागले. अब्दुल मझिदने नकार दिल्यावर ते इराणच्या शाह रझापहलेवी यांच्याकडे गेले व त्यांनाही हीच विनंती केली. पण शाह यांनी खलिफा होण्यास नकार दिला. तेव्हां भारतातच खिलाफत स्थापन करण्याच्या दृष्टीने ते निजामास भेटले होते.

हा निजाम इतका धूर्त होता की 1947-48 हैदराबादला मुस्लिम संघराज्य बनविण्याकरिता त्याने जे कट केले होते ते उघडकीस आल्यावर सगळ खापर रझाकारांवर फोडून स्वतः मोकळा झाला होता. 26 मार्च 1948त निजामाच्या पंतप्रधानाने जाहिर केले होते की, 'निजाम हे हुतात्मा होण्यास तयार आहेत. निजाम व लक्षावधि मुसलमान हे मरण्यास सिद्ध झाले आहेत." परंतु भारताचे सैन्य 13 सप्टेंबर 48ला हैदराबादला गेले व निजामाच्या जुल्मी शासनाचा अंत झाला.

Thursday, January 16, 2014

बीट - चुकंदर - वानस्पतिक नाम बीटा वल्गेरिस


प्राचीन रोमन और ग्रीक इसका प्रचुर मात्रा में प्रयोग करते थे। यह एक रसीली कंदमूल वनस्पति है। भारत में इसकी दो प्रजातियां पाई जाती हैं,लाल जामुनी और सफेद। इसका आहार में उपयोग पिछले 2000 सालों से हो रहा है। यह मध्य यूरोप और पश्चिमी एशिया मूल की वनस्पति है। भारत में इसकी खेती पौष्टिक खाद्य पदार्थ के रुप में की जाती है। इसमें शकर के रुप में कार्बोहायड्रेट्‌स (कार्बोदक), अल्प मात्रा में प्रोटीन (प्रथिन) और फेट्‌स (चिकनाई) रहते हैं। इसका उपयोग ज्यादतर सलाद, अचार और चटनी के रुप में किया जाता है। इसकी पत्तियों की सब्जी भी बनती है। यह प्राकृतिक शकर का अच्छा स्त्रोत है। इसमें सोडियम, पोटेशियम, फास्फोरस, केल्शियम, सल्फर, क्लोरिन, आयोडिन, आयरन, कॉपर, विटामिन बी1, बी2, नायसिन, बी6, सी और पी। इसका रस पाचक कार्बोहायड्रेट्‌स से युक्त परंतु, कम केलोरी वाला होता है। इसमें अच्छी गुणवत्ता और मात्रा में अमीनो एसिड होता है। विदेशों में इसके रस का व्यापक उपयोग होता है। यह रक्त को शीतलता प्रदान करता है।


तत्त्वों का पृथक्करण


खाद्य मूल्य खनिज और विटामिन
पानी 87.7% केल्शियम 18 मि. ग्रा.
प्रोटिन 1.7% फास्फेट 55 मि. ग्रा.
चिकनाई 0.1% आयरन 1 मि. ग्रा.
खनिज 0.8% विटामिन सी 10 मि. ग्रा. अच्छी मात्रा में विटामिन ए, बी और अल्प मात्रा में बी कॉम्पलेक्स और ऊर्जा मूल्य 43
रेशा 0.9%
कार्बोहायड्रेट्‌स 8.8%


प्राकृतिक लाभ और औषधीय गुणधर्म


चुकुंदर गुरु, स्निग्ध, शीतल, पौष्टिक, पित्तनाशक, रक्तवर्धक शरीर को लाली प्रदान करनेवाला और शक्तिप्रद है। चुकंदर में बेटिन नामका एक तत्त्व है जो किडनी, गाल ब्लेडर, जठर और आंतों को स्वच्छ रखने में सहायता करता है।


1). रक्ताल्पता - इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में रहता है जिसके कारण लाल रक्त कणों की वृद्धि होती है। बच्चों की रक्ताल्पता और जहां अन्य उपाय काम न आए हों वहां बीट का रस शरीर की मजबूती एवं रक्ताल्पता को दूर करता है।


2). पाचन के विकार - बीट का रस पीलिया - जॉंडिस, जी मिचलाना, उल्टी - दस्त आदि में लाभदायक रहता है। बीट के रस में एक चम्मच नींबू का रस मिलाने से इसके औषधी गुणों में वृद्धि होती है। सुबह नाश्ते के पूर्व बीट रस के साथ शहद का उपयोग गैस्ट्रीक अल्सर में फायदा पहुंचाता है। 'बीट का रस दिन में केवल एक बार लेना चाहिए।"


3). कब्ज और बवासीर - पुराने कब्ज और बवासीर में यह बहुमूल्य लाभ पहुंचाता है। इसका रेशा कब्ज दूर कर शौच के मार्ग को आसान बनाकर बवासीर में लाभदायक रहता है।


4). रक्त संचार प्रणाली के दोष - बीट का ज्यूस अकार्बनिक केल्शियम जमाव को रोकने के लिए एक अच्छे घोल का कार्य करता है। यह हायपर टेंशन, धमनियों के कडा होने, ह्रदय रोग आंतों के फूलने के रोगों के लिए एक महत्वपूर्ण उपचार है।


5). किडनी और पित्ताशय के विकार - ककडी, बीट और गाजर के रस का मिश्रण किडनी और पित्ताशय की सफाई के काम आता है। यह इन दोनो ही अंगों के विकारों के लिए बहुउपयोगी है।


6). चर्मरोग - बीट का कंद पत्तियों का उबला हुआ जल चर्मरोगों - फोडों - फुंसियों और मुंहासों पर लगाने से लाभ होता है।


7). फरास - जुंएं - बीट के पत्तों को पानी में उबालकर सिर धोने से फरास दूर होती है और जुंएं मर जाती हैं।


8). बालों का गिरना - चुकंदर के पत्तों को मेहंदी के पत्तों के साथ पीसकर सिर पर लेप करने से बाल गिरना बंद होकर और तेजी से बढ़ते हैं।


9). जोडों का दर्द - इसके खाने से जोडों के दर्द में लाभ होता है।


10). ट्यूमर - बीट और गाजर का रस लाभदायी है।


11). मासिकधर्म, श्वेत प्रदर आदि स्त्री रोग - गाजर और बीट का रस लाभकारी।


12). केंसर - बीट के रस में केंसर निवारक गुण हैं।


बीट का रस निर्दोष और गुणकारी है, पौष्टिक होने के साथ ही यह रक्तशोधन करके शरीर को लाल सुर्ख बनाने में सहायता करता है। बीट रस के रोग निवारक गुणों के लाभ के लिए किसी रस चिकित्सा तज्ञ से सलाह और मार्गदर्शन से अधिक लाभ होगा।