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Friday, January 31, 2014

""सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखो ।- यजुर्वेद''

हिन्दू धर्म वेद आधारित है। जो यह सीखाता है कि मनुष्य तो मनुष्य, प्राणी मात्र को भी मित्र की दृष्टि से देखो अर्थात प्राणियों के साथ अच्छा प्रेम भरा व्यवहार करो। दूसरी ओर प्रेम, दया और (तथाकथित) सेवा का उद्‌घोष करने वाला ईसाई धर्म है। जिसके धर्मगुरू पोप जॉन पॉल।। का यह वक्तव्य ध्यान देने योग्य है ''My Religion Takes You to Heaven, Yours to Hell (Oraganiser-9-1-2005).  सोचने योग्य बात यह है कि क्या ईश्वर इतना पक्षपाती है ? निश्यच ही नहीं। नैतिकता की दृष्टि से यह कथन असहिष्णु और तिरस्करणीय है जो ईसाइयत के असली दर्शन को दर्शाता है। तो इससे भी बढकर इसी सेमेटीक परंपरा का धर्म "इस्लाम' है जो अपने आपको "दीन-ए-कामिल' (संपूर्ण धर्म) बतलाता है। अर्थात्‌ संसार के अंत तक इसमें किसी भी तरह का बदलाव संभव नहीं। कुरान का अधिकृत भाष्य कहता है कि ""अब इस दीन (धर्म) को इसी रूप में कियामत (प्रलय) तक बाकि रहना है और संपूर्ण जगत की सारी की सारी कौमों के लिए यही हिदायत का स्तंभ है।''(दअ्‌वतुल कुर्आन खंड। पृ. 339) यह इस्लाम तो सीधे-सीधे मनुष्य जगत को ही ईमानवाले (यानी मुसलमान) और काफिर (गैर-मुस्लिम) इन दो भागों में बांटकर रख देता है। कुरान की सूर "मुजादलति' में स्पष्ट रूप से इंसानों को दो समूहों में बांटकर काफिरों को ""शैतानों का लश्कर'' (शैतानों की पार्टी ) (Hisb-Ush-Shaitan) (आयत 19) तो मुसलमानों को ""खुदाई लश्कर (अल्लाह की पार्टी) (Hizbulla)'' (आयत 22) कहा गया है। ईमानवालों (मुसलमानों) को हमेशा के लिए जन्नत (स्वर्ग) का वादा, तो काफिरों को हमेशा के लिए दोजख की आग (नरकाग्नि) में रहने का फरमाना सुनाता है। जिसे कुरान में बारम्बार दोहराया गया है और यह फरमान इसलिए है कि "अल्लाह ने संपूर्ण जगत की सारी कौमों के लिए इस्लाम को हिदायत (शिक्षा, निर्देश) का स्तंभ' कह दिया है फिर भी काफिर इस्लाम कुबूल करने के लिए तैयार नहीं हैं।

कुरान का अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि कुरान की कुल 114 सूरहों (अध्यायों) में से 101 सूरहों में जन्नत (स्वर्ग) और दोजख (नर्क) मिलने के संदर्भ का उल्लेख है ।  कुरान की कुल 6239 आयतों में से 1590 आयतों (श्लोकों) में इस प्रकार के वर्णन हैं। विश्वास नहीं होता ना ?  तो देखिए कुर्आन-शरीफ की ये चंद आयतें जिनमें काफिरों को मिलने वाले अजाब (पापों का वह दंड जो यमलोक में मिलता है) का वर्णन है, ""उसके लिए दोजख है और उसको पीप का पानी पिलाया जाएगा। वह उसको घूंट-घूंट पियेगा और उसको गले से उतारना कठिन होगा और मौत उसको हर तरफ से आती हुई दिखाई देगी  और वह मरेगा नहीं (कि चैन पा जाए) और उसके पीछे दुखदाई सजा होगी।''(इब्राहीम 16,17) वह दुखदाई सजा किस प्रकार की होगी उसका वर्णन आगे इस प्रकार से है, ""(ऐ पैगंबर !) मैं उसको जल्दी ही सकर (दोजख की आग) में झोंक दूंगा.. वह न बाकी रखती है न छोड़ती है, शरीर को झुलसाती छायी रहती है ।'' (मुद्‌दस्सरि 26-29) (ये उपर्युक्त आयतें प्रकट रूप से सार्वजनिक स्थानों पर धर्म प्रचार करने के लिए पैगंबर को संदेश देने के लिए जो पहली सूरह अवतरित हुई थी उसमें कही गई थी।) ""जब उनकी खालें जल (कर पक) जावेंगी, हम उनको दूसरी खाल बदल देंगे ताकि (वह बराबर) अजाब का मजा चखते रहें।'' (सूर निसा आयत 56) "" उनके लिए आग (दोजख) का बिछौना होगा और उनके सिरों पर खौलता पानी डाला जाएगा। जिससे जो कुछ उनके पेट में है और (उनकी) खालें गल जाएंगी और उनके (मारने के) लिए लोहे के गुर्ज होंगे। (इस दोजख के दु:ख और) घुटन से जब निकलना चाहेंगे तो उसी में फिर ढकेल दिए जावेंगे। और (कहा जाएगा कि बस हमेशा) जलने की सजा का अजाब चखते रहो।'' (हज्जि19-22) कुरान में कहा गया है काफिरों को खाने के लिए सेहुंड का पेड दिया जाएगा। जो ""दोजख (नरक) की जड में (से) उगता है उसके गाभे जैसे शैतानों के सिर सो (दोजखी) उसी में से खाएंगे और उसी से पेट भरेंगे। फिर उस पर उनका खौलता हुआ पानी दिया जाएगा। फिर इनको (नरक की) तरफ लौटना होगा।'' (सूर तुस्साफ्फाति 62-68 ) इस स्वरूप की आयतों से कुरान भरपूर है।

काफिरों के नरक में जाने का नियम इतना अचूक है कि इसमें से पैगंबर मुहम्मद के पूर्वज, माता-पिता तथा पिता समान चाचा अबू तालिब जिऩ्होंने मुहम्मद साहेब की 40 साल तक साज-सम्हाल की थी भी अपवाद स्वरूप बच नहीं सके। इससे संबधित हदीसेें भी उपलब्ध हैं। और कुरान की सूर तौबा की आयात 113 में स्पष्ट रूप से ही कहा गया है कि: ""पैगंबर के लिए और मुसलमानों के लिए यह जेब (शोभा) नहीं देता कि वे मुशरिकों (मूर्तिपूजक) के लिए माफी चाहें, गो वह रिश्तेदार (संबंधी ही क्यों न) हों, जबकि उन्हें मालूम हो चुका है कि वे मुशरिक (मूर्तिपूजक) दोजख की भड़कती आग वाले हैं।'' कुरान का तो यह भी कहना है कि : ""और उनमें से जो मरे उसकी नमाज (जनाजा) तुम हरगिज न पढ़ना और न कभी उसकी कब्र पर खड़े होना। क्योंकि उन्होंने अल्लाह के साथ कुफ्र किया और इस हाल में मरे कि वे फासिक (अवज्ञाकारी) थे।'' (सूर तौबा आयत 84) इस आयात पर दअवतुल कुर्आन खंड 1 के अधिकृत भाष्य मेें कहा गया है : ''कब्र पर खड़े होने का मतलब कब्र पर जाकर क्षमा की प्रार्थना करना और दया की भावना को प्रकट करना है। यह मनाही जिस प्रकार मुनाफिकों (दांभिक मुसलमान) के लिए है उसी प्रकार काफिरों (गैर-मुस्लिम), मुश्रिकों (मूर्तिपूजक, अनेकेश्वरवादी), मुहफिदों (नास्तिकों) के लिए भी है क्योंकि जो लोग मरते दम तक काफिर रहे वे अल्लाह के दुश्मन हैं और अल्लाह के दुश्मनों के लिए एक मोमिन के दिल में दया भाव नहीं हो सकता।'' (पृ.657) और हो भी क्यों जब कुरान ही सीखाती है कि काफिर अल्लाह की नजर में ''जियादती करने वाले'' (बकर 190) ""फसादी'' (बकर 205) ''कृतघ्नी (नाशुके)'' (हाज्जि38) ""दगाबाज'' (अंफालि 58) ""कसूरवार'' (निसा 107) ""जालिम (अन्यायी)'' (इमरान 57) ""इतराने वालेे'' (निसा 36) ""गुनहगार'' (बकर 276) ''नापाक (गंदे) ""(तौबा 28)'' अल्लाह का हुक्म न मानने वाले (अवज्ञाकारी) है ""(इमरान 32) अर्थात इस्लाम न कुबूल करने वाले है, इसलिए पसंद नहीं करता।

यही अल्लाह उसके दीन-इस्लाम को मानने वाले उसके बंदो यानी मुसलमानों पर अपने सद्‌गुणों रहमान और रहीम के कारण इतना मेहरबान है कि बेझिझक, बिना किसी विशेष रोक टोक के उन्हें सीधे जन्नत की नेमतें प्रदान करता है। ये नेमतें कौन सी हैं यह जानना भी बड़ा दिलचस्प होगा जिनका वर्णन कुरान में बहुतायात से मौजूद है। जन्नत की खुशखबरी सुनानेवाली कुछ आयतें अवलोकनार्थ प्रस्तुत है: ""उसको (ईमानवाले को) (बिहिश्त के) दो बाग मिलेंगे ......जिसमें बहुत सी टहनिया हैं इनमें दो चश्में बहते होंगे....उनमें हर मेवे की दो किस्में होंगी ......यह (जन्नत वाले) बिछौनों पर तकिए लगाए (बैठे) होंगे जिनके अस्तर ताफते के होंगे और दोनों बागों के मेवे (बहुतायत से) झुक  रहे होंगे..... उनमें (लजाती) नीचे निगाहवाली (पाक हूरें) होंगी, उनसे और पहले न तो किसी मनुष्य ने उन पर हाथ डाला होगा और न किसी जिन्न ने ।'' (तुर्रहमानि 46 से 56) आगे और वर्णन सुनिए: ""निअमतों के बागों में जडाऊ तख्तों के ऊपर आमने-सामने तकिए लगाए (बैठे होंगे) उनके पास लड़के जो हमेशा नौजवान बनें रहेंगे। उनके पास आबखोंरें गडुए और साफ शराब से भरे प्याले लाते और ले जाते होंगे। (वह शराब) जिससे न तो उनके सिर दुखेंगे और न बकवाद लगेगी और जिस किस्म के पक्षी का मांस उनकी इच्छा हो और हूरें बड़ी-बड़ी आँखो वाली जैसे जतन से सजाए आबदार मोती........ हमने हूरों की एक खास सृष्टि बनाई है फिर इनको कंवारी बनाया है (कि किसी जिन्न या इन्सान नें उन्हें हाथ नहीं लगाया) प्यारी और समान अवस्था वाली।'' (वाकिअति 12 से 36)  ""बड़ी-बड़ी आँखों वाली (गोरी) हूरों से हम उनका ब्याह कर देंगे।'' (सूरतुद्‌दुखानि 54) सूर बकर की आयात 25 में कहा  गया है "" वे जन्नत में अपनी पाक साफ बीवियों के साथ सदैव रहेंगे।'' 

संक्षेप में इस्लाम की संकल्पना मानव जगत को दो भागोंं ""काफिर और ईमानवाले'' (गैर मुस्लिमों और मुस्लिमों) में बांटकर हमेशा के लिए प्रदान किए जाने वाले नरक तथा स्वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। जिसमें काफिर की भूमिका संसार के निकृष्टतम प्राणी की है जैसा कि कुरान की सूर अंफालि की आयत 55 में कहा है ''निश्चय ही अल्लाह के निकट बदतरीन जानवर वे लोग हैं जिन्होंने कुफ्र  (इस्लाम से इंकार) किया और वे ईमान (श्रद्धा) नहीं लाते।'' द.कु.खंड। के अधिकृत भाष्य में पृ.595 पर ऐसे काफिरों को ""बहरा, गूंगा और अंधा तथा बेसमझ'' (बकर 171) ""अज्ञानी, हृदय हीन (बिना सिंग-पूछ के) पशुओं की तरह है बल्कि उनसे भी जियाद: भटका हुआ'' (अरफि 179) कहा गया है। कुर्आन इतने पर ही बस नहीं करते हुए काफिरों को चेतावनी देती है'' जो शख्स अल्लाह के दीन (इस्लाम) के सिवा किसी ओर दीन (धर्म) को तलाश करेगा तो (अल्लाह के यहां) उसका वह दीन हरगिज कबूल नहीं और वह आखिरत (अंतिम निर्णय दिन) में नुकसान उठाने वालों में से होगा।'' (इमरान 85) कुरान कियामत का वर्णन करते हुए आगे कहती है: ''यह बदले का दिन है यह वही फैसले का दिन है जिसे तुम झूठलाते थे जमा करो जालिमों (काफिरों) को और उनके साथियों को और उनको साथियोंें को और उनको भी जिनकी ये पूजा करते थे। अल्लाह को छोड़कर (जिनकी ये पूजा किया करते थे) फिर इन सबको जहन्नम (नर्क) का रास्ता दिखाओं।'' (तुस्साफ्फति 19-23)

धर्म तो सभी के लिए यानी विश्व के परमार्थ के लिए, विश्व कल्याण के लिए होता है लेकिन यह दीन-ए-इस्लाम तो ऐसा निराला धर्म है कि जो कहने को तो अपने आपको "भाईचारे' का धर्म बतलाता है लेकिन उसका भाईचारा केवल इस्लाम के अनुयायियों तक ही सीमित है। क्योंकि वह केवल अपने ही अनुयायियों को ""खैर-उम्मत'' (बेहतरीन गिरोह) ""(इमरान 110)'' उम्मते वसत (उत्तर समुदाय) बकर 143) इस आधार पर कहता है कि ""यही उम्मत (समाज) सत्यधर्म (इस्लाम) पर चल रही है।'' (द.कु.खंड1पृ.211पर का भाष्य) खुद को दीन-ए-अकिब यानी अंतिम सत्यधर्म और अपने पैगंबर को अकिब यानी आखरी पैगंबर मानता है। जिसके बाद अब न तो कोई नया धर्म आने वाला है न ही कोई पैगंबर जैसा कि कुरान की सूर अल-अहजाब की आयत 40 में कहा गया है ""मुहम्मद अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक है।'' अर्थात दीन अब पूर्णत्व को पहुंच चुका है, और अब किसी भी तरह के सुधार या बदलाव की गुंजाईश ही नहीं है। इसीलिए कुर्आन भाष्य में कहा गया है ""इस्लाम के सिवा जो शुद्ध रूप से एकेश्वरवादी जीवन प्रणाली है किसी भी धर्म की ओर मामूली सा झुकाव भी ईमान को प्रभावित कर देता है और सभी धर्मो के सही होने की बात तो सरासर गुमराही की बात है। '' (द.कु.खंड 3 पृ. 1413) या जो यह कहता है कि ""समस्त धर्म उसके (यानी अल्लाह के) नजदीक पंसदीदा हैं बड़े ही दुस्साहस की बात है और ऐसा व्यक्ति बड़ा ही गलतकार, दुष्कर्मी और सबसे बड़ा जालिम है।'' (पृ.1647) ""अत: जीवन को धर्म और संसार के खानों में विभक्त कर अल्लाह और उसके रसूल के कितने ही फैसलों को जो पारिवारीक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन से संबंधित हैं रद्द कर देना और  तथाकथित धर्म निरपेक्ष जीवन पद्धति को अपनाना इस्लाम से खुली विमुखता है।'' (पृ.1457) अंत में भाष्य चेतावनी देता है कि ""सारे धर्म समान है उनमें सत्य और असत्य का कोई फर्क नहीं'' के सिद्धांत को जो लोग तैयार करना चाहते है वह हरगिज यह आशा न रखें कि उन्हें कुर्आन का समर्थन प्राप्त हो सकेगा।'' (पृ.2368) अब पाठक स्वयं ही सोचें कि "सब धर्म समान' का कथन कितना थोथा और हास्यास्पद है।

Friday, August 3, 2012

धर्म मजहब रुपी फूले

वीर सावरकरांनी हिंदूधर्माला 'धर्मसमुच्चय" म्हटले आहे. सावरकरांच्या म्हणण्यानुसार हिंदूधर्म हे नाव कांही कोणा एका विशिष्ट धर्माचे अथवा पंथाचे विशेष आणि अनन्य नाव नसून ज्या अनेक धर्मांची आणि पंथांची ही भारतभूमि पितृभूमि आणि पुण्यभूमि आहे त्या सगळ्यांचा समावेश करणाऱ्या धर्मसंघाचे हिंदूधर्म हे सामुदायिक अभिधान आहे.

वीर सावरकरांच्या 'हिंदू"च्या व्याख्येप्रमाणे 'आसिंधू-सिंधू पर्यन्ता, यस्य भारतभूमिका। पितृभूः पुण्यभूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः। सावरकरांची 'हिंदू" शब्दाची ही व्याख्या अतिव्याप्ति आणि अव्याप्ति ह्या दोन्ही प्रकारच्या दोषांपासून मुक्त आहे. ह्या व्याख्येप्रमाणे वैदिक धर्मानुयायी, शीख व भारतीय बौद्ध, जैन, लिंगायत, नास्तिक, ब्राम्होसमाजी, गिरीजन, वनवासी इत्यादींचा समावेश 'हिंदू"त होतो. चीनी बौद्धांचा समावेश हिंदूत होत नाही. कां की हिंदुस्थान जरी त्यांची पुण्भू असली तरी पितृभूमि नाही. मुसलमान, ख्रिस्ती, पारशी, ज्यू यांचा समावेश अर्थात्‌च हिंदूत होऊ शकत नाही.

सावरकरांच्या या धर्मसमुच्चयाचे प्रतीक आहे झेंडूचे फूल जे धार्मिक आणि सामाजिक कार्यात विपुलतेने उपयोगात आणले जाते. झेंडूच्या फूलाचा पुष्पकाळ येतो भाद्रपद महिन्यात आणि दसरा-दिवाळी मध्य सारे धार्मिक विधि झंडूमय होऊन जातात. तरी देखील झंडूचे फूल संपूर्ण भारतात वर्षभर उपलब्ध असते.

वनस्पतीशास्त्रानुसार झंडूचे फूल एस्टेरेसी वनस्पतीचे फूल असून त्याची विशेषता ही आहे की त्यांस तोडून त्याच्या पाकळ्यांना पण आपण देवास अर्पण करु शकतो. याच्या उलट धोत्रा, मोगरा, कण्हेर बरोबर आपण असे करु शकत नाही. याचे कारण हे आहे की सर्वसाधारणांस जरी हे एक फूल भासत असले तरी ते एक फूल नसून त्यांत अनेक फूले एक समूहात जोडलेले असतात. या फूलांच्या गुच्छ्‌यास इंफ्लोरेसेंस म्हणजे पुष्पक्रम म्हटले जाते. हे पुष्पक्रम या प्रकारे जोडलेले असतात की आमच्या दृष्टिस ते एक फूलच वाटते.

हे हिंदूधर्मसमुच्चय रुपी भगवा-केशरी-पिवळ्या रंगाचे झेंडू नैसर्गिक रुपातच हातात टाकून एकाच मातेच्या उदरातून प्रसवलेल्या म्हणजे सख्ख्या भाऊंन सारखे पुष्पक्रम असेना कां परंतु, व्यवहारिक जीवनात अबोली सारखे नाजुक नसून एक टिकून राहणाऱ्या गुणाचे, सहजच न कोमजणारे म्हणजे सरळतेने न चेंचणें जाणारे फूल आहे. ठीक त्याचप्रमाणे जसे आमचा हिंदूधर्म जो कित्येक परचक्रांना झेलून देखील समाप्त झाला नाही, टिकलेला आहे, अनादि आहे, अनंत आहे, सनातन आहे. याच प्रकारे झेंडूचे फूल पण सगळ्यात आधी कोठे उमळले? कोठ पर्यंत उमळत राहणार आहे! अशा प्रकारचे प्रश्न निरर्थक असून ते पण अनादि आहे, अनंत आहे.

झेंडूचे फूल जे फूलांचा समुच्चय आहे च्या सगळ्यात बाहेर हिरव्या पाना सदृश्य रचनेनी बनलेली कपा सारखी रचना असते, जिस इन्वाल्यूकर म्हणतात. ही रचना या फूलांना एकजुट ठेवण्याचे काम करते. अचूक त्याच प्रमाणे ज्या प्रमाणे की, हिंदुत्व. जो हिंदूधर्मसमुच्चयाच्या धर्मांना एक रचनेत ठेवतो, जोडून ठेवतो आणि जसे इन्वाल्यूकरला जर का तोडून दिले गेले किंवा या फूलांना इन्वाल्यूकर पासून वेगेळे करुन दिले गेले तर हा पुष्पसमूह हळू-हळू विखरुन जाईल. तसेच जर कां या हिंदुत्वास नष्ट-भ्रष्ट करुन दिले गेले किंवा आम्हीं त्यांस सोडून दिले, आम्हांस त्यापासून वेगळे करुन दिले गेले तर, हे सारे भारतोद्‌भव धर्म जे या धर्मसमुच्चयाचा भाग आहे विखरुन जातील आणि परिणाम ....

झेंडूच्या बाहेरील परिघात जे किरण पुष्पक असतात, त्यांत सूर्य किरणांचा भास होतो, वरपांगी असतात. जर कां ते नसते तर झेंडूने आपली सर्व सुंदरता गमावली असती. उपर्युक्तांची तुलना हिंदूधर्माशी या प्रकारे केली जाऊ शकते की, जे किरण पुष्पक आहेत ते आमच्या धर्मसमुच्चयाचे धर्म विचारांचे प्रतीक आहेत जे पूर्ण विश्वाला सूर्या सारखे आलोकित करित आहेत, प्रेरणा देत आहेत, मार्गदर्शन करित आहेत. या सूर्यप्रकाशाला पसरविण्या करिता प्राचीनकाळात आमचे पूर्वज ऋषि, मुनि, धर्मप्रचारक बाहेर पडले आणि आपल्या ज्ञानानी संपूर्ण विश्वाला आलोकित केले.

झेंडूच्या केंद्रात डिस्क पुष्पक असतात. यांत पाकळ्या आणि अंकुर असतात या बरोबरच नर-मादा जननांग देखील. हे पूर्ण पुष्प असतात आणि वंशवृद्धि करतात. या झेंडू सारखेच आमच्या धर्मसमुच्चयाच्या केंद्रात आहे आमची परधर्म सहिष्णुता, सगळ्या धर्मांच्या धार्मिक स्वतंत्रतेची मान्यता. ज्यानुसार सगळ्यांना आप-आपल्या धर्मपालनाची स्वतंत्रता त्याच्या केंद्रात आहे आमची ही मान्यता -

1). 'आकाशात्‌ पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्‌। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रति गच्छति।। अर्थात्‌ आकाशातून पडलेले (पावसाचे) पाणी (नद्यांद्वारे) समुद्रात जाऊन मिळते, त्याप्रमाणे कोणत्याही देवाला केलेला नमस्कार केशवास जाऊन पोचतो. 2). न देवो विद्यते काष्ठे, न पाषाणे, न मृण्मये। भावे हि विद्यते देवः, तस्माद्‌ भावो हि कारणम्‌।। अर्थात्‌ देव हा लाकडात, दगडात किंवा मातीत (म्हणजे त्यांनी बनविलेल्या मूर्तीत) नसतो. देव हा भक्तिभावातच असतो. 'देव भावाचा भुकेला", 'भाव तोचि भगवंत।" म्हणून भक्तिभाव हेच उपासनेचे कारण होय. 3). श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैव अवधार्यताम्‌। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचेरत्‌।। अर्थात्‌ धर्मात जे काय आहे ते सारे ऐका आणि ऐकून लक्ष्यात ठेवा - 'आपल्याला ज्या गोष्टी प्रतिकूल म्हणजे दुःख देणाऱ्या असतील त्या इतरांच्या बाबतीत आचरु नयेत, लोकांनी आपणास जे करु नये असे आपल्याला वाटते, तसे आपण दुसऱ्याला करु नये. जसे आपण तसे इतर, ही आत्मौपम्य दृष्टी, हे धर्माचे सार होय.  

ह्या शिकवणीमुळेच आमच्या येथे एकाच कुटुंबात शैवांच्या शिवाची तर वैष्णवांचा देव विष्णुच्या अन्य अवतारांची पूजा-उपासना एकाच वेळेस एकमेकांबरोबर केली जाऊ शकते, केली जाते. एकाच कुटुंबातील सभासद वेग-वेगळ्या धर्माचे पालन करु शकतात. कोठे ही कशाही प्रकारची कोणतीही बाधा आणली जात नाही. हिंदूधर्मात झालेले अनेकविध धर्मप्रवर्तक, ऋषि, मुनि, अवतार, धर्मवीर, हुतात्म्यांनी याच उदात्त परंपरांना पुढ़े वाढ़विले, क्षरणापासून रोखले, रक्षा केली, धार्मिक-सामाजिक क्षेत्रांशी संबंधित वेगवेगळ्या विचारांना पुढ़े पसरविले, दृढ़ता दिली, त्यांत सुधार करुन वृद्धि केली, गौरव दिला.

ह्या मुळेच स्वतःच्या देशात त्रस्त आणि पीडल्या गेल्या मुळे पलायन करुन आलेल्या ज्यू आणि पारशी धर्मांना पण आमच्या येथे आश्रय मिळाला. फळफळण्याची संधि मिळाली. हेच वैशिष्टय झेंडूच्या फूलाचे पण आहे. झेंडूच्या फूलावर जेव्हा कोणी फूलपाखरु किंवा मधमाशी सारखे बाहेरील सभासद येतात तेव्हा त्यांना मकरंदाच्या रुपात थोडे-थोडे प्रेम सगळ्या फूलांकडून मिळते व खूप फळफळण्याचा आशीर्वाद देखील. झेंडूच्या फूलाच्या पाकळ्या छोट्या-मोठ्या, टोकदार, पसरट असतात तसेच लहान-मोठ्या, तीक्षण टोचणाऱ्या इत्यादी सगळ्या प्रकारच्या धर्मविचारांना, त्यांच्या प्रवर्तकांना आमच्या येथे स्थान मिळालेले आहे आणि ज्या प्रकारे झेंडूच्या फूलाचे रोपटे सगळ्या फूलवाल्या रौपट्यांमध्ये सगळ्यात मोठे व विकसित कुळ आहे त्याच प्रकारे सगळ्या धर्मात हिंदूधर्म सगळ्यात प्राचीन, सनातन, उदात्त आणि विकसित आहे.

याच श्रंखलेत एक फळ संत्रे पण येते. ज्याचे वरील कडक, लवचिक, आकर्षक चमकदार साल हिंदुत्वा सारखेच आहे ज्याकडे सगळेच आकर्षित होतात. तसेच जेव्हा वीर सावरकरांचे हिंदुत्व दर्शन सगळ्यांसमोर आले तेव्हा त्याच्या प्रकाशाने सगळ्यांचे डोळे दिपले. स्वामी श्रद्धानंद, महामना पंडित मदनमोहन मालवीय, संघसंस्थापक डॉ. हेडगेवार सारखी लोक आकर्षित आणि प्रभावित झाली होती.

संत्र्याच्या आतील रसदार गर जो फोडींच्या रुपात असतो त्या फोडी हिंदूधर्मसमुच्चयात सामील विभिन्न धर्मां सारख्या आहेत तथा त्या फोडींमध्ये भरलेला रुचकर रस हिंदुधर्मसमुच्चयाचे तत्त्वपूर्ण धर्मविचार आहेत. रसदार गरा मध्ये उपस्थित कडक बिंया हिंदुधर्मसमुच्चयाचे विभिन्न धर्मांचे धर्मप्रवर्तक, विचारक, समाजसुधारक महापुरुष आहेत ज्यांनी त्या धर्माला श्रेष्ठता कष्ट सहन करुन अडचणींचा सामना करुन दिली. समाजाच्या हिता करिता त्यांच्या विचारांचा हार न मानता प्रचार-प्रसार केला.

संत्र्याच्या फोडींच्या वरील पातळ आवरणरुपी साल प्रत्येक भारतोद्‌भव धर्माला दुसऱ्या भारतोद्‌भव धर्मापासून वेगळे करण्याचे विरळ से आवरण मात्र आहे आणि मुख्य आवरण तथा या झिरझिरीत आवरणाच्या मधील वरील तंतु त्या सगळ्या विभिन्न धर्मरुपी फोडीं आपसात आणि मुख्य आवरण हिंदुत्वाशी पण जोडून ठेवण्यात सहायक सिद्ध होणारे सर्वसाधारण सण-वार, रीति, परंपरा आहेत. ज्या सगळ्यांच्या सर्वसाधारण मान्यतांच्या एकतेला दर्शविण्या बरोबरच हे पण दर्शवितात की, ते एकाच बीजापासून उत्पन्न झालेल्या हिंदुत्वरुपी वृक्षाच्या शाखा आहेत.

आता आम्ही त्या हिंदुत्वावर येतो ज्याचे यशगान इतक्या वेळापासून आम्ही गात आहोत जे सगळ्या भारतोद्‌भव धर्मांना जोडून आहे. हिंदुत्वाचे दर्शन देणारे हिंदूराष्ट्राचे उद्‌गाते वीर सावरकरांप्रमाणे - हिंदू या शब्दापासून इंग्रजी मध्ये 'हिंदुइझम" (हिंदूधर्म) हा शब्द बनविला आहे. त्याचा अर्थ हिंदू लोक ज्या धर्ममतांना वा मार्गांना अनुसरतात ती धर्ममते वा मार्ग. जेव्हाकि हिंदुत्व हा हिंदूधर्मापेक्षा अधिक संग्राहक शब्द आहे. हिंदूधर्म या शब्दाप्रमाणे हिंदूंच्या केवळ धार्मिक अंगाचाच त्यात समावेश होत नसून त्यात हिंदूंच्या सांस्कृतिक, भाषिक, सामाजिक व राजकीय अंगाचाही समावेश होतो. येथेच हे सांगणे ही योग्य ठरेल की, पैगंबर महंमदाच्या जन्मापूर्वी नव्हे तर अरब हे एक 'लोक" म्हणून ओळखले गेल्यापूर्वी हे प्राचीन राष्ट्र आपणाकडून व इतरांकडून सिंधू वा हिंदू ह्या स्वाभिमानी नावाने ओळखले जात होते. अरबांनी सिंधू नदीचा शोध लावला हे म्हणणे जितके खरे तितके अरबांनी ह्या शब्दाचा शोध लावला हे म्हणणे आहे.

हिंदू शब्द मूलतः देशवाचक, राष्ट्रवाचक आहे. याचे मुख्य अधिष्ठान आसिंधु-सिंधू अशी ही भारतभूमिका आहे. 'आसिंधूसिंधू"  अशा त्या भारतभूमिकेत अत्यंत प्राचीनकाळापासून ज्यांचे पूर्वज परंपरेने निवसत आले, ज्या राष्ट्रात प्रचलित असलेली सांघिक संस्कृति, घडलेला इतिहास, बोललेल्या भाषा, अनुसरलेले धर्म; ज्यांची संस्कृति, इतिहास, भाषा, धर्म आहेत ते सारे हिंदू होत. त्या हिंदूराष्ट्राचे घटक होत. वैदिककाळापासून निदान पाच सहस्त्र वर्षे तरी आपले पूर्वज आपल्या लोकांचा धार्मिक, वांशिक, सांस्कृतिक नि राजकीय दृष्ट्या एकात्म असा गट घडवून आणित होते त्या क्रियेला स्वाभाविकपणे विकास पावता-पावता जे फळ आले ते म्हणजे वैदिककाळातील त्या सिंधूचेच आज संबंध हिंदुस्थानभर पसरलेले आणि हिंदुस्थानालाच आपली एकमेव पितृभू व पुण्यभू मानीत असलेले असे हिंदूराष्ट्र होय.

सावरकरांच्या या हिंदूराष्ट्राचा व हिंदूधर्माचा जरा देखील संबंध नाही. त्यांच्या बुद्धिवादी दृष्टिकोणानुसार ते 'हिंदू लोकांचे न्याय्य अधिकार सुरक्षित ठेवणारा राष्ट्र याप्रकारचा व्यापक अर्थ घेतात." त्यांच्या हिंदूराष्ट्राचा दुसरा अर्थ बहुसंख्य लोकांचे राष्ट्र. या अर्थानी  'बहुसंख्यकत्वच राष्ट्रीयत्व आहे," याप्रकारचा लोकतांत्रिक सिद्धांत ते प्रस्तुत करतात. हिंदू बहुसंख्यक असल्यामुळेच हिंदुत्वच बहुसंख्यकत्व आहे, असे त्यांचे म्हणणे आहे. याच अर्थाने 'हिंदुत्व हेच राष्ट्रीयत्व आहे," अशा प्रकारचा सिद्धांत ते प्रस्तुत करतात.  या सिद्धांताचा अर्थ अहिंदुंना राष्ट्रीयत्व नाही असा होत नाही. अहिंदू अल्पसंख्य आहेत इतकीच वस्तुस्थिति दाखवून देणे या सिद्धांताचे काम आहे. बहुसंख्यकांना अल्पसंख्य बनविणे राष्ट्रीयत्वाच्या विरोधात आहे, हे प्रखरपणे दाखवून देण्याकरिता या सिद्धांताला प्रस्तुत केले गेले आहे. पुनश्च या हिंदुत्वाचा हिंदूधर्माशी कोणत्याही प्रकारच संबंध नाही।

दुसरीकडे मध्यपूर्वात जे मजहब उमळले, विकसित झाले ते वनस्पतीशास्त्राच्या घुंगुर मोगरा (जास्मिन सॅमबॅक) फूला सारखे होते. मोगऱ्याचे फूल ओलेसिया कुळाचे मानले जाते. घुंगुर मोगरा फूलाची रचना एकात एक ठेवलेल्या पेल्या सारखी असते. चळतीतून एक पेला काढ़ला की जसे स्वतंत्र पेला असतो तसेच मूळ ज्यू धर्मातून निघालेला ख्रीस्ती रिलीजन वेगळा म्हणजे स्वतंत्र असतो. याप्रकारेच त्याच चळतीतून निघालेला इस्लाम सुद्धा त्याप्रकारेच न केवळ वेगळा आणि स्वतंत्रच होत नाही तर पूर्वीच्या धर्मांशी जणू भयंकर शत्रुतेचेच नाते ठेवतो. म्हणूनच म्हणावे लागत आहे की शेवटच्या प्रेषितांच्या इस्लाम मजहबची ही उत्पत्ति आज मात्र त्याच मूळ मोगरा (जास्मिन सॅमबॅक) फूलाशी सारे संबंध तोडून पूर्णपणे कुळ बदलून कण्हेरीचे गुणधर्म घेऊन बसली आहे. संस्कृत भाषेचा कर्णिकार, इंग्रजीचा ओलिएंडर आणि वनस्पतीशास्त्रानुसार थेवेशिया नेरीफोलियाच्या रुपात ओळखली जाणारी ही वनस्पती म्हणजे केवळ कण्हेर पुष्पच नाही तर त्याची सारी अंगेच विषारी आहेत. इथपर्यंत की, असे म्हटले जाते की त्याच्या जवळपास साप देखील फटकत नाही. वनस्पतीशास्त्रानुसार हा विषारी पदार्थ ग्लाइकोसाईडच्या रुपात असतो. एकूण रोपाच्या अंग-अंगातून निघणारा दुधा सारखा रस (मिल्की लेटेक्स), रोपाचे मूळ, बीं सगळे काही विषारी, इतकच नव्हे तर त्याच्या फूलाला जास्त वेळ हुंगणे देखील घातक तर रोपाला जाळल्यावर निघणारा धूर सुद्धा आरोग्यावर प्रतिकूल प्रभाव टाकणारा मानला जातो. तर आता कालाय तस्मै नमः म्हणून शांत बसायचे की .........

Saturday, March 31, 2012

''सगळ्या प्राण्यांना मैत्रीच्या दृष्टीने बघा."" यजुर्वेद

    हिंदूधर्म वेदांवर आधारित आहे. तो हे शिकवितो की मनुष्य तर मनुष्य प्रत्येक प्राण्याला पण मित्राच्या दृष्टीने बघा. म्हणजे प्राण्यां बरोबर चांगूलपणाचा प्रेमाचा व्यवहार करा. दूसरीकडे प्रेम, दया आणि (नाममात्र) सेवेचा उद्‌घोष करणारा ख्रिश्चन धर्म आहे. ज्याचे धर्मगुरु पोप जॉन पॉल खख यांचे हे वक्तव्य लक्षात घेण्याजोगे आहे. ''My Religion Takes You to Heavon, Yours to Hell."" (Organiser 9-1-05) विचारणीय हे आहे की खरोखरच देव इतका पक्षपाती आहे ! नक्कीच नाहीं. नैतिकतेच्या दृष्टीने हे विधान असहिष्णू आणि तिरस्करणीय आहे आणि ख्रिश्चिनिटीच्या खऱ्या तत्वाचे दर्शन यात होते. तर याच्याही दोन पाऊल पुढ़े याच सेमेटीक परंपरेचा धर्म 'इस्लाम" आहे जो स्वतःला 'दीन-ऐ-कामिल" (संपूर्ण धर्म) म्हणवितो. म्हणजे जगाच्या शेवटा पर्यंत यात कशाही प्रकारचा बदल शक्य नाही. कुराण भाष्य म्हणते ः''या धर्मास याच स्वरुपात कियामती पावेतो कायम रहावयाचे आहे व जगातील समस्त जाति समूहांकरिता हाच मार्गदर्शनाचा मीनार आहे."" (दअ्‌वतुल कुराण खंड 1 पृ.352) हा इस्लाम धर्म तर संपूर्ण मनुष्य जातिलाच ईमानवाले म्हणजे मुस्लिम आणि काफिर म्हणजे बिगर मुस्लिम या दोन भागात वाटून (कुराणाची सूर मुजादला मध्ये स्पष्टपणे माणसांना दोन विभागात विभागून काफिरांना ''शैतानाचा पक्ष (Hisb-Ush-Shaitan)"" (आयत 19) तर मुस्लिमांना ''"अल्लाहचा पक्ष (Hizbulla)"" (आयत 22) म्हटले गेले आहे.) मुस्लिमांना नेहमी करिता जन्नत (स्वर्ग) तर काफिरांना नेहमी करिता जहन्नम (नरकाग्नी) मध्ये राहण्याचा हुकूम सुनवितो. ह्या वचनांची कुराणात पुनः पुनः पुनरावृत्ती झाली आहे आणि हा हुकूम या करिता आहे की अल्लानी संपूर्ण जगाच्या सगळ्या जातीं करिता इस्लामला मार्गदर्शनाचा मीनार म्हटले आहे तरी पण काफिर इस्लामचा स्वीकार करावयास तैयार नाहीं.

    कुराणाचे निरीक्षण केल्यावर ज्ञात होते की कुराणाच्या एकूण 114 सूरहांपैकी 101 सूरहां (अध्यायां) मध्ये जन्नत आणि दोजख (नरक) मिळण्या संदर्भातील उल्लेख आढ़ळतात. कुराणाच्या एकूण 6239 आयातींपैकी सुमारे 1590 आयाती या संबंधीच्या आहेत. विश्वास बसत नाहीं ना !  तर पहा कुराणाच्या काही आयाती ज्यां मध्ये काफिरांना मिळणाऱ्या नरकाच्या शिक्षेचे वर्णन आहे ः''त्याच्या पुढ़े जहन्नम आहे आणि त्याला पीप-रक्त पाजले जाईल ज्यास तो एकेक घोट करुन पील परंतु घशाखाली सहजगत्या उतरवू शकणार नाहीं. मृत्यु प्रत्येक दिशेने त्याच्यावर ओढ़वेल परंतु तो मरु शकणार नाहीं आणि पुढ़े अत्यंत कठोर शिक्षेला त्याला तोंड द्यावे लागेल."" (इब्राहिम 16,17) ती कठोर शिक्षा कशा प्रकाराची असेल त्याचे वर्णन पुढ़ील प्रमाणे ः''लवकरच मी त्याला दोजख मध्ये दाखल करीन.....ना बाकी ठेवील आणि ना सोडील. त्वचेला भाजून टाकणारी."" (मुद्दस्सिर 26-29) (या आयाती उघडपणे सार्वजनिक ठिकाणी धर्मप्रचार करण्या करिता पै. मुहम्मदाला अल्ला कडून संदेश देण्या करिता जी पहली सूरह अवतरित झाली होती त्यातील आहेत.) ''जेंव्हा कधी असे होईल की त्यांच्या शरीराची त्वचा शिजून निघेल, तेंव्हा आम्हीं तिच्या जागी दुसरी त्वचा निर्माण करु म्हणजे ते (चांगल्या प्रकारे) शिक्षेची गोडी चाखतील."" (निसा 56) ''त्यांच्याकरिता जहन्नमचाच बिछाना असेल व वरुन पांघरुणही त्याचेच असेल."" (अअराफ 41)''त्यांच्याकरिता आगीचे पोषाख बेतविले गेले आहेत. त्यांच्या डोक्यावर उकळते पाणी टाकले जाईल ज्यामुळे त्यांच्या पोटात असलेल्या वस्तू व त्यांची चामडी गळून पडेल."" (हज्ज 19-22) कुराणात म्हटले गेले आहे की काफिरांना खायला जक्कूमचे (काटेरी) झाड दिले जाईल ''ते असे झाड आहे जे जहन्नमच्या तळा पासून उगते. त्याचे फळाचे घोस असे आहेत जणू सैतानाची मुंडकी ते याला खातील आणि उदर भरण करतील. मग यावर त्यांना प्यायला गरम पाणी दिले जाईल. मग त्यांचे परतणे जहन्नमच्या आगी कडे होईल.'' (अस्सफ्फात 62-68) अशा स्वरुपाच्या आयातींनी कुराण ओसंडून वाहत आहे.

    काफिरांचा नरकात जाण्याचा नियम इतका अचूक आहे की यातून पैगंबराचे पूर्वज, आई-वडील आणि वडिलां सारखे काका अबू तालिब ज्यांनी पैगंबराचा 40 वर्ष सांभाळ केला होता पण अपवादस्वरुप वाचू शकले नाही. या संबंधी हदीसपण आहेत आणि कुराणाची सूर तौबाची आयत 113 मध्ये स्पष्टपणे म्हटले गेले आहे की ः''पैगंबर आणि ईमान बाळगणाऱ्यास हे साजेसे नाही की त्यांनी अनेकेश्वरवाद्यांकरिता माफीची प्रार्थना करावी मग ते त्यांचे नातेवाईक का असेनात, जेंव्हा त्यांना स्पष्ट कळून चुकले आहे की ते जहन्नमवाले होत.""  कुराणात तर हे पण म्हणते की ''आणि यांच्यापैकी जो मरेल त्याची नमाज (जनाजा) तुम्ही मुळीच पढ़ू नका आणि ना कधी त्याच्या कबरीवर उभे राहा, कारण त्यांनी अल्ला व त्याच्या पैगंबराशी कुफ्र केले व अशा स्थितीत मेले की ते आज्ञा भंग करणारे होते."" (तौबा 84) या आयतीवरच्या दअ्‌वतुल कुराण खंड1च्या अधिकृत भाष्यात म्हटले गेले आहे की ः''कबरीवर उभे राहण्याचा" अर्थ कबरीवर जाऊन मृतासाठी क्षमा प्रार्थना करणे व दया-भावना प्रकट करणे होय. हा मनाई हुकूम ज्या प्रकारे दांभिकांबाबत आहे तद्‌वतच काफिर, अनेकेश्वरवादी व नास्तिकाकरिताही आहे; कारण जे लोक मरे पर्यंत काफिर राहीले ते अल्लाचे शत्रू होत आणि अल्लाच्या शत्रूंकरिता ईमान (श्रद्धा) बाळगणऱ्यांच्या मनात कोमल भाव असू शकत नाही."" (पृ.667) आणि असणे पण कसे शक्य आहे, का की कुराणच असे शिकविते की काफिर अल्लाच्या नजरेत ''अतिरेक करणारे (बकर 190) अनाचारी (बकर 205) कृतघ्न (हज्ज 38) वचनभंग करणारे (अनफाल 58) अप्रामाणिक व दुराचारी (निसा 36) ऐट करणारे  व घमेंड बाळगणारे (निसा 36) अत्याचारी (इमरान 57) गलीच्छ (बकर 28) अल्लाचा इंकार करणारे (अवज्ञाकारी) (इमरान 32)"" म्हणजे इस्लाम कुबूल न करणारे आहेत, म्हणून अल्ला पसंत करीत नाही.

    हाच अल्ला त्याच्या 'दीन-इस्लामला" मानणाऱ्या त्याच्या अनुयायांना म्हणजे मुसलमानांना आपले सदगुण रहमान व रहीम मुळे इतका उपकृत करतो की निःसंकोच, विशेष आढ़ेवेढ़े न घेता त्यांना सरळ जन्नतच्या (स्वर्गाच्या) देणग्या प्रदान करतो. या देणग्या कोणत्या, याची माहिती खूपच मजेदार आहे ज्यांचे वर्णन कुराणात भरपूर आहेत. स्वर्गाच्या आनंद-वार्ता सांगणाऱ्या काही आयाती निरीक्षणार्थ हजर आहेत ''त्याच्या करिता दोन (जन्नतच्या) बागा असतील. दोन्हीं बागा विपुल फांद्या बाळगणाऱ्या असतील.... दोन्हीं मध्ये दोन झरे वाहत असतील.... यात प्रत्येक मेव्याचे दोन प्रकार असतील ... ते अशा बिछान्यांवर तक्के लावून बसतील, ज्यांची अस्तरे जाड रेशमाची असतील आणि बागांची फळे खाली लोंबकळत असतील.... यात लज्जाशील नजरा बाळगणाऱ्या (हूर) असतील, ज्यांना यांच्या पूर्वी एखाद्या माणसाने किंवा जिन्नांने स्पर्श केला नसेल."" (रहमान 46 ते 56) पुढ़ील वर्णन बघा ''देणगी युक्त बागांमध्ये रत्नजडीत आसनांवर समोरासमोर तक्के लावून (बसले असतील) यांच्या जवळ अशी मुले ये जा करत राहतील जी सदैव त्याच अवस्थेत राहतील. प्याले आणि मद्य व वाहत्या मद्याचे प्याले घेऊन. ज्यामुळे न कैफ चढ़ावा आणि ना बुद्धि लयाला जावी. आणि मेवे जे पसंत करतील. आणि पक्ष्यांचे मांस जे त्यांना आवडत असावे आणि यांच्या करीता सुंदर नयनांच्या हूर असतील. जणू सुरक्षित ठेवलेले मोती. ..... यां (च्या पत्न्यांना) आम्हीं विशेषत्वाने उभारले असेल. आणि त्यांना कुमारीका बनविले असेल. प्रिय आणि समवयस्क."" (वाकेअ 12 ते 36) ''आणि सुंदर डोळ्यांच्या अप्सरांशी आम्हीं त्यांचा विवाह करुन देऊ."" (दुखान 54) सूर बकर च्या 25 क्रमांकाच्या आयाती मध्ये म्हटले आहे की ''या शिवाय या बागां मध्ये त्यांच्यासाठी पवित्र पत्न्या असतील आणि त्या मध्ये ते सदैव राहतील."" 

    संक्षेपात, इस्लामची संकल्पना मनुष्यांना दोन भागात 'काफिर आणि ईमानवाले (म्हणजे मुसलमान)" यां मध्ये वाटून आणि त्यांना नेहमी करीता प्रदान केल्या जाणाऱ्या नरक आणि स्वर्गाच्या जवळपास फिरत राहते. ज्यात काफिरांची भूमिका संसाराच्या निकृष्टतम प्राण्याची आहे. जसे की कुराणाच्या सूर अनफाल च्या 55 क्रं.च्या आयातीत म्हटले गेले आहे ''निःसंशय अल्लाह जवळ सर्वात निकृष्ट जनावर असे लोक होत ज्यांनी कुफ्र केले व ईमान बाळगले नाही ''या आयतीवर कुराण भाष्य म्हणते ''जो माणूस कुफ्रचा मार्ग पत्करतो तो बुद्धि व सुज्ञतेने काम घेत नाही. किंबहुना अंध बनतो व स्वतःला मानवतेच्या दर्जापासून खाली फेकून जनावरांपेक्षाही खालच्या थराला नेतो."" (द.कु.ख.1 पृ.607) केवळ भाष्यच नाही तर कुराण स्वतः अशा काफिरां बद्दल म्हटते ''हे बहिरे, मुके आणि आंधळे आहेत. आणि म्हणून काही समजू शकत नाही."" (बकर 171) ''यांच्या जवळ ह्रदये आहेत परंंतु त्या द्वारे ते ऐकण्याचे काम करीत नाही. त्यांच्या जवळ डोळे आहेत परंतु त्याद्वारे पाहण्याचे काम करीत नाही, त्यांच्या जवळ कान आहेत पण त्याद्वारे ते ऐकण्याचे काम करीत नाही. ते जनावरांसारखे आहेत. किंबहुना त्यांच्याहूनही अधिक भटकलेले."" (अराफ 179) कुराण इतक्यावरच थांबत नाही तर काफिरांना चेतावणी पण देते ''आणि जो कोणी इस्लामखेरीज दुसऱ्या कोणत्याही धर्माचा इच्छुक असेल तर तो त्याच्या कडून कधीही स्वीकारला जाणार नाही. आणि आखिरत मध्ये त्याचे मनोरथ विफल होतील."" (इमरान 85) कुराणात कियामतीच्या वर्णनात म्हटले आहे की ''अरेरे ! हा मोबदल्याचा दिवस आहे. हा तोच निर्णयाचा दिवस होय, ज्याला तुम्ही खोटे ठरवित होता. एकत्रित करा अत्याचारींना व त्याच्या सहकाऱ्रंना आणि त्यांना देखील, ज्यांची हे भक्ति (आराधना) करीत असत."" (तुस्सफ्फाति 20-23) 

    धर्म तर सगळ्यां करीता म्हणजे विश्वाच्या परमार्था करीता, विश्व कल्याणा करीता असतो, पण हा 'दीन-ए-इस्लाम" तर असा विलक्षण धर्म आहे की जो म्हणतो तर स्वतःला 'बंधुत्वाचा" धर्म पण त्याचे 'बंधुत्व" केवळ मुस्लिम समाजा पुरतेच. का की तो केवळ स्वतःच्या अनुयायिनांच ''उत्तम समाज (खैर-उम्मत)"" (इमरान 110) ''मध्यममार्गी समाज (उम्मते-वसत) (बकर 143)"" या आधारावर म्हणतो की ''हाच समाज सत्य धर्मावर कायम आहे."" (दु.कु.ख.1 पृ.225) स्वतःला 'अंतिम सत्य धर्म" आणि स्वतःच्या पैगंबरला 'अकिब" समजतो. ज्याच्या नंतर आता कोणताही नवा धर्म येणार नाही आणि कोणताही पैगंबर पण. जसे की कुराणातच म्हटले गेले आहे ''मुहम्मद अल्लाहचे रसूल (पैगंबर) आणि अखेरचे नबी होत."" (अहजाब 40) म्हणजेच दीन (इस्लाम धर्म) आता पूर्णत्वाला पोहचला आहे आणि आता कशाही प्रकारचा सुधार किंवा बदल शक्य नाही. म्हणूनच कुराण भाष्य म्हणते ''निखालस एके श्वरवादाचे स्वरुप असलेल्या इस्लाम धर्मा खेरीज इतर कोणत्याही धर्मा कडे किंचित मात्र लक्ष देणे ही ईमानास कंपित करते आणि समस्त धर्माच्या सत्य असण्या विषयीची कल्पना तर नितांत मार्गभ्रष्टता होय."" (द.कु.ख.3 पृ.1431) पुढ़े कुराण भाष्य म्हणते की ''समस्त धर्म त्याला आवडते आहेत मोठ्या धारीष्ट्याची बाब होय. आणि असा मनुष्य अतिशय दुराचारी व सर्वात मोठा अत्याचारी होय."" (1671) म्हणून ''जीवनाला धार्मिक व निधर्मी अशा दोन वर्गात विभागून अल्ला व त्याच्या प्रेषिताच्या कित्येक फैसल्यांना कौटुंबिक, आर्थिक व राजकीय जीवनाशी संबंधित आहेत रद्द बातील ठरविणे आणि सेक्युलर जीवन पद्धतिचा अवलंब करणे म्हणजे इस्लामशी उघड प्रतारणा करणे होय."" (1495) शेवटी भाष्य चेतावणी देते की ''सर्वधर्म समभावच्या सत्या व असत्यामध्ये कसलाच भेद ना पाळणाऱ्या दृष्टिकोणास मोठ्या मनमोहक शैलीत सादर करणारे जे लोक इस्लाम व कुफ्रचे मिश्रण तैयार करु इच्छितात त्यांनी तिळमात्र अशी अपेक्षा बाळगू नये की त्यांना कुराणाचे समर्थन लाभू शकेल."" (पृ.2396) आता वाचकांनी स्वतःच विचार करावा की सर्वधर्मसमभावाच्या गोष्टी किती हास्यास्पद आणि पोकळ आहेत.