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Saturday, June 20, 2015

योगशास्त्र पर सावरकरजी के विचार

सावरकरजी की योगशास्त्र में रुचि युवावस्था में ही हो गई थी। उनके काव्य 'सप्तर्षि" और 'माझी जन्मठेप" (मेरा आजन्म कारावास) में योगशास्त्र का उल्लेख मिलता है। स्वामी विवेकानंद का राजयोग उनका प्रिय ग्रंथ था। स्नान के बाद ध्यानधारणा करना उनका नित्यक्रम था। उन्होंने अखिल हिंदू ध्वज पर कृपाण के साथ कुंडलिनी को स्थान दिया था।

योगशास्त्र - मानव को एक वरदान

योगशास्त्र का वर्णन मानवी जीवन को एक श्रेष्ठ वरदान के रुप में किया जा सकता है। इस प्रयोगाधारित शास्त्र को हिंदुओं ने पूर्णत्व तक पहुंचाया है।
योगशास्त्र मनुष्य की आंतरिक शक्तियों के संपूर्ण विकास का एक सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है।

व्यक्तिगत अनुभवों का शास्त्र

योगशास्त्र व्यक्तिगत अनुभवों का शास्त्र है इसलिए उसमें मतभेद को स्थान नहीं।

गुप्त नहीं शास्त्र है
योग गोपनीय न होकर एक शास्त्र है।

मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ ध्येय

योग को आचरण में लानेवाले मनुष्य में आश्चर्यकारी, इंद्रियातीत और उत्कंट प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस अवस्था के बारे में योगी कैवल्यानंद कहते हैं - वज्रायनी महासुख। अद्वैती ब्रह्मानंद और भक्त प्रेमानंद कहते हैं - यह सर्वश्रेष्ठ आनंद प्राप्त कर लेना मनुष्य का फिर वह हिंदू या अहिंदू, आस्तिक हो या नास्तिक, नागरिक हो या वनवासी हो, सर्वश्रेष्ठ ध्येय है। (वि. दा. सावरकर)

Wednesday, May 28, 2014

28 मई वीर सावरकर जयंती

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यात्रा वृतांत - आधुनिक तीर्थक्षेत्र ः 'अंदमान की सेल्यूलर जेल"


'वनवास" शब्द का उच्चारण करते ही जिस प्रकार से हर हिंदू के मानस में भगवान श्रीरामचंद्रजी का स्मरण हो आता है, ठीक उसी प्रकार से 'अंदमान" शब्द सुनते ही स्वातंत्र्यवीर सावरकरजी का स्मरण हो आता है। ऐसे इस अंदमान की यात्रा करने का सौभाग्य अचानक मुझे मिला इसका श्रेय माननीय राज्यसभा सदस्य (सांसद) श्री अनिल माधव दवेजी को जाता है। जिन्होंने बीते कुछ वर्षों से यह नियम सा बना रखा है कि प्रतिवर्ष कुछ लोगों को अंदमान की यात्रा पर ले जाकर वे वहां क्रांतिकारियों का महातीर्थ सेल्यूलर जेल की 'सावरकर कोठरी" (सावरकरजी ने अपने काव्य 'सप्तर्षी" में इस कोठरी का उल्लेख 'एकलकोंडी" (एकांतवासी) के रुप में किया है) के दर्शन उन्हें कराते हैं। जिससे कि यात्रीगण उन कष्टों, भीषण यंत्रणाओं के ताप की कल्पना कर सकें, जो उन्होंने वहां सहे, भोगे। उनके त्याग को महसूस कर सकें जो उन्होंने देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए। देश को स्वतंत्रता ऐसे ही नहीं मिल गई। इसके पीछे क्रांतिकारियों का त्याग, बलिदान भी अहम्‌ था। इस सेल्यूलर जेल में अनेक क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की यंत्रणाएं सहते हुए, उनका विरोध करते हुए हौतात्म्य स्वीकारा। सावरकर ठीक ही कहते थे - क्रांतिकारियों की हड्डियों पर बसा है अंदमान।


हमारी यात्रा 26 अप्रैल को प्रातः प्रारम्भ हुई। हम कुल 9 लोग थे। 9 बजे दिल्ली विमानतल से हमने जेट एयरवेज द्वारा अंदमान के लिए प्रस्थान किया और लगभग 2 बजे दोपहर को अंदमान की राजधानी पोर्टब्लेयर के 'वीर सावरकर विमानपत्तन" पर पहुंचे। वहां से हम होटल सरोवर पोर्टिको पहुंचे जो शहर से दूर स्थित होकर सामने ही 'सी बीच" है। जहां हम हर रात को भोजनोपरांत जाकर कुछ समय तक समुद्री लहरों के उतार-चढ़ाव, उनकी गर्जनाओं को सुनते बैठे रहते। कहते हैं व्यक्ति हर चीज से कुछ समय के पश्चात ऊब जाता है, परंतु समुद्र तट पर बैठकर समुद्री लहरों की ओर देखते यदि हम घंटों बैठे रहें तो भी ऊबते नहीं। हर बार एक नएपन की अनुभूति होती रहती है।


भोजनादि से निपटने में हमें लगभग चार बज गए। चूंकि, इतनी देर बाद हम कहीं जा नहीं सकते थे अतः उस दिन शाम को समुद्र स्नान और बाद में रात्रि-भोजन के पश्चात समुद्र तट पर लहरों का आनंद लेने जा पहुंचे। उसी समय मुझे यह स्मरण हुआ कि इसी प्रकार से इंग्लैंड में एक शाम जब वीर सावरकर अपने मित्र के साथ समुद्र तट पर उदास एवं विमनस्क अवस्था में बैठे हुए थे तभी अचानक उनके मुख से 'सागरा प्राण तळमळला" इस अजरामर गीत की पंक्तियां फूट पडी। यह मान्यता है कि यदि वीर सावरकर ने अपने जीवन में इस गीत की रचना के अलावा और अन्य कोई महत्वपूर्ण कार्य ना भी किया होता तो भी इस रचना के कारण वे अमर हो गए होते। उनके विषाद का कारण था उनके अनुयायी मदनलाल धींगरा को फांसी की सजा और छोटे बंधु डॉ. नारायण सावरकर के कारावास की सूचना।


दूसरे दिन यानी दिनांक 27 को प्रातः 9 बजे हमने सेल्यूलर जेल के लिए प्रस्थान किया। जिसके लिए हम विशेष रुप से आए थे। आगे बढ़ने से पूर्व यह बता दूं कि 1947 में सरदार पटेल ने बडी दूरदर्शिता से इन द्वीपों को पाकिस्तान के अधिकार में जाने से बचाया था। उन्होंने एक जहाज को तिरंगा झंडा फहराने के लिए भेजा जिससे यह प्रमाणित हो सके कि यह भारत का क्षेत्र है। कुछ घंटों बाद वहां पाकिस्तान के जहाज देखे गए। उनकी आशंका सच निकली। भूगर्भ शास्त्रियों का कहना है कि, कभी ये द्वीप भारत की मुख्य भूमि से जुडे थे। इनका सबसे पहला उल्लेख दूसरी सदी के टोलमी ने किया है। मार्कोपोलो के यात्रा वर्णनों में भी इनका उल्लेख है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने 'मत्स्य पुराण" और 'वायुपुराण" संदर्भ से इन्हें 'इंद्र द्वीप" और 'नाग द्वीप" नाम दिया था।


अंडमान निकोबार को सच्चे अर्थों में 'लघु भारत" कहा जा सकता है। (यह एक अन्य लेख का विषय है) यहां प्रायः सभी राज्यों, धार्मिक परंपराओं, रीतिरिवाजों और भाषाओं के लोग बडे सौहार्द से रहते हैं। यहां न तो सांप्रदायिकता है ना ही धार्मिक संकीर्णता। इसका कारण है देश के विभिन्न अंचलों के लोग जो जेलों में बंद थे बाद में कैदी बस्तियों में रहने लगे उनके बीच विवाह संबंध हो गए। एक नए समाज का जन्म हुआ जिन्हें अंगे्रजों ने लोकल (भूमिपुत्र) नाम दिया। यहां की संपर्क भाषा हिंदी है। यहां की हिंदी का स्वाभाविक प्रचलन भले ही टूटा-फूटा हो परंतु, भारत की मुख्य भूमि के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है जहां आज भी हिंदी को स्वीकारने में न नुच की जाती है।


भारत प्रायद्वीप के पूर्व में गंगा-सागर (बंगाल की खाडी) में कोलकाता से 1255 कि.मी. और चेन्नई से 1190 कि.मी. की दूरी पर छोेटे-बडे 554 द्वीपों का पन्ने सा चमचमाता द्वीप-पुंज है 'अंदमान-निकोबार"। मुख्य भूमि से अतिदूर, निर्जन, उपेक्षित इस प्रदेश से आधुनिक विश्व तब परिचिय हुआ, जब ब्रिटिश शासकों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के लिए एक सुरक्षित कारागार के रुप में सेल्यूलर जेल की स्थापना 10 मार्च 1858 को जब आगरा (उत्तरप्रदेश) का कुख्यात कारा अधीक्षक डॉ. जेम्स पेटीशन वाकर 500 भारतीय स्वाधीनता सेनानियों (बंदियों) को लेकर इस बीयाबान पर उतरा। बंदियों को दहशत में रखने तथा किसी प्रकार पलायन के अवसर शून्य होने के कारण साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने सेल्यूलर जेल के फैलाव की सतत कोशिशें की। वीर बलिदानियों के जत्थे यहां सतत आते रहे। इसी क्रम में लंदन में बेरिस्टरी को निमित्त बनाकर परंतु स्वाधीनता संघर्ष के मंतव्य से पहुंचनेवाले इस वीर को अंग्रेजों ने 4 जुलाई 1911 को अंदमान के कारावास में पहुंचा दिया। यहीं पर अंदमान का राष्ट्रीय दृष्टि में एक उज्जवल रुप सावरकरजी के मनमस्तिष्क में उभर कर मानो साकार हुआ उसका वर्णन सावरकरजी की आत्मकथा 'आजन्म कारावास" में शब्दबद्ध है।


इस कारागार का निर्माण कार्य 1896 से 1906 तक चला। इस कारागार में सौ-सौ कोठरियों की तीन मंजिला इमारतों की सात पंक्तियों का समूह है। इसका आकार एक तारे के समान है। इसका निर्माण बडी ही होशियारी से किया गया है। सारी इमारतें एक मध्यवर्ती टॉवर से जोडी हुई हैं। इनमें से एक इमारत का आगे का भाग और दूसरी इमारत का पीछे का भाग एकदूसरे के सामने हैं। इस कारण कैदी एक दूसरे को देख नहीं पाते थे। इसी कारण पहले सावरकरजी को पता ही नहीं चला कि उनके बडे भाई गणेश दामोदर सावरकर (बाबाराव सावरकर) भी यहां सजा काट रहे हैं। एक दिन अचानक वे उनके सामने आ गए और वे अवाक्‌ रह गए। सबसे छोटा भाई भी एक बमकांड में गिरफ्तार होकर जेल में था। इस प्रकार तीनों भाई कारावास में थे ऐसा उदाहरण दूसरा कोई नहीं मिलता। वर्तमान में मात्र तीन इमारतें ही शेष बची हैं। बाकी की चार इमारतें 1942 के जापानी हमले में ध्वस्त हो गई। वर्तमान में वहां एक हॉस्पिटल है।


स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान की स्मृति और सम्मान में 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. मोरारजी देसाई ने सेल्यूलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया। ऐसे इस जेल के परिसर में हम एक भव्य प्रवेश द्वार से प्रविष्ट हुए। अंदर दीवारों पर जेल की ऐतिहासिक जानकारी दी गई है। हमें गाईड की कोई आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि, हमारे साथ श्रीअनिलजी जो थे जो प्रतिवर्ष यहां आते ही हैं। यहां एक छोटासा संग्रहालय है जो बलिदानियों की स्मृतियों को आनेवालों के मस्तिष्क में ताजा कर देता है।

संग्रहालय से बाहर आने पर एक खुले परिसर में हम आते हैं जहां सामने ही एक बडा पीपल का पेड है जो सेल्यूलर जेल के निर्माण के पूर्व से ही है। कुछ समय पूर्व यह गिर गया था, परंतु सरकार ने दस लाख रुपये खर्च कर इसे पुनर्जीवित कर दिया। वीर सावरकर सहित कई स्वतंत्रता के सेनानियों के हौतात्म्य का यह साक्षी है। बांई ओर एक बडे चबूतरे पर हुतात्माओं की स्मृतियों को जागृत रखनेवाला एक स्मारक स्तंभ है। उसके निकट ही पवित्र क्रांतिज्वाला स्थापित है से वीर सावरकर के उद्‌गारों को दुराग्रहपूर्वक तत्कालीन मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कुछ वर्ष पूर्व मिटा दिया था। उन पंक्तियों का भावार्थ इस प्रकार से है -

'हमने (देशभक्ति का) यह व्रत नासमझी से नहीं, तो हमारे स्वभावानुसार इतिहास के प्रकाश में सोच समझ कर लिया है। जो निश्चय ही दिव्य दाहक है, ऐसा यह असिधाराव्रत हमने परस्पर अपनाया है।" इन पंक्तियों में अनुचित कुछ भी नहीं परंतु राजनीति की माया देखिए कि इन्हें भी मिटा दिया गया।


हम आगे बढ़े और पहले जेल के मध्य स्थित टॉवर जिससे सातों इमारतों में जाने का मार्ग था में आए। इस टॉवर में बैठकर एक ही कर्मचारी सभी इमारतों के कैदियों पर नजर रख सकता था। क्योंकि, कैदी आखिर भागकर जाता भी तो कहां? चारों ओर घना जंगल और समुद्र के सिवा कुछ ना था। (वैसे यहां भी एक अपवाद है और वह एक कैदी था दूधनाथ तिवारी जिसके बारे में जानकारी किसी ओर लेख द्वारा दूंगा) इस टॉवर की दीवारों पर प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों के नाम उकेरे हुए हैं। हम सब लोग एक असीम इच्छा से उस कोठरी क्रमांक 123 जो तीसरी मंजिल पर स्थित है की ओर दर्शन की अभिलाषा से बढ़े जहां वीर सावरकर को दोहरा आजन्म कारावास (50 वर्ष) भुगतने के लिए रखा गया था। जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद यहां आए थे तो प्रतिकात्मक स्मारक कोठरी न. 42 में बनाया गया था। मन में यह जानने की उत्सुकता थी कि, कैसी होगी वह कोठरी? उस कोठरी की दीवारों पर 'कमला काव्य" की पंक्तियां क्या अद्याप भी हैं? दिल की धडकनें बढ़ने लगी। कोठरी को दो दरवाजे और दो ताले थे जिनकी रचना एकदम अलग थी। सावरकर डेंजरस कैदी जो थे, उनके गले में 'डी-डेंजरस" का बिल्ला भी लटका रहता था।


उस स्वातंत्र्य वीर के मंदिर रुपी गर्भगृह की दीवार पर सावरकरजी का कैदी के रुप में छायाचित्र लगा है। उस पर अमर काव्य 'कमला" की दो पंक्तियां उद्‌धृत हैं। लेकिन दीवारों पर कोई पंक्ति अब नजर नहीं आती, दीवारें बिल्कूल सामान्य दीवारों की तरह ही हैं। कमरे में दो तसले रखे हुए थे जिनमें से एक सावरकरजी भोजन के लिए और दूसरा शौच के लिए उपयोग में लाते थे। जब उन्हें आंव हुई थी तब उन्होंने दोनो ही तसलों का उपयोग शौच के लिए किया था, परंतु उन्हें कोई अन्य सुविधा नहीं दी गई। अमानवीय घोर यंत्रणाओं की यह पराकाष्ठा है। सन्‌ 1943 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इस जेल को भेंट दी थी। यहां हम कुछ देर स्तब्ध से खडे रहे फिर कुछ समय तक हम शांत बैठे रहे। कुछ ही देर में हम पसीने से भीग गए।


नीचे उतरकर हम फांसीघर की ओर बढ़े जो वीर सावरकर की कोठरी के सामने होकर सहज ही नजर आती है। यहां एक साथ तीन लोगों को फांसी पर चढ़ाया जाता था। निकट ही फांसी पूर्व स्नान और अंतिम क्रिया की व्यवस्था थी । वीर सावरकर का नैतिक बल और धैर्य को समाप्त करने तथा कैदियों का आक्रोश उनके कानों पर पडे इस उद्देश्य से उनकी कोठरी जानबूझकर फांसीघर के निकट रखी गई थी। परंतु, वे दृढ़ इच्छा शक्ति के स्वामी थे उन्होंने इन अत्याचारों को भी सह लिया और अपनी काव्य प्रतिभा को मरने नहीं दिया उसीका फल था उनका महाकाव्य 'कमला" जिसकी दस हजार पंक्तियां जो उन्होंने नाखुनों और खिलों से दीवारों पर उकेरी थी। जेल की भव्यता देख कोई भी चकित हो सकता है। जेल परिसर में ही एक पत्रे का शेड है। इस कार्यशाला में तेल की घानी घूमाकर कैदियों से तेल निकलवाया जाता था। नारियल के रेशों को कूटकर रस्सी गूंथवाई जाती थी। शेड में पुराना 'कोल्हू" रखा हुआ है इसी प्रकार से नारियल के रेशों से रस्सी बनाने का यंत्र भी यहां है।


शाम को हम फिर यहां 'लाइट एंड साउंड" कार्यक्रम देखने के लिए आए। उसमें क्रुर जेलर बारी द्वारा कैदियों को दी गई भयानक यातनाओं का वर्णन सुना। यह पूरा कार्यक्रम उसी पीपल के पेड और सर्वसाक्षी सूर्य को रखकर बनाया गया है जिसका उल्लेख हम पूर्व में ही कर चूके हैं। लेकिन इस कार्यक्रम में खलनेवाली बात यह है कि वीर सावरकर को उतना महत्व जिनके कारण ही अंदमान को पहचाना जाता है नहीं दिया गया है जितना की दिया जाना चाहिए था। इसमें संशोधन की आवश्यकता है। हमारा अंदमान आने का उद्देश्य पूर्ण हो चूका था। इसके बाद हम एक दिन और रुके हमारे साथ के कुछ ने नार्थ बे द्वीप पर जाकर स्कूबा डायविंग का आनंद उठाया और 29 तारीख को हमने वापसी की यात्रा प्रारंभ की। हम भले ही अधिक नहीं घूमे परंतु पर्यटकों के लिए यहां बहुत कुछ है परंतु लेख की भी सीमा है इसलिए मैं यहीं विराम देता हूं। 

Tuesday, February 25, 2014

भविष्य-चिंतक वीर सावरकर के सपनों का भारत

हिंदूराष्ट्र के उद्‌गाता वीर सावरकर न केवल एक महान हिंदूसंगठक थे, जिन्होंने अंडमान के कारागार में ही शुद्धि यज्ञ का सूत्रपात किया था अपितु, एक महान साहित्यकार भी थे, जिन्होंने कालकोठरी में ही रहते 'कमला" जैसे महाकाव्य का सृजन किया था, मुंबई मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष पद से 1938 में 'लेखनियां तोडो और बंदूक हाथ में लो" का क्रांतिकारी वक्तव्य देकर खलबली मचा दी थी। वे क्रांतिमंत्र के उद्‌गाता, जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रांतिकारी रहे; जिनका कहना था प्रत्येक क्रांति एक प्रयोग होता है, विज्ञाननिष्ठ, तर्कसिद्ध सर्वकालिक हिंदुत्व के प्रवक्ता, द्रष्टा-भविष्यचिंतक भी थे। अंडमान के तट को दूर से देखते ही, जहां उन्हें दो कालापानी का दंड भुगतने के लिए लाया जा रहा था, उनके मन में विचार उठे थे अरे! यह तो हिंदुस्थान के समुद्र का पूर्व की ओर का द्वार ही है, जहां भविष्य में भारतीय नौ-सेना का एक बलिष्ठ सैनिकी अड्डा स्थापित होगा, जो पूर्व की ओर से होनेवाले किसी भी आक्रमण का प्रथम प्रत्याघात कर देश की रक्षा करेगा। उनका यह स्वप्न सुन कारागार के अधीक्षक ने उपहास करने के लिए उनसे कहा - 'यह देखो सावरकर, इस अंडमान के तुम्हारे भावी जलदुर्ग के योद्धा इधर-उधर पहरा दे रहे हैं। देखो!" सावरकरजी ने इस पर हंसकर कहा, 'यह तुम्हें और मुझे कदाचित्‌ दिख न सकेंगे परंतु, अपने बच्चे बहुधा यहां आएंगे।" वीर सावरकर का यह स्वप्न सिद्ध हुआ। वे द्रष्टा ठहरे। 10 मई 1973 को लोकसभा में रक्षामंत्री ने पोर्टब्लेअर पर नौ-सेना का अग्रगामी अड्डा स्थापित करने के सरकार के निर्णय की घोषणा की। 

वीर सावरकर के हिंदुत्व-हिंदूराष्ट्रवाद को संकुचित समझनेवाले समझते रहें परंतु, उनका हिंदुत्व ग्रंथ जो 1921 के अंत और 1922 के प्रारंभ में गुप्तरुप से लिखकर अंडमान के कारागार से बाहर भेजा गया था वह 1923 में 'मराठा" इस सार्थ नाम से प्रकाशित हुआ था। और 1925 के प्रारंभ में हिंदूमहासभा के बेलगांव अधिवेशन में डॉ. मुंजे, लाला लाजपतराय, लाला हंसराज, बॅ. जयकर, तात्यासाहेब केलकर, बाबू राजेन्द्रप्रसाद जैसे बडे-बडे नेता उपस्थित थे में सावरकरजी द्वारा इस ग्रंथ में 'हिंदुत्व" की दी गई व्याख्या बतलाई गई थी। इस 'हिंदुत्व" ग्रंथ को जो कोई भी पढ़ेगा वह निःशंक होकर स्वीकारेगा कि सावरकरजी का हिंदुत्वाभिमान अंधधर्मांधता न होकर सांस्कृतिक स्वाभिमान था। हिंद्वेत्तर धर्मांधों को मुंहतोड उत्तर देनेवाला स्वाभिमानभरा संकल्प था। परंतु, जो बिना पढ़े ही उन्हेें और हिंदुत्ववादियों को धर्मांध और सांप्रदायिक ठहराना चाहते हैं। उन्हें अब क्या कहें?

'हिंदूराष्ट्र" की कल्पना को संकुचित कहनेवालों को उनके द्वारा दिया गया उत्तर था - हिंदूराष्ट्र की कल्पना संकुचित नहीं। क्योंकि, यदि इस प्रकार से कहा गया तो हिंदीराष्ट्र की कल्पना भी मानवता की विशाल कल्पना के सामने संकुचित ही ठहरेगी। 
  
वीरसावरकर भी हिंदूराष्ट्र का सपना देखा करते थे का उल्लेख कर हिंदुत्ववादियों का उपहास कर हिंदुत्व एवं हिंदुत्ववादियों के प्रति अनर्गल प्रलाप करनेवाले जिन्हें परंपरागत रुप से ही 'हिंदुत्वद्वेष" प्राप्त हुआ है वस्तुतः जानते ही नहीं कि वीर सावरकर अपने सपने के भारत के बारे में क्या विचार रखते थे। वीर सावरकर के शब्दों में ही - ''मेरे सपनों का भारत एक लोकतंत्रीय राज्य है, जिसमें सभी रुप धर्मों और मत-मतांतरों के अनुगामियों के साथ पूर्ण समानता का व्यवहार किया जाएगा। किसीको दूसरे पर आधिपत्य जमाने का अवसर न रहेगा। जब तक कोई व्यक्ति हिंदुओं की इस पुण्यभूमि तथा मातृभूमि हिंदुस्थान को एक राज्य मानकर इसके प्रति अपने दायित्वों का निष्ठा सहित पालन करेगा, जो आसिंधु-सिंधु पर्यंत विस्तीर्ण है, एक ओर अविभाज्य है तब तक उसे नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे। हिंदू एक जातिविहीन और संगठित आधुनिक राष्ट्र का रुप ग्रहण करेंगे। विज्ञान और टैक्नोलोजी को बढ़ावा मिलेगा, जिसमें सभी भूमि राज्य की होगी और कोई भी जमींदार न होगा। सभी महत्वपूर्ण उद्योगों का राष्ट्रीयकरण होगा तथा भारत खाद्यान्न, वस्त्र और प्रतिरक्षा की दृष्टि से पूर्णतः आत्मनिर्भर होगा। मेरे स्वप्नों के भारत का वसुधैव कुटुम्बकम के महान आदर्श में विश्वास होगा। सैनिक दृष्टि से सबल अखंड हिंदुस्थान की विदेश नीति होगी तटस्थता और शान्ति की। शक्तिशाली और अखंड हिंदुस्थान ही विश्व में स्थाई शान्ति और समृद्धि की दिशा में प्रभावी योगदान दे सकता है।""

हिंदुत्व पर होनेवाले आक्रमणों एवं कुप्रचार से तथा गिरती नैतिकता देखकर निराश होनेवाले हिंदुत्ववादियों के लिए सावरकरजी के ये वचन निश्चय ही गौर करने लायक होकर उनके लिए सम्बल प्रदान करनेवाले हैं - ''स्वतंत्रता के 18 वर्ष (वर्तमान में 66) उपरान्त भी हम लोगों को निराश, हताश, विक्षुब्ध और नैतिकता से गिरता हुआ देख रहे हैं। आज जनसाधारण जो पेट की रोटी और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, बडी योजनाओं ने उनको तनिक भी प्रभावित नहीं किया है। किन्तु इतने पर भी एक क्षण के लिए भी यह सोचना कि यह देश खंड-खंडित हो जाएगा, पागलपन ही होगा। एक ऐसा देश जिसने चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य, शालिवाहन, चाणक्य और शिवाजी जैसे महान राजनीतिज्ञों को गोदी में खिलाया है, वह कभी भी राजनैतिक दृष्टि से दिवालिया नहीं हो सकता। सहस्त्रों वर्षों के इतिहास में हिन्दुस्थान पर जब-जब संकट के घन घहराए हैं तब ही किसी-न-किसी महापुरुष ने इसका नेतृत्व कर राष्ट्र को सम्बल दिया है। जैसा अतीत में हुआ है भविष्य में भी ऐसे लोग होते रहेंगे जो देश का दिशा निर्देशन करेंगे, इसकी सेवा के लिए ही जिएंगे और मरेंगे।""

जिस प्रकार से उनके 'हिंदुत्व" के प्रति अनेक भ्रांतियां व्याप्त हैं उसी प्रकार से उनकी धर्म संबंधी भूमिका, मान्यताओं के बारे में भी अनेकानेक भ्रांतियां फैली हुई हैं। धर्म संबंधी उनके विचार थे - ''क्या धर्म अर्थात्‌ पारिमार्थिक चर्चा द्वैत, अद्वैत का वाद-विवाद या चेतन-अचेतन की खोज है? या केवल भावना है जो व्यक्ति शून्य हो? नहीं विशेष रुप से हमारा धर्म महान होने से हम धर्म को ही राष्ट्र कहते हैं। हमारा इतिहास ही धर्म है। इतना ही नहीं परंतु हमारा दैनिक व्यवहार जो इतिहास समाज और राष्ट्र को पुष्ट करता है वही हमारा धर्म है। धर्म की यह परिभाषा निधर्मी स्टालिन से कम्युनिस्टों को भी माननी पडी थी। धर्म की इस परिभाषा से यह स्पष्ट होता है कि कोई भी व्यक्ति धर्मातीत रह ही नहीं सकता। अमरीका का राष्ट्रपति बाइबल हाथ में लिए बिना राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण नहीं कर सकता; इंग्लैंड का सम्राट यदि प्रोटेस्टन्ट न हो तो उसे राज्य पद से त्यागपत्र देना पडता है। यदि छोटे से छोटे पाश्चात्य देश में भी हम गए तो हमें यही दिखाई देगा कि यह राष्ट्र किसी-न-किसी धर्म का अनुयायी होगा। हम हिन्दू हैं और हमने दुनिया देखी है? देश इतिहास और व्यवहार के विशुद्ध न्यायपूर्ण बरताव को ही हम धर्म कहते हैं। इसलिए धर्म में महान शक्ति होती है। हम, हमारा देश, इतिहास और व्यवहार हिंदुस्थान के वैभव को बढ़ानेवाला है। इस प्रकार व्यक्तिगत और सामाजिक भावनाओं में व्याप्त प्रेरणा को ही हम धर्म कहते हैं। धर्म की इस परिभाषा से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदुस्थान का धर्म हिंदू है।""

इस हिंदूधर्म को और अधिक विस्तृत रुप से समझने के पूर्व उनके द्वारा दी गई हिंदू की परिभाषा जो उनकी प्रतिभा दर्शाती है को समझना अनिवार्य है। उनकी व्याख्या के अनुसार 'आसिंधु-सिंधु-पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः।।" सिंधुस्थान ही जिनकी केवल पितृभूमि ही नहीं तो पुण्यभूमि भी है वह हिंदू। सावरकरजी की 'हिंदू" शब्द की यह व्याख्या अतिव्याप्ति और अव्याप्ति इन दोनो ही प्रकार के दोषों से मुक्त है। इस व्याख्या के अनुसार वैदिक धर्मानुयायी, सिक्ख और भारतीय बौद्ध, जैन, लिंगायत, नास्तिक, ब्राह्मोसमाजी, गिरीजन, वनवासी आदि का समावेश 'हिंदू" में होता है। चीनी बौद्धों का समावेश हिंदुओं में नहीं होता। क्योंकि, हिंदुस्थान उनकी पुण्यभूमि होने पर भी पितृभूमि नहीं है।

 'हिंदूधर्म" यह नाम किसी एक विशिष्ट धर्म अथवा पंथ विशेष का न होकर जिन अनेक धर्मों और पंथों की यह भारतभूमि ही पितृभू और पुण्यभू है उन सारों का समावेश करनेवाले धर्मसंघों का हिंदूधर्म सामुदायिक अभिधान है। बहुसंख्य हिंदुओं के धर्म को सनातन धर्म अथवा श्रुति-स्मृति-पुराणोक्त धर्म अथवा वैदिक धर्म इस प्राचीन एवं मान्य संज्ञाओं से संबोधित किया जाता है। अन्य हिंदुओं के धर्मों को उनके उनके मान्य नामों से जैसे सिक्ख धर्म अथवा आर्यधर्म अथवा जैन धर्म अथवा बौद्ध धर्म संबोधित किया जा सकता है। जब इन सारे धर्मों को एकत्रित नाम देने की आवश्यकता होगी तब हिंदूधर्म यह व्यापक नाम देना उचित होगा। इसके कारण अर्थहानि तो होगी ही नहीं, परंतु वह अचूक और निःसंदिग्ध जरुर होगी और अपने छोटे समाज के संदेह और बडे समाज का क्रोध दूर कर अपने समान वंश और समान संस्कृति दर्शानेवाले अपने प्राचीन ध्वज तले पुनः एक बार सभी हिंदुओं के एकत्रित करेगा। इसी प्रकार से हमारे यहां एक ही धर्म पुस्तक न होने का लाभ बतलाते हुए सावरकरजी इस संबंध में अपने विचार प्रकट करते हुए कहा इससे अपना धर्मविकास थमा नहीं। हमारे धर्मतत्त्व भी किसी पुस्तक के दो पुट्ठों में समा नहीं सकते। इस विश्व के दो पुट्ठों में जितना सत्य और ज्ञान विस्तृत फैला हुआ है उतनी हमारी धर्म पुस्तक विस्तृत होगी। अंत में उनका कहना था कुछ भी हो तो भी बुद्धिवाद की दृष्टि से देखा जाए तो कुल मिलाकर सभी धर्मों में ग्राह्यतम धर्म यदि कोई हो सकता है तो वह है हिंदूधर्म।

सावरकर हिंदुत्ववादी थे किंतु उसकी अपेक्षा अधिक 'सेक्यूलर" भी थे। परंतु उनके सेक्लूरिजम को भी उनके विरोधियों ने विकृत कर जनता के सामने प्रस्तुत किया और उनके अनुयायियों ने भी उसे कभी जनता के सामने ठीक ढ़ंग से प्रस्तुत नहीं किया। 'सेक्यूलिरिजम" यानी शासन की धर्म संबंधी भूमिका। इस संबंध में वीर सावरकरजी की भूमिका इस प्रकार की थी, धर्म से संबंधित विषय पारलौकिक और आध्यात्मिक स्वरुप का माना जाना चाहिए। लौकिक विषयों में धर्म का अधिकार मान्य नहीं होना चाहिए। उनका कहना था - धर्म शब्दनिष्ठा और श्रद्धा का प्रांत है और परलोक उसका विषय; इहलोक यानी कानून, व्यवहार होकर प्रत्यक्षनिष्ठ प्रयोग का क्षेत्र! वहां धर्म नहीं चलेगा। धर्म अलग। कानून अलग। धर्मग्रंथ को बंद कर अगर बुद्धिवाद से विचार किया जाए तो ही ऐहिक जीवन के प्रश्न हल हो सकते हैं। अतः मानव जीवन का ऐहिक और पारलौकिक इस प्रकार का विभाजन कर धर्म को केवल पारलौकिक विषयों तक ही मर्यादित रखना और ऐहिक जीवन के सारे विषय बुद्धिवाद के या उपयुक्ततावाद के हवाले करना इस प्रकार की उनकी सेक्यूरिजम संबंधी भूमिका थी। इहलौकिक जीवन से धर्म को दूर कर उसे केवल पारलौकिक जीवन तक का मर्यादित माने बगैर ऐहिक मानवी जीवन के निर्णय बुद्धि के आधार पर लिए नहीं जा सकेंगे, ऐसा उनका कहना था। 'अरबी संस्कृति का उच्चाटन" इस निबंध में उन्होंने इस संबंध में बिल्कूल सुस्पष्ट विचार प्रस्तुत किए हैं। तुर्कस्थान के कमालपाशा ने इस्लाम को पारलौकिक जीवन तक मर्यादित कर डाला था। ऐहिक जीवन में इस्लाम के हस्तक्षेप का अधिकार गैरकानूनी कर डाला था। राजनीति, सामाजिक नीति, अर्थनीति, शिक्षा, रक्षा, भाषा, कानून आदि सारे ऐहिक विषय उन्होंने शासन के, विधिमंडल के बुद्धिवादी क्षेत्रतले ले लिए थे। ऐहिक क्षेत्र से धर्म का साफ उच्चाटन कर डाला था। 

सावरकरजी को भारत में यही भूमिका लेनी थी। भारत का संविधान और कामकाज पूरी तरह से बुद्धिवाद पर आधारित रहेगा; वह वेद, गीता, कुरान, बाइबल इस प्रकार के किसी भी धर्मग्रंथ पर आधारित नहीं रहेगा इस प्रकार की उन्होंने घोषणा ही की हुई थी।  धर्मग्रंथ आज कालबाह्य हो गए हैं; आज हम किस प्रकार से रहें; व्यवहार करें यह कहने का अधिकार धर्मग्रंथों को नहीं; धर्मग्रंथों पर आधारित सामाजिक संस्थाओं को खडा करने के दिन गए; आज हमें जो सामाजिक संस्थाएं खडी करनी हैं वे धर्मग्रंथ पर न होकर विज्ञानग्रंथों पर, बुद्धिवाद पर खडी करनी हैं इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। सावरकरजी के सेक्यूलरिजम की यह भूमिका हिंदू-मुस्लिम समस्या सहित अनेक राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं पर रामबाण उपाय जैसी थी। उन्हें मालूम था कि, संसार की धर्मों संबंधी अधिकांश समस्याएं, धर्म जो मनुष्य के इहलौकिक जीवन मेें प्रभावी होता है से पैदा होती हैं। उदाहरणार्थ सामाजिक विषमता की समस्या को लें तो धर्म ने जीवन के विषय में कही हुई आज्ञाओं में से ही वह पैदा हुई हैं। इहलौकिक जीवन पर के धर्म के अधिकार को ही निकाल लिया जाए तो धर्मप्रणीत सामाजिक विषमता का आधार ही उखड जाता है। मुस्लिमों का स्वतंत्र राष्ट्र यानी इहलौकिक रहनेवाले राजनैतिक क्षेत्र में धर्म का उपयोग। धर्म का विषय परलोक तक का मर्यादित कर दिया जाए तो सारा इहलौकिक मानवी जीवन धर्म के नियंत्रण से मुक्त हो जाता है और धर्मसंबंधी सारी समस्याएं समाप्त हो जाती हैं, इस प्रकार की उनकी भूमिका थी। इस भूमिका के कारण हिंदुओं पर होनेवाला अन्याय भी समाप्त होनेवाला था, मुस्लिमों का प्रश्न भी हल होनेवाला था; धर्म का राजनैतिक आधार भी समाप्त होनेवाला था; सामाजिक सुधार और आधुनिकता का मार्ग भी खुला होनेवाला था। जिसे परलोक में या अध्यात्म में श्रद्धा होगी वह उस विषय तक का मर्यादित अपने धर्म का पालन कर सकेगा। पारलौकिक और आध्यात्मिक अर्थ का धर्म केवल मानसिक और आत्मिक संतुष्टि तक का सीमित होने के कारण उसका किसी भी तरह का दुष्परिणाम समाज पर और राष्ट्र पर नहीं होगा। सेक्यूलरिजम की इस प्रकार की भूमिका रखनेवाले होने के बावजूद सावरकरजी के  धर्म संबंधी विचारों के बारे में भ्रांतियां फैलाना, उन पर मिथ्या दोषारोपण करना इस अज्ञान को या जानबूझकर किए जानेवाले भ्रामक प्रचार को क्या कहा जाए?

Friday, January 24, 2014

तिरंगे ध्वज के तीन रंग

तिरंगा ध्वज के तीन रंगों का अर्थ सांकेतिक है। वे योग्य हैं। धार्मिक दृष्टि से हरा रंग मुसलमानों को अपना लगनेवाला है। तो, हिंदुओं के हाथ की फूलों की डलिया - लाल सुर्ख पुष्प, हरी दूब या दूर्वा, तुलसी, बेल और शुभ्र जूही के फूलों से भरी हुई होती है। अतः उसे कोईसा भी रंग पराया नहीं लगता. शुभ्र रंग तो समता का द्योतक है। अतः रंग के विषय में मतभेद नहीं। 
- (1928 हिंदूसमाज संरक्षक स्वातंत्र्यवीर सावरकर) (रत्नागिरी पर्व) - सावरकर बालाराव 

वर्तमान में अनायास जो राष्ट्रीय ध्वज बनने जा रहा है, उसमें व्यत्यय ना लाएं इस बुद्धि से और वर्तमान के रंगों का समुच्चय यह राष्ट्रीय ध्येय उत्तम प्रकार से व्यक्त करने में समर्थ होने के कारण हम इन रंगों को सहमति दे रहे हैं। अंत में यह भी ध्यान में रखना चाहिए कोई से भी रंग लिए तो भी उसमें इस तिंरगे के समान यह नहीं तो वह ऐसी कुछ न्यूनता रहेगी ही. वह न्यूनता इस तिरंगे में कुलमिलाकर बहुत ही अल्प है। यही उसका विशिष्ट समर्थ है। - (1928 श्रद्धानंद 2 अगस्त)
तिरंगी ध्वजातील तीन रंग

तिरंगी ध्वजातील तीन रंगांचे अर्थ हे सांकेतिक आहेत. ते योग्य आहेत. धार्मिक दृष्टीने हिरवा मुसलमानांना आपला वाटणारा आहे. तर हिंदुंच्या हातातील फुलांची परडी - तांबडी लाल पुष्पे, हिरव्यागार दुर्वा, तुळशी, बेळ आणि पांढ़ऱ्या जाई जुई यांनी भरलेली असते. तेव्हा त्याला कोणताच रंग परका वाटत नाही. पांढ़रा रंग हा समतेचा द्योतक आहे. तेव्हा रंगा विषयी मतभेद नाही. 
- (1928 हिंदूसमाज संरक्षक स्वातंत्र्यवीर सावरकर) (रत्नागिरी पर्व) - सावरकर बाळाराव 

सध्या अनायासे जो राष्ट्रीय ध्वज होऊ पाहत आहे, त्यात शक्यतो व्यत्यय आणू नये या बुद्धीने आणि, सध्याच्या रंगाचा समुच्चय हे राष्ट्रीय ध्येय उत्तम प्रकारे व्यक्त करण्यास समर्थ असल्याने आम्हीं या रंगास संमती देत आहोत. शेवटी हे ही ध्यानात ठेविले पाहिजे की कोणते ही रंग घेतले तरी त्यात या तिरंगाप्रमाणे ही नाही ती अशी काही न्यूनता ही राहणारच. ती न्यूनता या तिरंगात एकंदरीने फारच अल्प आहे. हेच त्याचे विशिष्ट समर्थन होय. - (1928 श्रद्धानंद 2 ऑगस्ट)

Monday, January 6, 2014

सावरकर - सूर्य नमस्कार !

सावरकर नाम है एक बहुआयामी व्यक्तित्ववाले आज के युग के मानवतावादी महर्षि का! एक ऐसे प्रखर सूर्य का जिसके प्रखर हिंदुत्व दर्शन के कारण अच्छे-अच्छों की आँखें चौधिया गई थी। परंतु, इसी कारण से उनके अन्य समाजोद्धारक विचार व आचार उपेक्षित ही रह गए। विशेष रुप से मूलतः भक्तिभावी स्वभाव के हम लोगों को आचरण पसंद नहीं। इसीलिए तो सावरकर का समाज-सुधार जो एक जमाने में गाया जाता था वह आज सुनने को भी नहीं मिलता।

वीर सावरकर का हिंदू-राष्ट्र कोई एकांगी, फुसफुसा अथवा अस्थायी आधार पर खडा किया हुआ नहीं है। हिंदू-राष्ट्र के प्रबल व प्रभावी निर्माण के लिए राज्यक्रांति के समान ही समाजक्रांति भी की जाना आवश्यक है। एक क्रांति के बिना दूसरी क्रांति घटित होना ही कठिन; घटित हुई भी तो टिकना तनिक भी संभव नहीं। हिंदू संगठन के आंदोलन की तत्त्वात्मक और कार्यात्मक योजना वीर सावरकर अंडमान से रिहा होने के पूर्व से ही आंक रहे थे। सन्‌ 1924 में वे कैद से छूटकर रत्नागिरी में स्थलबद्ध हुए। उस दिन से उन्होंने इस योजना की उसके इस दोहरे स्वरुप की कार्यवाही को करना प्रारंभ किया। तभी से वे प्रचार करने लगे और उनके कार्यक्रम स्थलबद्धता की चौखट में बैठ सकें ऐसे प्रत्यक्ष प्रयोग भी उन्होंने चालू किए। उन्होंने उनके अंगोपांगो का विशदीकरण करनेवाले अनेक स्वतंत्र ग्रंथ और श्रद्धानंद, केसरी, किर्लोस्कर आदि सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में स्फुट लेख भी लिखे थे।

1924 में सशर्त रिहा होने के बाद पहले तीन साल यानी 1926 के अंत तक सावरकरजी ने अस्पृश्यता निवारण, स्वदेशी प्रचार और बलसंवर्धन के लिए व्यायामशालाओं का प्रसार इन तीन बातों पर मुख्यतः बल दिया। आगे पूरे महाराष्ट्र में उनके जिस भाषाशुद्धि के आंदोलन नेे खलबली मचा दी उस भाषाशुद्धि का कार्य भी इसी काल में शुरु हुआ था। इसके उदाहरण हैं ः 'हवामान"  को 'ऋतुमान", रत्नागिरी के 'नेटिव्ह जनरल लायब्ररी" का रुपांतर 'नगरवाचनालय" या 'नगर ग्रंथालय" में हुआ। इसी प्रकार से पाठशालाओं में 'हाजिर" के स्थान पर 'उपस्थित" की पुकार करना, आदि। किसी भी नई बात के आरंभकाल में जैसी हेठी, निंदा होती है उसी प्रकार की भाषाशुद्धि के मामले में भी घटित होने लगी। इसी काल में सावरकरजी ने विद्यार्थियों के लिए हिंदी की कक्षाएं चलाई। सावरकरजी को हिंदी ही राष्ट्रभाषा के रुप में अभिप्रेत थी। मगर वह हिंदी संस्कृतनिष्ठ होना चाहिए, ऐसा उनका आग्रह था। उन्होंने लिपिशुद्धि और भाषाशुद्धि मंडलों की स्थापना की, जातिभेदोच्छेदक संस्थानों को जन्म दिया। पहले भारतीय वायुवीर रत्नागिरी के कॅप्टन दत्रातय लक्षमण पटवर्धन तथा 'डी लॅकमन" की देखरेख में 'रायफल क्लब" की स्थापना की। सावरकरजी ने  समाजक्रांति को पूरक ऐसा एक 'अखिल हिंदू उपहार गृह" शुरु किया। उस उपहार गृह के संचालक श्री गजाननराव दामले थे। वहां चाय-चिवडा महार के हाथ से मिलता था। वहीं सावरकरजी अतिथियों से मिलते थे।

अस्पृश्योद्धार के साथ ही सावरकरजी का शुद्धिकरण का कार्य भी शुरु था। उनके द्वारा किया गया महत्वपूर्ण शुद्धिकरण था धाक्रस परिवार का। दस पंद्रह वर्ष पूर्व ईसाई बन चूके इस परिवारा को सावरकरजी ने शुद्धि समारोह कर फिर से हिंदू धर्म में लिया था। समाज में समरस किया इतना ही नहीं तो उनकी दो उपवर कन्याओं के विवाह योग्य ऐसे वरों से करा दिए। और एक लडकी के विवाह में तो श्री धाक्रस के आग्रह पर कन्यादान भी किया। सावरकरजी द्वारा प्रचारित बातों से अब समाज अभ्यस्त होने लगा था।  परंतु, इस पर संतुष्ट न रहते गतिमान रहना सावरकरजी के किसी भी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण भाग होता था। इसलिए देवालय की 'सीढ़ी के बाद सभा मंडप आंदोलन" सावरकरजी ने शुरु किया। स्पृश्यास्पृश्यों के समिश्र मेले सभा मंडप में जाने पर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं इस प्रकार का प्रचार शुरु किया। किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अस्पृश्य माने गए बंधुओं को साथ लेकर वे मंदिर जाने लगे। इस आंदोलन को लेकर अनेक लोग उन्हें छोडकर जाने लगे। बस सुधारक ही बचे रह गए। सामान्य लोगों को अस्पृश्यों का देवालय प्रवेश उस काल में भयंकर भ्रष्टाचार लगा इसमें कोई आश्चर्य नही। सावरकरजी अपने किसी भी नए आंदोलन का उपक्रम सार्वजनिक गणेशोत्सव और रत्नागिरी के पुरातन श्री विट्ठल मंदिर से करते थे। गणेशोत्सव समिति सावरकरजी का व्यासपीठ था। अस्पृश्यता धर्मसम्मत होने के कारण उसका पालन किया जाना चाहिए ऐसा कहे जानेवालों के व्याख्यानों का आयोजन जानबूझकर सनातनी करते थे। तो, अस्पृश्यता निषेध के सुधारक। इस प्रकार की यह खींचतान लगभग दो साल चली।  इस कारण समाज ऊपर से नीचे तक हिल उठा।  अस्पृश्यता बाबद अनुकूल या प्रतिकूल चर्चाओं के बिना रत्नागिरी में अन्य विषय ही नहीं बचा था।

1928 में दशहरे के शुभ दिन, परधर्मियों को हम अपने घरों में जहां तक प्रवेश देते हैं वहां तक तो भी अस्पृश्यों को प्रवेश देने के लिए तैयार हिंदू नागरिकों के घरों में, अपने सवा सौ अनुयायियों और 8-10 अस्पृश्यों सहित सावरकरजी ने समारोहपूर्वक प्रवेश किया और उन सभी के नाम प्रकाशित किए गए। पाठशालाओं में भी अस्पृश्य समझे जानेवाले बच्चों को मिश्रित रुप से बैठाया जाए, उन्हें पाठशालाओं के बरामदों अथवा कक्षा में एक ओर न बैठाया जाए। यह बात सावरकरजी हिंदू संघटन की दृष्टि से अत्यंत ठोस और मूलगामी समझते थे। परंतु, सावरकरजी के इस आंदोलन को भी तीव्र विरोध का सामना करना पडा। कई पाठशालाओं में शिक्षकों की हडतालें हुई तो, कई गांवों में गांववासियों ने विरोध किया। कुछ स्थानों पर स्पृश्यों द्वारा दिए गए स्थान वापिस ले लिए गए। तो कुछ स्थानों पर अस्पृश्यों ने यदि अपने बच्चों को पाठशालाओं में भेजा तो बहिष्कार किया जाएगा की धमकियां दी गई। 

देवालय प्रवेश के साथ ही सावरकरजी को समाज के पतन का कारण बनी 'बंदियों" को तोड डालना था और इसलिए पुराने देवालयों में अस्पृश्यों के प्रवेश आंदोलन के साथ ही जिस देवालय में अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के समान प्रवेश और अन्य अधिकार होंगे ऐसा अखिल हिंदुओं के लिए श्री पतित पावन मंदिर का निर्माण सेठ श्री भागोजी कीर की सहायता से किया। 10 मार्च 1929 को मंदिर का शिलान्यास श्रीमत्‌ शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी के करकमलों द्वारा हुआ। उपस्थित स्पृश्यास्पृश्यों के प्रचंड जनसमुदाय के सामने सावरकरजी ने इस देवालय के उद्देश्यों की रुपरेखा निम्नानुसार कथन की -

1). इस देवालय में शंख, चक्र, पद्म, गदाधारी भगवान श्रीविष्णू की देवी लक्ष्मी सहित स्थापना की जाएगी। 2). उस मूर्ति की पूजा करने का अधिकार जातिनिर्विशेष ढ़ंग से सभी हिंदुओं को समान रुप से रहेगा। 3). मगर, ऐसी पूजा करनेवाले को सर्वप्रथम देवालय के प्रांगण में स्नान कर व शुद्ध वस्त्र धारण करने के बाद में ही पूजा के लिए मंदिर के गर्भगृह में जाने का अधिकार होगा। 4). देवालय का पुजारी 'स्वधर्मक्षम" होना चाहिए, फिर वह किसी भी जाति का हो। इस प्रकार सभी हिंदुओं के लिए खुला रहनेवाला देवालय अखिल महाराष्ट्र तो क्या परंतु, अखिल भारत में भी दुर्लभ होने के कारण इस मंदिर को एक विशिष्टता प्राप्त हुई। इस समय  सावरकरजी ने अपने भाषण में कहा था ''अस्पृश्यों को प्रेम से स्पृश कर उनका अंगीकार करनेवाले दो ही शंकराचार्य हुए हैं। पहले, पीठ स्थापक आद्य शंकराचार्य काशी में स्नान कर वापिस आते समय मार्ग में अद्वैत तत्त्वज्ञानी अस्पृश्य को आलिंगन देनेवाले और दूसरे यह शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी जो अखिल हिंदुओं के प्रतिनिधि के रुप में आए हुए पांडु विठु महार को हार और हाथ अपने गले में डालने देकर उस पांडोबा के साथ ही स्वयं भी कृतार्थ हुए। यह श्री पतित पावन मंदिर स्मृति है सनातनियों के विरोध की परवाह न करते अस्पृश्यता के कलंक को धो डालने के वीर सावरकर के क्रांतिकारी कार्य की।

श्री पतित पावन मंदिर के कारण सावरकरजी को बिना किसी अवरोध के सामाजिक क्रांति का कार्य करने के लिए स्वतंत्र व्यासपीठ प्राप्त हुआ। जब सनातनियों ने अस्पृश्यों को गणेशोत्सव के लिए विट्ठल मंदिर के सभामंडप में प्रवेश को नकारा तो, सावरकरजी ने सभासदत्व से त्यागपत्र देकर अखिल हिंदू गणेशोत्सव में भाग ले सकें ऐसा अखिल गणेशोत्सव श्री पतित पावन मंदिर में शुरु किया। इसी उत्सव में डेढ़ हजार स्त्रियों द्वारा भाग लिया हुआ हल्दी-कुंकु कार्यक्रम भी संपन्न हुआ। विशेष रुप से दर्ज करने लायक बात है पांच अस्पृश्य लडकियों द्वारा गायत्री मंत्र पठन की स्पर्धा में भाग लेना। शिवू भंगीने शास्त्रशुद्ध स्वरों में सैंकडों लोगों के सामने तीन बार गायत्री मंत्र का उच्चारण कर पुरस्कार जीता। सबसे महत्वपूर्ण बात थी सावरकरजी द्वारा 'हिंदुओं के जातिभेद" इस विषय पर हुए व्याख्यान। हिंदूजाति की वर्तमान दुर्बल, अव्यवस्थित स्थिति के लिए महत्वपूर्ण कारण है 'हिंदुओं के बीच का जातिभेद"। हिंदुओं की  शक्ति को बांझ कर डालनेवाली अधिकांश सभी दुष्ट रुढ़ियों का मूल इस जातिभेद में ही है, ऐसी उनकी दृढ़ धारणा थी। और इसीलिए जातिभेद के उच्छेदन का आंदोलन उन्होंने हाथ में लेना तय किया।

उन्होंने केसरी में 'जातिभेद के इष्टनिष्टत्व" इस शीर्षक तले लेखमाला लिखी और इस प्रश्न को महाराष्ट्र में गति दी। प्रचलित जातिभेद की अनिष्टता युवाओं के मानस पर अंकित होना चाहिए इसलिए उन्होंने रत्नागिरी में युवाओं का 'हिंदू मंडल" स्थापित कर उसमें जातिभेद के अनिष्टत्व को सिद्ध करने के लिए चर्चा करते थे। उनका कहना था जातिभेद सप्तपाद प्राणी है। वे पांव हैं - वेदोक्तबंदी, सिंधुबंदी, शुुद्धिबंदी, स्पर्शबंदी, रोटीबंदी व बेटीबंदी। इनमें से मुख्यतः तीन पांव स्पर्शबंदी, रोटीबंदी और बेटीबंदी तोडी कि जातिभेद समाप्त हुआ ही समझ लीजिए। इसके लिए 'जातिभेदोच्छेदनार्थ अखिल हिंदू सहभोजन करिष्ये" इस प्रकार का संकल्प कर सहभोजन होना चाहिए। 16 सितंबर 1930 को पहला सहभोजन रत्नागिरी में हुआ। इस समारोह के कारण रत्नागिरी ही नहीं तो पूरे महाराष्ट्र में खलबली मच गई। रत्नागिरी में पहले से ही चल रहे सावरकरजी के भाषाशुद्धि, लिपिशुद्धि, अस्पृश्यता निवारण, शुद्धिकरण, पाठशालाओं में अस्पृश्य बच्चों को मिश्रित ढ़ंग से बैठाना, 'अखिल हिंदू उपहारगृह की स्थापना", अस्पृश्यों का देवालय प्रवेश, अस्पृश्यों के साथ हिंदू नागरिकों के घरों में प्रवेश आदि अभियानों के बाद अब जातिभेदोच्छेदनार्थ सहभोजन ने आग में घी डालने का काम किया। पहले से ही उन्हें रुढ़ीप्रिय समाज पाखण्डी, 'सबगोलंकारी" अर्थात्‌ छूत-छात न माननेवाला कहता था। पहले कुछ अनुयायी मंदिरों में अस्पृश्यों के साथ प्रवेश प्रकरण के कारण छोड गए थे अब उसमें और बढ़ोत्री हुई। तथापि, 'वरंजनहितं ध्येयं न केवला न जनस्तुती" इस ध्येय वाक्य से प्रेरित सावरकरजी ने चिंता न की।

जात्युच्छेदक सहभोजनों और सहभोजकों का सनातनियों द्वारा बहिष्कार की धूम मची हुई थी कि जिस देवालय में अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के समान ही प्रवेश और अन्य सभी प्रकार के अधिकार हों ऐसे 'अखिल हिंदुओं के लिए श्रीपतितपावन मंदिर" जो सेठ भागोजी कीर की सहायता से निर्मित किया गया था के उद्‌घाटन के समय श्री भागोजी कीर जाति से भंडारी होने के कारण वेदोक्त पद्धति से हम धार्मिक विधि नहीं करेंगे, ऐसा शास्त्री-पंडितों ने कहा, तब सावरकरजी एक ओर तथा शास्त्री-पंडित दूसरी ओर इस पद्धति से दो दिन तक शास्त्रार्थ चला। सावरकरजी का धर्मग्रंथों का अध्ययन कितना प्रबल है इसका प्रत्यय सबको इस समय हुआ। शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी ने भागोजी कीर के कर कमलों द्वारा वेदोक्त विधि से धार्मिक विधि होने में कोई आपत्ति नहीं ऐसा निर्णय दिया। फिर भी शास्त्री-पंडितों को वह मान्य नहीं हुआ। श्रद्धालु प्रकृति के सेठजी ने कहा पुराणोक्त तो पुराणोक्त परंतु, मूर्ति की प्रतिष्ठा समय पर हो। सावरकरजी तत्काल बोले प्रत्येक हिंदू को वेदोक्त अधिकार है। इस सिद्धांत का त्याग करना हो तो, सबसे पहले मेरा त्याग करो। परंतु, यदि सिद्धांत का त्याग नहीं करनेवाले हो तो पूर्वास्पृश्यों का जो हजारों का समुदाय आज आया हुआ है उन हजारों हिंदुओं के हाथों से देवमूर्ति उठाकर जयजयकार कर हम उस मूर्ति की स्थापना करेंगे। यही हमारी विधि होगी। 'हिंदू धर्म की जय"  का हजारों कंठों से निकलनेवाला जयघोष ही हमारा वेदघोष होगा और 'भावेहि विद्यते देवो" हमारा शास्त्राधार।

अंत में मसूरकर महाराज के आश्रम के वे.शा.सं. विष्णू शास्त्री मोडक द्वारा महाराज की आज्ञानुसार कीर सेठजी के कर कमलों द्वारा वेदोक्त विधि से देवप्रतिष्ठादिक सारे धर्म विधि भलीभांति पूर्ण किए गए। और दिनांक 22 फरवरी 1931 को श्री पतितपावन की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा श्री शंकराचार्य के कर कमलों द्वारा 'हिंदू धर्म की जय" गगनभेदी नारों के साथ की गई। इस समारोह में पूणे के श्री राजभोग द्वारा शंकराचार्यजी की पाद्यपूजा की गई। दूसरे दिन दि. 23 को अन्नसंतर्पण के कार्यक्रम में 'सावरकरजी का पाखंडी सहभोजन नहीं होना चाहिए" का आग्रह अनेक सनातनियों के साथ ही श्री मसूरकर महाराज, संत पाचलेगांवकर महाराज और स्वयं डॉ. कूर्तकोटी ने भी किया। सहभोजन, जातिउच्छेदन इस प्रकार के आंदोलन आततायी और पांखडी हैं। सावरकरजी के इन आंदोलनो को हमारी बिल्कूल भी सहमति नहीं है, ऐसा वे जाहिर रुप से कहने लगे।

परंतु, इस अन्नसंतर्पण का जात्युच्छेदक सहभोजन कार्यक्रम सावरकरजी द्वारा स्थगित किया जाना संभव ही नहीं था। इस समारोह में दूर-दूर से आए हुए लोगों को रत्नागिरी में की गई सामाजिक क्रांति का प्रदर्शन दिखाने का अवसर गंवाना सावरकरजी जैसे आग्रही प्रचारक को मान्य होनेवाला नहीं था। उन्होंने कीर सेठजी के पास न्याय्य मांग की ''अन्न संतर्पण के भोजन की इच्छा रखनेवालों की स्वतंत्र पंगत रखने की व्यवस्था करें, जो उस पंगत में बैठना चाहें बैंठे। सनातनियों की जातिगत पंगत का हम सहभोजक विरोध नहीं करेंगे। वे भी हमारी पंगत का विरोध ना करें। उनकी प्रामाणिकता को हम मान्य करते हैं। वे हमारी प्रामाणिकता को मान्य करें।"" सावरकरजी के जातिभेदोच्छेदक सहभोजन की परंपरा आगे चलकर हमारे इंदौर में भी चटनी-रोटी सहभोजन के रुप में पहुंची।

22 फरवरी को ही मंदिर के सभामंडप में दोपहर को मुंबई के अस्पृश्यता निवारक परिषद का छठा अधिवेशन हुआ। अध्यक्ष के रुप में सावरकरजी को चुना गया। सुभेदार घाटगे (पुणे) ने तो 'हमारे सच्चे शंकराचार्य" की उपाधि सावरकरजी को प्रदान की। स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा अधिक कर्मठ रुढ़ीग्रस्त होती हैं। इस कारण जात्युच्छेदन के आंदोलन ने स्त्रियों में जड पकडी तो वह अधिक शाश्वत स्वरुप का होने का संभावना थी। इसके लिए उनमें भी खुल्लमखुल्ला रोटीबंदी तोडने की प्रवृत्ति शुरु करना आवश्यक था। परंतु, यह काम सरल नहीं था। इसके लिए बहुत मेहनत करना पडी। वर्ष-दो वर्ष के प्रयत्नों के बाद तीस-पैतीस सुविद्य स्त्रियां और बीस-पच्चीस अस्पृश्य स्त्रियों का पहला सहभोजन 21 सितंबर को हुआ। इसी मंदिर में सावरकरजी अस्पृश्यों को यज्ञोपवित भी बांटते थे।

1933 में शिवरात्री पर रत्नागिरी में जन्मजात अस्पृश्यता का मृत्युदिवस मनाना रत्नागिरी की हिंदूसभा ने तय किया। उस 'दिन" के लिए पूणे के डिप्रेस्ड क्लास मिशन के कर्मवीर शिंदे और दलित वर्ग के नेता पा. ना. राजभोग आए थे। समारोह के अध्यक्षीय भाषण में कर्मवीर शिंदे, जिन्होंने अस्पृश्यता निवारण के कार्य में अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया था, ने कहा ''रत्नागिरी के सामाजिक परिवर्तनों को मैंने सूक्ष्मता से देखा है। इस पर से मैं निःशंक रुप से कह सकता हूं कि, यहां घटित हो रही सामाजिक क्रांति अभूतपूर्व है, सामाजिक सुधार का कार्य मैंने जीवन भर किया है। वह इतना कठिन और क्लिष्ट है कि, मैं भी बीच-बीच में निरुत्साहित हो जाता हूं। परंतु, यह क्लिष्ट काम मात्र सात वर्षों में रत्नागिरी जैसे सनातनी नगर में सावरकरजी ने कर दिखाया। यह रत्नागिरी केवल अस्पृश्यता का उच्चाटन कर ही रुकी नहीं अपितु जन्मजात जातिभेद के उच्चाटन करने के लिए कटिबद्ध हुई। आप लोगों को अस्पृश्यों के साथ सहभोजन, सहपूजन आदि सारे सामाजिक व्यवहार प्रकटरुप से करते हुए मैंने देखा है। इससे मैं इतनी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूं कि, यह दिन देखने के लिए मैं जीवित रहा बडा अच्छा रहा।   

वीर सावरकर की यह क्रांति आगे खंडित हो गई। परिणामस्वरुप 1927 में महाड में डॉ. आंबेडकर द्वारा की गई घोषणा 1956 के दशहरे पर अमल में लाई गई। परंतु, उसके पूर्व ''1938 में पूना ओ.टी.सी में एक दिन डॉ. आंबेडकर पधारे। उन्होंने डॉक्टरजी से पूछा, 'इन स्वयंसेवकों में कोई महार जाति के हैं क्या?" डाक्टरजी ने कहा, 'होंगे लेकिन हम उनकी जाति-वार याददाश्त नहीं रखते, इच्छा हो तो कमरे में चलकर जानकारी ले सकते हैं।" वे बोले, 'हॉं, मैं जानकारी लेना चाहता हूँ।" इस पर दोनो कमरे में गए और स्वयंसेवकों से पूछा, 'यहां कोई महार जाति के कोई हैं क्या?" कुल करीब 200 स्वयंसेवकों में से 8 या 9 स्वयंसेवक महार जाति के निकले। उनसे आंबेडकरजी ने पूछा, 'क्या आप अन्य स्वयंसेवकों के साथ ही खाना खाते हैं?" उत्तर मिला, 'जी हॉं," और सबने मिलकर बतलाया कि वहॉं वे कोई भेदभाव महसूस नहीं करते।"

आंबेडकर आश्चर्य-चकित हो गए और बोले, 'मैंने ऐसा दृश्य अपने जीवन भर कहीं नहीं देखा। परंतु डॉक्टर! आपके इस मार्ग से पूरी महार जाति का उद्धार करने में सैंकडों साल लग जाएंगे। मुझे उतना 'धैर्य" नहीं है। इनका उद्धार तुरंत हो, ऐसी मेरी इच्छा है।" डाक्टरजी हॅंसकर बोले, 'आपकी इच्छा ठीक है, पर मैं कहूँगा, 'हेस्ट मेक्स वेस्ट" और इतना कहकर डॉक्टरजी आंबेडकरजी को अपने साथ अपने निवास-स्थान पर ले चले गए।""(राष्ट्रधर्म मार्च 1989पृ.102 युगान्तर विशेषांक) 24 मई 1956 बुद्धजयंती पर नरे पार्क में डॉ. आंबेडकर ने निर्वाण की घोषणा की कि 14 अक्टूबर 1956 विजयादशमी को अनुयायियों सहित मैं बौद्धधर्म ग्रहण करुंगा। डॉ. आंबेडकर को इस विचार से परावृत्त करनेवाली एक भी हिंदू शक्ति नहीं थी ऐसा ही कहना पडेगा।

''डॉक्टर साहब के धर्मांतर करने के निश्चय का जब श्री गुरुजी को पता चला तब उन्होंने अविलम्ब ठेंगडीजी को डॉक्टर साहब के पास चर्चा करने हेतु भेज दिया। 'डॉक्टर साहब, सुना है कि आप हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले हैं?" 'हॉं,मैंने पक्का निर्णय किया है।" 'परंतु आप जो विचार बताते हैं वही सब हममें से कुछ युवक प्रत्यक्ष आचरण में अनेक वर्षों से ला रहे हैं।" 'आप युवक याने आर.एस.एस. ही है?"  'जी हॉं, हममें कुछ सवर्ण भी हैं, कुछ दलित वर्ग के भी हैं। जो सवर्ण हममें हैं वे ऐसा विचार करते हैं कि भूतकाल में हमसे जो कुछ पाप हुआ सो हो गया है उसका प्रायश्चित करने को हम तैयार हैं। हमको सब हिंदू मात्र का संगठन करना है।" 'बहुत ही अच्छा है परंतु इस पर मैंने कुछ सोचा ही नहीं ऐसी तुम्हारी धारण है क्या?" 'आपने इस पर सोचा नहीं होगा यह कैसे हो सकता है डॉक्टर साहब!" ठेंगडीजी ने कहा।

'तो फिर मेरे प्रश्न का उत्तर दो।" 'पूछिए आपका प्रश्न डॉक्टर साहब!" 'तुम्हारे आर.एस.एस. का कार्य कब प्रारंभ हुआ।" 'सन 1925 में।" 'याने कार्य प्रारंभ हुए कितने वर्ष हो गए?" 'साधारणतः 27-28 वर्ष।" 'देशभर में आर.एस.एस. वालों की कुल  कितनी संख्या है?" 'मुझे तो इसकी कल्पना नहीं है।" 'अच्छा! तो मेरे अनुमान से देशभर में 26-27 लाख स्वयंसेवक होंगे।" 'हो सकते हैं।" 'तो तुम ही बताओ कि 26-27 लाख सवर्ण और दलित लोगों को आपकी संस्था में लाने में अगर आपको 27-28 वर्ष लगे हैं तो पूरे दलित वर्ग को संघ में लाने के लिए कितने वर्ष लगेंगे?" 'परंतु... .. डॉक्टर साहब... 'बीच में मत बोलो। तुम क्या कहने वाले हो वह सब मुझे पता है। तुम जो geometric progression बतानेवाले हो उसकी भी कुछ मर्यादा है। बकरी कितनी भी बडी हो जाए तो भी बैल नहीं बन सकती। मुझे अपने ही जीवन में इस समस्या का हल करना है। इसको निश्चित दिशा देनी है।""  ठेंगडी मौन रह गए।" (स्वदेश दीपावली विशेषांक 1973 पृ.25) और प्रत्यक्ष नागपूर में ही दशहरे के विजयदिवस पर तथाकथित अस्पृश्यों का बडा भाग हिंदूधर्म समाज से अलग हो गया।

Sunday, May 27, 2012

धर्म मजहब रुपी फूल

वीर सावरकरजी ने हिंदूधर्म को 'धर्मसमुच्चय" कहा है। सावरकरजी के अनुसार 'हिंदूधर्म" यह नाम किसी एक विशिष्ट धर्म का अथवा पंथ का विशेष और अनन्य नाम न होकर जिन अनेक धर्मों की और पंथों की यह भारतभूमि ही पितृभूमि और पुण्यभूमि है उन सभी का समावेश करनेवाले धर्मसंघ का हिंदूधर्म यह सामुदायिक अभिधान है।

वीर सावरकरजी की हिंदू की व्याख्या के अनुसार 'आसिंधु-सिंधु-पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः।। जो अतिव्याप्ति और अव्याप्ति इन दोनो ही प्रकार के दोषों से मुक्त है। इस व्याख्या के अनुसार वैदिक धर्मानुयायी, सिक्ख और भारतीय बौद्ध, जैन, लिंगायत, नास्तिक, ब्राह्मो समाजी, गिरिजन, वनवासी आदि का समावेश 'हिंदू" में होता है। चीनी बौद्धों का समावेश हिंदुओं में नहीं होता। क्योंकि, हिंदुस्थान उनकी पुण्यभूमि होने पर भी पितृभूमि नहीं। मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी इनका समावेश अर्थात्‌ ही हिंदुओं में हो नहीं सकता। उनके इस धर्म समुच्चय का प्रतीक है धार्मिक एवं सामाजिक कार्यों में बहुतायत से उपयोग में लाया जानेवाला 'गेंदा" फूल। गेंदे का पुष्पकाल भाद्रपद महीने में आता है और दशहरा-दीवाली मध्य सारे धार्मिक विधि गेंदामय हो जाते हैं तो भी यह वर्षभर भारत में सर्वत्र पाया जाता है।

वनस्पति शास्त्रानुसार गेंदे का फूल एस्टेरेसी वनस्पति का पुष्प होकर इसकी विशेषता यह है कि, इसे आप तोडकर इसकी पंखुडियों को भी भगवान पर चढ़ा सकते हैं जबकि ऐसा धतूरा, मोगरा, कनेर के साथ नहीं कर सकते। इसका कारण यह है कि हम सामान्यजनों को भले ही यह एक फूल लगता हो लेकिन यह एक फूल न होकर उसमें अनेक फूल एक समूह में जुडे हुए होते हैं। इन फूलों के गुच्छे को इंफ्लोरेसेंस यानी पुष्पक्रम कहा जाता है। यह पुष्पक्रम इस प्रकार से जुडे हुए होते हैं कि, हमारी दृष्टि को वह एक फूल ही लगते हैं।

यह हिंदूधर्म समुच्चय रुपी भगवा-केसरिया-पीले रंग का गेंदा फूल प्राकृतिक रुप से ही हाथों में हाथ डालकर एक ही माता के उदर से प्रसव हुए यानी सहोदर जैसा पुष्पक्रम भले ही हो परंतु, व्यवहारिक जीवन में लालकटसरैया (अबोली) सा कोमल न होकर एक टिकने के भाव या गुणवाला, सहज ही न मुरझानेवाला यानी सरलता से न कुचले जा सकनेवाला फूल है। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से हमारा हिंदूधर्म जो अनेकानेक परचक्रों को झेलने के बाद भी समाप्त नहीं हुआ, टिका हुआ है। अनादि है, अनंत है, सनातन है। इसी प्रकार से गेंदे का फूल भी सबसे पहले कहां खिला? कब तक खिलते रहेगा ! इस प्रकार के प्रश्न निरर्थक होकर वह भी अनादि है, अनंत है।

गेंदा फूल जो फूलों का समुच्चय है के सबसे बाहर हरी पत्तीनुमा रचना से बनी कपनुमा रचना होती है, जो इन्वाल्यूकर कहलाती है। यह रचना इन फूलों को एकजुट रखने का कार्य करती है। ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार से कि, हिंदुत्व जो हिंदूधर्म समुच्चय के धर्मों को एक रचना में बनाए रखता है, जोडकर रखता है और जिस प्रकार से इन्वाल्यूकर को यदि तोड दिया जाए या इन फूलों को इन्वाल्यूकर से अलग कर दिया जाए तो यह पुष्प समूह धीरे-धीरे बिखर जाएगा उसी प्रकार से यदि इस हिंदुत्व को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाए या हमने उसे छोड दिया, हमें उससे अलग कर दिया गया तो, ये सारे भारतोद्‌भव धर्म जो इस धर्मसमुच्चय का भाग हैं बिखरकर रह जाएंगे और परिणाम !......

गेंदा फूल के बाहरी घेरे में किरण पुष्पक होते हैं, जो सूर्य की किरणों का आभास देते हैं, दिखावटी होते हैं। इसके न होने से गेंदा अपनी सारी सुंदरता खो देता है। उपर्युक्त की तुलना हिंदूधर्म से इस प्रकार की जा सकती है कि, जो किरण पुष्पक हैं वे हमारे धर्मसमुच्चय के धर्म विचारों के प्रतीक हैं जो पूरे विश्व को सूर्य के समान आलोकित कर रहे हैं, प्रेरणा दे रहे हैं, मार्गदर्शन दे रहे हैं। इसी सूर्य प्रकाश को फैलाने के लिए प्राचीनकाल में हमारे पूर्वज ऋषि, मुनि, धर्मप्रचारक बाहर निकले और अपने ज्ञान से पूरे विश्व को आलोकित कर दिया।
गेंदे के केंद्र में डिस्क पुष्पक लगे होते हैं। इनमें पंखुडियां और अंखुडियां होती हैं और नर-मादा जननांग भी। ये पूर्ण पुष्प होते हैं और वंश को आगे बढ़ाते हैं। इस गेंदे के समान हमारे धर्म समुच्चय के केंद्र में है हमारी परधर्म सहिष्णुता, सभी धर्मों की धार्मिक स्वतंत्रता की मान्यता। जिसके अनुसार सभी को अपने-अपने धर्मों के पालन की स्वतंत्रता जिसके केंद्र में है हमारी यह मान्यता -

1). 'आकाशात्‌ पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्‌। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति।। अर्थात्‌ जिस प्रकार से आकाश से गिरा (वर्षा का) पानी समुद्र की ओर जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवता को किया हुआ नमस्कार उसी केशव (यानी परमेश्वर) को जाता है।" सारे धर्म-पंथ ईश्वर की ओर जाते हैं। 'ममैव वर्त्म अनुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ, सर्वशः। (श्रीमद्‌भगवद्‌गीता, अ.4-श्लोक 11) 2). 'न देवो विद्यते काष्ठे, न पाषाणे, न मृण्मये। भावे हि विद्यते देवः, तस्माद्‌ भावो हि कारणम्‌।।' अर्थात्‌ ईश्वर लकडी में, पत्थर में अथवा मिट्टी (यानी उससे बनाई हुई मूर्ति) में नहीं होता। ईश्वर का वास तो भक्तिभाव में ही होता है। 3). श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैव अवधार्यताम्‌। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचेरत्‌। अर्थात्‌ धर्म का सार सुनो और सुनकर ध्यान में रखो - 'अपने लिए जो प्रतिकूल है यानी दुखदायी है वह आचरण अन्य लोगों के साथ भी न करें, लोगों द्वारा अपने साथ जो नहीं किया जाना चाहिए ऐसा अपने को लगता है वैसा अपन भी दूसरों के साथ न करें। जैसे अपन वैसे अन्य, यह आत्मौपम्य दृष्टि, यही धर्म का सार है।

इसी कारण से हमारे यहां एक ही परिवार में शैवोंके शिव तो, वैष्णवों के भगवान विष्णु के अन्य अवतारों की एक साथ पूजा-आराधना की जाती है। एक ही परिवार के सदस्य विभिन्न धर्मों का पालन स्वतंत्रतापूर्वक कर सकते हैं। कहीं किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं की जाती। हिंदूधर्म में हुए विभिन्न धर्मप्रवर्तकों, ऋषियों, मुनियों, अवतारों, धर्मवीरों, हुतात्माओं ने इन्हीं उदात्त परंपराओं को आगे बढ़ाया, क्षरण से रोका, रक्षा की, धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र से संबंधित विभिन्न विचारों को आगे बढ़ाया, दृढ़ता प्रदान की, उनमें सुधारकर बढ़ौत्री की, गरिमा प्रदान की।
 
इसी कारण से हमारे यहां अपने देश से त्रस्त और पीडित होने के कारण पलायन कर आए यहूदी और पारसी धर्मों को भी हमारे यहां आसरा मिला, फलने-फूलने का अवसर प्राप्त हुआ। यही विशेषता गेंदा फूल की भी है। गेंदा फूल पर जब कोई बाहरी सदस्य जैसे तितली या मधुमक्खी एक बार आती है तो मकरंद के रुप में थोडा-थोडा प्यार सभी फूलों से पाती है और खूब फलने-फुलने का आशीर्वाद भी। गेंदे के फूल की पंखुडियां छोटी-बडी, नौकदार, फैली हुई होती हैं उसी प्रकार से छोटे-बडे, तीखे चुभनेवाले आदि सभी प्रकार के धर्मविचारों, उनके प्रवर्तकों को हमारे यहां स्थान प्राप्त है और जिस प्रकार से गेंदे का पौधा सभी फूलधारी पौधों में सबसे बडा और विकसित कुल है उसी प्रकार से सभी धर्मों में हिंदूधर्म सबसे प्राचीन, सनातन, उदात्त और विकसित है।

इसी कडी में एक फल संतरा भी आता है। जिसका ऊपरी हल्का कडा, लचीला आकर्षक चमकीला छिलका हिंदुत्त्व सा है जिसकी ओर लोग उसी प्रकार से आकर्षित हो जाते हैं जिस प्रकार से कि जब वीर सावरकरजी का हिंदुत्व दर्शन सबके सामने आया था तब उसकी चमक से सभीकी आंखे चौंधिया गई थी, स्वामी श्रद्धानंदजी, महामना मदनमोहन मालवीयजी, संघसंस्थापक डॉ. हेडगेवारजी जैसे लोग आकर्षित हो गए थे, प्रभावित हो गए थे। संतरे के अंदर का रसीला गूदा जो फांकों के रुप में होता है वह फांके हिंदूधर्म समुच्चय के अंतर्गत आनेवाले विभिन्न धर्मों के समान हैं और उन फांकों में भरा स्वादिष्ट रस हिंदूधर्म समुच्चय के सारगर्भित धर्म विचार हैं। रसीले गूदे के बीच उपस्थित कडे बीज हिंदूधर्म समुच्चय के विभिन्न धर्मों के धर्मप्रवर्तक, विचारक, समाज सुधारक महापुरुष हैं जिन्होंने उस धर्म को ऊंचाइया कष्ट सहकर, कठिनाइयों का सामना करने के पश्चात प्रदान की, समाज हित में उनके विचारों का अनथक प्रचार-प्रसार किया।

संतरे की फांकों के ऊपर का झिना आवरण रुपी छिलका हर भारतोद्‌भव धर्म को दूसरे भारतोद्‌भव धर्म से अलग करने का झिना सा आवरण मात्र है और मुख्य आवरण तथा इस झिने आवरण के बीच के, ऊपर के रेशे उन सभी विभिन्न धर्म रुपी फांकों को आपस में भी और मुख्य आवरण हिंदुत्व से जोडे रखने में सहायक सिद्ध होनेवाले सामान्य वार-त्योहार, रीति - रिवाज, परंपराएं हैं। जो सबकी समान मान्यताओं को एकता को दर्शाने के साथ ही यह भी दर्शाते हैं कि, वे एक ही बीज से उत्पन्न हुए विशाल हिंदुत्त्व रुपी वृक्ष की शाखाएं हैं।
अब हम उस हिंदुत्व पर आते हैं जिसका बखान हम इतनी देर से कर रहे हैं जो सभी भारतोद्‌भव धर्मों को जोडे हुए है। हिंदूराष्ट्र के उद्‌गाता वीर सावरकरजी जिन्होंने हिंदुत्त्व का दर्शन दिया है के अनुसार - हिंदू शब्द से अंग्रेजी का 'हिंदुइजम" (हिंदूधर्म) शब्द बना है। इसका अर्थ हिंदू लोग जिन धर्ममतों का या मार्गों का अनुसरण करते हैं वे धर्ममत या मार्ग। जबकि हिंदुत्व हिंदूधर्म की अपेक्षा  अधिक संग्राहक शब्द है। हिंदूधर्म इस शब्द के अनुसार हिंदुओं के केवल धार्मिक अंगों का उसमें समावेश न होकर उसमें हिंदुओं के सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक और राजनैतिक अंगों का भी समावेश होता है। यहीं पर यह बता देना उचित होगा कि, मुहम्मद साहेब के जन्म के पूर्व ही नहीं बल्कि अरब एक 'लोग" के रुप में जाने के पूर्व से ही यह प्राचीन राष्ट्र अपनों की ओर से और अन्यों की ओर से भी सिंधू या हिंदू इस स्वाभिमानी नाम से जाना जाता था, पहचाना जाता था। अरबों ने सिंधू नदी की खोज की यह कहना जितना सत्य है उतना ही अरबों द्वारा इस शब्द की खोज की गई यह कहना है।

'हिंदू" शब्द मूलतः देशवाचक, राष्ट्रवाचक है। इसका मुख्य अधिष्ठान 'आसिंधुसिंधु" इस भारत भूमि में अत्यंत प्राचीनकाल से जिनके पूर्वज परंपरा से निवास करते आए हैं, जिस राष्ट्र में प्रचलित रही सांघिक संस्कृति, घटित हुआ इतिहास, बोली हुई भाषाएं, अनुसरण में लाए गए धर्म; जिनकी संस्कृति, इतिहास, भाषा, धर्म हैं वे सारे हिंदू हैं। उस हिंदूराष्ट्र के घटक हैं। वैदिक काल से कम से कम पांच हजार वर्ष तो भी अपने पूर्वज अपने लोगों का धार्मिक, वांशिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक दृष्टि से एकात्म ऐसा गुट बनाते चले आ रहे थे। उस क्रिया का स्वाभाविक विकास होते-होते जो फल आया वह यानी ही वैदिक काल से ही उस सिंधू के ही यानी आज हिंदुस्थान भर में फैले हुए और हिंदुस्थान को ही अपनी एकमेव पितृभू और पुण्यभू मानते चले आ रहे हैं ऐसा हिंदूराष्ट्र।

सावरकरजी के इस हिंदूराष्ट्र का और हिंदूधर्म का तनिक भी संबंध नहीं। उनके बुद्धिवादी दृष्टिकोण के अनुसार वे 'हिंदू लोगों के न्याय्य अधिकार सुरक्षित रखनेवाला राष्ट्र इस प्रकार का व्यापक अर्थ लेते हैं।" उनके हिंदूराष्ट्र का दूसरा अर्थ बहुसंख्यक लोगों का राष्ट्र। इस अर्थ से 'बहुसंख्यकत्व ही राष्ट्रीयत्व है" इस प्रकार का प्रजातांत्रिक सिद्धांत वे प्रस्तुत करते हैं। हिंदू बहुसंख्यक होने के कारण हिंदुत्व ही बहुसंख्यकत्व है, ऐसा वे कहते हैं। इसी अर्थ से 'हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है" इस प्रकार का सिद्धांत वे प्रस्तुत करते हैं।  इस सिद्धांत का अर्थ अहिंदुओं को राष्ट्रीयत्व नहीं होता ऐसा नहीं। अहिंदू अल्पसंख्य है इतनी ही वस्तुस्थिति दिखला देना इस सिद्धांत का काम है। बहुसंख्यकों को अल्पसंख्य बनाना राष्ट्रीयत्व के विरोध में है, यह प्रखरतापूर्वक दिखला देने के लिए इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया है। पुनश्च इस हिंदुत्व का हिंदूधर्म से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं।

दूसरी ओर मध्यपूर्व में जो मजहब खिले, विकसित हुए वे वनस्पति शास्त्र के घुंघरु मोतिया (जास्मिन सॅमबॅक) फूल जैसे थे। मोगरे का फूल ओलेसिया कुल का माना जाता है। घुंघरु मोतिया फूल की रचना एक में एक रखे हुए कटोरे जैसी होती है। गड्डी से एक कटोरा निकाला कि जिस प्रकार से स्वतंत्र कटोरा होता है उसी प्रकार से मूल यहूदी (ज्यू) धर्म से निकला ईसाई रिलीजन पृथक्‌ यानी स्वतंत्र होता है। इसी प्रकार से उसी गड्डी से निकला इस्लाम भी उसी प्रकार से न केवल पृथक्‌ और स्वतंत्र ही नहीं होता   प्रत्युत पूर्व के धर्म से मानो घोर शत्रुता का नाता रखता है। इसलिए कहना पड रहा है कि, अंतिम पैगंबर के इस्लाम मजहब की यह सर्जना आज भर उसी मूल मोगरा (जास्मिन) पुष्प से सारे संबंध तोडकर पूरी तरह कुल बदलकर कनेर का गुणधर्म ले बैठी है। संस्कृत भाषा का कर्णिकार, अंग्रेजी का ओलिएंडर और वनस्पति शास्त्रानुसार थेविशिया-नेरीफोलिया के रुप में पहचानी जानेवाली यह वनस्पति यानी केवल कनेर पुष्प ही नहीं अपितु उसके सारे अंग विषैले हैं। यहां तक कि, कहते हैं उसके आस-पास सांप तक नहीं फटकते। वनस्पति शास्त्रानुसार यह विषैले पदार्थ ग्लाइकोसाइड के रुप में होते हैं। कुल मिलाकर पौधे के अंग-अंग से निकलनेवाला दूध जैसा रस (मिल्की लेटेक्स), पौधे की जड, बीज सब कुछ विषैला, इतना ही नहीं बल्कि इसके फूल को अधिक समय तक सूंघना भी घातक तो पौधे को जलाने पर निकलनेवाला धुंआ तक स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालने वाला माना जाता है। तो फिर कालाय तस्मै नमः कहकर शांत बैठे कि .....

Saturday, February 25, 2012

नवदृष्टि के जनक - बुद्धिवादी वीर सावरकर

वीर सावरकरजी ज्ञानमार्गी होने के साथ ही हर एक विषय का स्वतंत्र एवं मूलगामी विचार करनेवाले होने के कारण उनकी विचार सृष्टि बहुरंगी है। जिसके कारण जनसाधारण मंत्रमुग्ध सा हो जाता है। बुद्धि प्रामाण्यता एवं इहवादी दृष्टिकोण होने के कारण कई बार वे चार्वाकवादी भी लगते हैं। क्योंकि, इहलोक और केवल इहलोक को माननेवाला व्यक्ति और समाज के हित देखने के लिए दंडनीति  को माननेवाले चार्वाक का विचार करें और सावरकरजी के बुद्धिवादी सामाजिक मतों को देखें तो वे चार्वाक कुल के ही लगते हैं।

सावरकरजी के सामाजिक विचारों के महत्वपूर्ण सूत्र हैं बुद्धिप्रामाण्य और प्रत्यक्षनिष्ठा और इसी विज्ञाननिष्ठ भूमिका से उन्होंने हिंदूधर्म की सामाजिक रुढ़ियों की समीक्षा की थी। उदा. 1935 में डॉ. आंबेडकरके संभावित धर्मांतरण के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था ''चाहें तो डॉ. आंबेडकर एक बुद्धिवादी संघ निकालें।"" इस पत्रक में सावरकरजी ने इस बुद्धि संघ के आधार तत्त्वों को स्पष्ट करते हुए कहा था, 'आज की परिस्थितियों में जनहित को प्रत्यक्ष साधने के नियम ही जिसका आधार, तर्कनिष्ठ और प्रत्यक्षागत तत्त्वज्ञान ही जिसके उपनिषद और विज्ञान ही जिसकी स्मृति ऐसा बुद्धिवादी संघ स्थापित करें और इसके अनुयायियों को अंधश्रद्धा के और बेकार की बातों के पिंजरे से छुडवाकर एक झटके से नवीनतम ऐसे बुद्धि स्वतंत्रता के उच्चतम और आरोग्यप्रद वातावरण में ले जाकर छोडें यही इष्ट है।"" (समग्र सावरकर खंड 3, पृ.571)

इसी पत्रक के प्रारंभ में धर्म छोडने की भूमिका बुद्धिवादी होनी चाहिए यह ध्वनित करते हुए सावरकरजी ने कहा - 'जिसमें कुछ पुराने और आज की परिस्थितियों में निरर्थक ही नहीं तो अनर्थक भी हो चूके आचार और संकेत जो होते ही हैं, उन्हें जनहित के लिए सुधारना जिन्हें अपना कर्तव्य लगता है और पारलौकिक समझी जानेवाली बातों पर जो प्रत्यक्षनिष्ठ तर्क के पार जाकर विश्वास करने के इच्छुक नहीं, ऐसे पॉजिटिव्ह अथवा रॅशनिलिस्ट आदि बुद्धिवादियों ने एकाध धर्म छोडा तो उसका कारण सहज ध्यान में आता है। इस अर्थ से यदि डॉ. आंबेडकर हिंदूइज्म को छोड रहे हों तो इसमें कोई बडी बात नहीं।" इसका मथितार्थ यह है कि बुद्धिवादी दृष्टिकोण से इसमें सावरकर को कुछ भी आक्षेपार्ह नहीं लगता।

धर्मविज्ञान की दृष्टि से कुरान और बाइबल का अध्ययन कर सावरकरजी ने डॉ. आंबेडकरजी को यह कहलवाया था कि, 'कुछ भी हो तो भी बुद्धिवादी दृष्टिकोण से विचारा जाए तो समग्र रुप से समस्त धर्मों में यदि कोई ग्राह्यतम धर्म होगा तो वह हिंदूधर्म ही है।" (जात्युच्छेदक निबंध, पृ. 222) परंतु, यह निष्कर्ष निकालते समय सावरकरजी की दृष्टि चिकित्सक और बुद्धिनिष्ठ ही थी। सावरकरजी ने स्पष्ट कहा था कि, समाज संस्था की पुनर्रचना किसी भी धर्मग्रंथ के आधार पर न हो।

यह बुद्धिवादी दृष्टिकोण उनमें बचपन से ही था। जिज्ञासा का उद्‌गम उनमें बचपन में ही किस प्रकार से जागृत हो गया था इसका वर्णन सावरकरजी ने स्वयं के आत्मचरित्र में किया है। अपने ज्ञानमार्ग का उपयोग राष्ट्रोत्थान के लिए करने का उनका निश्चय युवावस्था से ही था। सावरकरजी सिद्धांतों के पक्के और निग्रही सुधारक थे, वाचाल नहीं। उनका आचार सूत्र था 'वरं जनहितं ध्येयम्‌"। 'सुधार यानी अल्पमत और रुढ़ी मतलब बहुमत।" इस कारण अपने अल्पमत या एकाकी पडने की चिंता उन्होंने कभी नहीं की। परंतु, वास्तववादी होने के कारण भले ही वे स्वयं भगवान सत्यनारायण की पूजा नहीं करते थे, किंतु यदि किसीने की तो वे उसका उपहास भी नहीं उडाते थे प्रत्युत झुणका-भाकर (बेसन और ज्वार की रोटी), सत्यनारायण की पूजा जैसी सामाजिक सुधार घटित करवाने में उपयुक्त ठहरनेवाले आंदोलनों का वे समर्थन करते थे।

उनके सुधारवादी मानस के हठ का पता उनकी पत्नी के देहावसान के पश्चात उनका पिंडदान आदि अनावश्यक विधि न करने का निश्चय आप्तजनों के आग्रह, अनुयायियों के सत्याग्रह, प्रदर्शन करने के बाद भी उन्होंने नहीं बदला। इतने हठी होने के बावजूद सुधारवाद के लिए रत्नागिरी में अस्पृश्यता निवारण और शुद्धिकरण आंदोलन के लिए कार्यकर्ताओं का संगठन अपने वास्तववादी होेने के कारण ही खडा कर दिखाया।

यह सुधारवाद भी उनमें प्रारंभ से ही था। जिसका परिचय 1902 में रचित रचना 'बालविधवा दुःस्थिति कथन" से पता चलता है। इस कविता में हिंदू समाज की विधवाओं का दुःख वर्णित है इसके लिए उन्हें पुरस्कार भी मिला था। भावना प्रधान कविताओं की रचना उन्होंने अंदमान के कारावास में की थी। जो मराठी साहित्य की अनमोल धरोहर है। समाज सुधार के विचार-भावनाएं उनमें प्रारंभ से ही थी। युवावस्था में आगरकरजी और मिल्स स्पेंसर की उपयुक्ततावादी नीति की पकड उनके मानस पर हो गई थी। उपयुक्ततावाद पर उन्होंने अपने आत्मचरित्र में कहा है -

'जिस नीतिशास्त्र के सूत्र और आचार पर अपने क्रांतिकारी आंदोलन को खडा करना चाहिए और समर्थन करना चाहिए वह यही  (यूटिलिटी) नीतिशास्त्र, यही क्रांति की मनुस्मृति ऐसा मैं कहता था, ऐसा मैं मानता था और महाभारत के कृष्ण के अनेक प्रसंगों के भाषणों पर से मैं यह सिद्ध करता था कि, भगवान कृष्ण ही उपयुक्ततावाद के प्रणेता ही नहीं, आचार्य भी थे। उन्होंने वह आचरण में लाकर दिखलाया। उनके सभी आचरणों का समर्थन उन्होंने इसी तत्त्व पर किया था।" (माझ्या आठवणी पृ. 10) भगवान श्रीकृष्ण सावरकरजी के आराध्य थे।

परंतु, समाज संस्था की पुनर्रचना किसी भी धर्मग्रंथ के आधार पर नहीं होना चाहिए यह सावरकरजी ने स्पष्ट रुप से कहा था। समाज की रचना करते समय नीति का, सामाजिक उपयुक्तता की दृष्टि से ही विचार किया जाना चाहिए। सावरकरजी ने अपने सामाजिक विचारों में मुख्यतः हिंदुओं के सामाजिक दोषों की ही चिकित्सा और चर्चा की होने पर भी भारतीय राष्ट्र के एक घटक के रुप में मुसलमानों को भी अपना सामाजिक परीक्षण और अपने धार्मिक उन्माद, रुढ़ियों का उच्छेद करें, ऐसा उन्हें भी कहा है। मुसलमान अगर विज्ञाननिष्ठ और प्रगत हो गए तो उसमें हिंदुओं का तो कल्याण है ही उससे अधिक उनका स्वयं का भी बडा कल्याण है।

उनके सामाजिक तत्त्वज्ञान का आधार ही विज्ञाननिष्ठा था और नए युग का वह दीपस्तंभ है, नए युग की प्रगति का दीपस्तंभ है यह वे साधार उदाहरणों सहित कहा करते थे। वे हिंदुओं का मानसिक आधुनिकरण करना चाहते थे क्योंकि उनको विश्वास था कि विज्ञानवादी हिंदू समाज ही भारत को आधुनिक और समर्थ बनाएगा।

यंत्र से बेकारी बढ़ेगी इसका उत्तर देते हुए सावरकरजी ने कहा था यह अर्थरचना का दोष है। यहां भी विश्व में चल रही दौड में अपना राष्ट्र पीछे न रह जाए यही उद्देश्य है। सावरकरजी के दो ही ध्येय थे 1). हिंदुओं का उत्थान; 2). देश की स्वतंत्रता। उन्हें अपने ज्ञान, अपनी बुद्धिमतता, अपने बुद्धिप्रामाण्य, विज्ञाननिष्ठा को राष्ट्र के उत्थान के लिए ही उपयोग में लाना था। उनका युवावस्था से ही निश्चय था - 'तुजसाठी (तेरे लिए) मरण ते जनन, तुजविन (तेरे बिना) जनन ते मरण (मृत्यु)"

सावरकरजी ने जो यह नई दृष्टि दी थी उसकी राष्ट्र ने उपेक्षा की उसीका परिणाम आज राष्ट्र भोग रहा है। परंतु, अभी भी वह समय गया नहीं है आज भी अगर राष्ट्र ने उनकी इस नवदृष्टि का वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय वृत्ति से अध्ययन किया तो, राष्ट्रहित सधेगा मार्गदर्शन उन्होंने ग्रंथरुप में दे ही रखा है। अंत में सावरकरजी का यह विचार प्रस्तुत कर लेख समाप्त करता हूं कि, 'प्रत्येक पीढ़ी के प्रश्न अलग होते हैं भले ही वे स्वमत के आग्रही थे तो भी वे यह मानते थे कि, आज की पीढ़ी पुरानी पीढ़ी कंधे पर खडी होने के कारण उसे निश्चय ही दूर का अधिक दिखता है।"

Thursday, December 29, 2011

विज्ञाननिष्ठ सावरकर और धार्मिक कट्टरता

कणाद shirishsapre.com

अपने आपको हिंदुत्ववादी, हिंदूधर्मउद्धारक समझनेवाले, बतानेवाले कुछ लोगों द्वारा इस प्रकार का प्रचार किया जाता है कि देखिए सभी सरकारें, सभी राजनैतिक दल मुसलमानों के तुष्टीकरण में लगे हुए हैं, सभी उनकी जायज-नाजायज मांगों के आगे झुकते नजर आते हैं। परंतु, हिंदुओं की कोई नहीं सुनता, उनकी उपेक्षा हो रही है, आदि। फिर वे खुलासा करते हुए कहते हैं कि, सरकारें, राजनैतिक दल मुसलमानों के आगे इसलिए झुकते हैं क्योंकि, वे धार्मिक रुप से कट्टर हैं, एकजुट हैं। इसलिए हमें भी उन्हीं की तरह धार्मिक रुप से कट्टर होना चाहिए, आदि। इस प्रकार की बातें सुनकर हमें सहसा विज्ञाननिष्ठ सावरकरजी के उन लेखों की याद आ जाती हैं जो उन्होंने रत्नागिरी में नजरबंद रहते उनके द्वारा की जा रही समाजक्रांति के दौरान हिंदू समाज के प्रबोधन के लिए किर्लोस्कर आदि में लिखे थे। वे लेख उन्होंने अपने हिंदू राष्ट्र की दृष्टि पोथीनिष्ठ (धर्मग्रंथनिष्ठ) न रहते विज्ञाननिष्ठ हो, पुराण प्रवृत्ति, सनातन प्रवृत्ति छूटकर उनकी प्रवृत्ति अद्यतन हो इस दृष्टि से लिखे थे।

'हमें भी मुसलमानों की तरह ही कट्टर पोथीनिष्ठ होना चाहिए।"  इस प्रकार के विचारों पर उन्होंने जो एक दीर्घ लेख 'विज्ञान बल" शीर्षक से लिखा था आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि उस काल में था। उसके कुछ अंश इस प्रकार से हैं - ''उन मुसलमानों को देखिए, दाढ़ी तो दाढ़ी रखेंगे; बुरका कष्टदायक होने के बावजूद समाज की विशिष्ट पहचान के रुप में उस रुढ़ि का पालन करेंगे; मस्जिद के सामने वाद्य (बैंड) बजा रे बजा कि, भडक उठेंगे! कुरान ईश प्रेषित धर्मग्रंथ है इसलिए सब के सब उसका सम्मान रखेंगे; उसके नाम से सभी एक हो जाएंगे; सुअर का मांस नहीं तो नहीं खाएंगे! कुरान का प्रत्येक आचार कितना भी पुराना हो या कष्टदायक हो, उसका सामाजिक धार्मिक बंधन के रुप में पालन करेंगे! पांच बार तो पांच बार प्रत्येक व्यक्ति नमाज पढ़ेगा, रोजा तो रोजा सारा समाज रोजा रखेगा! आदि रुढ़ियां क्या तर्कसंगत हैं? अंधश्रद्धा नहीं? परंतु, फिर भी उसके कारण उस समाज में एकरसता, एकजुटता और दृढ़ता आई है।

''हम हिंदुओं को भी उसी प्रकार से जो हमारी प्राचीन रुढ़ियां और धार्मिक मान्यताएं हैं वे अंधश्रद्धा और अन्य दृष्टि से हास्यास्पद हों तो भी समाज में मुसलमानों के समान ही धार्मिक कट्टरता संचारित करने के लिए उनका पालन करना चाहिए!""

धर्मपरायणता अथवा पोथीनिष्ठता के कारण मुसलमानों की दुर्दशा ही हो रही है!

पोथीनिष्ठता के कारण ही मुस्लिम समाज एकजुट, प्रबल और प्रगत हो रहा है और इसलिए अपन उनसे भी अधिक पोथीनिष्ठ हुए तो अधिक प्रबल और प्रगत होंगे इस प्रकार की समज आजके अनेक निश्चछल हिंदुसंघटकों में विचर रही है वह मूलतः दोतर्फा गलत है। पोथीनिष्ठता के कारण मुसलमानों की कौनसी प्रगति हुई है? आज (भी) हिंदुस्थान में भी वे शिक्षा में पिछडे हुए हैं; अज्ञान, दरिद्रता और कूपमंडूकता में भी हिंदुओं की अपेक्षा वे अधिक ग्रसित हैं। साहित्य में हिंदू ही श्रेष्ठ हैं। अधिकांश बडी-बडी संस्थाएं हिंदुओं ने ही प्रारंभ की और चलाई हैं। सारे भारतीय मुद्रालय हिंदुओं के ही हाथों में हैं, बडे-बडे कवि, संशोधक, उद्‌भावक, प्रकल्पक, संपादक, विद्वान प्राध्यापक, सुधारक, वक्ता, प्रबंधक जो पिछले कुछ शतकों में प्रसिद्ध हुए हैं हिंदुस्थान में हुए हैं। उनमें से 95% तो भी हिंदू ही हैं। ऑक्सफोर्ड, केंब्रिज, पेरिस, बर्लिन आदि यूरोपीय विश्वविद्यालयों में भारतीय बुद्धिमत्ता की जो छाप पडी है वह मुख्यतः हिंदुओं द्वारा ही पडी है। रॅंगलर्स, आय. सी.एस., नोबल प्राइजमेन, वैज्ञानिक, संशोधक जो भारतीय यूरोप में झलके हैं वे भी बहुतकर हिंदू और हिंदू ही हैं। राजनीति में जो कुछ विद्रोह जूझ होती रही है वह पिछले सौ वर्षों में सारी की सारी हिंदुओं द्वारा ही। तिलक, लाजपतराय, गोखले, बेनर्जी, पाल, गांधीजी, मालवीय, अय्यर आदि झट से बतलाने जैसे और जो यहां बतलाए नहीं गए हैं, वे हिंदू ही थे। जर्मन महायुद्ध जैसे सैनिक शौर्य प्रकट करनेवाले जो कुछ अच्छे-बुरे अवसर मिले, उनमें सिक्ख, गुरखा आदि हिंदू सैनिक अपना क्षात्र तेज प्रकट करने से चूके नहीं हैं। वही स्थिति औद्योगिक क्षेत्र में है। बीमा, मिलें, बैंके, सहकारी क्षेत्र की संस्थाएं कारखाने इन जैसी जो कुछ बडी-बडी औद्योगिक संस्थाओं का प्रपंच जो बढ़ता हुआ दिख रहा है वह अधिकतकर हिंदुओं के कर्तृत्व, नेतृत्व का फल है।

जो बात वर्तमानकाल में, वही बात भूतकाल में भी थी। पोथीनिष्ठता के कारण, ईशभक्ति, धार्मिक उन्माद के कारण ही मुसलमान वीर और विजयी हुए ऐसा कई बार मुसलमान बारम्बार बोलकर दिखलाते हैं। हमारे हितशत्रु भी यही बतलाते हैं। परंतु, वह अर्धसत्य है। जो समाज उनसे अधिक असंगठित था और अंधश्रद्ध था उन पर मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता-उन्माद ने विजय पाई। परंतु जब उनसे अधिक ऐहिक दृष्टि से संगठित समाज से उनका पाला पडा तब मुसलमानों की पारलौकिक पोथीनिष्ठा उनके बिल्कूल भी काम ना आई। इसका निरुत्तर कर देनेवाला सबूत हिंदुओं तक का मर्यादित चाहिए हो तो महाराष्ट्र का इतिहास देखें। पोथीनिष्ठ औरंगजेब के क्या हाल मराठों ने किए।

विज्ञानबल के आगे धार्मिक कट्टरता का डंक और पोथीनिष्ठता का दंश किस प्रकार से ढ़िला पडा है उसे यूरोप में देखो। तीनसौ वर्षपूर्व यूरोप को भी पोथीनिष्ठता ने खोखला कर दिया था। उनकी पोथीनिष्ठता भी हिंदुओं की पोथीनिष्ठता की तरह थी इसीलिए मुसलमानों की आक्रमक पोथीनिष्ठता ने उनकी धज्जियां उडा दी। पुर्तगाल, स्पेन जीतकर वे पेरिस के तट तक और दूसरी ओर हंगरी तक पहुंच गए। परंतु, आगे जब यूरोप में विज्ञाननिष्ठा अवतरित हुई, भाप, बिजली और हवाई जहाज का युग आया, तब उसी यूरोप ने उन्हीं मुसलमानों की क्या दुर्दशा की है यह भी बतलाने की जरुरत है क्या? जिन मूरों ने स्पेन जीता उन मूरों को स्पेन और फ्रांस ने जीता। ईशभक्ति और पोथीनिष्ठता के गढ़ अबीसीनिया को विज्ञानबल से संपन्न इटली ने एक झटके में बेहाल कर दिया। सायबेरिया के पोथीनिष्ठ और लाखों कट्टर मुसलमानों पर निरीश्वरवादी और निधर्मी रशिया राज कर रहा है! इराक, इजिप्त और दिल्ली के खलीफाओं - बादशाहों के पोथीनिष्ठ तख्तों की प्रदर्शनी आज इंग्लैंड में लगी हुई है।

मुसलमानों की दुनियाभर में हुई दुर्दशा का अपवाद केवल तुर्कस्थान है। परंतु, वह अपवाद ही हम बतला रहे उस नियम का निरुत्तर कर देनेवाला सबूत है! तुर्कस्थान जो टिका वह केवल इसलिए मात्र क्योंकि, उसने ईशभक्ति, पोथीनिष्ठता को छोडकर विज्ञानबल की उपासना की। तुर्कस्थान यूरोप जितना ही अद्यतन बना, प्रयोगक्षम भौतिक विज्ञान का उपासक बना इसीलिए बच गया।

हमारी अंतःकरण से इच्छा है कि हिंदी मुसलमान भी पोथीनिष्ठता की प्रवृत्ति छोडकर, विज्ञाननिष्ठ बनें; धार्मिक कट्टरता के शिकंजे से उनकी बुद्धि स्वतंत्र हो, उनका समाज भी शिक्षित, प्रगत और अभ्युन्नत हो। अगर उनके ध्यान में यह बात आ गई कि विज्ञानबल के आगे अज्ञानी धार्मिक उन्माद कभी भी टिक नहीं सकेगा तो, वे भी तुर्कों का मार्ग स्वीकारेंगे और आज यूरोपीयन शक्तियों के आगे उनकी जो दुर्गत हो रही है वह रुकेगी। मुसलमान अगर विज्ञाननिष्ठ और प्रगत हुए तो उसमें हिंदुओं का भी कल्याण है, हिंदी मुसलमानों का तो बहुत बडा कल्याण है ही।

परंतु, इतना होने पर भी अगर मुसलमानों को उनकी पोथीनिष्ठ प्रवृत्ति ही हितकारक लगती है, पुसाती है तो बडे मजे से आचरण में लाएं। परंतु, हमने यह गांठ बांध लेना चाहिए कि, यूरोप के विज्ञानबल के आगे जिन अर्थों में उनके धार्मिक उन्माद की एक नहीं चलती, जिन अर्थों में बुद्धिनिष्ठ प्रगति से वंचित होने के कारण उनका समाज आज हमारे हिंदू समाज की अपेक्षा अज्ञान, दरिद्रता और अवनति के चंगुल में फंसा हुआ है और जिन अर्थों में हमें जो सामना करना है वह विज्ञानयुग का और यूरोपीय विज्ञानबल का ही, इन अर्थों में मुसलमान पोथीनिष्ठ हैं इसलिए हम उनसे अधिक पोथीनिष्ठ, ईशभक्त और धार्मिक रुप से कट्टर होंगे यह कोई हमारी अभ्युन्नति का उपाय नहीं। अगर अनुकरण ही करना है तो आज मुसलमानों के सामने टिकी रही यूरोप की उस विज्ञाननिष्ठता का। जिसका संपादन करना है, जिसके सामने धर्मभेद का डंक ढ़िला पडता है उस विज्ञानबल का! ईशभक्ति सारे गंडे-ताबीज, कोसाकाटी जिस कवच पर असर नहीं कर सकते, यह आज इंग्लैंड, रशिया, जर्मनी में साफ-साफ नजर आ रहा है, उस विज्ञानकवच को हमने धारण करना चाहिए। अपने इस विधेय को उन्होंने बुरका, नमाज-पूजा, मांसाहार के उदाहरण देकर विस्तृत रुप से समझाया है जो विस्तारभयास्तव हम उद्‌. नहीं कर रहे हैं।

इसी प्रकार बहुत से हितचिंतकों को लगता है कि जिस प्रकार से मुसलमानों का एकही धर्मग्रंथ कुरान है, ईसाइयों का बाइबल है उसी प्रकार से हिंदुओं ने भी कोई सा तो भी एक ही धर्मग्रंथ तय करना चाहिए। जिससे कि जिस प्रकार कुरान कहते ही सारे मुसलमान एकजुट हो जाते हैं वैसेही हिंदू भी हो जाएंगे। परंतु, यह आशा भी एक दोहरी भूल है। कुरान एक ही धर्मग्रंथ होने के कारण मुसलमानों को संगठन की दृष्टि से बहुत लाभदायक है, वे प्रबल बन रहे हैं, यह मूल बात ही ऊपरी तौर पर ही महसूस होती हैं उतनी सच नहीं! कुरान के एक-एक वाक्य के कारण मतभेद होकर मुसलमानों ने मुसलमानों का कत्लेआम किया है, खलीफाओं का मारा है, बगदाद; दमास्कस, मक्का-मदीना जो मुसलमानों के राजनगर-धर्मक्षेत्र हैं पक्ष-विपक्ष द्वारा बारम्बार ध्वस्त किए गए हैं। अपने हिंदुओं को वह इतिहास बहुतकर मालूम नहीं है इसलिए वे धोखा खा जाते हैं। वहाबियों और सुन्नियों की आज भी अरबस्थान में गूंज रही अनबन, कादियानी और अहरार के बीच की पंजाब की धारा 144 द्वारा थाम कर रखी गई जाती दुश्मनी, शिया-सुन्नी की लखनऊ में होनेवाली आपसी लडाई देखो! केवल पोथीनिष्ठता की दुर्घटना! अगर एक ही धर्मग्रंथ होने से मुस्लिम समाज की आज के युग में भी टिकाऊ ऐसी शक्ति होती तो आज यूरोपीयनों द्वारा सारी पृथ्वी पर मुसलमानों के जो हाल किए जा रहे हैं, वह वे कैसे कर सकते थे? यूरोपीयनों का उनको प्रबल करनेवाला एक ही धर्मग्रंथ कौनसा? बाइबल नहीं! इसके बिल्कूल विपरीत उन्होंने बाइबल को मूंदकर अपनी आँखें खोली! रशिया ने तो बाइबल ही फाड डाली! एक ही धर्मग्रंथ वाले लाखों मुसलमानों पर कोई सा भी धर्मग्रंथ न माननेवाला रशिया राज कर रहा है; वे पिछडे हुए, वह प्रगत; वे निर्बल, वह प्रबल; ऐसा क्यों? क्योंकि, रशिया ने अपनी समाज संस्था का आधार किसी भी धर्मग्रंथ पर न रचते विज्ञानग्रंथ पर रचा इसलिए!

इसलिए अपने को मुसलमानों की पोथीनिष्ठता का अनुकरण न करते विज्ञाननिष्ठा का करना चाहिए! जिस समाज ने जिस धर्मग्रंथ को जकड लिया वह धर्मग्रंथ जितना सहस्त्रावधि वर्षों से पुराना उतने ही सहस्त्रावधि वर्षों से वह समाज पिछडा ही रहना चाहिए! धर्मग्रंथ पर समाज व्यवस्था खडी करने के दिन गए! सौभाग्य से अपने हिंदू दर्शन में किसी भी एक धर्मग्रंथ को पिंजडे में न अटकनेवाली तत्त्वज्ञान बुद्धि की जो स्वतंत्र उडान मिलती है वही अपना भूषण है! वेदगीतोपनिषदादि ग्रंथ पूज्य हैं, आदरणीय हैं, उतना ही पर्याप्त है। वे परमप्रमाण नहीं होना चाहिए! इस विज्ञानयुग में समाजसंस्था का जो संगठन करना है वह प्रत्यक्ष ऐहिक और विज्ञाननिष्ठ इसी प्रकार के तत्त्वों पर करना चाहिए। उस मार्ग पर चलकर इंग्लैंड, रशिया, जापान ये राष्ट्र बलवान हुए वैसेही अपना हिंदूराष्ट्र भी हुए बगैर रहेगानहीं।

परंतु, खेद है कि विज्ञाननिष्ठ सावरकर के इन विचारों की उपेक्षा की गई चाहिए वैसा उन विचारों का प्रचार-प्रसार नहीं हुआ उसीका परिणाम है कि आज भी अपने हिंदू समाज में चंद ऐसे लोग मौजूद हैं स्वयं को हिंदुत्ववादी, हिंदूधर्मउद्धारक बताकर-बनकर लोगों को भ्रमित कर गलत राह पर ले जाने के प्रयास में हैं।

Wednesday, December 7, 2011

 ईश्वराचे अधिष्ठान आणि सावरकर
कणाद shirishsapre.com

सावरकर नाव उच्चारले की आमच्या डोळ्यांसमोर जे चित्र उभे ठाकते ते समुद्रात उडी टाकणाऱ्या वीराचे, स्वातंत्र्य संग्रामातल्या एका अप्रतिम योद्धाचे  ज्यांस आम्ही अत्यंत आदराने स्वातंत्र्यवीर म्हणतो, हिंदु-हिंदुत्वाचे दर्शन मांडणाऱ्याचे ज्याच्या मुळे सर्वांचेच डोळे दीपले. पण सावरकर म्हणजे केवळ इतकेच नाही तर सावरकरांची जी विविध रुपे आहेत त्यांचा तो एक भाग मात्रच आहे. ही विविध रुपे वर्तमानकाळात एक प्रकारे विस्मृतीच्या कपारीत दडल्या सारखी झाली आहेत. असेच एक रुप आहे विज्ञाननिष्ठ सावरकरांचे.

सावरकरांचे हे रुप सर्वसाधारणजनांच्या विचारांना हादरवून सोडते. हे जितके खरे आहे तितकेच हे पण खरे आहे की सावरकर एक वास्तववादी क्रांतीकारी, प्रगतीशील विचारांचे धनी होते. त्यांचे विचार काळ बदलला तरी टिकून राहणारे, काळबाह्य न होणारे अर्थात्‌ सर्वकाळिक आहेत. यातहि दुमत नाही. त्यांचे संपूर्ण जीवन या राष्ट्राकरीता, हा हिंदु समाज आधुनिक, विज्ञाननिष्ठ संघटित व्हावा, हेच ध्येय समोर ठेऊन याच ध्येयपूर्ती करीता वाहिलेले होते. आपल्या हिंदु समाजाचे अभ्युदय आणि निःश्रेयस दोन्हीं साधले गेले तरच तर समाज आणि राष्ट्राची उन्नती साधली जाईल. हीच परिकल्पना त्यांनी आपल्या हिंदुध्वजातहि साकारली आहे. त्यांनी जी समाजक्रांती केली त्यामुळे अनेक रुढ़ींना धक्का पोहोचला आणि समाजात सर्वात जास्त लोक अप्रियहि तेच झालेत. हे दुर्दैव. पण ज्या गोष्टी समाजाला घातक त्यांच्या बद्दल धाडसाने विरोध म्हणजे क्रांती आणि अशी क्रांती करणारा आपल्या भाग्यात यश येईल की अपयश यांची किंचितहि पर्वा करीत नाही.

सावरकर असा सूर्य आहे की त्यांच्या बद्दल कितीहि दुष्प्रचार केला गेला किंवा न उल्लेखाने मारण्याचा किंवा दडपण्याचा प्रयत्न केला गेला तरी आपल्या तेजाने ते सर्वांस निष्प्रभ करुन टाकतात.

एक दुष्प्रचार त्यांच्या बाबतीत हेतुपूर्वक असा केला जातो की बघा इतका तेजस्वी, तपस्वी कल्पनेपलीकडच्या यातना भोगून देशाच्या स्वातंत्र्यतेकरीता लडणारा योद्धा पण त्यांस यश नाही मिळाले. कां? कां की त्यांस ईश्वराचे अधिष्ठान नव्हते. आता या दुष्प्रचारकांना ईश्वराचे अधिष्ठान म्हणजे काय? हेच समजत नसावे असे म्हणावयासे वाटते. तसेहि ईश्वराचे अधिष्ठान कोणी लुंग्या-सुंग्यांनी म्हटण्यात अर्थ नाही. असा एकहि सत्पुुरुष ज्याला ईश्वराचे अधिष्ठान प्राप्त झाले होते त्याने असे विचार व्यक्त केलेले नाही. ज्या लोकांनी अंधश्रद्धा पसरवली आणि बुवाबाजी वाढ़वली त्यांना सावरकर जाचकच राहणार आणि मग ती लोक अशीच भाष्य करणार. ईश्वराचे अधिष्ठान म्हणजे काय? हे सावरकरांनी आपल्या विज्ञाननिष्ठ निबंधात विशदले आहे.

सामर्थ्य आहे चळवळीचे। जो जो करील त्याचे। परंतु तेथे भगवंताचे। अधिष्ठान पाहिजे।।
समर्थ रामदासस्वामींची ही ओवीं विजेची एक ज्योत आहे! शिवकालीन महाराष्ट्राच्या प्रचंड कर्तृत्वशक्तीची नी हिंदु स्वातंत्र्य समराची केवळ रणघोषणा!

परंतु तेथे भगवंताचे अधिष्ठान पाहिजे, त्या शब्दांनी समर्थांच्या मनात कोणचा अर्थ व्यक्तविण्याचे उद्दिष्ट होते ते आता नक्की सांगणे यद्यपि दुर्घट आहे, तथापि त्यांचा अर्थ काहीहि असला तरी त्या ओवींचे तेजस्वी कार्य ती करुन गेली! तथापि त्या ओवींचा आज केला जाणारा अर्थ आजच्या परिस्थितीत किती अनर्थकारक आहे नी तिच्यांत जे तत्त्व अनुस्यूत केलेले आहे म्हणून साधारणतः समजले जाते, ते ऐतिहासिकदृष्टया किती अतथ्य आहे हे सावरकरांनी दाखवून दिले आहे.
चळवळीचे म्हणजे मानवी प्रयत्नांचे सामर्थ्य किती जरी वाढ़विले तरी ज्या चळवळीला भगवंताचा पाठिंबा नाही ती चळवळ अयशस्वी झालीच पाहिजे. ह्या तत्त्वाचा अर्थ नक्की करताना भगवंताचा पाठिंबा म्हणजे काय, ईश्वराचे अधिष्ठान म्हणजे काय ह्याचा प्रथम स्पष्ट उलगडा झाला पाहिजे. जर भगवंताच्या अधिष्ठानाचा इतकाच अर्थ असेल की ऐहिक आणि मानवी उपायांच्या हातीच यशाची किल्ली नसून मनुष्याच्या ज्ञानाच्या नी शक्तीच्या पलीकडे ज्या अनेक अज्ञात, अज्ञेय, प्रचंड अशा अमानुष विश्वशक्ती आहेत, त्यांच्या आघात-प्रत्याघातांच्या टकरीतहि त्या यशाचा वा अपयशाचा संभव असतो, तर तो अर्थ बरोबरच आहे! ह्या तात्त्विक अर्थी कोणच्याहि चळवळीचे यशापयश हेहि एक फलितच असल्यामुळे मानवी उपायांच्या पलीकडील त्या अमानुष शक्तींचा व्यापार हेच त्यांचे महाकारण होय. त्यास जर ईश्वराचे अधिष्ठान म्हणावयाचे असेल तर मानवी उपाय नी साधनें ही प्रत्यक्ष कारणेच कोणत्याहि यशाची अशेष कारणे नसून ती अमानुष विश्वशक्तींची गुंतागुंत, तो योगायोग, हे त्यांचे महत्कारणहि अनुकूल असले पाहिजे हे म्हटणे यथार्थ आहे. मानवी चळवळ कितीहि सामर्थ्यसंपन्न असली आणि ती कितीहि यशस्वी झाली तरी त्या यशाचे सर्वयश मनुष्यकृत प्रयत्नांसच नसून अतिमानुष शक्तींचा व्यापारहि त्यास अनुकूल असा घडत गेला; दैवाचा फांसाहि तेच दान देणारा पडत गेला; आणि त्या दैवास देवाची इच्छा म्हटले तर ईश्वराचे अधिष्ठान त्यास लाभले म्हणून ते यश आहे हे जर कां त्या ओवींचा उपदेश असेल तर तो यथातथ्य आहे. यात शंका नाही.

परंतु ह्या ओवींचा अर्थ अशा तात्त्विक अर्थी क्वचितच कोणी घेत असेल! सामान्यतः तिचा अर्थ असाच घेण्यात येतो की ज्याला ज्याच्या-त्याच्यापरी नीती वा अनीती, न्याय-अन्याय, दैवी वा आसुरीसंपन्न धर्म वा अधर्म म्हटतो त्यांपैकी पहिले ते सत्य नी दुसरे ते असत्य. जी चळवळ मानवी सत्याच्या पायावर उभी असते; मानवी धर्माचे ब्रीद मिरविते; तीच काय ती यशस्वी होते! ईश्वर तीच्यावरच कृपा करतो अशा अर्थी ईश्वराचे अधिष्ठान जिला लाभत नाही. ती चळवळ कितीहि प्रबळ असली तरी ती यशस्वी होत नाही. यास्तव चळवळ करणाऱ्यांनी प्रथम ते भगवंताचे अधिष्ठान संपादिले पाहिजे आणि हे संपादिण्याकरीता नामजप, उपास-तापास, एकशे आठ सत्यनारायण, एककोटी रामनामजप, रेडे वा बोकड मारणारे नवस इत्यादि शतावधि उपाय देवास संतोषविण्यास्तव वर्णिले आहेत, त्यांस आचरले पाहिजे अर्थात्‌ तपस्या आधी मग मानवी चळवळ.

सावरकरांनी पारलौकिक मोक्ष प्रभृति जी फळे आहेत त्यांचा ऊह केलेला नाही. त्यांची फळे प्रत्यक्ष अनुभवांत केव्हांहि मिळालेली नाहीत ती त्यांची फळे नव्हत इतकेच इथे विषदावयाचे आहे. त्या साधनांविषयी किंवा त्यांच्या आध्यात्मिक वा पारलौकिक परिणामांविषयी ज्यांस जसा आदर नी निष्ठा असेल त्यांस त्यानी सुखनैव आचरावे. त्यापासून लाभणाऱ्या आत्मप्रसादास सुखनैव आस्वादावे. परंतु तशा अर्थाच्या ईश्वरी अधिष्ठानावर वरील ओळीत ज्या राष्ट्रीय उत्थानादिक भौतिक चळवळींच्या ऐहिक यशाचा उल्लेख केलेला आहे, ते यश वा अपयश बहुधा मुळीच अवलंबून नसते; तर मुख्यतः तिच्या भौतिक सामर्थ्यावर अधिष्ठित असते.

वरील ओळीवर हे भाष्य नेहमीच करण्यात येते की हिंदुपदपादशाहीचे जे प्रचंड स्वातंत्र्ययुद्ध आम्हां हिंदुंनी ठाणले नी जिंकले, ती प्रचंड राष्ट्रव्यापी चळवळ यशस्वी होण्याचे मुख्य कारण तिच्या मुळाशी असलेले ईश्वरी अधिष्ठान हेच होय. नाना साधुसंत हरिनामाचा जो अखंड घोष महाराष्ट्रात दुमदुमवीत राहिले, ज्ञानेश्वरसारख्यांनी यौगिक सिद्धी संपादिल्या, सहस्त्रावधि पुण्यपुरुष ईश्वरी कृपा संपादिण्यास्तव जी तपस्याकरीत होते. ती मुळे भगवंत प्रसन्न झाले, ईश्वरी अधिष्ठान मिळाले यास्तव ती चळवळ समर्थ आणि यशस्वी ठरली. हिंदुवीरांना जो जय मिळाला, त्या झुंजीचा पुरावा ज्या अर्थी ईश्वरी अधिष्ठानाच्या सिद्धांतास दिला जातो तो किती लंगडा आहे हे इतिहासाची छाननी करुन सावरकरांनी खालीलप्रमाणे दाखवून दिला आहे.

साधारणतः 1300 ते 1600 पर्यंतचा काळास महाराष्ट्राच्या, भारताच्या इतिहासाचे कां म्हणाना, एक पान कल्पिले तर त्यांत ह्या ईश्वरी अधिष्ठानाच्या दृष्टीकोणातून प्रथमदर्शनीच ज्ञानेश्वरांसारख्या महायोग्याचे दर्शन घडते. जर कधी तपस्येने, योगाने, पुण्याईने कोणा मनुष्यात भगवंताचे अधिष्ठान सुव्यक्त झाले असेल तर ते ह्या अलौकिक पुरुषातच होतेच होते. रेड्याकडून त्यांनी वेद म्हणविले; भींतीना चालविले; हरिनामाच्या गजराने महाराष्ट्र दणाणून सोडले. जिकडे-तिकडे दैवी चमत्कार त्यांच्या मागोमाग नामदेव, जनाबाई, गोरा कुंभार इत्यादि सारे जीवन्मुक्त, साऱ्यास प्रत्यक्ष पांडुरंग प्रसन्नपणे भेटीगांठी देता आहेत, घेता आहेत. त्यांच्या मागोमाग एकनाथ ते तुकाराम ब्राह्मणवाड्यापासून महारवाड्यापर्यंत महाराष्ट्रात घरोघर साधुसंत, घरोघर यौगिक सिद्धि, घरोघर देवाचे येणे-जाणे, प्रत्यही सकाळी कोण्यातरी अलौकिक चमत्काराची ताजी बातमी! अशा चमत्कारांचे वर्णन सावरकरांनी विस्ताराने केले आहे पण विस्तारभयास्तव आम्ही उद. करीत नाही. पुढ़े सावरकर म्हणतात असे वाटते की महाराष्ट्र हेच देवाचे राहते घर झाले होते, वैकुंठ नव्हते!

ईश्वरी अधिष्ठान प्राप्त अशी ही महाराष्ट्राच्या इतिहासातील सुवर्णअक्षरांनी लिहलेली बाजू वाचल्यानंतर जेव्हां आपण दुसरी बाजू उलटतो तर आपल्याला दिसले पाहिजे ईश्वरी अधिष्ठानामुळे भौतिक सामर्थ्य, राष्ट्राची अजिंक्यता. पण दिसते मात्र देवांची नव्हे तर राक्षसांची भौतिक विजय. स्वातंत्र्य आणि राज्य धुळीस मिळून त्या देवाच्या अधिष्ठानावर राक्षसी राज्याची उभारणी.

काय हा दुष्ट योगायोग! परमयोगी ज्ञानेश्वरांनी 'ज्ञानेश्वरी" लिहून आपली लेखणी खाली ठेवली न ठेवली, तोच अलाउद्दिन खिलजी दहा-पंधरा हजार सैन्यास घेऊन बकऱ्यांच्या कळपात वाघ घुसावा तसा घुसला नी ज्ञानेश्वरांच्या भगवंताचा पूर्ण पाठिंबा असलेल्या रामदेवास अलाउद्दिन विंध्याद्रि उतरून आल्याची बातमी देखील पुरती कळाली नाही नी रामदेवरावाच्या हरिभक्त हिंदुंच्या अफाट सैन्याचा त्या हरिद्वेष्टयाने चक्काचूर उडविला. त्याचे हिंदु राज्य बुडविले. ते परत स्थापू निघालेल्या परमवीर शंकरदेवास जिते धरुन अंगाचे कातडे सोलून ठार मारले. संतमहंत घरोघर देवाशी हंसत, जेवत, बोलत असता महाराष्ट्र भगवंताची प्रत्यक्ष राजधानी झालेली असता तिकडे बिहार-बंगाल, अयोध्या-काशीत हिंदु राज्यश्री परकीयांच्या घोड्याच्या टापाखाली तुडविली जात होती. पण विंध्याद्रि उतरून प्रलय दक्षिणेवर कोसळणार हे स्पष्ट झाले होते एक टपालवाल्यालाहि जी सूचना देता आली असती की अलाउद्दिन चालून येत आहे ती मात्र ज्ञानेश्वरांना रेड्याच्या किंवा स्वतःच्या तोंडून देता आली नाही!! ज्ञानेश्वर निर्जीव भिंत चालवू शकले, पण सजीव माणसे मंत्रबळे चालवून विंध्याद्रिच्या खिंडीत अलाउद्दिनला रोखण्यासाठी उभी करु शकले नाहीत!! सन्‌ 1294त दक्षिणेच पहिला पाय टाकला आणि हिंदुराज्ये, देवदेवता उद्‌ध्वस्त करीत इतक्या दुर्धुष वेगाने पुढ़े घुसला की 1310च्या आत त्यानी रामेश्वरापर्यंतचे सारे राज्य निर्हिंदु करुन रामेश्वरला मशीद बांधली. इकडे विठूरायाची नगरी भगवंताच्या नामघोषाने दणाणतच होती, संताचे जाळे गांवोगांव पसरत होते, त्यांच्या घरात येऊन देव प्रत्यक्ष जोडे शिवीत होते, मडके घडीत होते दळणे दळीत होते. बादशहाची खंडणी भरीत होते. जपजाप्य, व्रतवैकल्य, नामसप्ताह इत्यादिंचा पर्वकाळ गजबजला होता. तिकडे एक सोडून पाच पादशाह्या हिंदुंच्या उरावर नाचत होत्या 'देवलदेवी" रावण पळवीत, बाटवीत होते. पण प्रत्येक देवास दोहोंपेक्षा जास्त हात असूनहि त्यांपैकी एकानेहि अलाउद्दिन किंवा मलिक अंबरचा हात धरला नाही. हिंदुंची हजारो तरुण मुले-मुली गुलाम होत असता, राजकन्या दासी होत असता, जोडे शिवीत बसलेल्या देवाला करुणा आली नाही की काशी ते रामेश्वरपर्यंत हजारो देवालय पाडून त्यांच्या मूर्तींची मशीदीची पायरी केली जात असता त्या देवाला या अत्याचारांचा राग आला नाही. पण एक नवस जरी चुकला तर त्या हिंदुचा कुलक्षय मात्र होई.

भगवंताचे अधिष्ठान होते त्या राज्याचा चक्काचूर कोणी उडविला तर त्या ज्यांस आम्ही पंचपातके म्हणतो ते करणाऱ्यांनी. जी गोष्ट या मुसलमानांची तीच पुर्तूगीजांची. तेथून मूठभर लोक येतात गोमांतकात घुसतात. हिंदुंवर धार्मिक छळाची आग पाखडतात. हजारो तरुण हिंदु मुले-मुलीं दास करुन यूरोप-आफ्रिकेच्या बाजारात विकतात. सारे हिंदु संस्कार दंडनीय ठरवतात. जीव घेऊन लोकच नव्हे तर देवहि आपआपल्या मूर्ती भंगू नयेत म्हणून श्रीमंगेश, शांतादुर्गा प्रभृति देवहि पळाले आणि तेहि आपल्या पायांनी नव्हे तर भक्तांच्या खांद्यांवर आपल्या पालख्या लादून.

भगवंताच्या अधिष्ठानाच्या अशाच वल्गना पीर-पाद्रयांनीहि हजारो वेळा केल्या होत्या. पण इतिहासानी त्याहि तशाच खोट्या पाडल्या. सावरकरांनी तो इतिहास पण विस्ताराने दिला आहे पण आम्ही तो विस्तारभयाने देत नाही आहोत.

सारांश सामर्थ्य आहे चळवळीचे, जो जो करील त्याचे, इतकेच काय ते खरे आहे. ऐहिक यश ज्या चळवळीस हवे तिने ऐहिक, भौतिक, प्रत्यक्ष सृष्टीत उपयोगी पडतील तेवढ़ी साधने संपादून विपक्षावर 'सामर्थ्यात" मात केली की ती चळवळ बहुधा यशस्वी होते. मग तिला ज्याच्या धार्मिक पोथ्यातील कल्पनां प्रमाणे न्यायाचा, पुण्याचा, स्नानसंध्याशील उपायांनी मिळविल्या जाणाऱ्या भगवतांच्या आध्यात्मिक अधिष्ठानाचा पाठिंबा असो वा नसो! हीच गोष्ट जगातील पारशी, ख्रिस्ती, मुसलमानी; यहूदी प्रभृति यच्चयावत धर्मग्रंथातील वचनांची नी त्यांच्या इतिहासाची आहे. शेवटी सावरकर म्हटतात, ऐहिक यश ज्यास हवे, त्याने अद्यावत वैज्ञानिक सामर्थ्य संपादावे. चळवळीत ते सामर्थ्य असेल तर भगवंताच्या अधिष्ठानावाचून कांही अडत नाही. ते सामर्थ्य नसेल तर भगवंतांच्या अधिष्ठानासाठी कोटी-कोटी जप केले तरी ऐहिक यश मिळत नाही, हाच सिद्धांत!

पण दुर्दैव हे की अंधश्रद्धा निर्मूलनवाल्यांहि हे सावरकर नको आहेत; पोथीनिष्ठ पुरोगाम्यांना त्यांचे हिंदुत्व तर नकोच आहे पण बुद्धिवादापुरते नाव सुद्धा घ्यावयास ते तयार नसतात. धर्मनिष्ठ अनुयायींना त्यांचा बुद्धिवाद नकोसा आहे. उरले सावरकर भक्त तर त्यांना त्यांचा केवळ जय जयकार करावयाचा आहे. केवळ मूठभर अनुयायीच असे आहेत जे त्यांना आचरणात आणण्याचा प्रयत्न करतात.