Thursday, June 20, 2013

सूत ना कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा क्यों?

भारत के फिल्म इतिहास के दो लीजेंड हैं दिलीपकुमार और देवआनंद। दिलीपकुमार जिन्होंने अपने लाजवाब अभिनय से ट्रेजेडी किंग का खिताब हासिल किया और देवआनंद जो सदाबहार ऐव्हरग्रीन चाकलेटी हीरो के रुप में जाने गए, मेटिनीकिंग के रुप में नवाजे गए। लेकिन दिलीपकुमार ने उम्रदराज होने के बाद भी अपने आदर-सम्मान को बरकरार रखा क्योंकि कब रिटायर हो जाना चाहिए इसका भान उन्होंने समय रहते रखा। वहीं देवआनंद भले ही अपने अंतिम समय तक फिल्म निर्माण के काम में लगे रहे और लोगों ने उनके बिना थके या निराश हुए फ्लाप फिल्मों की झडी (1980 में अपनी अंतिम सफल फिल्म देस-परदेस के बाद उनकी कोई भी फिल्म सफल नहीं हुई) लगाने के बावजूद अपनी लगन व समर्पण के कारण फिल्में बनाते रहने की जीजीविषा की सराहना की। परंतु अपनी नाती की उम्र की हीरोइनों के साथ हीरो के रुप में काम करते रहने और बुढ़ापे का असर चेहरे चाल-ढ़ाल में दिखने के बावजूद हीरो के रुप में डटे रहने के कारण अंततः वे हास्य के पात्र ही बने और अपना वह सम्मान जिसके वह वास्तव में हकदार थे खो बैठे।

जो हाल देवआनंद का हुआ वही हाल अब आडवाणी का हो रहा है। माना कि वे आज भी पूरी तरह स्वस्थ एवं कार्यक्षम हैं परंतु, जमाना बदल गया है, वे अब चूक गए हैं समय रहते उन्हें रिटायर हो स्वयं होकर पार्टी के मार्गदर्शक की भूमिका में आकर युवा नेतृत्व के लिए स्थान रिक्त कर देना था। परंतु उन्होंने किया क्या जब स्पष्ट दिख रहा था कि पार्टी धीरे-धीरे मोदी के पीछे लामबंद होती जा रही है, ऐसे समय में बीमारी का बहाना बनाकर कोपभवन में जा बैठना, बाद में इस्तीफे का ब्रह्मास्त्र चलाना फिर पीछे घूम की स्थिति में आ जाना, अपन पराजीत हो गए हैं कि स्थिति में स्वयं को लाना आडवाणी जैसे तपे-तपाए राजनीतिज्ञ ने जो इतना विचारवान और कुशाग्र हो कि आठ माह पूर्व साक्षात्कार में दिए हुए उत्तर के बाद आज की तारीख में दिए हुए उत्तर में ऐसा कोई विरोधाभास नजर आए कि कोई स्पष्टीकरण देना पडे या गलतफहमी पैदा हो, ऐसा कभी होते दिखा नहीं ऐसा परिपक्व आजीवन अपने ध्येय के लिए समर्पित रहनेवाला राजनेता स्वयं को हंसी का पात्र बनवा लेनेवाला इस प्रकार का उपक्रम, जब स्पष्ट दिख रहा था कि मोदी का प्रभाव बढ़ गया है करेगा ऐसा लगा नहीं था। परंतु ऐसा हुआ और वे फजीहत को प्राप्त हुए।

लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को कराची में एक खुशहाल उच्चमध्यमवर्गीय परिवार में ज्येष्ठ पुत्र के रुप में हुआ। उनका मूल नाम लाल और पिता का कृष्ण परंतु कालांतर में उसका हो गया लालकृष्ण। उनकी शिक्षा कराची के प्रसिद्ध सेंट पॅट्रिक्स स्कूल में हुई इस कारण प्रारंभ में उन पर फादर एवं नन्स के संस्कार हुए। उनके एक मामा रामकृष्ण मीरचंदानी थे जो कांग्रेस का कार्य करते थे परंतु उनके जीवन पर मामा के विचारों का कोई प्रभाव नहीं पडा। घर में किसी भी तरह का सामाजिकता का भान न होने के बावजूद वे रा.स्व.से. संघ की ओर आकृष्ट हुए। 1942 में 15 वर्ष की अवस्था में आडवाणी अपने ननिहाल हैदराबाद आए और वहां राम कृपलानी के घर की छत पर लगनेवाली संघ की शाखा में अपने चचेरे भाई प्रीतम और एक अन्य रिश्तेदार हीरु के साथ मात्र उत्सुकतावश गए। वहां शामलाल का बौद्धिक था और विषय था 'हिंदुत्व"। आडवाणी को संघकार्य का महत्व समझ में आया और वे हमेशा के लिए संघ के सच्चे स्वयंसेवक बन गए।

इसी दौरान उन्होंने एक पुस्तक पढ़ी 'ऐ वार्निंग टू द हिंदू सोसायटी" जिसे मूलतः एक ग्रीक परंतु विवाहोपरांत हिंदू बन चूकी विद्वान महिला 'सावित्रीदेवी" ने लिखा था। इस ग्रीक महिला ने इस पुस्तक में इशारा दिया था कि, 'तुम जाग जाओ। अभी भी समय गया नहीं है। ब्रिटिशों (ईसाई) के केवल राजनैतिक ही नहीं तो सांस्कृतिक आक्रमण के कारण जिस प्रकार से ग्रीक संस्कृति रसातल में चली गई उसी प्रकार से हिंदू संस्कृति भी रसातल में चली जाएगी। इसलिए हिंदुओं अब तो भी जाग जाओ। सामने की परिस्थिति का सामना करो।" इस पुस्तक एवं शामलाल के बौद्धिक के विचारों के कारण आडवाणी के जीवन की दिशा ही बदल गई। और शिक्षा छोड संघ प्रचारक बनने का निर्णय उन्होंने 1946 में ले लिया। उस समय वे इंजीनियरिंग के द्वितीय वर्ष में पढ़ रहे थे। इसी वर्ष वे नागपूर में संघ के तृतीय वर्ष के शिविर के लिए आए थे उनके साथ केदारनाथ साहनी, के. आर. मलकानी भी थे। संघ के घोष पथक में वे बांसुरी बजाया करते थे। अधिकाधिक बच्चों पर संघ संस्कार हो सके इसके लिए वे कराची के मॉडल हायस्कूल में शिक्षक की नौकरी करने लगे।

विभाजन के पश्चात 12 सितंबर 1947 को चोरी-छिपे हवाई मार्ग से भेस बदलकर हमेशा के लिए भारत आ गए और 1952 में जनसंघ की स्थापना के पश्चात राजस्थान में जनसंघ का कार्य करने लगे। बाद में प्रचारक का कार्य छोडकर 'ऑर्गनायजर" में पत्रकारिता करने लगे। आपको आश्चर्य होगा परंतु,1964 में ऑर्गनायजर में वे सिनेमा विषयक स्तंभ लिखने लगे। आयु के 37वें वर्ष 1965 में वे कमलाजी से विवाहबद्ध हो गए। उन्हें एक पुत्र जयंत एवं पुत्री प्रतिभा है। उनके परिवार से कोई भी राजनीति में  सक्रिय नहीं है।

उनका इतिहास गवाह है कि वे परास्त जरुर होते रहे हैं परंतु, हताश नहीं। इसलिए वर्तमान में नजर आ रही उनकी हार को हार मान लेना भूल करना होगा। जिन्होंने विभाजन की त्रासदी भोगने के बाद निर्वासित के रुप में भारत आकर 1948 में गांधी हत्या के बाद संघ पर आए भयंकर संकट का सामना एक प्रचारक के रुप में किया हो, 1952 में 3, 1957 में 4, 1962 में 14 सांसद पार्टी के चुने गए, ऐसे संघर्षपूर्ण काल में अडिग रहकर सतत बिना विचलित हुए कार्य करते आपातकाल रुपी विपरीत काल भी देखा और भोगा भी। 1984 में 2 सीटों पर पहुंच गई पार्टी को 2 से 186 तक का सफर तय करवाया हो जिनकी पार्टी पर इतनी पकड थी कि पार्टी में अटल टू आडवाणी और आडवाणी टू आडवाणी के अलावा अन्य कोई पार्टी अध्यक्ष वह रुतबा ही हासिल नहीं कर पाया जो आडवाणी का था। वह निश्चय ही इतनी जल्दी हार मानकर हताश हो, अपनी उपेक्षा सह अपमान का घूंट पीकर चुप बैठ जाएंगे, प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी छोड देेंगे लगता नहीं।

जिन मुद्दों को उठाकर आडवाणी ने इस्तीफा दिया था वे तो उनके कार्यकाल में भी मौजूद थे लेकिन तब वे उन्हें नजर नहीं आए और आज अचानक नजर आने लगे। राजनीति के इस माहिर खिलाडी द्वारा इस्तीफा देकर पार्टी को धर्मसंकट में डालना फिर वापिस लेना एक सोची समझी रणनीति ही नजर आती है भले ही इससे पार्टी की साख को बट्टा लग गया हो । इस बदलते परिवेश में पार्टी के अंदर अपने समर्थन में कौन, किस प्रकार के और कितने हैं तथा पार्टी के बाहर अपने पक्ष में कौन खडे हो सकते हैं, अपनी मान्यता कितनी है का जायजा लेने के लिए अपनाई गई एक रणनीति है। मोदी की प्रधानमंत्री के लिए चल रही घुडदौड में बाधा डालना मात्र है। हां उनके इस कदम से यह जरुर हो गया है कि मोदी को तत्काल प्रधानमंत्री पद का पार्टी प्रत्याशी घोषित करना हालफिलहाल टल गया है और भविष्य में लिए जानेवाले फैसलों में उनकी सलाह जरुर ली जाए ऐसी परिस्थिति निर्मित करने में वे सफल हो गए हैं। वर्तमान में वे सभी पदों पर बने हुए हैं।

इसके पूर्व सन्‌ 2005 में जिन्ना की तारीफ में कसीदे पढ़ना भी अपनी छबि बदल स्वयं को सेक्यूलर कहलवा पार्टी के बाहर अपनी मान्यता बढ़ाने का एक उपक्रम ही तो था। परंतु यह प्रयास सफल हो, चर्चित हो उसके पूर्व ही पार्टी में हुए भारी विरोध के कारण वे अपनी छबि को धक्का जरुर पहुंचा बैठे। वैसे अभी उन्होंने जो रणनीति अपनाई है उसका परिणाम तो चुनाव बाद ही नजर आएगा। परंतु, अब परीक्षा की घडी तो मोदी की है जिन्हें चुनाव प्रचार प्रमुख के रुप में पार्टी को इतनी सीटें जीतवाकर लाना है कि सरकार बनाने के लिए अन्य छोटी-मोटी पार्टियां उनके साथ स्वयं होकर जुडें और एक वृहत्तर एनडीए का गठन हो उनका प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हो सके। वरना इतिहास फिर से दोहराए जाने कि संभावना है कि गठबंधन के लिए सर्वमान्य नेता के रुप में आडवाणी को ही चुना जाए। भले ही आज एनडीए विघटित होते दिख रहा हो परंतु, भाजपा को सबसे अधिक सीटे मिलने की स्थिति में हालात बदल भी सकते हैं। नए दल जुड भी सकते हैं। वैसे जो भी होगा वह तो भविष्य के गर्भ में ही छिपा हुआ है।

लेकिन अपनी अतिमहत्वाकांक्षा की जद में आकर वह यह भूल बैठे कि जिस आक्रमकता के लिए वे जाने जाते थे वह आक्रमकता अब गायब हो गई है। पार्टी मूलतः ही जुझारु एवं आक्रमक प्रवृत्ति की है और जब भी वह आक्रमक स्थिति में आती है आपसी फूट, विवादों को भूलकर एकजुट हो विजय के पथ पर अग्रसर होती है। 90 के दशक की आक्रमकता अब आडवाणी में रही नहीं है, वे पार्टी कार्यकर्ताओं में वह जोश भी नहीं भर सकते जो वे भर दिया करते थे और पार्टी अब पुनः 90 के दशक के मार्ग पर बढ़ चली है इसलिए अब पार्टी कार्यकर्ता भी उनके पीछे नहीं आक्रमक मोदी के पीछे हैं।

'गांधीनु गुजरात को मोदीनु गुजरात" में बदलनेवाले नरेंद्र मोदी के बारे में सबसे पहले विहिप के अशोक सिंघल ने कहा था- 'मोदी आज नेहरु जितने ही लोकप्रिय हैं।" यह लोकप्रियता मोदी ने लोगों की इच्छाओं आकांक्षाओं पर सवार होकर हासिल की है और जब कोई नेता यह सफलता हासिल कर लेता है तो उस नेता की इच्छाएं आकांक्षाए, संकल्पनाएं जनता की हो जाती हैं और वह नेता के पीछे चलना प्रारंभ कर देती है। यह सफलता हासिल करनेवाले मोदी का जन्म गुजरात के मैहसाणा जिले के वडनगर में 17 सितंबर 1950 को हुआ था। शालेय जीवन में ही वे संघ के प्रचारक बन गए। शीघ्र ही वे अ.भा. विद्यार्थी परिषद के अध्यक्ष बने। आपातकाल में उन्होंने सरकार विरोधी पत्रक बांटने का काम किया। पॉलिटिकल साइंस में वे स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त है। 1987 में गुजरात भाजपा में प्रवेश कर एक ही साल में पार्टी महासचिव बने। 1995 में भाजपा को सत्ता प्राप्त होने पश्चात वे राष्ट्रीय  सचिव बने और पांच राज्यों की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। 1998 में दिल्ली की सत्ता भाजपा को दिलाने में उनका अहम योगदान था। आडवाणी की अयोध्या यात्रा और मुरलीमनोहर जोशी की एकता यात्रा के प्रबंधन की धुरा उन्होंने ही सफलतापूर्वक संभाली थी। गुजरातियों की अस्मिता जागृत करने में सफलता प्राप्त करने के कारण ही आज मोदी गुजरात में अजेय है इसके लिए उन्होंने महान स्वतंत्रता सेनानी श्यामजीकृष्ण वर्मा के अस्थि कलश की यात्रा निकालने जैसा कार्य भी किया। 

मोदी गुजरात में अजेय कैसे बने और आज राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें जो भारी लोकप्रियता प्राप्त है वह उन्हें कैसे मिली उसके भी कुछ कारण और विश्लेषण इस प्रकार हैं-

1. भुज के भूकंप के समय केशुभाई मुख्यमंत्री थे और कुशासन-भ्रष्ट प्रशासन के कारण लोग इतने बेहाल हो गए थे कि लोग कटाक्षपूर्वक कहने लगे थे कि, यदि कांग्रेस को जीतना है तो वह प्रतिदिन प्रार्थना करे कि केशुभाई मुख्यमंत्री बने रहें वे अपनेआप चुनाव जीत जाएंगे। परंतु, नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री बन गए और पासा पलट गया भाजपा फिर से सत्ता में आ गई। इसके बाद उन्होंने विकास और सुशासन की वो लहर चलाई कि उनके विरुद्ध सांप्रदायिकता कासतत धुआंधार प्रचार करनेवाले भी इस मामले में उनके मुरीद हो गए।

2. मोदी कभी पार्षद का चुनाव तक नहीं लडे बल्कि सीधे मुख्यमंत्री बने लेकिन संगठन पर पकड और संगठन को खडा करने के लिए वे गांव-गांव घूमे थे और इसी कारण 1984 में चली राजीवगांधी की आंधी में भी उन्होंने पार्टी को गुजरात में टिकाए रखा। अपनी इसी क्षमता एवं योग्यता के कारण मुख्यमंत्री बनने के बाद सफलता पूर्वक प्रशासन पर अपनी पकड बना ली और गुजरात को विकास की राह पर ले आए।

3. उनके द्वारा गुजरात में किए गए चौतरफा विकास, दंगारहित एवं शांत गुजरात, जहां कानून-व्यवस्था की स्थिति उत्तम है महिलाएं आम जनता अपनेआपको सुरक्षित महसूस करते हैं, औद्योगिक शांति एवं बिजली, पानी, सडक, शीघ्र भूमि उपलब्ध हो जाती है के कारण देश के शीर्ष उद्योगपति एवं युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार उपलब्ध होने के कारण युवा तक आज उनके सबसे बडे समर्थक बन गए हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार युवाओं के समर्थन के तीन कारण हैं- अ). वे एकमात्र नेता हैं जो पाकिस्तान द्वारा की जा रही हरकतों का करारा जवाब दे सकते हैं। ब). वे एकमात्र नेता हैं जो निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं। स). वे ही ऐसे नेता हैं जो देश को प्रगति के पथ पर ले जा सकते हैं।

लेकिन यह भी एक बहुत बडा सच है कि गुजरात पहले से ही एक विकसित एवं सुसंपन्न राज्य रहा है, अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थित का भी उसे बहुत लाभ मिलता चला आया है, लेकिन विपक्ष एवं तथाकथित सेक्यूलर मीडिया द्वारा सांप्रदायिकता के नाम पर उनके खिलाफ इतना शोर मचाया गया कि सारे देश-विदेश के लोगों का ध्यान मोदी और गुजरात की आकर्षित हो गया और इसीके कारण उनके द्वारा किए गए विकास के कार्य लोगों की नजरों में चढ़ गए। इसमें मोदी का मीडिया प्रबंधन कौशल भी बहुत काम आया जिसमें वे अत्यंत माहिर हैं यह उनका मीडिया प्रबंधन कौशल ही है कि उन्होंने खुद होकर कभी भी नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं पर मीडिया एवं विपक्ष ही सबसे अधिक शोर मचा रहा है कि वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, वे प्रधानमंत्री बन गए तो बडा भारी अनर्थ हो जाएगा।

जब भी किसी राजनेता के विरुद्ध सब लोग लामबंद होकर गरियाने लगते हैं तो जनता का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हो जाता है और लोग आगे होकर दोनो ही पक्षों के ही कार्यों पर नजर रख उनका मूल्यांकन करने लगते हैं, उसके साथ सहानुभूति रखने लग जाते हैं। याद कीजिए जनता पार्टी का शासन काल उस समय इंदिरा गांधी के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया था नतीजा क्या हुआ इंदिराज सत्ता में ढ़ाई साल में ही लौट आई। यही सोनिया गांधी के मामले में भी हुआ। लेकिन इससे सबक सीखने की बजाए वही इतिहास मोदी के साथ दोहराया जाने लगा उसका लाभ भी मोदी को मिला। परंतु, यही लाभ वे अपने अतिअहंकार, गर्वोक्तियों एवं अशालीन तथा अतिआक्रमक भाषा के कारण कहीं गंवा ना दे।

4. मोदी पर आरोप है कि उन्हें बडी जल्दी मची है प्रधानमंत्री बनने कि तो इसके भी कारण हैं हर अपने आपको योग्य समझनेवाला राजनेता प्रधानमंत्री बनने की चाह रखता है और ऐसी चाह रखनेवालों में आडवाणी, नीतिशकुमार से लेकर कई राजनेता शामिल हैं। परंतु, इस दौड में मोदी भारी इसलिए नजर आ रहे हैं क्योंकि इस समय सबसे बडे करिश्माई व्यक्तित्व के धनी वे ही हैं उनके पीछे जनाधार भी नजर आ रहा है, सर्वेक्षणों में भी उन्हें ही बढ़त मिलती नजर आ रही है। आज की तारीख में उन्हें जितनी लोकप्रियता हासिल है वह अटलजी को तो प्रधानमंत्री बनने के बाद ही हासिल हुई थी। इसीका लाभ वे उठाना चाहते हैं।

सोशल साईट्‌स पर भी मोदी ही छाए हुए हैं। ऊपर जिन कारणों की चर्चा की गई है वे गुजरात के संदर्भ में तो ठीक हैं परंतु वे ही कारण राष्ट्रीय स्तर पर भी सटिक बैठेंगे क्या, यह एक प्रश्न ही है! सबसे पहली बात तो यह है कि आज जो मोदी मोदी का शोर चारों तरफ है वह चुनावों तक यथावत रह भी पाएगा क्या? जिस जनाधार की चर्चा की गई है वह देश के कई प्रदेशों में जबरदस्त जातिगत राजनीति के चलते बरकरार रह पाएगा? वह मतदानवाले दिन मतों में बदलकर मोदी को समर्थन दिला पाएगा? यह सब तो नतीजों के आने के बाद ही पता चल पाएगा। कांग्रेस कौनसे मुद्दों पर चुनाव लडेगी, कौनसी रणनीति अपनाएगी यह भी सामने आना है, यह भी देखना पडेगा कि तीसरा मोर्चा बनता भी है या नहीं उसमें कौन-कौन से दल होंगे, वे क्या रणनीति अपनाते हैं, चुनावों से पहले व चुनावी नतीजों के बाद कौन किस पाले में जाता है, आदि।

सबसे वरिष्ठ नेता आडवाणी 2009 में असफल सिद्ध हो चूके हैं, भाजपा में मोदी जितने जनाधारवाले राजनेता नजर भी नहीं आ रहे हैं। सत्तारुढ़ दल के कुशासन एवं घोटालों से लोग तंग आ चूके हैं इसीका लाभ उठाने के लिए मोदी ने आक्रमक रुख अख्तियार कर लिया। परंतु, आडवाणी भी अपनी वरिष्ठता, पार्टी के लिए किए गए त्याग, तपस्या, बलिदान का प्रतिफल चाहते हैं, वे यह भी जानते हैं कि मिलीजुली सरकारों के युग में एनडीए में अपनी सेक्यूलर छवि बनाने के लिए एवं स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए किए प्रयत्नों के कारण गठबंधन के नेता के रुप में उनकी स्वीकार्यता मोदी से अधिक है और मोदी भी वर्तमान हालात को अपने लिए सुनहरा मौका मान दौड में सबसे आगे निकलने की फिराक में हैं इसीलिए आज जब कब चुनाव होंगे तक का किसी को पता नहीं है फिर भी 'सूत ना कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा जारी" की कहावत चरितार्थ की जा रही है।


Friday, June 7, 2013

इस्लाम में मूर्तिभंजन की परंपरा
इस्लाम मूर्तिपूजा का निषेध करता है। क्योंकि, इस्लाम की मान्यता है कि, ईश्वर एक ही है और वह अल्लाह है, इसके अलावा अन्य कोई ईश्वर नहीं इस एकेश्वरवाद पर श्रद्धा रखना यह इस्लाम का पहला और मूलभूत सिद्धांत है। मूर्तिपूजा का विरोध इस सिद्धांत का उपसिद्धांत है। क्योंकि, मूर्ति को मानना मतलब एकमेव अल्लाह के सिवाय अन्य देवी-देवताओं को मानना है अथवा अल्लाह के एकाध प्रतिस्पर्धी को मानना है यानी अनेकेश्वरवाद/बहुदेववाद को मानना है और यही विवाद का मुद्दा भी है।

कुरान मूर्तिपूजा को सबसे बडा धर्मद्रोह, गंदगी मानती है और उसका कठोरता से निषेध करती है। कुरान की आयत 22ः30 में कहा गया है- ''बुतों (मूर्तियों) की गंदगी से बचो।"" इस आयत पर दअ्‌वतुल कुर्आन का भाष्य इस प्रकार है : ''बुतों की गंदगी से तात्पर्य आस्था एवं आचरण की वह गंदगी है जो मूर्तिपूजा के फलस्वरूप पैदा होती है। ऐसे लोेग व्यर्थ के भ्रमों, अंधविश्वासों और मानसिक निकृष्टता में लिप्त रहते हैं। मनुष्य के अंतर्मन को पाक साफ रखने वाली चीज एकेश्वरवाद की धारणा और ईमान ही है। बहुदेववाद तो मनुष्य के अंर्तमन को गंदगियों से भर देता है।'' (दअवतुल कुरान खंड 2 पृ. 1131) इसीलिए कुरान का सम्पूर्ण और मुख्य जोर शिर्क (अनेकेश्वरवाद) एवं मूर्तिपूजा नष्ट करने पर है।

एकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा विरोध इन दोनो ही प्रमुख बातों को मुहम्मद साहेब उन्हें पैगंबरत्व प्राप्त होने के पूर्व से ही मानते थे। एक बार उन्होंने स्पष्ट किया था कि, 'जन्म से ही मैंने मूर्ति के प्रति गहरा द्वेष और बैरभाव पाल रखा है।" मक्कावासी कट्टर मूर्तिपूजक थे और उन्हें मूर्तिपूजा का विरोध कदापि सहने होनेवाला नहीं था यह बात मुहम्मद साहेब अच्छी तरह जानते थे इसलिए प्रारंभ में उन्होंने अपने इस्लामधर्म का प्रचार अपने निकटस्थों में गुप्त रुप से किया। तीन वर्षों में उन्हें केवल 33 अनुयायी मिले। तीन वर्षों पश्चात उन्हें खुले प्रचार का संदेश अल्लाह से प्राप्त हुआ जो इस प्रकार से है

 ः ''ऐ (वही यानी आयत के प्रभाव से) चादर ओढे हुये (पैगंबर!) उठो और लोगों को सचेत करो, और अपने परवरदिगार की बडाई (का बखान) करो, और अपने कपडों को पाक रखो, और (मूर्तिपूजा की) नापाकी से अलग रहो। और (इहसान से) जियाद: बदला पाने के लिए किसी पर इहसान न करो, और अपने परवरदिगार (की कुदरत) पर सब्र रखो। फिर (उस कियामत के दिन) जब सूर (नरसिंहा) फूंका जायगा, तो वह दिन (श्रद्धाहीनों के लिए) बडा कठीन होगा। कि उसमें श्रद्धाहीनों को (यानी गैर-मुस्लिमों के लिए) आसान न होगा।"" (74:1-10)

असत्य धर्म के विषय में तटस्थ रहकर अथवा गुप्त रुप से प्रचार करके नहीं चलेगा बल्कि सत्य धर्म की विजय के लिए खुले रुप से प्रचार करना होगा। ऐसा अल्लाह का संदेश था। इसी समय आगे का संदेश भी अवतरीत हुआ : ''(नहीं), बल्कि हम (यानी अल्लाह) सच को झूठ पर खींच मारते हैं तो वह उसके सिर को कुचल देता है फिर वह (झूठ) उसी दम मटियामेट हो जाता है। (और लोगों !) तुम जैसी बातेें बनाते हो उससे तुम्हारी ही खराबी है ।'' (21:18) ''पस जो तुमको आज्ञा हुई है उसे खोलकर सुना दो । ''(15:94) इस प्रकार के प्रचार की परिणिती मूर्तिभंजन में होना थी और आगे चलकर शक्ति संपन्न होने पर वह हुई भी।

वैसे भी मूर्ति के प्रति द्वेष और भंजन तो सेमेटिक (यहूदी, ईसाई, मुस्लिम) धर्मों की परंपरा ही है और इन तीनों के ही समान पूर्वज हैं इब्राहीम जिनकी सारे पूर्व पैगंबरों में सर्वाधिक प्रशंसा कुरान में की गई है। मुहम्मद साहेब, इब्राहीम के चालीसवें वंशज थे, ऐसा माना जाता है। इब्राहीम के दो लड़के थे, इस्माईल और इसहाक। दोनों ही बाद में पैगंबर बने। इस्माईल से आगे जो वंश तैयार हुआ वह मुस्लिमों का था। वे मुस्लिमों के पैगंबर बने। इसहाक से जो वंश तैयार हुआ वह यहूदी लोगों का था। वे यहूदियों के पैगंबर बने। बाइबल में उनका नाम अब्राहम है। इस प्रकार ये तीनों ही धर्मों के श्रद्धेय पैगंबर हैं। कुरान का कहना है :''और कौन है जो इब्राहीम के दीन से मुंह फेरे, सिवा उसके जो अपने को बिल्कुल बे अकली के सुपुर्द कर दे । और बेशक हमने इब्राहीम को दुनिया-लोक में चुन लिया, और आखिरत (परलोक) में (भी) वह सदाचारियों में होंगे । जब उनसे उनके पालनकर्ता ने कहा कि (मेरे) आज्ञाकारी (मुस्लिम) बनो, (तो जवाब में) निवेदन किया कि मैं सारे संसार के स्वामी का आज्ञाकारी (मुस्लिम) हुआ... इब्राहीम अपने बेटों को वसीयत कर गए, कि ऐ मेरे बेटो! बेशक अल्लाह ने इस दीन को तुम्हारे लिए पसंद फरमाया है तो तुम मुस्लिम (अल्लाह के अनुवर्ती) होने की हालत ही में मरो।'' (2:130-132) अर्थात्‌ इस्लाम धर्म मूलत: इब्राहीम को बताया हुआ है।

उन्होंने मार्गदर्शन स्वरुप क्या किया वह कुरान में इस प्रकार से आया हुआ है ः''फिर (इब्राहीम ने एक दिन उन लोगों की गैर मौजूदगी में उन)बूतों को (तोड़-फोड़कर) टुकड़े-टुकड़े कर दिया""(21ः58) जब मूर्ति एवं मूर्तिपूजा से इतनी घृणा है तो स्पष्ट है कि, उसके पूजकों से घृणा होगी ही होगी वे निंदा के पात्र, घृणास्पद होंगे ही। कुरान में कहा गया है ः''अल्लाह के नजदीक सबसे खराब वह जीव है (worst of beasts) जो कुफ्र (इस्लाम से इंकार) करते हैं, फिर वह श्रद्धा नहीं लाते ।""(8:55) वैसे ही (8:22) ''(अल्लाह को छोड़कर) शैतान को पूजनेे लगे थे, तो यही लोग दर्जे में खराब ठहरे, और सीधी राह से बहुत दूर भटक गए।""(5:60) ''उन्होंने (इब्राहीम ने) अपनी कौम (मूर्तिपूजक लोगों) से कहा कि हम तुमसे और जिनको तुम अल्लाह के सिवाय पूजते हो उनसे विमुख हैं । और हममें और तुममें दुश्मनी और बैर हमेशा के लिए खुल पड़ा।""(60:4) इसी कारण से इब्राहीम के वंशज ईसाई और मुसलमान हम मूर्तिपूजकों को पैगन-काफिर कहकर हमें निकृष्ट समझते हैं, नरकगामी समझते हैं और दोनो ने ही हिंदुस्थान में मूर्तिभंजन किया है।

इतने स्पष्ट आदेश होने के बावजूद तथाकथित सेक्यूलर विद्वान इस्लाम और उसके अनुयायियों को पाक साफ समझते हैं तथा उनको मूर्तिभंजन के आरोपों से बचाने के लिए नए-नए और अजीबोगरीब तर्क गढ़ने से बाज नहीं आते। विगत दिनों जब दक्षिण भारत में एक प्रसिद्ध मंदिर से अकूत खजाना मिला तो इन्हीं तथाकथित सेक्यूलरों में से एक ने एक लेख लिखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मंदिरों के इस प्रकार के अकूत धन को लूटने के लिए ही मुहम्मद गजनी जैसे इस्लामधर्मी हिंदुस्थान में आए, आक्रमण किया और रही बात मूर्तिभंजन की तो वह कश्मीर में राजा हर्षवर्धन और उसके मंत्री ने भी किया था।

यहां हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि यह राजा हर्षवर्धन अपवाद है जिसने मूर्तिभंजन किया और मंदिरों को लूटा और उसने जो कुछ किया उसके लिए उसे कोई धार्मिक आदेश नहीं था। यह हमारी परंपरा नहीं। हमारे यहां तो आद्य शंकराचार्य इधर तो अद्वैत का दर्शन देते हैं उधर मूर्तिपूजकों के लिए भी सिद्ध मंत्रों की रचना करते हैं किसी तरह का कोई द्वेष नहीं। आर्य समाज के स्वामी दयानंद सरस्वती एकेश्वरवादी होकर मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं परंतु, मूर्तिभंजन करो का न तो कोई आदेश देते हैं ना ही स्वयं करते हैं। जबकि इसके विपरीत स्वयं मुहम्मद साहेब ने मूर्तिभंजन किया भी और मूर्ति को लूटने का कार्य भी उन्हीं के पैगंबरत्व काल में हुआ था जो उन्हीं के इस्लाम के अनुयायियों ने इस प्रकार से दर्ज कर रखा है-

मक्का विजय के बाद पैगंबर तत्काल ही पवित्र काबागृह गए । वहां पवित्र 'काले पत्थर" का भक्तिभाव से अभिवादन किया, प्रेम से चुंबन लिया, 'अल्लाह हो अकबर' (अल्लाह सर्वश्रेष्ठ है) की घोषणा की। उसके बाद उन्होंने परंपरानुसार काबागृह की सात बार परिक्रमा की काबागृह में कुल 360 मूर्तियां थी। अनेक देवी-देवताओं के, पूर्व पैगंबरों के चित्र थे। पैगंबर ने उनके हाथ की लकड़ी से निर्देश किया। उस अनुसार उनके आदेश पर प्रत्येक मूर्ति इस तरह फोड़ डाली गई कि तोडी गई मूर्ति नीचे जमीन पर मुंह के बल   गिरे। भग्न मूर्तियों का ढ़ेर हो गया। प्रत्येक मूर्ति को तोड़ते समय और नीचे गिराते समय पैगंबर बड़ी जोरों से कुरान की यह आयत कहते थे :'सत्य प्रकट हो गया और असत्य मिट गया, बेशक असत्य तो मिटनेवाला होता ही है।" (17ः81, 34:49) 

इस प्रकार सारी मूर्तियां कुछ ही समय में मिट्‌टी में मिला दी गई,  इस्लाम के अनुसार मूर्ति याने अल्लाह को आव्हान था; अल्लाह से स्पर्धा करना था, वह अल्लाह से विद्रोह था; वह अल्लाह विरोधी गुनाह था। इस कार्य में आज काबागृह तक ही सफलता मिली थी। वहां हुबल की जो प्रमुख और प्रचंड मूर्ति थी, वह पैगंबर ने अली के कंधों पर खड़े रहकर स्वयं के हाथों से फोड डाली। उसके जमीन पर गिरने पर टुकड़े कर दिए गए। उसके बाद इस स्थान पर के चित्र नष्ट किए गए। उनमें इब्राहीम, इस्माईल, इन पैगंबरों के और मेरी के चित्र भी थे। चित्र नष्ट करते समय पैगंबर ने प्रार्थना की : 'अल्लाह इन श्रद्धाहीनों का नाश करेे।" इसके बाद शहर भर में डोंडी पिटवाई गई कि : 'जो कोई अल्लाह पर और अंतिम निर्णय दिन पर श्रद्धा रखता है, वह उसके घर में कोई भी मूर्ति न रखे यदि हो तो उसे नष्ट कर डाले।" पैगंबर ने मक्कावासियों का आवाहन किया कि, वे एकमेव अल्लाह को मानें; उन्हें अल्लाह के पैगंबर के रुप में मान्य करें; श्रद्धा अर्पण करें, उनकी आज्ञा का पालन किया जाए। 

संक्षेप में,लोग श्रद्धावान बनें; इस्लाम का स्वीकार करें ऐसा आवाहन किया गया। मक्का विजय के संबंध में वे आगे बोले : 'अल्लाह ने अपना वचन पूर्ण किया और उसके दासों की मदद की। उसने अकेले ही सारी शत्रु सेना को धूल चटा दी। सभी पुराने गर्व, बदला लेने के और रक्त के बदले के सभी अधिकार आज मेरे पैरों तले हैं ...ऐ कुरैश लोगों ! अल्लाह ने श्रद्धाहीनता का अभिमान नष्ट किया है। तुम्हारे अज्ञान काल का सारा अभिमान और उच्च कुल का गर्व आज मिट्‌टी में मिल गया है। सभी मनुष्य इसी मिट्‌टी से जन्मे हुए आदम के ही वंशज हैं।"

इसी प्रकार से तायफ शहर की जीत के बाद पैगंबर ने निर्णय दिया था कि, 'इस्लाम और मूर्ति एक साथ रह नहीं सकते। (सभी) मूर्तियों को एक दिन के अंदर मटियामेट कर दिया जाए।" मूर्ति और मंदिर नष्ट करने के लिए भूतपूर्व मक्का प्रमुख अबू सुफियान और एक को नियुक्त किया गया। उन्होंने तायफ जाकर वहां स्थित अल-लात की भव्य मूर्ति गेंती की चोटें मारकर चकनाचूर कर दी। अपनी इस मूर्ति की यह दशा देखकर शहर की औरतें छाती पीटकर आक्रोश करके रो रही थी। उस मंदिर में बहुत सारी संपत्ति और मूर्ति पर बहुत कीमती ऊंंचे दर्जे के जेवरात थे। मूर्ति फोड़ी जाने वाली है यह मालूम होते हुए भी मूर्ति को दु:ख पहुंचेगा इसलिए वे जेवरात वहां के लोगों ने नहीं उतारे। मूर्ति फोड़ने के लिए गए हुओं ने वह संपत्ति और जेवरात अपने कब्जें में ले लिए। मूर्ति फोड़ने के बाद वहां की संपत्ति लूटने का यह पहला ही उदाहरण था। मक्का विजय के समय भी वहां की सम्पत्ति लूटी नहीं गई थी। पैगंबर के बाद के समय में भर इस्लाम का प्रसार, मूर्ति का भंजन और वहां की संपत्ति की लूट इन तीनों घटनाओं का एक दूसरे में मिश्रण हो गया था।


मुहम्मद साहेब ने जो कुछ किया वह सुन्नत है और उस सुन्नत का पालन करना मुस्लिमों का आदर्श है। इसीलिए आज भी मुसलमान जब भी मौका मिलता है मूूर्तिभंजन से बाज नहीं आते और समय-समय पर होेनेवाले दंगों या होनेवाली सांप्रदायिक घटनाओं में इस आदर्श को आचरण में लाकर दिखलाते रहते हैं। वैश्विक स्तर पर तो ऐतिहासिक महत्व की अफगानिस्तान की बामियान मूर्तियों को ध्वस्त करने का और हाल ही में मालदीव के संग्रहालय की प्राचीन मूर्तियों को भग्न करने का पराक्रम दिखाने का श्रेय भी इन्हीं इस्लाम के बंदों को जाता है।

Monday, May 27, 2013

सावरकरजी के बुद्धिवाद की उपेक्षा क्यों?

जिस प्रकार से सूर्य के प्रकाश में विविध रंगों की छटा समाई होती है उसी प्रकार से बहुमुखी प्रतिभा के धनी सूर्य समान सावरकरजी के तेजस्वी विचारों में भी विविध प्रकार की समाजहितकारी बुद्धिगम्य विचारों की छटा बिखरी हुई दृष्टिगोचर होती है और वह भी इतनी कि क्या ये विचार एक ही व्यक्ति के हैं का प्रश्न किसी के भी सम्मुख उपस्थित हो सकता है। उनके भक्तों एवं अनुयायियों के लिए तो वे एक श्रद्धास्थान ही हैं और वे प्रायः हिंदुत्वनिष्ठ ही हैं और वे आग्रहपूर्वक उनकी हिंदुत्वनिष्ठा को ही बताने में लगे रहते हैं व उनके बुद्धिवाद के बारे में बोलना टालते हैं जबकि सावरकरजी एक प्रखर बुद्धिवादी थे।

सावरकरजी के बुद्धिवादी विचारों का आकर्षण इन हिंदुत्ववादियों को कभी भी नहीं रहा है। क्योंकि, शुरु में ही उनके यह ध्यान में आए बगैर नहीं रहता कि बुद्धिवाद और हिंदुत्ववाद परस्पर विरोधी हैं। इसलिए उनके बुद्धिवाद पर वे मौन रहना ही पसंद करते हैं। और रही बात विरोधियों की तो उनके लिए सावरकरजी का हिंदुत्वनिष्ठ होना ही पर्याप्त होता है। इस प्रकार से सावरकरजी का बुद्धिवाद दोनो ही पक्षों द्वारा उपेक्षित है।

सावरकरजी का हिंदुराष्ट्र धर्माधिष्ठित (चातुर्वर्णाधिष्ठित हिंदूधर्म पर) ही होगा यह मानकर चलने के कारण और सावरकरजी के विज्ञाननिष्ठ निबंधों में भी हिंदूराष्ट्र शब्द आने के कारण ये विरोधी यह मानकर ही चलते हैं कि सावरकरजी इस राष्ट्र को मध्ययुग में ले जाना चाहते थे और ऐसा व्यक्ति भला बुद्धिवादी हो ही कैसे हो सकता है? इसी सोच के कारण ये विरोधी सावरकरजी का समावेश बुद्धिवादी विचारकों में करने को तैयार नहीं होते और इसका कोई खेद भी उनके भक्तों-अनुयायियों को नहीं होता यह एक विडंबना ही है।

सावरकरजी एक तत्त्वज्ञ होने के साथ ही साथ एक नेता भी थे। एक तत्त्वज्ञ अपने विचार सुसूत्रबद्ध और सुसंगत पद्धति से प्रस्तुत करता है जो उसके तत्त्वों से संलग्न होते हैं और उनको प्रस्तुत करने के स्तर की भाषा कितनी भी उंचे स्तर की हो सकती है। परंतु, एक नेता की भाषा, उसके विचारों की प्रस्तुति के स्तर को एक तत्त्वज्ञ का स्तर नहीं लगाया जा सकता नेता को उसके अनुयायियों की बोली भाषा में बोलना पडता है। यदि नेता के व्यवहारिक विचारों को तात्त्विक विचारों की कसौटी पर कसा जाने लगे तो उसे बडे ही निचले स्तर का तत्त्वज्ञ ठहराया जा सकता है और यही सावरकरजी के साथ भी हुआ है।

भारत में विचारकों की दो परंपराएं हैं। पहले में वे आते हैं जिन्होंने प्रखर बुद्धिवाद का समर्थन किया और समाज की रचना को आमूलाग्र रुप से बदलना चाहिए की भूमिका ली। इनमें महात्मा फुले, आगरकर, नेहरु, अंबेडकर आदि आते हैं। समाज को धर्ममुक्त करना चाहिए इस विचार का उन्होंने समर्थन किया। इस मंडली को भारत के इतिहास, धर्म, परंपराओं पर प्रखर गर्व नहीं था। ये प्रखर राष्ट्रवाद के प्रति नहीं अपितु उदारवाद की ओर झुकाव रखनेवाले लोग थे।

दूसरी परंपरा में लोकमान्य तिलक, स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविंद जैसे धार्मिक व प्रखर राष्ट्रवादी आते हैं। इस मंडली को अपने भारत के इतिहास पर बडा जबरदस्त गर्व था। राष्ट्रवाद जिस इतिहास, संस्कृति, परंपरा पर खडा होता है उसे पहली परंपरा वाले संकुचित समझते थे। उन्होंने राष्ट्र क्या है, राष्ट्र का आधार कौनसा होता है, एकात्म राष्ट्र के घटक कौनसे होते हैं आदि का कभी गंभीरतापूर्वक विचार ही नहीं किया। राष्ट्र, राष्ट्रवाद का विचार तो अपरिहार्य होने के कारण उन्हें करना पडा। उनका विश्वास तो इस पर था कि, समता, बंधुता, न्याय आदि के तत्त्वों पर सभी मानवों को एकत्रित किया जा सकता है। कुछ का तो विश्वास केवल आर्थिक समता या समाजवाद के आधार पर सभी को एकत्रित किया जा सकता है पर था। एकात्म राष्ट्र इन्हीं तत्त्वों के आधार पर खडा किया जा सकता है, ऐसा यह समझते थे। ये प्रादेशिक राष्ट्रवाद को माननेवाले हैं। धर्म, वंश, जाति संस्कृति, भाषा आदि के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव करने को अपने देश में वे बुद्धिवाद के विरोध में और संकुचित समझते थे।

परंतु, प्रखर राष्ट्रवादियों की भूमिका इनके ठीक उलट थी। ये धर्म, संस्कृति, परंपरा, इतिहास में गहरी श्रद्धा रखते थे, इस पर उन्हें गर्व था। इनकी भूमिका यह थी कि, हमारा धर्म, तत्त्वज्ञान, संस्कृति विश्व में सबसे श्रेष्ठ है। धर्मचिकित्सा इन्हें मान्य नहीं थी। उन्हें इस बात पर गर्व था कि, हमारे तत्त्वज्ञान में मानव को अध्यात्म के सर्वोच्च स्तर पर ले जाने का सामर्थ्य है।ये मामूली से सुधारों के साथ पुराने को टिकाए रखने की प्रवृत्ति रखते थे। इनके प्रखर राष्ट्रवाद का आधार धर्म, संस्कृति, इतिहास था यानी जिसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है उसका समर्थन इन्होंने किया। इनके द्वारा प्रस्तुत सिद्धांत के अनुसार देश प्रेम यानी इस देश के इतिहास, धर्म, संस्कृति, परंपराओं से प्रेम। ये दोनो ही परंपराएं मोटे तौर पर परस्पर विरोधी हैं।

सावरकरजी इनमें से किसी भी परंपरा में नहीं आते। सावरकरजी ने पहली परंपरा के प्रखर बुद्धिवाद को स्वीकारा तो दूसरी परंपरा के हिंदुत्वनिष्ठ राष्ट्रवाद को स्वीकारा। जैसाकि हमने ऊपर देखा ये दोनो ही परंपराएं परस्पर विरोधी होने के कारण सावरकरजी के बुद्धिवाद के संबंध में अनेक भ्रांतियां निर्मित हो गई हैं। और सावरकरजी को दूसरी परंपरा में मान लेने के कारण उनके बुद्धिवाद की घोर उपेक्षा हुई है।

आज समाज को बुद्धिवाद की ओर ले जाने की नितांत आवश्यकता है। इस दृष्टि से सावरकरजी ने बुद्धिवाद का जो मार्ग अपनाया था उसका अध्ययन कर उसे समाज के सामने लाने की जिम्मेदारी निश्चय ही उनके हिंदुत्त्वनिष्ठ अनुयायियों की बनती है और जब अब पूरा सावरकर साहित्य हिंदी में भी उपलब्ध है तो भ्रांत धारणाएं दूर करने के लिए अनुयायी उनके साहित्य के प्रचार-प्रसार के कार्य को हाथ में ले तो अधिक उचित होगा। क्योंकि, सावरकरजी का बुद्धिवाद समझना हो तो, जो उनके सारे साहित्य और जीवनकार्य में बिखरा हुआ है, का अध्ययन करना होगा।

लोगों में सबसे अधिक भ्रांत धारणा यह व्याप्त है कि, हिंदू राष्ट्र धर्माधिष्ठित होगा यह सर्वथा असत्य है यह समझने के लिए उनकी पुस्तक 'हिंदुत्व" जिससे स्वामी श्रद्धानंद, पंडित मदनमोहन मालवीयजी तक प्रभावित हुए थे का अध्ययन करें तो समझ सकेंगे कि सावरकरजी का हिंदू राष्ट्र धर्माधिष्ठित नहीं था।

उनके हिंदूराष्ट्र का व्यापक अर्थ यह है कि, हिंदुओं के न्याय्य अधिकार सुरक्षित रखनेवाला राष्ट्र। उनकी दृष्टि में हिंदू राष्ट्र एक भावनिक संकल्पना है। यदि मुसलमान यह मानते हैं कि, वे एक राष्ट्र हैं तो हिंदू भी यह क्यों नहीं मान सकते कि वे भी एक राष्ट्र हैं वैसे भी हिंदू राष्ट्र पुरातन है। हिंदुओं की राष्ट्रीय भावना मुस्लिम भावना की प्रतिक्रिया नहीं। जब तक मुसलमान उनकी स्वतंत्र राष्ट्रीयत्व की भावना का त्याग नहीं करते तब तक हिंदू भी अपनी हिंदू राष्ट्र की भावना को रखने के लिए बाध्य हैं। सावरकरजी का यह दृष्टिकोण क्या व्यवहारिक नहीं और यहीं सावरकरजी दूसरे बुद्धिवादियों से अलग पड जाते हैं। सावरकरजी मानते हैं कि एक शासन तले दो राष्ट्र रह सकते हैं इसके लिए हर एक को एक मत, धर्मनिरपेक्षतापूर्वक सभी को समान अधिकार तथा अल्पसंख्यकों के धर्म और संस्कृति को संरक्षण का विश्वास।

हिंदूराष्ट्र का दूसरा अर्थ बहुसंख्यकों का राष्ट्र और इसी आधार पर 'बहुसंख्यकत्व ही राष्ट्रीयत्व है" का सिद्धांत वे प्रतिपादित करते हैं। हिंदू बहुसंख्य होने के कारण 'हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है" का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं। परंतु, इसका अर्थ यह नहीं कि अल्पसंख्यकों को राष्ट्रीयत्व नहीं होता यह सिद्धांत केवल वस्तुस्थिति को दर्शाता है कि अहिंदू अल्पसंख्य हैं। और बहुसंख्य को अल्पसंख्य बनाना अराष्ट्रीय है। इन अर्थों से भी हिंदुत्व का हिंदूधर्म से कोई संबंध नहीं आता। उपर्युक्त अर्थों से कोई भी बुद्धिवादी इंकार नहीं कर सकता, हिंदू एक राष्ट्र है, बहुसंख्यकों का राष्ट्रीय जीवन पर प्रभाव पडता ही है लेकिन यही बातें ये सेक्यूलर विद्वान हिंदू के स्थान पर भारतीय कहकर प्रस्तुत करते हैं।


Saturday, May 18, 2013


स्वच्छतागृहों की कमी से जुझते नागरिक

गांधीजी का वचन है -स्वच्छता आजादी से महत्वपूर्ण है। वस्तुतः स्वच्छ, सुरक्षित स्वच्छतागृह नागरिकों का मूलभूत अधिकार है और किसी भी नगर का सांस्कृतिक निर्देशांक वहां के स्वच्छतागृहों की दशा पर से ही तय होता है। परंतु, इस महत्वपूर्ण मूलभूत आवश्यकता की इतनी उपेक्षा है कि इस पर कोई सार्वजनिक रुप से चर्चा तक नहीं करता जैसे यह कोई मुद्दा ही नहीं है।

जबकि वास्तविकता यह है कि किसी भी शहर में जाओ स्वच्छतागृह (शौचालय, मूत्रालय) ढूंढ़ना पडते हैं। पहले तो वे मिलते नहीं और जब मिलते भी हैं तो वहां की अस्वच्छता देख उनमें घुसने की हिम्मत जुटानी पडती है और उपयोग में लाने के लिए अपनी जुगुप्सा को दबाना पडता है। इसकी कमी की पीडा एवं कष्ट सबसे अधिक महिलाएं ही भुगतती हैं परंतु, किसी भी नगरपालिका-निगम की महिला पार्षद इस संबंध में मुखर होकर आगे नहीं आती। जबकि महिला सशक्तिकरण के तहत उन्हें 30% आरक्षण उपलब्ध है। परंतु, शायद लज्जावश बजट आवंटन के समय इस संबंध में अपनी आवाज उठा नहीं पाती।

वैसे तो हर शहर की यह एक ज्वलंत समस्या है परंतु, विशेषतः महिलाओं के संबंध में यह समस्या बहुत ही विकराल है। अधिकांश सार्वजनिक स्वच्छतागृहों के दरवाजे या तो टूटे हुए या जर्जर हो चूके हैं और वहां भयंकर दुर्गंध का साम्राज्य व्याप्त रहता है, नलों की टोटियां या तो होती ही नहीं है या उनमें पानी नहीं होता। कहीं-कहीं शौचलयों के बाहर पानी की कोठियां भरी हुई होती हैं परंतु, अंदर या तो डिब्बे नहीं होते या होते भी हैं तो फूटे हुए होते हैं।

कई महिला शौचालयों का उपयोग तो पुरुष ही करते नजर आते हैं, सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं। कई स्थानों पर महिला स्वच्छतागृह किसी कोने-काने में स्थित होते हैं और वे भी ठेलों-गुमटियों के अतिक्रमण से घिरे जहां शोहदे आती-जाती महिलाओं को घूरते खडे रहते हैं इस कारण कोई अकेली महिला तो वहां जाने से ही कतराती है। ऐसा लगता है असुरक्षा, अस्वच्छता और अव्यवस्था सार्वजनिक स्वच्छतागृहों के पर्यायवाची नाम हैं, विशेषकर महिलाओं के।

कई रेल्वे स्थानकों पर तो स्वच्छतागृह ढूंढ़ना पडते हैं, जो स्थानक के किसी कोने में स्थित होते हैं जहां रात में अंधेरा छाया रहता है। बस स्टैंडों का हाल तो उससे भी बदतर होता है। गंदगी इतनी कि लोग विशेषकर महिलाएं उनका उपयोग करने की बजाए थोडा समय वैसे ही निकाल लेने में अपना भला समझती हैं अन्यथा उपयोग में तभी लाती हैं जब कोई विकल्प ना बचा हो।

वर्तमान में मधुमेह के रोगी भी बहुतायत से हैं और वे बहुमूत्रता की समस्या से पीडित होते हैं, कई बार कुछ विशिष्ट शस्त्र क्रियाओं के कारण भी बार-बार शौचालय में जाने की आवश्यकता पडती है, ऐसे में शौचालयों की कमी अखरती है। भले ही वे स्वच्छ ना हों अस्वच्छ ही सही परंतु पर्याप्त तो हों।

हाल ही में प्राप्त एक चौंका देनेवाली रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फरमान के बावजूद स्कूलों में शतप्रतिशत शौचालय बन नहीं सके हैं और जो बने हैं उनकी जानकारी के्रंद के पास नहीं है। म.प्र. के शासकीय स्कूलों में जब शौचालयों की गिनती हुई तो प्रदेश में 53365 शौचालयों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि कागजों पर 43477 शौचालयों को पूर्ण करने की बात कही गई है, जबकि 10471 शौचालयों का निर्माण हुआ ही नहीं है। वहीं 36543 शौचालयों को कार्य पूर्णता का प्रमाण-पत्र भी दे दिया गया है। उल्लेखनीय है कि पिछले शिक्षण सत्र के दौरान नवंबर दिसंबर में यह लक्ष्य पूर्ण करने के निर्देश दिए गए थे।

परंतु, हमारे जनप्रतिनिधि वास्तविकता के धरातल पर चल शौचालयों जैसी मूलभूत समस्या की ओर ध्यान न देते नित नई लोकलुभावन घोषणाएं करते रहते हैं, नई-नई योजनाएं प्रारंभ करते रहते हैं। उदाहरण के लिए हमारे शहर के बाजारों में ही मूत्रालयों की कितनी कमी है और जो हैं वे संख्या में कितने कम और भयंकर अस्वच्छ हैं। परंतु, हमारे जनप्रतिनिधियों को तो शहर के नागरिकों को 24 घंटे नलों में पानी देने की पडी है। जबकि उनका ध्यान इस वास्तविकता की ओर है ही नहीं कि पानी कितनी दूर से लाना पड रहा है और कितना महंगा है तथा उसका कितना भयंकर दुरुपयोग इस समय हो रहा है और वह भी तब जबकि वह नियंत्रित मात्रा में, निश्चित समयावधि में ही दिया जा रहा है और जब 24 घंटे पानी की उपलब्धता होगी तो उसका कितना दुरुपयोग होगा।

Tuesday, May 7, 2013


एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों

नित सामने आते रिश्वतखोरी से कमाए धन के प्रकरण, उजागर हो रहे राजनेताओं द्वारा किए गए आर्थिक घोटाले-भ्रष्टाचार के अंतहीन मामलों से देश की जनता आहत, त्रस्त हो रही है, अपने आप को असहाय एवं ठगा हुआ सा महसूस कर रही है। इस कारण जहां भी जाओ लोग इसके लिए राजनेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए नजर आ रहे हैं। जो बहुत कुछ अंशों में सत्य भी है। लेकिन यही वह समय भी है जो आत्मपरिक्षण भी मांगता है कि क्यों हमारे द्वारा चुने हुए ये राजनेता इस प्रकार से बेगुमान हो गए हैं? क्यों ये इतने लापरवाह एवं बेखौफ हो गए हैं?

भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी आदि तो देश की स्वतंत्रता के समय से ही और इसके भी पूर्व से मौजूद रही है। परंतु, यह समस्या आज जिस विकराल रुप में नजर आ रही है इसके पूर्व न थी। जितना कालाधन पिछले बीस वर्षों में देश में पैदा हुआ और देश के बाहर गया उतना देश की आजादी के 40 वर्षों बाद भी नहीं हुआ था।

यदि वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य पर दृष्टि डालें तो यही नजर आएगा कि जीवन के जो विभिन्न कार्यक्षेत्र हैं उनमें जो व्यक्ति कुछ ना कर सका वही राजनीति में सक्रिय एवं सफल नजर आ रहा है। इसके लिए वह अवांछनीय हथकंडे उपयोग में ला रहा है क्योंकि, बाकी जगहों पर तो वह कुछ कर ना सका था इसलिए वह यहां सफल होने के लिए सभी तरह के हथकंडे फिर वह चाहे अनैतिक, समाज के लिए हानिकारक भी क्यों ना हो उपयोग में ला रहा है। अधिकांशतः ऐसे ही व्यक्तियों ने राजनीति को दूषित कर पैसा बनाने का माध्यम बना रखा है।

इस प्रकार के राजनेताओं के साथ भ्रष्ट नौकरशाहों-कारपोरेट क्षेत्र ने हाथ मिला रखे हैं और यही गठजोड देश को लूट रहा है,  विकास की नई परिभाषा गढ़ रहा है तथा चंद लोगों की आर्थिक संपन्नता जो चमचमाते मॉल्स, होटल्स, मल्टीप्लेक्स, चौडी सडकों पर दौडती महंगी गाडियों के रुप में नजर आ रही है को देश की आर्थिक प्रगति बता रहा है। जनता भी भ्रमित हो आर्थिक संपन्नता को ही सच्चा विकास मान इस संकुचित दृष्टिकोण को सामने रख संपन्नता की लालसा, अधिकाधिक धन प्राप्ति को ही ध्येय बना, आर्थिक संपन्नता को ही यश-अपयश का पैमाना बना बैठी है। 

वस्तुतः यह विकास नहीं विनाश है और इसके परिणाम भी हम भुगत रहे हैं। समाज दिशाहीन हो गया है। केवल कुछ लोगों की मौज मजे के लिए की गई विदेश यात्रा, पानी जैसा पैसा जहां समारोहों में बहाया जाए यह जिन्हें हासिल है ऐसे गिनेचुने लोगों द्वारा यह समझना कि हम आर्थिक महासत्ता बनने जा रहे हैं यह उच्च पदस्थों का स्वार्थीपना, ढ़ोंग वस्तुतः घृणास्पद है।

परंतु, हम समझने को तैयार नहीं। क्योंकि, जो सुशिक्षित मध्यम वर्ग हमेशा देश को सुविचार देता है, सबसे ज्यादा नैतिकता का झंडाबरदार बनता है, देश या समाज के लिए कुछ करने की चाह रख आगे आता है, आदर्श सामने रखता आया है वही आज इस मामले में सबसे पीछे है क्योंकि, यही वर्ग तो इस उपर्युक्त अनैतिक गठजोड से सबसे अधिक लाभान्वित हो रहा है इसलिए अपनी आंखे मूंदे अधिकाधिक धन प्राप्त करने की होड में सबसे अधिक शामिल है।

इस विकास की अंधी दौड में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है जो पर्यावरण के संतुलन को बिगाड रहा है। चंद लोगों का आर्थिक विकास सच्चा विकास नहीं है। विकास सर्वसमावेशक होना चाहिए। विकास वह है जिससे मनुष्य को आनंद की प्राप्ति हो। जरा खुद ही कुछ सोचिए इस तथाकथित विकास से प्राप्त क्या हो रहा है- आनंद, संतुष्टि, मानसिक शांति या केवल तनाव, हताशा और साथ ही साथ नई-नई समस्याओं का अंबार जिन्हें हल करने जाओ तो फिर एक नई समस्या। सच्चा विकास तो वह है जिसमें सभी को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं मिले, जीवन सीमा बढ़े, पर्याप्त आमदनी हो, रोजगार उपलब्ध हों। बिजली, पानी, सडक के साथ सभीको शौचालयों की सुविधा उपलब्ध हो।

जीडीपी की दौड में शामिल हो उसके आंकडे बताने में गर्व महसूस करनेवाले, व्यस्त रहनेवाले खुद ही बता रहे हैं कि, शौचालयों की समस्या कितनी गंभीर है। देश के 60% लोगों को शौचालयों की सुविधा उपलब्ध नहीं है फिर भी विकास, विकास की रट लगाए जा रहे हैं। सच्चा विकास तो वह है जिसमें प्रकृति का अवांछित दोहन ना हो, धार्मिक विवादों से उत्पन्न अशांति ना हो, विवाद ना हों, सामाजिक एकता हो, कला साधना भी हो रही हो। इसके लिए गांधीजी और वीर सावरकर को बलराम-श्रीकृष्ण समझ सावरकरजी की विज्ञाननिष्ठा (बुद्धिवाद) और गांधीजी की ग्राम विकास की अवधारणा (अंत्योदय) का समन्वय जरुरी है।

यदि सच्चा विकास चाहिए हो तो भ्रष्टाचार का प्रखर विरोध हो। इसके लिए सबसे जरुरी है कि, महाभ्रष्ट, असामाजिक तत्व जो राजनीति में घुस आए हैं सबसे पहले उन्हें ही राजनीति से बाहर का रास्ता दिखाया जाए। चुनें उसे जो ना कहना जानता हो, नकारना जानता हो सिफारिशों को, प्रलोभनों को। लेकिन हो रहा है उल्टा, हम चुन रहे हैं उन्हीं नेताओं को जो अनुचित सिफारिशें सुनता हो  और उन्हीं के अनुसार निर्णय लेता हो। प्रलोभनों की बलि चढ़ भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता हो तथा उसका एक हिस्सा हम पर खर्च कर स्वयं कृतार्थ होता हो और हमें भी कृतार्थ करता हो हम उसीकी विकास पुरुष के रुप में जयजयकार करते हैं।

राजनेता का काम है समाज का निर्माण इसके लिए जो उचित हों वह कानून बनाता है, जनता को सुयोग्य नेतृत्व प्रदान करता है और इसके लिए जनता को अपने पीछे चलने के लिए बाध्य करता है। जब देश अनाज के संकट से ग्रस्त था तब लालबहादुर शास्त्री के आवाहन का देश की जनता ने साथ दिया था कि नहीं! आज भी यदि कुछ राजनेता समाज निर्माण का व्रत ले आगे आएं तो आज भले ही वे गिने-चुने हों कल अपनी अडिग ध्येय निष्ठा के बलबूते निश्चय ही अपने जैसे लोग एकत्रित कर ही लेंगे और कौन कहता है कि, ऐसा हो नहीं सकता।

जिस जमाने में इसी देश के लोग अंग्रेजों की गुलामी में ही खुशी महसूस कर रहे थे उनके राज्य को ईश्वर का वरदान मानते थे उसी जमाने में वीर सावरकर ने क्रांति का दर्शन दिया था। वासुदेव बलवंत फडके जिन्हें क्रांति का जनक कहा जाता है ने दलितों और अतिपिछडों को एकत्रित कर अंग्रेजों को नाकों चने चबवाए थे कि नहीं और अदन में विदेशी भूमि पर अंतिम सांस ले हौतात्म्य स्वीकारा था। गांधीजी को तो चलती ट्रेन से उठाकर बाहर फैंक दिया गया था परंतु, उस निहत्थे गांधी ने देश से अंग्रेजों को भगाकर देश को स्वतंत्रता दिलवाई कि नहीं? जनता भी इन्ही गांधीजी के पीछे गई थी। यही दृष्टिकोण सामने रख चंद अच्छे नेता भी यदि आगे आएं तो बदलाव क्यों नहीं हो सकता। अच्छे लोग ऐसे राजनेता से जुडना निश्चय ही पसंद भी करेंगे क्योंकि, वे जानते हैं कि राजनीति ही एक ऐसा सशक्त माध्यम है जिससे जुडकर निश्चय ही समाजोपयोगी कोई सा भी कार्य अधिक आसानी से करने में सहायता मिल सकती है।

खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है तो एक अच्छे नेता को देखकर दूसरा नेता क्या थोडा बहुत भी नहीं बदलेगा। बस यही प्रक्रिया सतत चलती रहे तो बदलाव जरुर आकर रहेगा। परंतु, समाज को भी यह समझना जरुरी है कि ऐसे नेताओं का साथ दे। यहीं पर एक बात का स्पष्टीकरण किसी तरह की गलतफहमी ना रह जाए इसलिए कर देना बेहतर होगा कि क्रांति मतलब हर समय सशस्त्र विद्रोह नहीं होता यहां क्रांति का अर्थ समाज में रुढ़ हो चूकी समाज विरोधी मान्यताओं के विरुद्ध खम ठोंक के खडे होना। क्योंकि, यह भी कोई आसान काम नहीं, अकेले पड जाने का डर बना रहता है। 

आज राजनेता बहाना बना रहे हैं कि, यदि जनता की बेजा सिफारिशों को पूरी ना करुं तो हार जाऊंगा, अलोकप्रिय हो जाऊंगा, इसलिए गलत कामों की तरफ से आंखें मूंद लेता हूं, प्रश्रय देने के लिए बाध्य हो जाता हूं। नेता का कहना भी ठीक है, उसने क्रांतिकारी बनने का ठेका थोडे ही ना ले रखा है, जो अच्छा और ईमानदार सुशासन दे और ऐसा कर वह अपनी बलि चढ़ाए। हम भी तो छोटे-छोटे कामों के लिए नेता का मुंह ताकते हैं, जो काम हम थोडा सा कष्ट उठाकर या लाइन में लगकर स्वयं कर सकते हैं, उसके लिए थोडा इंतजार भी तो कर सकते हैं को छोडकर झट नेता से सिफारिशी चिट्ठी लिखवाने या फोन करवाने जा धमकते हैं। पहले अवैध कार्य करते हैं फिर उसे नियमित करवाने के लिए नेता पर दबाव बनाते हैं। यदि नेता नहीं करता तो उसे बदनाम करने पर उतारु हो जाते हैं। भ्रष्ट राजनेता हमारी इसी मानसिकता का लाभ उठा रहे हैं और कहते भी हैं राजतंत्र में यथा राजा तथा प्रजा परंतु, अब प्रजातंत्र है और प्रजातंत्र में यथा प्रजा तथा राजा का मुहावरा फिट बैठता है। जैसी प्रजा होगी वैसा ही उसे नेतृत्व मिलेगा। यह निरा पाखंड है। जनता गांधी, सावरकर जैसे नेताओं के पीछे गई थी कि और वे तो धारा के विरुद्ध ही तैर रहे थे।

यदि सुधार चाहते हैं तो यह सब छोडना पडेगा पहले हम भी तो अपने कर्तव्यों का पालन करना सीखें। परिचित नेता के पद पाते ही हम अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगते हैं, बेजा लाभ पाने के उद्योग में रम जाते हैं। यातायात के नियमों का पालन नहीं करते, जुर्माने से बचने के लिए नेताओं से बात करवाते हैं, कई बार अनावश्यक ऐसी ट्रांसफर-पोस्टींग के लिए नेता पर दबाव बनाते हैं बस यहीं से भ्रष्टाचार भी शुरु हो जाता है।

करें यह कि यदि लगभग पूरी तरह भ्रष्ट हो चूकी व्यवस्था से निजात पाना चाहते हैं तो, राजनेताओं द्वारा की जानेवाली घोषणाओं, कार्यों का विवरण मांगें, उनसे स्पष्टीकरण मांगना सीखें। इसके लिए चाहें तो ई-मेल करें यदि हजारों मेल जाएं तो नेता सोचने के लिए बाध्य होगा। विभिन्न समाचार पत्रों में संपादक के नाम पत्र लिखकर भी अपनी समस्याएं उठा सकते हैं, स्पष्टीकरण मांग सकते हैं। चाहें तो इसके लिए कुछ संगठन बनाकर संगोष्ठियां आयोजित कर नेताओं का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं। भ्रष्ट राजनेताओं को सम्मानित करना उन्हें सामाजिक आयोजनों में अतिथि के रुप में बुलाना बंद कर उनका बहिष्कार करें।

आज जब सोशल मीडिया का जोर है तो उस पर अपनी आवाज उठा सकते हैं। विभिन्न समस्याओं पर लेख लिख सकते हैं, टिप्पणीयां दे सकते हैं। सोशल मीडिया का शोर राजनेताओं के कानों तक जाता ही है। कुछ नेताओं ने तो फेसबुक जैसे लोकप्रिय सोशल साइट्‌स पर अपने पेजेस बना रखें हैं उन तक आपकी आवाज अवश्य जाएगी। अपनी समाजोपयोगी मांगे, विचार राजनेताओं तक पहुंचाएं शायद ही कोई नेता होगा जो ना सुने वो आपको इतनी आसानी से टाल नहीं सकता। यह सब करें देखिए दबाव बनना शुरु हो जाएगा। यदि कोई नेता किसी तरह का अच्छा कार्य करता है तो जितना संभव हो उसे समर्थन प्रदान करें, अपनी ओर से जितना संभव हो सहयोग दें। इंटरनेट एक अत्यंत ही प्रभावी माध्यम है अपनी जायज बात रखने का किसी घोटाले को सामने लाने का। इसका सदुपयोग करें।

सबसे अधिक योग्य मार्ग है चुनाव पद्धति में सुधार। जिसके लिए वास्तव में एक बहुत बडे आंदोलन की जरुरत है जो कोई भी नहीं कर रहा है। जब तक यही चुनाव पद्धति रहेगी पैसा-बाहुबल प्रभावी रहेगा ही। अपनी वर्तमान चुनाव पद्धति बदली जाना चाहिए यह सब जानते हैं परंतु प्रयत्न कोई नहीं कर रहा, इसके लिए आंदोलन कोई नहीं चला रहा जबकि इसके लिए विशेष अधिक कुछ करना नहीं है पूर्व में ही कई विशेषज्ञों की रिपोर्टे उपलब्ध हैं, समितियां, आयोग इस संबंध में बन चुके हैं जिनके द्वारा प्रस्तावित संशोधनों को मात्र लागू ही तो करना है बस उसके लिए एक बडे आंदोलन को चलाने की आवश्यकता है, धनबल और चुनाव के बीच के गठजोड को तोडे बगैर कुछ होनेवाला नहीं है। जब सब इस मामले में एकमत हो प्रयत्न करेंगे तभी कुछ होगा।

हमें अपनी मानसिकता बदलना होगी नेताओं के बेजा महत्व को भी कम करना होगा जैसाकि पूर्व के एक लेख में मैं लिख भी चूका हूं कि, 'कम करें महत्व राजनेताओं का" यह भी एक उपाय है जिससे इन नेताओं का अहंकार थोडा कम होगा। हमारे लिए क्या इष्ट है क्या अनिष्ट है यह समझना नितांत आवश्यक है जिसकी ओर हम में से अधिकांश आंखें मूंदे हुए हैं। भ्रष्टाचार के समाचारों को पढ़कर केवल नेताओं के खिलाफ जबानी खर्च करने से कुछ नहीं होगा। प्रयत्न किए जाएं तो क्या नहीं हो सकता। इस संसार में कुछ भी असंभव नहीं।

कौन कहता है कि आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालों यारों।
  

Saturday, April 27, 2013


प्रतापभानु पेशवा बाजीराव (प्रथम)

लाखों-करोडों की जनसंख्यावाले किसीभी देश या समाज में कुछ चंद लोग ही ऐसे होते हैं जो उस समाज या देश को दिशा देने की क्षमता रखते हैं, दिशा देते हैं। ऐसे ही लोग इतिहास निर्माता होते हैं जिनकी पुण्यतिथि या जयंती पर उनका स्मरण कर वह समाज उऋण हो सकता है, होता है। 28 अप्रैल ऐसे ही एक इतिहास निर्माता की पुण्यतिथि है जो भारतीय इतिहास के गगन पर एक प्रखर नक्षत्र के रुप में चमका और पेशवा बाजीराव बालाजी के नाम से विख्यात हुआ।

बाजीराव की पेशवा पद पर नियुक्ति उनके पिता बालाजी विश्वनाथ के देहावसान के पश्चात छत्रपति शाहू महाराज ने सारी राजनैतिक गुटबाजियों, अटकालबाजियों, अफवाहों को नकारकर अनुवांशिकता के आधार तत्व पर नहीं अपितु बाजीराव के व्यक्तित्व से प्रभावित और विश्वस्त होकर की थी इसको इतिहासविदों ने भी स्वीकारा है। छत्रपति शिवाजी ने जिस हिंदवी स्वराज्य की नींव रखी उसको परवान बाजीराव पेशवा ने चढ़ाया। जिन दिनों दिल्ली की ओर आंख उठाकर देखनेवाला कोई नहीं था उन दिनों बाजीराव का रणघोष गूंज रहा था 'चलो दिल्ली - चलो दिल्ली"। इसी में उनका अनोखापन और गर्व और गौरव की बात है।

सातवीं शताब्दी में अरबस्तान में इस्लाम मजहब का जन्म हुआ और शीघ्र ही इस्लामी फौजें पश्चिम और यूरोप पर चढ़ दौडी। इस्लामी अरबों ने तीन-साढ़ेतीन सौ वर्षों तक स्पेन और पुर्तगाल पर हुकूमत की तथा भीषण अत्याचार और धर्मांतरण किए। स्वतंत्रता पश्चात भोगे हुए अत्याचारों से उपजे तीव्र रोष और प्रतिशोध की भावना से इन्क्वीजिशन के बीज पडे और बढ़े। स्पष्ट है कि इस इन्क्वीजिशन का हिंदुओं या हिंदुस्थान से कोई संबंध नहीं। फिर भी गोवा विजय के पश्चात पुर्तगालियों ने जिस इन्क्वीजिशन की स्थापना इस्लामियों से प्रतिशोध के लिए की थी उस कुख्यात इन्क्वीजिशन की शुरुआत हिंदुओं के विरुद्ध सन्‌ 1560 में की। पुर्तगालियों के धार्मिक अत्याचारों के खिलाफ शिवाजी ने योजनाबद्ध अभियान आरंभ किया जिसे आगे पेशवा बाजीराव और उनके अनुज चिमाजी अप्पा ने आगे बढ़ाया और अंततः पुर्तगालियों को परास्त कर ही दम लिया।

अट्ठराहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जब ईरान में पडे भयंकर अकाल से निपटने के लिए धन की आवश्यकता थी उस समय नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर दिल्ली को 57 दिनों तक लूटा था। उस आक्रमण का सामना करने के लिए मुगल बादशाह ने तमाम मुगल सूबेदारों, राजपूत राजाओं से सहायता मांगी थी तथापि इस प्रकार की कोई सहायता मराठों से मांगी न गई थी। फिर भी एक अखिल भारतीय व्यापक दूरदृष्टि के कारण ही पेशवा बाजीराव (प्रथम) नादिरशाह से निपटने के लिए पुणे से उत्तर हिंदुस्थान के लिए चल पडे थे। जबकि उस समय उधर साष्टी-वसई में पुर्तगालियों के साथ चल रहा युद्ध प्रतिष्ठा का प्रश्न था फिर भी अब उस युद्ध का दायित्व अपने छोटे भाई चिमाजी अप्पा को सौंप 7 फरवरी 1739 को पेशवा बाजीराव उत्तर हिंदुस्थान की ओर चल पडे। उन्हें किसी भी परिस्थिति में नादिरशाह से चंबल के उत्तर में ही निपटना था, इधर दक्षिण मेंं वे उसे आने नहीं देना चाहते थे। परंतु, नादिरशाह के वापिस ईरान लौट जाने के कारण उन दोनो में निर्णायक युद्ध हो न सका और एक नया इतिहास बन ना सका। हां इतना जरुर हो गया कि नादिरशाही धक्का खाने के बाद पेशवा बाजीराव की किसी भी मांग का विरोध करने का साहस मुगल बादशाह के लिए असंभव सा हो गया।

नादिरशाह के सामने मुगल बादशाह द्वारा घुटने टेके देने पर पेशवा बाजीराव के मस्तिष्क में हिंदूपदपादशाही की योजनाएं साकार होने लगी। उदयपुर का राजसिंहासन महाराणा प्रताप की परंपरा का सिंहासन था जिन्होंने अपने बहनों-बेटियों को कभी भी मुगल जनानखाने में नहीं भेजा था। बाजीराव को इसीलिए उदयपुर के महाराणाओं पर बहुत गर्व था। पेशवा बाजीराव ने उदयपुर महाराज को संस्कृत में पत्र लिखकर अपनी योजना से अवगत कराया था। पेशवा ने लिखा था कि आपकी सवा लाख सेना के साथ मराठों की सेना  जुडकर दो लाख की सेना हो जाएगी। शत्रु को परास्त करने के उपरांत इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर उदयपुर महाराणा को प्रतिष्ठित करेंगे। परंतु, नियती का खेल देखिए राजपूतों ने पेशवा की योजना को सराहने का साहस नहीं दिखाया वरना आज इतिहास कुछ और ही होता।

पेशवा बाजीराव की अपने सनातन हिंदूधर्म पर नितांत श्रद्धा थी। आज से तीन सौ से अधिक वर्ष पूर्व का यह पेशवा बाजीराव धर्मश्रद्ध होते हुए भी जातीय भेदभाव और ऊंच-नीचता से सर्वथा कैसे मुक्त था यह एक पहेली ही है। उच्च पद पर होने पर भी अधीनस्थ पर अवस्था से वरिष्ठ यथा पिलाजी जाधव, मल्हारराव होलकर जैसों से वह बडे अदब से पेश आते थे। परिवार में वह मातुश्री राधाबाई का समुचित आदर-सम्मान करते तो उधर अनुज चिमाजी अप्पा की व्याधिजनित दुर्बल देह के उपरांत भी विलक्षण वीरता और साहस पर उन्हें गर्व था। पत्नी काशीबाई और मस्तानी दोनों में उन्होंने कभी कोई भेदभाव नहीं किया। बाजीराव के स्वभाव की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि वे दिए हुए आदेशों के पालन में हीलहवाल-ढ़ीलढ़ाल को कतई पसंद नहीं करते थे। ऐसे प्रकरणों एवं आदेशों की अवहेलना पर वे क्षुब्ध हो उठते थे और उनका चित्तक्षोभ इतना भयंकर होता था कि वे अपराधी के हाथ-पैर या गर्दन तक उडाने का दंड दे दिया करते थे। इसके फलस्वरुप उनका प्रशासन बडा ही चुस्त-दुरुस्त बना रहता था।

बाजीराव संस्कृत के अच्छे ज्ञाता होकर जब वीरकर्म के लिए प्रस्थित होते तब उनके साथ शस्त्रों के अतिरिक्त अन्य दो वस्तुएं अवश्य होती थी - एक, पत्र लिखने का साहित्य; दूसरी, श्रीमद्‌भगवद्‌ गीता। गीता के कर्मयोग को तो बाजीराव ने अपने जीवन में ही उतार लिया था। गीता के मर्म को उन्होंने आत्मसात्‌ कर लिया था इसलिए कम से कम रक्त बहाकर युद्ध में सफलता प्राप्त करना उनकी विशिष्ट दृष्टि थी। गीता रहस्य हमें बतलाता है कि, अर्जुन को अपने अपराजेय होेने का अहंकार था तथापि बाजीराव को  अपराजेय होने का अहंकार छूकर भी नहीं गया था। उन्होंने अपने शत्रु को कभी भी कमतर करके नहीं आंका ना ही परास्त करने के बाद कभी उसके साथ दुर्व्यहार किया या अपमानित किया। उनकी युद्धशास्त्र नीति यह थी कि कभी भी हडबडी या उतावलेपन से युद्धारंभ मत करो व्यवस्थित रणनीति बनाकर, समयानुकूल उसमें परिवर्तन करते हुए अनुकूल परिस्थिति हो तभी युद्धारंभ करो। उनकी सफलता का राज भी यही था।

पेशवा बाजीराव के जीवन और व्यवहार पर दृष्टि डालें तो प्रखरता से यही दिख पडेगा कि उनके मानस में यही भाव सदैव जागृत रहा कि, किसी भी संघर्ष या युद्ध में सफलता सेनापति मात्र की न होकर संपूर्ण समूह की होती है। पेशवा बाजीराव के इसी असाधारण नेतृत्व गुण के कारण उनके सरदारों-वीरों में उनके प्रति विलक्षण श्रद्धा थी। उनके वीर सरदार भी स्मरणीय ही हैं। उनके वीर सरदारों में थे उनके दाहिने हाथ पिलाजी जाधव जिनसे उन्होंने युद्धकला सीखी थी, दूसरे थे मल्हारराव होलकर जो एक कुशल सैनिक थे। बाजीराव ने ही उन्हें सरदार बनाया और मालवा के एक भाग की जागीर दी जिसने कालांतर में होलकर रियासत का रुप ग्रहण किया। राणोजी शिंदे (सिंधिया) पेशवा बालाजी विश्वनाथ की सेवा में एक खिदमतगार के रुप में थे। बाजीराव ने उनकी क्षमताओं को परखकर उन्हें सरदार बनाया और आगे चलकर उज्जैन-ग्वालियर की जागीर दी जिसने ग्वालियर रियासत का रुप धारण किया। बाजीराव ने उदाजी पंवार जो मूलतः मालवा के परमार वंश से थे को मालवा-गुजरात को प्राप्त करने की योजना में जुटाया। उदाजी और उनके अनुज आनंदराव पंवार को धार जागीर दी जो आगे चलकर धार रियासत बनी। इतिहास प्रसिद्ध पालखेड युद्ध में तुकोजीराव पंवार वीरतापूर्वक लडे तो, जीवाजीराव पंवार मालवा में। इन दोनों को देवास की जागीर दी जो आगे चलकर क्रमशः देवास बडी पाती और छोटी पाती में दो रियासतों में बदल गई। उनके अन्य विश्वसनीय सहयोगी थे, बाजी रेठरेकर, अंबाजी पंत पुरंदरे उनके पुत्र और भतीजे। गोविंदपंत खेर रत्नागिरी (कोंकण) के थे जिन्हें बुंदेलखंड की जागीर मिली और यही पंत  इतिहास में गोविंदपंत बुंदेले के नाम से विख्यात हुए।

इनके अतिरिक्त उत्तर भारत में पेशवा के वकील हिंगणे, दावलजी सोमवंशी, कदमबांडे, आवजी कावडे, पेशवा बाजीराव का साला व्यंकटराव घोरपडे आदि जैसे अनेक नाम हैं जिन्होंने अपनी पूरी क्षमता और निष्ठा से बाजीराव द्वारा दिया हुआ दायित्व निभाया और अट्ठारहवी शताब्दी को एक क्रांतिकारी मोड देनेवाले पेशवा बाजीराव (प्रथम) की अपराजेयता की यशोगाथा के अंग बने। धन्य पेशवा बाजीराव और उनके वीर सहयोगी जिन्होंने देश की पीढ़ियों के सम्मुख साहस और समर्पण का आदर्श रखा। 

Saturday, April 6, 2013


अमीना के बहाने - मुस्लिम स्त्री स्वतंत्रता पर एक दृष्टि

ट्यूनिश की 19 वर्षीय लडकी अमीना टेलर ने अपने अर्धनग्न चित्र फेसबुक जैसी सोशल साईट पर लोड कर महिला अधिकारों के लिए आवाज उठाकर अपने को मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर ला दिया। उसके पक्ष में दुनिया भर की महिलाएं जिनमें यूरोप, अमेरिका से लेकर अरब देश की महिलाएं तक शामिल हैं में कठमुल्लापन के खिलाफ विरोध की लहर चल पडी है। पेरिस की ग्रॉंड मस्जिद के सामने ट्यूनिश की महिलाओं ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया और टॉपलेस जिहाद का आगाज हो गया। अरब मीडिया में इस पर बहस प्रारंभ हो गई है कि मुहिम सही है या गलत। परंतु, एक बात जरुर है कि इस मुहिम के कारण कट्टरपंथियों के होश जरुर उड गए हैं। और इस अर्धनग्न होने की होड में स्त्रियों के साथ-साथ कई पुरुष भी शामिल हो गए हैं। इसके पूर्व सऊदी अरब में एक महिला पत्रकार नदीन बेदार ने अपने एक आलेख, जो इजिप्त के प्रसिद्ध अखबार 'अल मिस्त्री अलयोम" में 'माय फोर हसबेंड्‌स एंड आय", के जरिए चार निकाह करके चार शौहर रखने का अधिकार मांग कर इस्लामी जगत में हलचल मचा दी थी।

'उसका कहना है कि इस्लाम में यदि पुरुष चार निकाह कर सकता है तो, यह अधिकार महिला को क्यों नही? यदि पुरुष सुंदरता और कामुकता के आधार पर भिन्न-भिन्न महिलाओं का चयन करता है तो एक महिला को भी अधिकार हो कि वह भी रंग-रुप और चाहत के आधार पर अपने अलग-अलग शौहर (पति) चूने। नदीन बेदार के विरुद्ध कुछ राजनीतिज्ञ भी अब मैदान में आ गए हैं। नदीन के समर्थक भी बाहर निकल आए हैं, उनका कहना है कि आज की वर्तमान परिस्थिति में इन कुप्रथाओं पर विचार होना चाहिए। अल अजहर विश्वविद्यालय के बाहर कुछ लोगों ने नारे लगाए और कहा या तो महिला को चार शौहर रखने की छूट दें या फिर पुरुषों के लिए भी अनिवार्य करो कि वह केवल एक ही बीवी रखे। कई महिलाएं भी बिना परदा किए वहां खडी थी और नारे लगानेवालों का साथ दे रही थी। इजिप्त में कुछ दिन पूर्व शेख अल अजहर शेख अल तावावी ने भी परदे के संबंध में अपना वक्तव्य देकर वातावरण को गर्मा दिया था। उनका कहना था कि परदे के विषय में इस्लाम ने कोई आदर्श प्रस्तुत नहीं किया है इसलिए महिलाओं पर परदा करने की बात अनिवार्य रुप से लादी नहीं जा सकती है।"

इधर भले ही स्त्री अधिकारों के लिए इस प्रकार के विद्रोह हो रहे हों उधर अकादमिक स्तर पर देखें तो इस्लाम में स्त्रियों को उच्च अधिकार प्राप्त थे यह सिद्ध करने के लिए बडे जतन से रखे गए उदाहरण पेश किए जाते हैं। इस प्रकार के अनेक उदाहरण किताब अल्‌ अघानी में दिए हुए हैं। उदाहरणार्थः तैय जमात की औस नामक लडकी की कथा है। जिसने अपने होनेवाले पति द्वारा विवाह द्वारा प्राप्त होनेवाले अधिकारों का जब अशिष्टतापूर्वक आग्रह धरा तो विवाह से इंकार कर दिया। उसने पूछा ''क्या मेरे साथ तुम गुलाम लडकी के समान अथवा युद्धबंदी के समान व्यवहार करनेवाले हो।"" अंत में उसने उसके साथ विवाह की संमति दी परंतु, केवल नाम की पत्नी नहीं अपितु विवाह की संमति देते समय उसने उस पर दीर्घकाल से एकदूसरे के साथ भयानक शत्रुता रखनेवाले आबस्‌ और धुबयान्‌ कबीलों में शांति घटित करवाने की कठिन जिम्मेदारी लाद दी।

दूसरा उदाहरण पैगंबर के पोते हुसैन की लडकी सुकायना का दिया जाता है। उसने एक के बाद एक चार विवाह किए थे और उनका चुनाव भी उसने स्वयं ही किया था। यहां यह स्पष्ट ही है कि सुकायना उच्च कुल की होने के कारण उसे यह करना संभव हो सका। परंतु, जैद की लडकी आतिका का भी इस संदर्भ में उल्लेख किया जाता है। उसने इस प्रकार से तीन विवाह किए थे।

जिन विवाहित स्त्रियों ने अपने पतियों ने विवाह संबंधी कानून के विरुद्ध गुनाह किया इसलिए उनका त्याग किया और इस कारण उन्हें किसी भी प्रकार का नुक्सान ना सहना पडा ऐसी कुछ स्त्रियों के नाम इस संदर्भ में उदाहरणस्वरुप दिए जाते हैं। उम्म सलाम  इसी प्रकार की स्त्रियों में से एक थी। अपने पति के एक गुलाम स्त्री से संबंध हैं यह ध्यान में आते ही उसने उसका त्याग किया। पैगंबर की पत्नी आयशा की भांजी आयशा बिन तल्हा ने अपने प्रेमी मुसाब को बहुत समय तक इंतजार करवाने के बाद उससे विवाह की संमति दी थी इतना ही नहीं तो, यदि वह चाहेगी तो परदा करेगी अन्यथा नहीं ऐसा भी दृढ़तापूर्वक कहा था।

हिजरी की तीसरी शताब्दी तक और उसके बाद भी मस्जिद में जाकर पुरुषों के साथ नमाज पढ़ने का अधिकार स्त्रियों को था। उमर द्वारा सार्वजनिक नमाज के साथ स्त्रियों को कुरान पढ़कर दिखलाने के लिए एक विशेष व्यक्ति की नियुक्ति की गई थी। उस समय स्त्रियों द्वारा बुरका ना भी पहना हो तो चलता था। परंतु, सार्वजनिक नमाज के समय स्त्रियों द्वारा पहनी जानेेवाली पोशाक के विषय में कानून में सूचनाएं हैं। छाती पर चोली और माथेके ऊपर की ओर बुरका और शरीर पर अंगरखा होना चाहिए। चेहरा, हाथ और पांवों के निकट के ऊपरी भाग आच्छादित करने की जरुरत नहीं। इनमें से पांवों के ऊपर का भाग ढ़ंका जाए कि नहीं इस पर मतभेद हैं। डच यात्री हरग्रोंज जब मक्का गया था तब उसने स्त्रियों को भी नमाज के लिए मस्जिदों में जाते देखा था। हरग्रोंज ने कहा है कि, मस्जिद में स्त्री-पुरुष के मध्य केवल एक कटघरा रहता था। स्त्रियों के चेहरे क्वचित अनाच्छित दिख पडते थे, तो भी बालों की एक भी बट बाहर नहीं दिखेगी इस प्रकार से वे अपने बालों को भर कडी रुढ़िनिष्ठा के भय से ध्यानपूर्वक आच्छादित कर लेती थी।

प्रारंभिक काल की एक पुरानी परंपरा के अनुसार स्त्रियों को अपने साथ प्रार्थना करने देने का विरोध स्वयं पैगंबर को नहीं था। पति की सहमति हो तो स्त्रियों को नियमित रुप से मस्जिद में जाने में अपने को कोई एतराज नहीं ऐसा भी उन्होंने कहा था। इस परंपरा को एक दूसरी परंपरा द्वारा पुष्टि मिलती है। 'परमेश्वर की जिन दासियों को" मस्जिद में जाकर प्रार्थना करने की इच्छा हो उनके मार्ग में किसी भी तरह की बाधा लाना पैगंबर को नापसंद था, ऐसा इसमें कहा गया है। परंतु, बाद में शीघ्र ही मस्जिद में जाना पुरुषों का विशेषाधिकार हो गया। वैसे इसके बहुत से अपवाद मिलते हैं।

एक बात मगर ध्यान में रखने योग्य है और वह है जब धर्मपंडितों का विरोध नहीं था उस काल में अनेक बाधाएं होने के बावजूद मुस्लिम स्त्रियों में साधुसंत हुए हैं। ''बारहखडी के प्रत्येक अक्षरानुसार पवित्र स्त्रियां पंजीबद्ध नहीं ऐसे बहुत कम ही चरित्रकोश मिलेंगे। इन स्त्री साधुसंतों ने किए हुए चमत्कार, उनके चरित्रकोश में पडौस में ही जिनको पंजीबद्ध किया गया है ऐसे पुरुष साधुसंतों के चमत्कारों की अपेक्षा किसी भी दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं।"" इस्लाम में संगठित ऐसा धर्मोपदेशक वर्ग अथवा जमात नहीं। इसी कारण से कदाचित्‌ स्त्री साधुसंतों को आगे आना सुलभ हो सका हो। परंतु, इन स्त्री संतों में बहुतायत से जो संत हुए हैं वे सूफी अथवा अन्य गूढ़ पंथों से थे यह दिख पडता है। क्योंकि, इन पंथों में बाह्य भेदों का कोई बहुत महत्व नहीं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध महिला संत हुई है राबिया।

प्रत्येक स्त्री-पुरुष द्वारा धार्मिक शिक्षा ग्रहण की ही जाना चाहिए इस प्रकार के हदीस कथन में उस प्रारंभिक काल में असुविधा नहीं हुई थी। उस काल में निश्चित ही अनेक स्त्री साधुसंत हुए। उस काल में अनेक विद्वान मुस्लिम स्त्रियां हुई हैं। उदा. प्रख्यात 'लेखिका" और 'स्त्री जाति का गौरव" के रुप में जानी जानेवाली शुहदा बिन अल्‌ इबारी ने अपनी विद्वता से बहुत ख्याती प्राप्त की थी। हिजरी की दसवीं शताब्दी तक इस प्रकार की स्त्रियां बीच-बीच में हुई हैं। अब्बासी खिलाफत काल में राजघराने की कई स्त्रियों का राजसिंहासन पर प्रभाव था इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। उदा. हारुन अल्‌ रशीद की पत्नी सीट्टा जुबैद ने बगदाद में इतनी ख्याती प्राप्त की थी कि अद्याप उसकी कबर को बडा आदर का स्थान प्राप्त है। उसके एक शताब्दी बाद हुई खलीफा मुक्तदीन की मां तो इस्लामी साम्राज्य की सत्ताधीश बन गई थी। क्योंकि, स्वयं खलीफ दुर्बल था।

 तथापि मुस्लिम इतिहास में इस प्रकार की विख्यात स्त्रियां कम ही हुई हैं और जो हुई हैं उन्हें भी आलोचना सहना पडी है। वैसे तो इतिहास में सर्वत्र ही यह घटित हुआ है परंतु फिर भी इस्लामी जगत की स्त्रियों के मुकाबले बाहरी जगत की स्त्रियों को कम आलोचना का सामना करना पडा है, कम बाधाओं का सामना करना पडा है। और आज भी परिस्थितियां में कोई खास बदलाव आया नहीं है। और जब तक इस्लामी धार्मिक विद्वान अपना कट्टर दृष्टिकोण त्याग नहीं देते; उनका सर्वसाधारण पर का प्रभाव कम होता नहीं है तब तक यह भयंकर बाधाएं बरकरार रहेंगी यह निश्चित है। हिंदुस्थान तो एक उदारवादी देश है जहां कई मुस्लिम सुधारवादियों के साथ-साथ अन्य कई सुधारवादी महिला पुरुष भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों कार्यरत हैं उन्हें भी तो चाहिए कि वे आगे आएं और दकियानूसी विचारों और कट्टरपंथ के खिलाफ महिला सुधार के क्षेत्र में आवाज बुलंद करें, कट्टरपंथ को निष्प्रभावी करने की ओर अग्रसर हो जिसका आगाज पिछले कुछ दिनों से वैश्विक स्तर पर हो रहा है।