Showing posts with label antarrashtriya. Show all posts
Showing posts with label antarrashtriya. Show all posts

Sunday, March 8, 2015

महिलाओं की आजादी की पक्षधर 
मलिका - ए - अफगानिस्तान ः सुरय्या

20वीं सदी के उत्तरार्ध में तालिबान द्वारा देश को मुहम्मद गजनी और मुहम्मद गौरी के दौर में पहुंचाने और इस्लाम के नाम पर अफगान महिलाओं को पिंजरेनुमा बुर्के में कैद करने के कारण अफगानिस्तान चर्चा में आया, तो 20वीं सदी के पूर्वार्ध में अफगानिस्तान दो कारणों से प्रसिद्ध हुआ एक, अंग्रेजों के चंगुल से छूटकर स्वतंत्रता प्राप्ति में सफल होने और दो, अफगानिस्तान की मलिका (रानी) सुरय्या के कारण जिसको पाश्चात्य देशों में बडी प्रसिद्धी और कीर्ति प्राप्त हुई।

अफगानिस्तान की स्त्रियों को सर्वप्रथम मुक्ति का मार्ग दिखानेवाले थे वहां के राजा अमानुल्लाह और उनकी पत्नी सुरय्या। अमानुल्लाह का शासनकाल (1919-29) मात्र दस वर्ष चला और अंत में उन्हें अपने सुधारवादी रवैये के कारण देश छोडकर भागना पडा। उसकी प्रतिभा और साहस लोकोत्तर था। उसने अमीर का पद तोडकर स्वयं को बादशाह घोषित कर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का शंखनाद कर दिया। दबाने में असफल हो अंततः विवश हो अंगे्रजों ने उससे संधि कर ली अफगानिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप में सामने आया। अमानुल्लाह यूरोप में शिक्षित होकर उदारचेता एवं अपने देश को रुढ़िवाद से मुक्त कर इस्लाम के अंधकार से निकाल उन्नत और सभ्य देशों की श्रेणी में लाना चाहता था। उसने यूरोप और एशिया के प्रमुख देशों के साथ व्यापारिक एवं कूटनीतिक संबंध जोडे। 1920 में ही उसने नया क्रिमिनल एवं सिविल कोड तैयार किया था।

उसने 1913 में जिस स्त्री सुरय्या से विवाह अपनी पहली पत्नी परिगुल से संबंध विच्छेद कर किया था वह दमास्कस (सीरिया) में शिक्षित होकर वहां उसने आधुनिक और पाश्चात्य कल्पनाओं को अंगीकार कर लिया था। सुरय्या के पिता सरदार महमूद तर्जी  अफगान होकर राजनैतिक कारणों से सीरिया में आश्रय लेकर रह रहे थे। महमूद तर्जी एक विचारवंत नेता होकर अमानुल्लाह के पिता हबीबुल्लाह ही उन्हें वापिस अफगानिस्तान लेकर आए थे। अफगानिस्तान को आधुनिक बनाने की कोशिशों में उनका बडा ही योगदान है। महमूद तर्जी बहुपत्नीत्व परंपरा के विरोधी थे और स्त्रियों की शिक्षा और रोजगार का आग्रह रखते थे। सुरय्या भी इसी विचारसरणी का मूर्तिमंत प्रतीक थी। अमानुल्लाह ने भी इन्हीं विचारों को अंगीकृत कर गांव-गांव में स्त्री शिक्षा का आंदोलन चलाया। सुरय्या भी सामाजिक बदलाव लाने के लिए आग्रही होने के कारण अनेक लडकियों ने उच्च शिक्षा ग्रहण की यहां तक कि विदेशों में भी जाकर और आगे जाकर यही स्त्रियां सरकारी विभागों में उच्चाधिकारी बनकर कार्य कर सकी। 

यह सुरय्या के प्रोत्साहन का ही नतीजा था कि अनेक महिलाएं शिक्षा ग्रहण करने लगी। तुर्कस्तान के बदलाव को देखकर उसने 15 होशियार लडकियों को वहां भेजा। अफगानिस्तान की नई मानसिकता तैयार करने के लिए तर्जी ने 'सिराजुल अखबार" नामक पत्र चलाया था। सुरय्या ने भी स्त्रियों के लिए 'इरशाद-ए-निसवान" मासिक शुरु किया था। सुरय्या अपने भाषणों में पुरुषों की बराबरी से ही स्त्रियों को भी स्वतंत्रता मिलना चाहिए का प्रचार अपने भाषणों द्वारा करती थी। देश की उत्क्रांति में सुरय्या की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए अमानुल्लाह जनता को संबोधित करते हुए कहा करता था मैं तुम्हारा राजा हूं और तुम्हारी शिक्षामंत्री  तुम्हारी रानी सुरय्या है। सुरय्या उन्हें शिक्षा एवं ज्ञान प्राप्ति के लिए कहती थी। वे एक साथ अनेक सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिरकत करते थे। वह उसके साथ शिकार और अश्वारोहण का शौक भी रखती थी। अफगानिस्तान की आजादी की लडाई में घायल सैनिकों से मिलती उनके साथ संवाद स्थापित कर उन्हें भेंट भी देती, विद्रोह स्थलों पर जाकर लोगों से चर्चा भी करती।

अमानुल्लाह के आधुनिकीकरण और सुधार अभियान का जबरदस्त विरोध भी हुआ। इस्लाम के नाम पर चल रहे ढ़ोंग को उसने शीर्षासन करवा दिया। परदा प्रथा को बंद करा दिया। अफगान महिलाएं भी पाश्चात्य पद्धति के कपडे पहनने लगी, बाल कटवाने लगी। बालविवाह पर बंदिश आई। लडकियां अपना पति स्वयं पसंद करने लगी। अफगानियों को कोट-पैंट पहनना अनिवार्य कर दिया गया। शुक्रवार के स्थान पर गुरुवार को छुट्टी घोषित कर दी गई। यहां तक कि देवबंदी उलेमाओं को देश निकाला दे दिया गया।

1928-29 में अमानुल्लाह और सुरय्या ने यूरोप यात्रा की ऑक्सफोर्ड यूनिव्हर्सिटी ने उन्हें सम्मानीय पदवी प्रदान की सुरय्या ने वहां विद्यार्थियों के समक्ष व्याख्यान दिया। अमानुल्लाह पाश्चात्य तंत्रज्ञान से प्रभावित था। वही सबसे पहले फोटोग्राफी के साधन  अफगानिस्तान में लाया। उन दोनो की जीवनप्रणाली पाश्चात्य पद्धति की होकर वे शूटिंग, हंटिंग व फिशिंग उनकी दिनचर्या में शामिल थी। सुरय्या हमेशा चायपार्टी आयोजित किया करती थी। वह इंग्लैंड की उच्चभ्रू महिलाओं के समान पोशाक किया करती थी। इस प्रकार की दिनचर्या से अफगान लोग पूरी तरह से अनभिज्ञ थे। 10 दिसंबर 1927 को अमानुल्लाह और सुरय्या भारत चमन आए थे। चमन से वे कराची गए वहां एक समारंभ में सुरय्या ने अनेक स्त्रियों से भेट की। उस समय सुरय्या द्वारा कही गई कथाएं और उसके सौंदर्य के वर्णन चर्चा का विषय बने। 

1919 में अंग्रेजों से किए गए युद्ध के कारण अमानुल्लाह और अंग्रेजों के संबंध कुछ अच्छे ना थे। उसने अफगानिस्तान का संविधान तैयार किया था। सरकार का स्वरुप और राजा की भूमिका ये सारी बातें संविधान की दृष्टि से जनता के सामने स्पष्ट की। सारे विश्व में अमानुल्लाह और सुरय्या द्वारा किए गए सुधार चर्चा का विषय बने। किंतु, अंग्रेजों ने सुरय्या की स्त्री मुक्ति आंदोलन का विरोध किया, अफगानिस्तान को आधुनिक बनाने का उपक्रम वहां के कट्टरपंथियों को भी रास ना आया। जब 1929 में वे वापिस लौटे तब तक उनके विरोध में जोरदार जनमत तैयार हो चूका था। अंतर्गत गृहयुद्ध को टालने के लिए उन्होंने देश त्यागने का निर्णय लिया और रोम में स्थायी होना तय कर विदेशों में अपना शेष जीवन बीताया। अफगानिस्तान फिर से पीछे चला गया। तुर्की में कमाल अता तुर्क तो सुधार लाने में सफल रहा परंतु, अमानुल्लाह अफगानिस्तान में सफल ना सका। लेकिन अमानुल्लाह और सुरय्या द्वारा बोए बीज दोबारा प्रस्फुटित हो गए।

1977 में कुछ पुरोगामी विचारों की महिलाओं ने एकत्रित आकर 'रिव्होल्यूशनरी अफगान विमेन्स एसोसिएशन" (रावा) की स्थापना की। सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों की रक्षा 'रावा" का ध्येय है। 'रावा" मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध में तो है ही परंतु, 1979 में अफगानिस्तान पर हुए रशिया के हमले का भी 'रावा" ने विरोध किया था। जब तालिबान ने सत्ता में आने के बाद अफगान स्त्रियों का जीवन अंधकारमय कर दिया था तब इस प्रकार की भयानक परिस्थिति में भी बहुत बडा धोखा उठाकर भी कुछ अफगान महिलाओं ने लडकियों के लिए गुप्त रुप से स्कूल चलाए। 'रावा" अपना भूमिगत कार्य चलाते रही। जब असंभव हो गया तब पाकिस्तान जाकर वहां भी निर्वासित अफगान स्त्रियों-लडकियों के लिए स्कूल चलाए। उपजीविका के साधनों के रुप में सिलाई-कढ़ाई-बुनाई की शिक्षा दी, महिलाओं के लिए दवाखाने चलाए। यूनो के सामने अफगान स्त्रियों की दुर्दशा प्रस्तुत की, उनकी ओर से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहायता की अपेक्षा रखी। परंतु, किसी ने उनकी परवाह नहीं की लेकिन जब अमेरिका पर 11 सितंबर का हादसा गुजरा तब दुनिया जागी। परंतु, बिना हताश हुए अफगान स्त्रियों ने हिम्मत, धैर्य के साथ अनंत यंत्रणाएं सहकर भी अपनी लडाई जारी रखी। अपने परिवारों को, समाज को रीढ़ की हड्डी बन संभाले रखा।

Saturday, December 20, 2014

विश्व मानवता में उम्मा की दीवार 2

सर्व साधारण यह समझ नहीं पाते कि इस तरह के अपराधिक, आतंकवादी कृत्यों का जिनमें बेगुनाह लोग मारे जाते  हैं का समर्थन धर्म के आधार पर कैसे किया जा सकता है, किया जा रहा है। यह जानने के लिए हमें कुरान क्या कहती है यह समझना पड़ेगा। समझने में आसानी  रहे इसलिए हम रेडियंस में दि. 19,20 नवम्बर 2000 में अब्दुल रहमान हमद अल ओमर द्वारा एक लेख में किए गए प्रतिपादन को प्रस्तुत कर रहे हैं, "" इस्लाम भौगोलिक सीमाएं, राष्ट्रीय रिश्ते, लोकप्रिय संबंधों और  राष्ट्रीयत्व को नहीं जानता; क्योंकि उनके कारण लोगों में विभक्तता और दुजाभाव निर्मित होता है। मुसलमानों के लिए इस्लाम के सिवाय अन्य कोई राष्ट्रीयत्व नहीं।'' अर्थात इस्लाम राष्ट्रवाद को मान्यता नहीं देता और मौ. मौैदूदी तो इस राष्ट्रवाद पर आरोप ही जड़ते हैं कि "" मुस्लिमों की दृढ़ एकता (यानी उम्मा) के भंग करने के उद्देश्य से ही मुसलमानों के दुश्मन राष्ट्रवाद का प्रचार कर रहे हैं।'' (Who is maududi?- Maryam Jameelah) ़ 

कुरान के अनुसार-"" तुम (मुसलमान) खैर-उम्मत (बेहतरीन गिरोह) हो।'' (3ः110) ""अल्लाह ने तुमको जमीन का खलीफा (शासक) बनाया है।'' (6ः165) इस तरह की आयतों के कारण स्वयं को अन्यों की अपेक्षा सर्वश्रेष्ठ समझने की  ओर वे ही राज्य करने लायक हैं यह भावना पैदा हो जाती है। उनका श्रेष्ठत्व इसलिए है, क्योंकि वे एकमेव अल्लाह की ही इबादत करते हैं। और जो नहीं करते हैं वे काफीर हैं। शिर्क (बहुदेव वाद) का गुनाह करते हैं। इसलिए गुनाहगार हैं। कुरान और हदीस के अनुसार सबसे बड़ा गुनाह शिर्क है। "" अल्लाह का शरीक (साझी) न ठहरा निस्संदेह  शिर्क बहुत बड़ा जुल्म है।'' (31ः13), (बुखारीः 32, 3428) और जो ऐसा करते हैं वे "" कुफ्र (इस्लाम से इनकार) करने वाले गुनाहगार है।'' (2ः276) उन्हें अल्लाह  पसंद नहीं करता। और यदि ऐसे काफीरों को इस्लाम के बंदे बतौर सजा बम से उड़ा दें तो वे गलत कहां हैं !  क्योंकि कुरान के अनुसार- ""तबाही है उसके लिए जो शिर्क (बहुदेव पूजन) करते हैं।'' (41ः6) "" और इनका  (काफीरों का) आखिरी ठीकाना दोजख (नरक) है।'' (13ः18)  जहां उनको पहुंचाने का नेक कार्य बम विस्फोट जैसी कारगुजारियों से इन अल्लाह के बंदों द्वारा बखूबी अंजाम दिया जा रहा है।
तो यह है कुरान की सीख और अल्लाह के वचन जो कि अपरिवर्तनीय हैं। हमेशा के लिए हैं जो पूरे होकर ही रहेंगे, इस बात पर हर मुसलमान की दृढ़ श्रद्धा रहती है। इस श्रद्धा को पै. मुहम्मद के अंतिम विदाई यात्रा के भाषण से और भी बल मिलता है। पै. मुहम्मद ने अपनी मक्का की अंतिम बिदाई यात्रा में कहा था-"" ऐ लोगों, मेरे शब्द ध्यान से सुनो और समझ लो। ध्यान में  रखो, प्रत्येक मुसलमान दूसरे मुसलमान का भाई है। तुम सब (मुसलमान) समान हो। तुम सब मिलकर एक (मुस्लिम) बंधुसंघ) (उम्मा) हो। तुम एक दूसरे पर अन्याय मत करो, परस्पर गले काटकर काफिर मत बनो।''

""मैंने अपना जीवन कार्य पूर्ण कर लिया है। मैं मेरे पीछे अल्लाह का (कुरान) ग्रंथ और उसके पैगंबर की सुन्नाह (हदीस) तुम्हारे लिए छोड़े जा रहा हूं। अगर उसे (श्रद्धा से और कृति सेे) दृढ़ता से पकड़े रहोगे तो तुम सीधी राह छोड़कर कभी भी मार्ग भ्रष्ट नहीं होओगे'' (The Spirit of  Islam- Saiyad Amir Ali पृ. 114) उसी समय अल्लाह की ओर से आगे का संदेश अवतरित हुआ-""मैंने तुम्हारे लिए दीन को मुकम्मल (परिपूर्ण)  कर दिया तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन (धर्म) की हैसियत से पसंद कर लिया।'' (5ः3) इस आयत पर दअ्‌वतुल कुर्आन का  भाष्य है- "" दीन के मुकम्मल (परिपूर्ण) करने का मतलब यह है कि दीन की इमारत का निर्माण परिपूर्ण हो गया। इसमें न तो कोई रिक्ति रह गई और न किसी वृद्धि एवं संशोधन की गुंजाइश है। मानव जाति के लिए अल्लाह तआला को जो हिदायत देनी थी वह दे चुका और.... अब इस दीन को इसी रूप में कियामत तक बाकी रहना  है और सम्पूर्ण जगत की सारी कौमों के लिए यही हिदायत का स्तंभ है।'' भाष्य आगे कहता है- "" दीन या  यह व्यवस्था मानव जीवन के तमाम विभागों पर हावी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जिन मार्ग निर्देशों की आवश्यकता थी और व्यक्तिगत जीवन के साथ-साथ सामाजिक जीवन के लिए जो आसमानी हिदायत दरकार थी उन सबका आयोजन इस व्यवस्था में है और उन सबका समावेश इस व्यवस्था में है।'' भाष्य आगे यह भी कहता है कि-"" जब दीन परिपूर्ण हो गया तो रिसालत (पैगंबरी) का सिलसिला भी खत्म हो गया। किसी नए नबी के आने की  जरूरत बाकी नहीं रहती।'' (द.कु. खंड1 पृ.340) अर्थात अब जो कुछ करना है वह अनुयायियोें को ही करना है, और वे कर भी रहे हैं तथा वे जो कुछ कर रहे हैं यह ऊपर पहले ही बतलाया जा चुका है। कुरान की इस शिक्षा का मुस्लिमों के मन-मस्तिष्क पर इतना गहरा प्रभाव है कि अशिक्षित, अल्पशिक्षित या उच्चशिक्षित इनमें से कोई भी हो वे अल्लाह एक है मुहम्मद उसका अंतिम पैगंबर है, और कुरान उसकोे अल्लाह ने दी है तथा जो कुछ कुरान में है वही अंतिम सत्य है। जो कुछ है वह कुरान में  ही है। उसमें हर चीज का समाधान मौजूद है के दायरे से बाहर ही नहीं निकल पाते और इसी कारण स्वयं को सुधारवादी, आधुनिक समझने वाले, कहे जाने वाले मुस्लिम विद्वान, चिंतक, विचारक भी, इस्लाम की कई चीजें कालबाह्य हो चुकी हैं और कुरान का पुनर्वाचन कर नए अन्वयार्थ लगाए जाकर उस अनुसार मुस्लिम समाज के सामने प्रस्तुत किए जाना चाहिए, करना चाहिए, यह कहने का साहस नहीं जुटा पाते जिसकी आवश्यकता है। 
सम्पूर्ण आलेख का निष्कर्ष यह निकलता है कि इस्लाम धर्म की "उम्मा' की संकल्पना केवल भयंकर ही नहीं तो अति संकुचित भी है, क्योंकि वह तो केवल ईमानवालों यानी इस्लाम पर श्रद्धा रखने वाले मुसलमानों तक ही सीमित है। उसमें गैर मुस्लिमों (काफिरों) को कोई स्थान प्राप्त नहीं। अर्थात्‌ इस्लाम की सदाचार, भाईचारा आदि की नैतिक शिक्षाओं, श्रद्धावानों ;"उम्मा' के सदस्यों द्वारा आपस में एक दूसरे के साथ पालन करने के लिए है, गैर-उम्मा या काफिरों के साथ इन सदवर्तनों के पालन की आवश्यकता नहीं। क्योंकि वे काफिर तो हैं ही-""नजिस (अपवित्र)''। (9ः22) अर्थात्‌ उनके साथ किए जाने वाले कदाचार, दुराचार, हिंसा सब जायज हैं। इसमें कोई गुनाह नहीं। बल्कि सर्वत्र-"" दीन अल्लाह ही का हो'' अर्थात सभी ओर इस्लाम गालिब (प्रबल) हो। इसके लिए तो ऐसे कृत्य करना ही पड़ते हैं, पड़ेंगे। क्योंकि "" इस्लाम के प्रति समस्त मुस्लिमें की केवल परिपूर्ण भावनात्मक निष्ठा ही पर्याप्त नहीं वरन गैर- मुस्लिमों के विचार- सिद्धांत, इनके विषय में भी चरम की घृणा होना अत्यावश्यक है।'' (सय्यद कुल्ब अंतरराष्ट्रीय विद्वान, विवेक 20-8-06 पृ. 84 ) जब इतनी घृणा होगी तो  बम विस्फोट जैसे कृत्य तो होंगे ही ना। शांति, सहिष्णूता, भाईचारे के कृत्य तो होने से रहे।

धर्म तो सम्पूर्ण विश्व के कल्याणार्थ होता है, विश्व के सम्पूर्ण मानव जगत के तारण के लिए होता है। जबकि इस्लाम धर्म के उम्मा के कारण तो सम्पूर्ण मानव जगत दो भागों में बंटकर रह जाता है। एक तो, उम्मा के सदस्य जो ""अल्लाह की पार्टी के हैं।'' (58ः22) दूसरे वे जो उम्मा के सदस्य नहीं वे ""शैतान की पार्टी के हैं।'' (58ः19) दअ्‌वतुल कुर्आन भाष्य भी कहता हैः ""कुफ्र (इस्लाम से इनकार) और इस्लाम की जंग में ईमान वालों को काफिरों से निर्भिकता पूर्वक और निःसंकोच लड़ना चाहिए। '' (द.कु. खंड 3, पृष्ठ 1993) और निःसंदेह वे बेझिझक लड़ भी रहे हैं।

 स्पष्ट है कि उम्मा की भयानक और संकुचित संकल्पना के कारण विश्वमानवता में उम्मा की जो दीवार खडी है, उसकी वजह से सम्पूर्ण विश्व समुदाय एक ही परिवार के समान, एक ही तरह के सभी को प्राप्त समान अधिकारों  और कर्त्तव्यों के साथ, शांत और सहिष्णू वातावरण में  सुख के साथ रह ही नहीं सकता।  "वसुधैव कुटुम्बकम '  और  "सर्वे भंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामयः' की आदर्श एवं श्रेष्ठ भावनाएं साकार रूप ले ही नहीं सकती। मुस्लिम विद्वानों, िंचंतकों, विचारकों को सोचना चाहिए कि जब विश्व समुदाय की दूरियां कम हो रही हैं, वैश्वीकरण और उदारीकरण का दौर चल रहा है, ऐसे दौर में इस तरह की भयंकर संकुचित संकल्पना से जनित दूषित विचारों के  साथ मुस्लिम समुदाय रहा तो  उसके दुष्परिणाम कितने घातक होंगे। इससे तो इस्लाम मतलब शांति नहीं, वरन अशांति या कब्रस्तान की शांति कहा जाएगा। और धर्म का अर्थ यह तो कदापि नहीं। संक्षेप में, हम इस बात से कतई इनकार नहीं कर रहे हैं कि इस्लाम में इंसानियत नहीं, लेकिन यह किसी विशेष घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप उपजी सहज भावना हो सकती है; व्यक्तिगत तौर पर हो सकती है। लेकिन, जहां सवाल इस्लाम का आता है तो सभी इंसानों के लिए नहीं वरन्‌ वहां वह उम्मा का रूप धरकर ही सामने आती है। जिस प्रकार कोई मां ममता की मूर्ति, वात्सल्य से परिपूर्ण होती है, परंतु जितना वात्सल्य वह अपनी स्वयं की संतान पर उंडैलती है उतनी ममता वह दूसरे बच्चों पर प्रकट नहीं करती। उसी प्रकार इस्लाम में जो इंसानियत है वह इतनी सीमित है जितनी की रेगिस्तान की तपती भर दोपहरी में की इंसान की छाया। जो उस तक ही सीमित रहती है। वह छाया क्षितिज तक जा पहुंचे इतनी लंबी नहीं हो पाती। जैसी की संध्याकाल की होती है। जो कि मानव धर्म में होती है।
विश्व मानवता में उम्मा की दीवार 1

प्राचीन अरबस्तान में कबीलाई संस्कृति व्याप्त थी। "" कबीलों के अलग-अलग  रहने तथा सभी आदमियों के एक दूसरे पर निर्भर होने के कारण इन लोगों में एक प्रकार का प्रेम भाव पैदा हो जाता था, जिसकी वजह से कबीलों तथा कौमों के संगठन में अत्याधिक सहायता मिलती थी। यह भावना " असबियह' अर्थात "असबियत' के नाम से प्रसिद्ध है। इसी के कारण एक कबीला अपनी मर्यादा की रक्षा हेतु दूसरे कबीले से युद्ध करते समय अपने प्राणों की बलि देना ब़ड़ी साधारण बात समझता था। बदवी (अरबस्तान के लोग) भाट का यह गीत सर्वदा उसके कबीले में गूंजता रहता था कि " अपने कबीले के प्रति निष्ठावान रहो। कबीले का हक इतना अधिक है कि पति अपनी पत्नी का त्याग कर सकता है।  '' (इब्ने खल्दून का मुकदमा पृ.6) संक्षेप में, "असबियत' मतलब  "कबीले के अंतर्गत लोगों का आपसी प्रेम, भाईचारा अथवा संगठन।' मुहम्मद साहेब और उनके द्वारा स्थापित इस्लाम पर यह संस्कार स्वाभाविक ही था। इसलिए कहा जा सकता है कि इस्लाम ने इन भावनाओं से लाभ उठाया और यह संकल्पना इस्लाम में "उम्मा' के रूप में दृढ़ मूल हुई।

 "उम्मा' यह वह संकल्पना है जो अपने अलावा और किसी के सम्मान से जीने के अधिकार को अन्य किसी सभ्यता, संस्कृति, जीवन शैली या परंपरा के हक को नकारती है। कलमा "ला इलाहइल्लल्लाह मुहम्मद रसूल्लल्लाह' अर्थात अल्लाह एक है और मुहम्मद उसका पैगंबर है, के बाद मुस्लिमों की सबसे अधिक श्रद्धा "उम्मा' में ही होती है। उम्मा यानी मुस्लिम बंधु संघ। उम्मा की संकल्पना का आधार है कुरान की यह आयत ""ईमान वाले (मुसलमान)(सब) आपस में भाई हैं। ''(49ः10, 9ः71, 8ः72) । यह भावना बलवती हो इसलिए कुरान में आगे यह हृदय स्पर्शी प्रश्न पूछा गया है- "" क्या तुममेें से कोई अपने भाई का गोश्त खाना पसंद करता है़?'' (49ः12)। इस "उम्मा' की सर्वश्रेष्ठता बनी रहे इस संबंध में पैगंबर मुहम्मद के वचन (हदीस) हैं। "हदीस' कथन के पूर्व हम यह जान लें कि हदीस के मायने क्या हैं़? मुस्लिमों में कुरान के अनंतर हदीस का महत्व है। हदीस को  "सुन्नाह' भी  कहते हैं। सुन्नाह का अर्थ मार्ग, नियम, कार्यपद्धति अथवा जीवन पद्धति होता है। कुरान की शिक्षाओं का योग्य स्पष्टीकरण और उसके अन्वयार्थों के विवाद मिटाने का एकमेव साधन हदीस ही है। अर्थात कुरान और हदीस मिलकर "दीन' (धर्म) की शिक्षा को पूर्णत्व तक पहुंचाते हैं। संक्षेप में हदीस मतलब मुहम्मद साहेब की कृतियां, उक्तियां एवं यादें, जो उनके निकटस्थ एवं विश्वसनीय अनुयायियों द्वारा आस्थापूर्वक संभालकर रखी थी, जिन्हें बाद में संग्रहीत कर संशोधकों ने ग्रंथ का रूप दिया। तो, हदीस कथन हैः-" कियामत के दिन सभी को फैसले के लिए अल्लाह के सामने लाया जाएगा। उसके द्वारा सभी प्रकार के धर्म विधि किए जाने के उपरांत भी जब उसको धिक्कारा जाएगा तब उसे आश्चर्य होगा कि यह दंड मुझे क्यों? तब उसे बताया जाएगा कि उसने उसके शब्दों द्वारा "उम्मा' (मुस्लिम समाज) में फूट डाली थी। उसका यह फल है।' (Tabligh movement मौ. वहीदुद्दीन खान- पृ. 48) एक और हदीस कथन है- "मुस्लिम समाज के (उम्मा के) परस्पर संबंधों में भेद पैदा करने वाले का तलवार से कत्ल करो, फिर वह कोई भी क्यों ंन हो।' (मुस्लिम 4565 से 66) एक और पैगंबर कथन- पैगंबर ने कहा-  "जो एकजुट (मुस्लिम) समाज से दूर जाता है वह नरक में जाता है।'  (रेडियंस 16-1-2000 पृ.5)पै. मुहम्मद द्वारा मक्का से हिजरत कर मदीना आगमन के बाद उम्मा की स्थापना उन्हें अनिवार्य प्रतीत हुई। इस प्रकार यह उम्मा मदीनावासियों (जिन्हें कुरान में अनसार (मददगार) कहा गया है) और मक्का से हिजरत (देशत्याग) कर आए हुए शरणार्थी (मुहाजिर) मक्कावासियों के बीच एक ही धर्म के अनुयायियों के रूप में स्थापित किया गया था। इस संबंध में कुरान की आयत 8ः72 में कहा हुआ है-"" जो लोग ईमान (श्रद्धा) लाए और उन्होंने हिजरत (यानी देशत्याग) किया और अल्लाह के रास्ते में अपनी जान माल से ल़ड़े और जिन  लोगों(यानी अनसारों) ने देश त्याग करने वालों को जगह दी और मदद की यह लोग (आपस में) एक दूसरे के वारिस हैं।' '  यह"उम्मा' कितना दृढ़ था उसका एक उदाहरण इस हदीस में मिलता है! एक मददगार ने एक शरणार्थी जो उसका भाई बना था से कहा- मैं अपनी सारी सम्पत्ति हम दोनों में बांटता हूं। वैसे ही मेरी दो पत्नियां है उनमें से जो तुझे पसंद हो वह बता तो मैं उससे तलाक ले कर उसकी शादी तेरे साथ करा देता हूं। (बुखारी3680, 81, 3937)
 "उम्मा'  को इस ऐतिहासिक वाकिये से और भी अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि सिकंदर जब विश्व विजय के लिए निकला तब उसके पास केवल 30,000 सैनिक थे, लेकिन तक्षशिला तक पहुंचते-पहुंचते उन सैनिकों  की संख्या 1,20,000 तक जा पहुंची। हारे हुए देशों की सेनाओं को सिकंदर अपनी सेना में शामिल कर लिया करता था, परंतु इस प्रकार के बहुद्देशीय सैनिक उसके वफादार कभी भी नहीं हुए और अंत में मात्र कुछ ही सैनिक उसके साथ बचे रहे। वहीं हारे हुओं को अपनी सेना में शामिल करने की नीति मुहम्मद साहेब ने भी अपनाई थी, परंतु वे सिकंदर के समान असफल न रहे। यही तो थी मुहम्मद साहेब की दूर-दृष्टि भरी चतुराई कि वे जिन्हें भी पराजित करते थे उन्हें सर्वप्रथम धर्मांतरित कर अपने "उम्मा' का सदस्य बना डालते थे। (इनकार की तो गुंजाइश रहती ही नहीं थी) और वादा रहता था कि यदि लड़ते हुए जीते तो युद्ध लूट के रूप में उपभोग के लिए धन सम्पत्ति और सुंदर औरतें और यदि खुदा न खास्ता शहादत को प्राप्त हुए तो मिलेगा परलोक का सुखी जीवन और मिलेगी जन्नत की हुरें (स्वर्ग की अप्सराएं), जहां उन्हें सदा के लिए रहना है।  सिकंदर यहीं मात खा गया। यदि सिकंदर ने भी मुहम्मद साहेब की भांति धर्म का जोड़ लगाया होता तो वह दुर्दशा को प्राप्त न हुआ होता। उदाहरणार्थः- मक्का विजय के पश्चात हुनैन के युद्ध के लिए निकलते समय उन्होेंने मक्का के 2000 नव मुस्लिमों को अपनी सेना में लिया था और उन्हें युद्ध लूट में से निश्चित हिस्सा भी दिया था, जिससे कि वे इस्लाम की ओर आकर्षित हों। इसका वर्णन कुरान की (9ः58-60) आयतों में आया हुआ है। तो बनी कुरैजा के साथ हुए युद्ध के पश्चात स्वयं को (यानी मुहम्मद साहेब को) लूट के प्राप्त पांचवे हिस्से में से कुछ लड़कियां और स्त्रियां अपने मित्रों को भेंट के रूप में दी और बची हुई बेचकर उससे राज्य के लिए घोड़े और शस्त्र खरीदे तथा शेष लूट 3000 सैनिकों में नियमानुसार बांट दी। (मुस्लिम 4370) इस कारण धर्मांतरित लोग और उनकी सेनाएँ अपना बहुदेेशीयत्व खोकर एक संघ मुस्लिम समुदाय का भाग बनकर रह गए और मुहम्मद साहेब विजेता कहलाए। जबकि सिकंदर यहीं मात खा गया। यदि सिकंदर ने भी मुहम्मद साहेब की भांति ही धर्म का जोड़ लगाया होता तो वह दुर्दशा को प्राप्त न होता।

"उम्मा' के संबंध में एक इस्लामिक विद्वान सय्यद हुसैन कहते हैं-"" पै. मुहम्मद द्वारा पुरस्कृत (बंधुभाव) का मूलभूत सिद्धांत यह था कि "बंधुसंघ' यह रक्त संबंधों पर आधारित न होकर (समान) धर्म श्रद्धा पर आधारित है और इसीलिए मुस्लिमों के साथ गैर-मुस्लिमों के रिश्तों को उन्होंने नकारा था। उन्होंने मक्का से आए हुए मुहाजिर और मदीना के अनसारों के बीच व्यक्तिगत स्तर पर बंधुसंघ निर्मित किया था।'' ( The Early History of Islam-Saiyad safdar Husain  पृ. 95) उम्मा का घटक बनने के लिए जिस कलमातैयबा ""ला इलाह इल्लल्लाह मुहम्मद रसूल्लुल्लाह'' का उच्चारण करना प़ड़ता है उस पर मौ. मौदूदी का भाष्य गौर करने लायक है-"" इसी कलमें की वजह से आदमी और आदमी में भी  बड़ा फर्क हो जाता है जो इस कलमें के पढ़ने वालेे हैं  वे एक (समुदाय) उम्मत होते हैं। बाप अगर कलमा पढ़ने वाला है और बेटा इससे इनकार करता है तो गोया बाप बाप न रहा और बेटा बेटा न रहा।  पराया, आदमी अगर कलमा पढ़ने वाला है.. गोया यह कलमा ऐसी चीज है कि गैरों को एक दूसरे से मिला देती है और अपनों को एक दूसरे से काट देती है, यहां तक कि इस कलमें का जोर इतना है कि खून और जन्म के रिश्ते इसके मुकाबले में कुछ नहीं।'' (खुतबात सय्यद अबुल आला मौदूदी मर्कजी मकतबा इस्लामी देहली- पृ.26,27)

मौै. मौदूदी आगे यह भी कहते हैं- "" अतः तुमने इकरार कर लिया कि जो कानून और जो तरीका हुजूर (यानी मुहम्मद साहेब) ने बताया है तुम उसी पर  चलोगे और जो कानून इसके खिलाफ है उस पर लानत भेजोगे'' यह इकरार करने के बाद अगर तुमने हुजूर के लाए हुए कानून को छोड़ दिया और दुनिया के कानून को मानते रहे तो तुमसे बढ़कर झूठा और बेईमान कोई न होगा, क्योंकि तुम यही इकरार करके तो इस्लाम में दाखिल हुए थे कि मुहम्मद साहेब का लाया हुआ कानून हक है और इसी की तुम पैरवी करोगे। इसी इकरार की बदौलत तो तुम मुसलमानों के भाई बने। '' (पृ.31)
यही "पॅन इस्लामिझम' वैश्विक मुस्लिम भाईचारे का भी आधार है। इस संबंध में दअवतुल कुर्आन भाष्य कहता है- "" दीनी (धार्मिक) रिश्ते के हिसाब से मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं। रंग और वंश, जाति और देश का अंतर इस विश्वव्यापी भाईचारे में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता। वे जहां कहीं भी होंगे एक दूसरे से जुड़े रहेंगे और एक के दर्द की चोट दूसरा अपने अंदर महसूस करेगा चाहे उनके बीच हजारों मील का फासला हो।'' इस भाईचारे के रिश्ते को मजबूत करने की ताकीद (चेतावनी) हदीस में दी गई है, मुसलमान मुसलमान का भाई है, न उस पर जुल्म करें और न उसे जालिम के हवाले करें। जो व्यक्ति अपने भाई की हाजत (इच्छा) पूरी करने में लगा रहता है और जो व्यक्ति किसी मुसलमान की तकलीफ दूर करेगा और जोे किसी मुसलमान की परदापोशी करेगा (दोषों को छुपाएगा) अल्लाह कियामत के दिन उसकी परदापोशी करेगा।'' (दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 3 पृ.1848) यही कारण है कि 11 सितम्बर का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन पर हवाई हमला हो या लंदन हवाई अड्डे की साजिश या लंदन के 2005 के बम विस्फोट या मुम्बई के बम विस्फोट इन मुस्लिम विस्फोटकर्ता, हमलावर आतंकवादियों के कृत्यों के समर्थन में मुस्लिम समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग विभिन्न रूप धरकर सामने आ जाता है। जुलाई 2005 में लंदन में हुए बम विस्फोट जिसमें 56 लोग मारे गए थे के संदर्भ में  हाल ही में हुए एक सर्वेक्षण में 25 से 28 प्रतिशत तक ब्रिटिश मुस्लिमों ने इस हमले का समर्थन किया है। समर्थन का कारण यह बतलाया गया है कि अमेरिका ने आतंकवाद से युद्ध के नाम पर मुस्लिमों के विरुद्ध लड़ाई छेड़ दी है और ब्रिटिश सरकार उसको समर्थन दे रही है। इसी "उम्मा' की संकल्पना के कारण "अक्षरधाम मंदिर' पर हमले के आरोपी फांसी की सजा प्राप्त तीनों अपराधियों का गुजरात से किसी भी तरह का कोई संबंध न होने पर भी उन्होंने यह कुकृत्य किया। ठीक इसी तरह लंदन हवाई अड्डे से उड़ान भरने वाले विमानों को उड़ाने की साजिश और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर तथा पेंटागन पर हवाई हमले करने वाले स्वतंत्र पॅलिस्टन समर्थक हैं, परंतु इनमें से कोई भी पॅलेस्टिनी नहीं। और तो और इस तरह के अपराधिक कृत्यों का जिनमें निर्दोष बलि चढ़ते हैं, जिहाद के नाम पर, कैरो (इजिप्त) के 1000 वर्ष पूर्व स्थापित "अल अजहर' विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक भी समर्थन करते हैं। ....

Monday, October 27, 2014

आइएस द्वारा इराक में इस्लाम का इतिहास ही दोहराया जा रहा है

भारत, यूरोप से लेकर अमेरिका तक के युवा इनमें कई युवतियां भी शामिल हैं जिस रफ्तार से अल बगदादी और उसके आतंकी  संगठन आइएसआइएस की ओर आकर्षित हो रहे हैं उससे इस समय सारा विश्व आतंकित और भयभीत है। बगदादी के आइएस (इस्लामिक स्टेट) ने जिस बर्बरता से इराक के तिरकित शहर में 1700 लोगों को सामूहिक रुप से मौत के घाट उतार दिया उसके दिल दहला देनेवाले वीडियो इंटरनेट पर लोड किए गए हैं। इसके अलावा इस संगठन द्वारा ब्रिटिश नागरिक एलन हैनिंग, राहतकर्मी डेविड हेंस, अमेरिकी पत्रकार जिम फोली, अमेरिकी इजराईली पत्रकार स्टीवन स्कॉटलाफ के सिर कलम करने के भी वीडियो, चित्र प्रकाशित हो चूके हैं। जिन्हें सर कलम करते समय केशरिया (भगवा) कपडे पहनाए गए हैं। भले ही इस इस्लामी स्टेट के विरुद्ध सब लोग एकजुट हों इसका आवाहन किया जा रहा है, अमेरिका निर्णायक कारवाई की बात कर रहा हो परंतु, यह सब जो कुछ भी आइएस द्वारा किया जा रहा है इसके पूर्व भी अरब भूमि में दोहराया जा चूका है। इसका गवाह इस्लाम का इतिहास है जिसे सारी दुनिया शायद विस्मृत कर चूकी हो। परंतु भारत के लोगों को तो इसका ज्ञान भी होगा क्या इस संबंध में शंका ही है। अतः लोगों को इस इतिहास का ज्ञान हो इसके लिए वह इतिहास यहां लिखना पड रहा है।

हजरत मुहम्मद ने अपने अपने जीवन के मदीनाकाल खंड के दस वर्ष के दौरान कुल 82 लड़ाइयां लड़ीं, उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण लड़ाई ''खंदक युद्ध'' के नाम से प्रसिद्ध है, जिसका 1400 वां (हिजरी) स्मृति दिन सन्‌ 1985 में धूमधाम से मनाया गया था। इस लड़ाई में मूर्तिपूजकों पर विजय संपादन के बाद ''जिब्रैल के जरिये अल्लाह का हुक्म पाकर पैगंबर मुहम्मद कुरैजा (मदीना का यहूदी कबीला) के किले के पास जा पहुंचे, जहां कबीले के सब लोगों ने पनाह ली थी। वे उनसे बोले 'ऐ बंदरों और सूअरों के भाईबंदों! हम आ गए हैं। अल्लाह ने तुमको जलील किया है और अपना कहर तुम पर नाजिल किया है।" रसूल ने पच्चीस रातों तक उनको घेरे रखा, जब तक कि वे टूट ना गए और अल्लाह ने उनके दिलों में दहशत पैदा न कर दी।" उन्होंने बिना शर्त समर्पण कर दिया और वे बंदी बना लिए गए। ('हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन" पृ. 120) हदीसों और पैगंबर के प्रामाणिक जीवन चरित्रों में इन कैदियों के भाग्य का बखान उल्लासपूर्वक किया गया है। हम यहां विलियम म्यूर की किताब 'लाइफ ऑफ महोमेट" में जिल्द 3 पृ. 276-279 पर संक्षिप्त में की गई कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं - 

'मर्दों और औरतों को रातभर अलग-अलग बाडों में बंद रखा गया... (उन्होंने) पूरी रात प्रार्थना करते हुए, अपने शास्त्रों के अंश दोहराते हुए और एकदूसरे को अविचलित रहने का प्रबोधन देते हुए गुजारी। उधर रातभर कब्रें या खाइयां ... बाजार में खोदी जाती रहीं ... सबेरे जब ये तैयार हो गईं तो पैगंबर ने जो स्वयं इस क्रूर घटनाक्रम की देखरेख कर रहे थे, हुक्म दिया कि बंदियों को पांच-पांच या छह छह की टोलियों में बारी बारी से लाया जाए। हर टोली को उस खाई के किनारे बिठा दिया गया जो उसकी कब्र के लिए नियत थी। वहां टोली में से हरेक का सिर काट डाला गया। एक टोली के बाद दूसरी इस तरह वे लोग लाए जाते रहे और उनकी निर्मम हत्या होती रही, जब तक वे सब खत्म ना कर डाले गए ...... 

'बदले की प्यास बूझा लेने के बाद और बाजार को आठ सौ लोगों के खून से रंग लेने के बाद और उनके अवशेषों पर तेजी से मिट्टी डाल देने का हुक्म दे देने के बाद, लूट के माल को चार श्रेणियों में बांटा गया - जमीन, बरतन-भाण्डे ढ़ोर-डांगर और गुलाम।  पैगंबर ने हर श्रेणी में से अपना पांचवा हिस्सा ले लिया(छोटे बच्चों को छोडकर जिनको उनकी माताओं के साथ गिना गया) एक हजार कैदी थे। इनमें से अपने हिस्से में आए कैदियों में से पैगंबर ने कुछ गुलाम औरतों और नौकरों को उपहार के रुप में अपने दोस्तों को दे दिया और बाकी औरतों और बच्चों को नजद के बद्द कबीलों में बेचने के लिए भेज दिया। उनके बदले में घोडे और हथियार ले लिए। 

इस पूरे किस्से को पैगंबर मुहम्मद के जीवनीकारों इब्न इसहाक, तबरी और मीरखोंद ने वर्णित किया है। तबरी पहले के एक जीवनीकार वाकिदी के हवाले से बतलाते हैं कि पैगंबर ने खुद 'गहरी खाइयां खुदवाई, खुद वहां बैठे रहे और उनकी मौजूदगी में अली और जुबैर ने कत्ल किए।" एक अन्य जीवनीकार इब्न हिशाम कुछ ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो दूसरे विवरणों में छूट गई दिखती हैं। उनके किस्सों में से एक से यह पता चलता है कि मुहम्मद ने स्थानीय संघर्षों का अपने स्वार्थ के लिए कैसे इस्तेमाल किया। मदिना के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण और गैर-यहूदी कबीले थे बनू औस और बनू खजरज। बनू कुरैजा के यहूदी बनू औस के साथ संधिबद्ध थे और इसलिए बनू खजरज उन्हें पसंद नहीं करते थे। इसलिए पैगंबर ने जब यहूदियों के सिर काटने का हुक्म दिया तो 'खजरज बडे शौक से सिर काटने लगे। रसूल ने देखा कि खजरज लोगों के चेहरों पर खुशी थे किंतु औस लोगों के चेहरों पर ऐसा कोई भाव नहीं था। रसूल को शक हुआ कि औस और बनू कुरैजा में पहले मैत्री थी इसीलिए औस के लोग हत्या करते हुए हिचकिचा रहे थे। जब सिर्फ बारह कुरैज बच गए तो पैगंबर ने उन सबको औस लोगों को सौंप दिया। हर दो औस के हिस्से में एक यहूदी आया। पैगंबर ने कहा ः तुम में से अमुक उसे मारेगा और अमुक उसे खत्म करेगा।""

इस पूरे घटनाक्रम पर भाष्य करते हुए 'हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन" के लेखक रामस्वरुप कहते हैं - जो लोग पैगंबर का अनुसरण करते हैं, उन्हें नई चेतना और नई निष्ठा के साथ नया आदमी बनना होगा। उन्हें इस्लाम की प्रखर पाठशाला में अपने मानस को कठोर करना पडेगा, इस्लाम की रक्तरंजित रस्मों में हिस्सा लेना होगा। उन्हें ऐसे कामों में सहभागी बनना होगा, जो उसी मात्रा में पूरे माने जाएंगे जिस मात्रा में कि उनकी चरित्र हानि हो सकेगी। कोई व्यक्ति जिसमें अपनी कोई निष्ठा बची हो, निर्भर करने योग्य नहीं रहता। किसी भी स्थिति में इस्लाम के अनुयायियों को यह मौका नहीं मिलना चाहिए कि वे अपनेआपको श्रेष्ठ समझें और किसी काम से सिर्फ इसलिए परहेज करें कि उनकी नजर में वह काम अन्यायपूर्ण अथवा क्रूर है। उन्हें जो भूमिका निभानी है इसीके हिसाब से अपनी चेतना को संवारना चाहिए और जो नए काम उन्हें सौंपे जाएं उनको करने लायक बनना चाहिए।

कुरान की सूर अल अहजाब की आयतें 26 और 27 में लड़ाई और न्याय का वर्णन इस प्रकार से आया हुआ है: ""और अहले किताब (यहूदी) में से जिन लोगों ने उन (हमलावर) गिरोहों की सहायता की थी अल्लाह ने उनके दिलों में ऐसा रोब डाल दिया कि एक गिरोह (पुरूषों) को तुम कत्ल करते रहे और दूसरे गिरोह (स्त्रियों व बच्चों) को तुमने कैद कर लिया और (अल्लाह ने) तुमकों उनकी जमीन, उनके घरों और उनके माल का वारिस बना दिया, और ऐसी(उपजाऊ) जमीन का भी जिस पर अभी तुमने कदम नहीं रखे। अल्लाह हर चीज पर सामर्थ्यवान है।"" अर्थात्‌ यह सब कुछ अल्लाह की मदद से और उसके मार्गदर्शनानुसार तथा इच्छानुसार ही हुआ है।

इस दंड के संबंध में न्यायाधीश सैयद अमीर अली ने 'The Spirit of Islam' में लिखा है : ""थोड़ा सोचिए अगर अरबों की तलवार ने अपना काम अधिक दयालुता से किया होता तो हमारा (मुस्लिमों का) और आकाश तले के अन्य प्रत्येक देश का भविष्य आज क्या होता ? अरबों की तलवार ने, उनके रक्तांकित कृत्यों से संसार के हर कोने के पृथ्वी पर के सभी देशों के लिए दया लाने का काम (Work of Mercy) किया है।'' (पृ. 81,82) उनका अंतिम निष्कर्ष यह है कि: ''किसी भी भूमिका में से हो पूर्वाग्रह रहित मानस को ऐसा ही लगेगा कि, बनी कुरैजा को कत्ल किया था इसलिए पै. मुहम्मद को किसी भी तरह से दोषी ठहराना सम्मत नहीं।'' (पृ.82)

एक बात बची रहती है वह यह कि जिन पत्रकारों को बगदादी की फौज ने मौत के घाट उतारा उन्हें केशरिया कपडे क्यों पहनाए गए? तो, उसका आधार हमें हदीसों (पैगंबर की उक्तियां और कृतियां) में मिलता है। वह इस प्रकार से है ः पैगंबर ने 'भगवा रंग के कपडे पहनने के लिए अनुयायियों को प्रतिबंधित किया था। इस संबंध में उनका कहना था ः 'ये कपडे (हमेशा) श्रद्धाहीन (गैरमुस्लिम) उपयोग में लाते हैं, (इसलिए) तुम उन्हें उपयोग में मत लाओ।" (मुस्लिम 5173) एक व्यक्ति केशर में रंगे कपडे पहने हुए था। यह देखकर कि पैगंबर ने वे कपडे पसंद नहीं किए उसने उनको धो डालने का वायदा किया। लेकिन पैगंबर बोले ''इनको जला दो।"" (मु. 5175) न केवल कपडे बल्कि केशों को भी केशर द्वारा नहीं रंगना चाहिए। (5241) 

स्पष्ट है कि बगदादी अपने इस्लामी स्टेट में जो कुछ भी कर रहा है उसकी प्रेरणा वह इस्लाम के 1400 से अधिक वर्षपूर्व के  इतिहास से ग्रहण कर रहा है। वह भी यह बिना सोचे कि अब वो जमाना बीत चूका है। आजके इस आधुनिक युग में ऐसी बातों के लिए कोई स्थान ही नहीं है। लेकिन वह तो उसी इतिहास, उन्हीं बाबाआदम के जमाने की बातों को सर्वकालिक सत्य मानकर बतलाकर युवाओं को बरगला रहा है और उसके भडकाऊ प्रचार के चक्कर में पडकर कई मुस्लिम युवा अपना जीवन बर्बाद करने पर उतारु हैं और अपने निर्दोष साधारण जीवन जीनेवाले परिवारजनों को कष्ट और असहनीय पीडा भोगने के लिए पीछे छोड बगदादी की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। यह निश्चय ही बहुत बडी चिंता का विषय है।

Friday, August 1, 2014

खिलाफत का जुनून

अल बगदादी ने अपने आपको इस्लामी जगत का खलीफा घोषित कर खिलाफत की स्थापना क्या की उसकी आंच भारत तक पहुंचने लगी है। अभी तक तो यही सुनने और पढ़ने में आया करता था कि इंग्लैंड-अमेरिका-यूरोप में सीधे-सादे, मासूम से दिखनेवाले सामान्य मुस्लिम युवाओं की मानसिकता अचानक बदल जाती है और वे जिहाद की राह पर चल पडते हैं। कुछ तो वैश्विक जिहाद (global jihad) में भाग लेने के लिए अपना देश छोड मध्यपूर्व-अफगानिस्तान-पाकिस्तान तक जा पहुंचे हैं। परंतु समाचार पत्रों के अनुसार चौंकने की बात यह है कि आईएसआईएस में शामिल होने वालों में कुछ भारतीय भी हैं और इसमें भी चिंतित करनेवाली बात यह है कि इनमें से अधिकतर दक्षिण भारत के हैं। जबकि इसके पूर्व उत्तर भारत के संबंध में इस प्रकार के समाचार मिल चूके थे।

खिलाफत संबंधी समाचारों ने जो इतिहास के जानकार हैं उनके जहन में 1920 में भारत में जो खिलाफत आंदोलन हुआ था उसकी यादें ताजा हो गई होंगी। इस पर चर्चा हम बाद में करेंगे, पहले तो विचार इस पर करना होगा कि वह कौनसा कारण है जो इन युवाओं को अपना साधारण जीवन छोड जिहाद की ओर प्रवृत्त कर रहा है? तो, इसका कारण है 'उम्मा" (pan islamism) (विश्व मुस्लिम बंधुत्व-पॅन इस्लामिज्म)। जिसका आधार है कुरान की यह आयत ""ईमान वाले (मुसलमान)(सब) आपस में भाई हैं। ''(49ः10, 9ः71, 8ः72) । इस पर कुरान भाष्य कहता है -

"" दीनी (धार्मिक) रिश्ते के हिसाब से मुसलमान एक दूसरे के भाई हैं। रंग और वंश, जाति और देश का अंतर इस विश्वव्यापी भाईचारे में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकता। वे जहां कहीं भी होंगे एक दूसरे से जुड़े रहेंगे और एक के दर्द की चोट दूसरा अपने अंदर महसूस करेगा चाहे उनके बीच हजारों मील का फासला हो।'' इस भाईचारे के रिश्ते को मजबूत करने की ताकीद (चेतावनी) हदीस में दी गई है, मुसलमान मुसलमान का भाई है, न उस पर जुल्म करें और न उसे जालिम के हवाले करें। जो व्यक्ति अपने भाई की हाजत (इच्छा) पूरी करने में लगा रहता है और जो व्यक्ति किसी मुसलमान की तकलीफ दूर करेगा और जोे किसी मुसलमान की परदापोशी करेगा (दोषों को छुपाएगा) अल्लाह कियामत के दिन उसकी परदापोशी करेगा।'' (दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 3 पृ.1848)

आयत (9ः71) के संबंध में मौ. मौदूदी कहते हैं : ''सच्चे श्रद्धावान (मुसलमान) पुरूष और स्त्री मिलकर एक विशिष्ट स्वतंत्र समाज (distinct community) तैयार होता है, क्योंकि उनमें अनेक गुणविशेष समान होते हैं। वे स्वभाव से ही सदाचारी बने होते हैं; वे दुराचार को निषिद्ध मानते हैं; और एकमात्र अल्लाह का स्मरण यह उनके जीवन की सांस ही होती है... इस समान गुण धर्म के कारण उनमें सामूहिक एकता की भावना निर्मित होती है।'' अर्थात्‌ जिहाद के लिए यह एकता, भाईचारा और दोस्ती बहुत काम आती है। इसे ही वैश्विक मुस्लिम भाईचारा कहते हैं। इसीलिए संपूर्ण विश्व के मुस्लिमों का जिहाद के लिए आवाहन किया जा सकता है, किया जाता है। आयत (8ः72) पर भाष्य करते हुए मौ. मौदूदी कहते हैं ''अगर (संसार के) मुसलमान ......एक दूसरे की मदद नहीं करेंगे तो संसार में उपद्रव और अराजकता फैल जाएगी।"" सच्चा श्रद्धावान कौन की व्याख्या है : ''श्रद्धावान वह हैं जो अल्लाह और उसके पैगंबर पर श्रद्धा लाए (और श्रद्धा में दाखिल होने के बाद) फिर शक में (डावांडोल) नहीं हुए और अल्लाह की राह में अपनी जानों और मालों से जिहाद किया ।'' (49:15) इस प्रकार यहां जिहाद को अल्लाह और पैगंबर के ठीक बाद का स्थान मिला हुआ है। इसी बंधुभाव के आधार पर बगदादी विश्व के मुसलमानों का जिहाद के लिए आवाहन कर रहा है और उसके प्रत्युत्तर में कुछ मुस्लिम युवा जिहाद में शामिल होने के लिए जा भी रहे हैं।

भारत में 1920 में खिलाफत आंदोलन प्रारंभ करने के पीछे कारण यह था कि मित्र राष्ट्रों द्वारा प्रथम विश्वयुद्ध के बाद तुर्क साम्राज्य के टुकडे करके आपस में बांट लिए थे। मुसलमानों के अरबस्थान के पवित्र तीर्थस्थान (मक्का-मदीना) विजयी ईसाई राष्ट्रों के कब्जे में चले गए थे। वे उनके कब्जे में न जाएं और उन पर खलीफा की हुकूमत बनी रहे इसलिए हिंदुस्थान के मुसलमानों ने खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की थी। क्योंकि, संसार के सारे मुसलमान तुर्की के खलीफा को अपना राजनैतिक और धार्मिक प्रेरणास्थान और श्रद्धास्थान, रक्षणकर्ता मानते थे और पैगंबर के बाद खलीफा का ही स्थान था। इस आंदोलन के परिणामस्वरुप मुसलमानों का धार्मिक उन्माद बेकाबू हो गया। उन्हें विदेशी मुस्लिम अपने भाई और हिंदू शत्रु नजर आने लगे। तभी सबसे पहले राष्ट्रीय हिंदू नेताओं के ध्यान में खिलाफत और पॅनइस्लामिझ्म (विश्व इस्लामी बंधुत्व) का भयंकर स्वरुप आया। गांधीजी ने ही, आंदोलन के प्रारंभ में जब वे अली बंधुओं के साथ देशव्यापी दौरों पर थे, लिख रखा है ''उन्हें ऐसा नजर आया कि हिंदू-मुस्लिम एकता होने पर भी हिंदू 'वंदेमातरम्‌" तो मुसलमान 'अल्लाहो अकबर" के नारे लगाया करते थे।""(यंग इंडिया 8 सितंबर 1920)

सन्‌ 1921 में मोहम्मद अली ने एक पत्र लिखकर अफगानिस्तान के अमीर अमानुल्ला को भारत पर आक्रमण का आमंत्रण दिया था। मोहम्मद अली ने अफगान आक्रमण संबंधी जो वक्तव्य दिया था वह इस प्रकार से था ः ''यदि महामहिम (अफगानिस्तान का अमीर) को उसी धार्मिक उद्देश्य से प्रेरित होकर उन लोगों के विरुद्ध जेहाद की बात सोचनी पडती है जिन्होंने जजीरुतल अरब और पवित्र स्थलों पर अवैध अधिकार कर रखा है ... जो इस्लाम को दुर्बल करने की इच्छा रखते हैं और हमें प्रचार करने की पूरी स्वतंत्रता देने से इंकार करते हैं, ... तो इस्लाम का कानून साफ-साफ कहता है कि किसी भी मुसलमान को उनके (अमीर के) विरुद्ध कोई  सहायता नहीं देनी चाहिए और यदि जेहाद उसके क्षेत्र तक पहुंचता है तो प्रत्येक मुसलमान को मुजाहिदीन (विधर्मियों से लडनेवाले योद्धा) में सम्मिलित हो जाना चाहिए और सबको, चाहे स्त्री हो या पुरुष, उनकी भरसक सहायता करना चाहिए।"" 

दिसंबर 1922 में अहमदाबाद में खिलाफत आंदोलन की समीक्षा करते हुए हकीम अजमल खां जिन्हें विशुद्ध एवं वास्तविक राष्ट्रवादी माना जाता था ने गांधीजी की उपस्थिति में मंच से कहा था कि इस्लामी साम्राज्य का भविष्य उज्जवल है ः ''एक ओर भारत और दूसरी ओर एशिया माइनर भावी इस्लामी महासंघ की लम्बी श्रंखला के दो सिरे ही हैं। शनैः शनैः ये सिरे मध्यवर्ती राज्यों को एक महान सूत्र में पिरोते जा रहे हैं।"" आज बगदादी इसी दिशा में ही तो कदम बढ़ा रहा है। भारत के खिलाफ भी जिहाद की घोषणा कर रहा है।

गांधीजी ने खिलाफत के समूचे प्रश्न को एक वैचारिक आधार प्रदान किया और स्वयं उस आंदोलन का नेतृत्व भी किया एवं कांग्रेस ने तो केवल उसका अनुगमन किया। तथापि कांग्रेस में कुछ ऐसे स्वर उभरे जिन्होंने सचेत किया कि खिलाफत जैसे साम्प्रदायिक उन्माद में कूदने के क्या कुफल हो सकते हैं। परंतु, गांधीजी ना माने। 1921 में यंग इंडिया में घोषणा की ''एक दृष्टि से मैं निश्चय ही अफगानिस्तान के अमीर की सहायता करुंगा यदि उन्होंने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध तलवार उठाई। इसका अर्थ है कि मैं खुले आम अपने देशवासियों से कहूंगा कि जिस सरकार ने सत्ता में रहने के संबंध में राष्ट्र का विश्वास खो दिया है, उसकी सहायता करना अपराध होगा।""

खिलाफत से उत्पन्न जेहाद का उन्माद शीघ्र ही दावानल की भांति फैल गया। देश भर में फैले दंगों से गांधीजी को गहरा आघात लगा। गांधीजी के नेतृत्व की यह भयंकर भूल मानी गई। इस कारण आज भी गांधीजी पर यह आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने खिलाफत आंदोलन में भाग लेकर मुसलमानों को भारत के बाहर देखने की आदत लगाई।

 यह आरोप अज्ञान पर आधारित है। मुसलमानों को भारत के बाहर देखने की नई आदत किसी के द्वारा लगाने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। वे हमेशा से ही स्वयं को इस देश में परकीय विजेता मानते आए हैं। जिनकी कई पीढ़ियां भारत में गुजर गई प्रत्युत जो एतद्देशीय धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बने  वे भी स्वयं को इस भूमि में पराया मानते। सुन्नी राज्यकर्ता स्वयं को तुर्की समझते और शुक्रवार की नमाज का खुत्बा बिना चूके तुर्की के खलीफा के नाम से पढ़ा जाता। भले ही औरंगजेब क्यों ना हो, उसे भी खलीफा का आशीर्वाद तख्त जीतने के समान महत्वपूर्ण और आनंद का लगता था। शिया राजा ईरान के खलीफा के नाम का खुत्बा पढ़ते। शिया राज में ईरान के नागरिकों को विशेषाधिकार थे। सुन्नीयों के राज में तुर्कों को विशेषाधिकार थे। जो स्वयं को परंपरा से पराया मानते आए, जो हर दिक्कत के समय ईरान, तुर्कस्तान, अफगनिस्तान की सहायता मांगते आए वे आवश्यकतानुसार अरबस्तान की ओर हिजरत करते गए, उन्हें विदेश की ओर देखने की आदत गांधीजी द्वारा लगाए जाने की आवश्यकता ही नहीं थी।

 इसीलिए शाह वलीउल्लाह ने सहायता के लिए अहमदशाह अब्दाली की ओर देखा तो इसमें आश्चर्य करने जैसा कुछ नहीं उसके पूर्व भी यह अनेकों ने किया था और उसके बाद भी करना अनेकों ने योग्य माना था। यदि आज कुछ मुसलमान युवा बगदादी के जिहाद में शामिल होने जा रहे हैं तो इसमें भी आश्चर्य करने या चौंकने जैसा कुछ भी नहीं। 

Friday, July 11, 2014

THE CALIPH & ISLAMIC STATE


खलीफा  और इस्लामी राज्य

अलकायदा के सहयोगी रह चूके आतंकवादी संगठन आईएसआईएल के प्रमुख अबू बक्र अल बगदादी ने कुछ दिनों पूर्व अपने आपको खलीफा घोषित कर मुसलमानोें को पवित्र जिहाद में तब तक लडने के लिए शामिल होने को कहा है जब तक रोम को फतह नहीं कर लेते। बगदादी ने उसके द्वारा कब्जाए हुए इराक-सीरिया के क्षेत्र में इस्लामी राज्य घोषित कर उसमें आ बसने का आमंत्रण भी दे दिया है। इस प्रकार से उसकी यह घोषणा सन्‌ 1924 में तुर्कीस्तान के कमाल अतातुर्क द्वारा खलीफा और खिलाफत इस संस्था को ही रद्द कर तुर्की को सेक्यूलर राज्य घोषित कर देने के बाद एक प्रकार से खलीफा और खिलाफत को पुनर्जीवित करने के समान ही है।

खलीफा का राज्य ही इस्लामी राज्य (खिलाफत) होता है। इस्लाम प्रणीत खिलाफत एक अनन्य संस्था है जिसका आधार कुरान की (24ः55) आयत है। इस्लामी राज्य को ही 'अल्लाह का राज्य" भी कहते हैं। लेकिन सर्वसाधारणजन इस संकल्पना के बारे में कुछ भी नहीं जानते इसलिए इस्लामी राज्य क्या है यह समझ सकें इसलिए यहां उसका संक्षिप्त सार प्रस्तुत है। 

खिलाफत यानी उत्तराधिकारी अथवा प्रतिनिधि। पैगंबर की मृत्यु के बाद जो मुस्लिम समाज का नेता बना उसे ही 'खलीफा" कहते हैं। वही उस समाज का एकमेव राजप्रमुख और धर्मप्रमुख होता है। उस समय यह अपेक्षा थी कि संसार का संपूर्ण मुस्लिम समाज बंधुसमाज के रुप में एकत्र रहेगा और उन सबका मिलकर एक ही खलीफा होगा। परंतु, आगे जाकर उस समाज के राजनैतिक दृष्टि से अनेक गुट बन गए और प्रत्येक गुट के स्वतंत्र खलीफा बन गए। सारे गुटों के मिलाकर कुल 176 खलीफाओं के नाम इतिहास में दर्ज हो चूके हैं और अब बगदादी नए खलीफा के रुप में सामने आया है। 

यह इस्लामी राज्य कैसा होना चाहिए को मुस्लिम विद्वान मौ. अबू मुहम्मद इमामुद्दीन के इस भाष्य से समझा जा सकता है ः 'आजकल जिस राज्य का राष्ट्रपति और मुख्य प्रशासक मुसलमान है उस राज्य को इस्लामी राज्य कहा जाने लगा है ... वस्तुतः इस्लामी राज्य वह है जिसका संविधान कुरान और हदीस पर आधारित है एवं जिसका राष्ट्रपति और प्रधान अधिकारी इस्लाम के सिद्धांतानुसार जीवन जीता है।"" इसीलिए पैगंबर और उनके उत्तराधिकारी पहले चार खलीफाओं के राज्य को 'आदर्श इस्लामी राज्य" कहा जाता है।

इस्लामी राज्य के कानूनी स्वरुप के बारे में बतलाते हुए पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के कानूनी विद्वान द्वारा लिखी हुई और विधि पाठ्यक्रम में समाविष्ट ग्रंथ में कहा गया है ः ''इस्लामी कानूनों का मूलाधार (कुरान और हदीस के) ईश्वरीय संदेश हैं ... इस्लाम के अनुसार (राज्य का) कानूनसम्मत सार्वभौमत्व अल्लाह का होता है .... जो व्यक्ति या संस्था स्वयं को सार्वभौम समझती है या कानूनीतौर पर वैसी मानी जाती है, वह अनेकेश्वरवाद का भयंकर अपराध करती है।"" ''इस्लाम की आज्ञा है कि, नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्षेत्र में केवल अल्लाह को ही सार्वभौम मानना चाहिए ... समाज में उसीकी आज्ञा प्रस्थापित होना चाहिए और पाली जानी चाहिए ... उसकी इच्छा ही सर्वोच्च कानून होना चाहिए।""

अब्दुल रहमान बि. हमद अल उमर ने सऊदी अरेबिया शासन की पूर्वानुमति से प्रकाशित ग्रंथ में लिखा है कि, ''सार्वभौमत्व और कानून बनाना केवल अल्लाह का विशेषाधिकार है। यह एकेश्वरवाद से अपनेआप निष्पन्न होनेवाला निष्कर्ष है। अल्लाह के कानून के विरोध में कानून बनाने का कोई सा भी अधिकार मनुष्य को नहीं है।"" (समान नागरिक संहिता का किस आधार पर विरोध किया जाता है यह इस पर से समझा जा सकता है)

संक्षेप में, इस्लामी राज्य में शासन को अल्लाह के कानून के अनुसार राज्य करना होता है, उसे उसके विरोधी कानून बनाने का  अधिकार नहीं होता है, उन कानूनों को कार्रवाई में लाने के लिए आवश्यक ऐसे पूरक उपविधि या नियम बनाने तक का ही उन्हें अधिकार होता है। 

पाश्चात्य पद्धति में जिस प्रकार से 'धर्म" और 'राज्य" अलग होते हैं, वैसा इस्लाम में नहीं। मानव जीवन का धर्म, अर्थ, समाज, राजनीति में विभाजन इस्लाम को मान्य नहीं। मानव जीवन के सभी घटक इस्लाम में अभिन्नता से समाविष्ट होते हैं। इस्लाम एक जीवन पद्धति है। अल्लाह ने समय-समय पर जो संदेश पैगंबर को दिए उनमें इस प्रकार का विभाजन नहीं। आज धर्म, कल समाज, परसों राजनीति इस प्रकार से जीवन के खाने बनाकर अल्लाह ने मार्गदर्शन किया हुआ नहीं है। इस कारण से इस्लाम में ये सारी बातें अविभाज्य और एकरुप हैं। 

धर्म और राजनीति में फर्क करो की पाश्चात्य कल्पना इस्लाम को मान्य नहीं। इस कारण जिस प्रकार से पैगंबर एक ही समय में धर्मप्रमुख, राजप्रमुख, सेनापति, न्यायाधीश, समाज सुधारक आदि सबकुछ थे उसी प्रकार से आदर्श खलीफा भी सबकुछ थे। उन्होंने दी हुई वही आज्ञा एक ओर धार्मिक तो, दूसरी ओर से राजनैतिक होती। राजादेश और धर्मादेश में कोई अंतर ना था। एम. एन. रॉय के शब्दों में 'इस्लाम मूलतः धर्म नहीं अपितु राजनैतिक आंदोलन के रुप में उदित हुआ था।"   

इस्लामी राज्य का ध्येय, मकसद, उद्देश्य और खलीफा के कर्तव्य वही थे जो पैगंबर ने आदर्श के रुप में सामने रखे थे। वह राज्य अल्लाह के कार्य के लिए स्थापित हुआ होने के कारण अल्लाह के कार्य के रुप में इस्लाम का प्रसार करना, उसे सभी मानवों तक पहुंचाना, इस्लामी राज्य का विस्तार करना, सर्वत्र अल्लाह के कानून को प्रस्थापित करना, अल्लाह का धर्म अन्य धर्मों पर प्रभावी और विजयी बनाना, संसार में प्रेम, सत्य, न्याय, समता, बंधुता, सहिष्णुता, शांति, नैतिकता, मानवता आदि इस्लामी नीतिमूल्यों की प्रतिष्ठापना करना, राज्य की प्रजा के इहलोक और परलोक के कल्याण की चिंता करना, इस्लाम की सीख के अनुसार प्रजा को व्यवहार करने के लिए बाध्य करना, कानून और सुव्यवस्था प्रस्थापित करना, गुनहगारों को दंडित करना ये सारे काम खलीफा के  कानूनसम्मत कर्तव्य तय होते थे। इन्हीं सब कर्तव्यों का निर्वाह कर आदर्श निर्मित किया इसलिए पहले चार खलीफाओं को आदर्श कहा जाता है। इन चार आदर्श खलीफाओं को इस्लाम, इस्लाम के इतिहास और मुस्लिमों के जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण एवं बहुमूल्य स्थान प्राप्त है।  

आज अलकायदा, तालिबानी, हिज्ब उत तहरीर आदि अनेकानेक कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के धर्मयोद्धा जिस विशुद्ध इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए संघर्षरत हैं उन सबमें आईएसआईएल के बगदादी ने स्वयं को खलीफा घोषित कर और अपने कब्जेवाले प्रदेश में इस्लामी राज्य (खिलाफत) स्थापित कर सबसे बाजी मार ली है।  

Friday, June 20, 2014

दुनिया को मुसीबत में डालता शीआ - सुन्नी विवाद

इस समय इराक में छिडे हुए गृहयुद्ध ने सारी दुनिया की सांसें रोक रखी हैं। यह युद्ध शीआ-सुन्नी विवाद के फलस्वरुप उपजा है। नफरत की यह जंग इराक को तबाही की ओर ले जा रही है और सारी दुनिया खौफजदा है। इस शीआ-सुन्नी विवाद ने पूरे मध्यपूर्व को ही सुलगा रखा है। यह विवाद कोई आज का नहीं है यह चौदह सौ से अधिक वर्षों से चला आ रहा है और इसकी जड में है पैगंबर साहब का उत्तराधिकारी यानी खलीफा कौन होगा? सबसे पहले खलीफा और खिलाफत की संकल्पना को समझ लें।

खलीफा का अर्थ होता है प्रतिनिधि या किसी की अनुपस्थिति में उसके स्थान पर काम करनेवाला, राजा, प्रमुख या मुहम्मद साहेब का उत्तराधिकारी। मुहम्मद साहेब ने कहा था 'मेरे बाद अब कोई पैगंबर नहीं आएगा खलीफा भर आएंगे।" परंतु जब मुहम्मद साहेब मृत्यु को प्राप्त हो गए तो उनके बाद उनका प्रतिनिधित्व कौन करेगा इस संबंध में कोई सूचना उन्होंने रख नहीं छोडी थी। इस कारण खलीफा पद के लिए विवाद की स्थिति निर्मित हो गई और मुस्लिमों के विभिन्न गुटों व व्यक्तियों के बीच विवाद उभर कर सामने आ गया।

 मक्कावासी (मुहाजिर, निर्वासित) मुहम्मद साहेब के कुरैश वंश के होने के कारण और इस्लाम स्वीकृति के मामले में वरिष्ठ होने के कारण व मुहम्मद साहेब के इन वचनों के आधार पर कि 'खिलाफत (राज्य सत्ता) हमेशा कुरैशों के ही हाथों में रहेगी भले ही उनके दो मनुष्य ही (पृथ्वी पर) जीवित रहें तो भी (वह रहेगी)।" (मुस्लिम 4476,बुखारी 7140) खलीफा पद पर अधिकार जमाना चाहते थे। तो मदीनावासी (अनसार यानी मददगार, जिन्होंने मुहम्मद साहेब और उनके साथियों को मक्का से हिजरत अर्थात्‌ देशत्याग कर मदीना आने पर शरण दी थी) इस सोच के कारण कि उनके द्वारा आश्रय दिए जाने के कारण ही मुहम्मद साहेब का इस्लाम इतना फल-फूल सका था। इसलिए वे ही खलीफा पद के असली दावेदार हैं महत्वाकांक्षी हो खलीफा पद पर किसी मदीनावासी को ही देखना चाहते थे।

 अतः मदीनावासियों ने नेता के रुप में 'सद बिन उबादह" को चुन भी लिया था। यह पता चलते ही अबू बकर और उमर (यानी मक्कावासी) दोनो ही तत्काल वहां पहुंचे। अबू बकर ने मदीनावासियों को दो टूक शब्दों में कह दिया कि ''ऐ मदीना के लोगों! अपनी गुणवत्ता के विषय में तुम जो कह रहे हो वह बिल्कूल सत्य है। इस संंबंध में तुम जैसे प्रशंसा के पात्र दुनिया में और कोई नहीं। परंतु, अरब लोग हमारी टोली कुरैश के सिवाय अन्य किसी को अपने प्रमुख के रुप में मान्यता नहीं देंगे। हम अमीर (राजा) हैं तुम वजीर (प्रधान) हो।" इस पर मदीनावासियों ने कहा 'ऐसा नहीं है। फिर भी, ऐसा करो ः तुम में से एक को अमीर और हम में से भी एक को अमीर बनाओ।" यह दो अमीरों की मांग अबू बकर ने तत्काल ठुकरा दी और कहा 'नहीं, हम अमीर और तुम हमारे वजीर (ंमंत्री) हो। हम सभी अरबों में सर्वश्रेष्ठ कुल के और वंश से सर्वश्रेष्ठ हैं।" 'उमर (दूसरा खलीफा) ने भी आगाह कर दिया कि दो खलीफा (कुछ लोगों के मतानुसार 'तलवार") एक साथ नहीं रह सकते। वह एक अरिष्ट होगा। अल्लाह की कसम, पैगंबर के कुल के सिवाय अन्य किसी को भी अरब खलीफा के रुप में नहीं मानेंगे...हम पैगंबर के कुल के (यानी कुरैश) हैं और इसलिए हम से बेहतर खलीफा पद का हकदार और कौन हो सकता है? केवल दुराग्रही, पापी और विनाश के गड्‌ढ़े में गिरने की चाह रखनेवाला ही इसे नकार सकता है।" इस प्रकार से पैगंबर की विरासत यानी खिलाफत के लिए संघर्ष शुरु हुआ।

 परंतु, मदीनावासियों द्वारा पीछे हटने के कारण मक्कावासियों का रास्ता साफ हो गया और उमर तथा एक और प्रभावशाली मक्कावासी अबू उबैदा (पैगंबर के आरंभिक सहयोगी) द्वारा तत्काल अबू बकर के प्रति एकनिष्ठता की शपथ लेकर उन्हें पैगंबर का वारिस खलीफा घोषित कर दिया गया। रुबेन लेव्ही के मतानुसार 'सच कहें तो उमर के इस निर्णय के कारण हर तरह से अबू बकर समाज पर लादा गया था। उसके बदले में अबू बकर ने मरते समय (अपने बाद) उमर की खलीफा पद पर नियुक्ति की थी।"  

परंतु, 'अबू बकर का विरोध करनेवाले केवल मदीनावासी ही नहीं थे बल्कि कुछ मक्कावासी भी उनके विरोध में थे। वे अली के समर्थक थे। इनका कहना था कि वे पैगंबर चचेरे भाई, दामाद और पैगंबर के ही हाशिम वंश के होने और योग्य होने के कारण खलीफा पद पर अधिकार अली का बनता है। जब अबू बकर को खलीफा चुना गया उस वक्त यह इने-गिने वहां मौजूद नहीं थे। मुहम्मद साहेब के निकट के रिश्तेदार होने के कारण वे उनकी अंत्येष्टि क्रिया की तैयारियों में व्यस्त थे। अबू बकर के चुनाव के संबंध में उनसे पूछा भी नहीं गया था। अली के पक्ष के लोग 'शीआ" तो अबू बकर, उमर के पक्ष के लोग 'सुन्नी" कहलाए और यहीं से इस्लाम के इन पंथों में विभाजन की शुरुआत हुई।

 शीआ गुट का आक्षेप है कि पैगंबर के हाशिम वंश के व्यक्ति को खलीफा पद से दूर रखने के लिए ही अली को इस पद से दूर रखा गया और इस संबंध में उनका सबसे अधिक गुस्सा उमर के प्रति है। शीआओं का कहना है कि सकिफा (सभागृह का नाम जहां चुनाव हुआ था) ('सकिफा" को 'मुस्लिमों कापहला विघटन" सूचित करनेवाला सामान्य नाम मानना चाहिए) में कुछ मदीनावासियों ने अली को खलीफा के रुप में चुनने की मांग की थी और यह भी कहा था कि मक्कावासियों में केवल अली ही ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी योग्यता पर ऊंगली नहीं उठाई जा सकती और उन्हें मानवंदना देने के लिए हम तैयार भी हैं। (इन योग्यताओं को मुस्लिम इतिहासकार इब्ने खलदून ने अपने 'मुकद्दमे" मेें विस्तार से पृ. 178 से 180 पर दिया हुआ है।) 

परंतु, उमर ने तत्काल अबू बकर से निष्ठादर्शक हाथ मिला लिया। इतना होने पर भी कुछ अनसारों ने विरोध कर चिल्लाते हुए कहा 'हम अली के सिवाय अन्य किसी भी (कुरैश) नेता की मानवन्दना नहीं करेंगे"। परंतु, उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गई।" 

'दूसरे दिन सार्वत्रिक मानवंदना के लिए जो जनसभा आयोजित की गई उसमें अली के पक्ष के लोग उपस्थित नहीं हुए। उनमें अली सहित अब्बास (पैगंबर के चाचा), जुबैर, तल्हा, खलीद बि. सईद, अमर (सभी पैगंबर के सहयोगी) और अन्य प्रतिष्ठित शामिल थे। हाशिम वंश (जिसके कि स्वयं पैगंबर थे) का कोई भी उपस्थित नहीं था (वे अंत्येष्टि क्रिया में व्यस्त थे)। दफन विधि के बाद अली के पक्ष के लोग अली की पत्नी फातिमा (पैगंबर की बेटी) के घर एकत्रित हुए। यह बात अबू बकर और उमर को पता चली। अबू बकर ने उमर को उधर भेजा। अली और उनके समर्थकों को खलीफा से एकनिष्ठता की शपथ लेने के लिए बाध्य करने का काम उन पर सौंपा गया था। वहां जाकर उमर ने फातिमा के घर में अनधिकृत प्रवेश कर उन्हें इशारा दिया कि, अगर उन्होंने ऐसी शपथ नहीं ली तो, वे घर को जला डालेंगे। वहां उपस्थित जुबैर ने उमर के विरोध में तलवार उठा ली। परंतु, उमर के लोगों ने उन्हें निःशस्त्र कर दिया और उनसे एकनिष्ठता की शपथ लेने में सफल रहे। परंतु, अली ने शपथ लेने से इंकार करते हुए उमर के सामने वही तर्क दोहराया जो उमर ने अनसारों के सामने दोहराया था कि 'खलीफा पद पर हमारा अधिकार इसलिए अधिक है क्योंकि, हमने तुमसे पहले इस्लाम का स्वीकार किया था और हम पैगंबर के अधिक निकट के रिश्तेदार हैं। उसी तर्क के आधार पर तो इस्लाम स्वीकार करनेवालों में तुमसे पहले मैं हूं कि नहीं? क्या तुम सबसे अधिक निकट का खून का रिश्ता पैगंबर के साथ मेरा है कि नहीं? इसलिए यदि तुम सच्चे मुसलमान हो तो अल्लाह से डरो और पैगंबर के परिवार से उसके वारिस होने का अधिकार मत छीनो।" दरवाजे की आड से फातिमा ने गर्जना की ऐ लोगों! पैगंबर का शव हमारे पास रखकर तुम हमारे अधिकार को नजरअंदाज कर खिलाफत हथियाने के लिए भागे।" उसके बाद रोते हुए वह बडी जोर से चिल्लाई 'ऐ पिताजी! ऐ अल्लाह के पैगंबर! इधर तुम गए उधर कितनी जल्दी अबू बकर और उमर हमारे ऊपर मुसीबतें डाल रहे हैं।" इसके बाद अली को अबू बकर के पास ले जाया गया। वहां उसे शपथ लेने के लिए कहा गया। इस पर अली ने स्पष्ट रुप से पूछा, 'अगर मैंने शपथ नहीं ली तो तुम क्या करोगे?" उसे उत्तर दिया गया ः'ऐ अल्लाह! तो फिर हम तुम्हें मार डालेंगे।" इस पर अली ने निर्भयतापूर्वक पूछा ः'क्या तुम अल्लाह के सेवक को और पैगंबर के भाई का कत्ल करोगे?" इस पर उमर ने कहा 'तुम पैगंबर के भाई हो यह हमे मान्य नहीं।"* इसके बाद खलीफा ने निर्णय दिया 'ऐ अली! अगर तुम्हें शपथ नहीं लेना हो तो मैं जबरदस्ती नहीं करुंगा।" इसके बाद अली सीधे पैगंबर की कब्र पर गए और जोरों से बोले 'ऐ मेरे भाई! ये लोग मेरे साथ कैसा तुच्छता का व्यवहार कर रहे हैं और मुझे कत्ल करने की तैयारी में हैं।" अंत में अली ने छह महीने बाद अबू बकर के प्रति एकनिष्ठता की शपथ ली। इस दौरान उनकी पत्नी फातिमा की मृत्यु हो गई थी।"

* लगता है उमर यहां मक्का यात्रा से मदीना लौटते समय सन्‌ 632 में 'खुम गधीर" के प्रवचन में पैगंबर मुहम्मद द्वारा अली के संबंध में निकाले गए उद्‌गारों को भूल गए उसमें पैगंबर ने कहा था ः'जो कोई मुझे मौला (स्वामी) के रुप में स्वीकारता है, उसने अली को भी मौला के रुप में स्वीकारना चाहिए। ऐ अल्लाह! अली के मित्रों का तू मित्र बन और अली के शत्रुओं का शत्रु बन। जो उसकी मदद करेंगे तू उनकी मदद कर, और जो उसे कमतर आंकेंगे तू उनकी आशाओं को निष्फल कर।" 'शीआ पंथीय मुस्लिम इस प्रवचन को इतना महत्व देते हैं कि खुमगधीर की घटना को वे ईद के रुप में (ईद की बजाए) मनाते हैं।" पैगंबर ने अली की प्रशंसा में कहा था 'अली मेरा और मैं अली का अंश हूं।" 'अली कुरान के साथ और कुरान अली के साथ है।" 'जो अली पर प्रेम करता है, वह मुझ पर प्रेम करता है। और जो अली का द्वेष करता है, वह मेरा द्वेष करता है, वस्तुतः वह अल्लाह का द्वेष करता है।" 'जो अली को कष्ट देता है, वह मुझे ही कष्ट देता है।" 'जो अली को कुछ देता है वह मुझे ही कुछ देता है।" 'जो अली को गाली देता है वह मुझे ही गाली देता है।" 'अली मेरा वजीर है, मेरे बाद वही मानवों में सर्वश्रेष्ठ है।" 'मैं जिनका नेता हूं, अली उनका नेता है।"

अली के धर्मप्रेमी, संयमी, उदार स्वभाव के कारण और इस्लाम की एकता को प्रधानता देने के कारण खुला संघर्ष नहीं हुआ और जो भी विवाद था वह अली द्वारा एकनिष्ठता की शपथ लेने के कारण समाप्त हो गया। परंतु, तात्कालिक रुप से वह विवाद भले ही थम गया था। परंतु, उनके अनुयायियों में बना रहा और आज भी शीआ-सुन्नी के रुप में पूरे विश्व में नजर आता है। फिर वह ईरान-इराक, सीरिया, लेबनान आदि अरब देश हों या भारत।

Friday, May 30, 2014

क्या मध्यपूर्व ईसाई विहीन हो जाएगा 

मध्यपूर्व सेमेटिक धर्मों (यहूदी, ईसाई और मुस्लिम) की जन्मभूमि है। सन्‌ 1914 में मध्यपूर्व की आबादी का लगभग 25 प्रतिशत ईसाई था। परंतु, अब वह केवल पांच प्रतिशत रह गया है। नवंबर 2013 में क्रिश्चियन पादरियों की बैठक में इस पर चिंता प्रकट करते हुए पोप फ्रांसिस ने कहा था, हम चुपचाप बैठकर ईसाईविहीन मध्यपूर्व की कल्पना कर नहीं सकते। आज जब वैश्विकरण के कारण दूरियां घट रही हैं विभिन्न देशों में भिन्न-भिन्न धर्म, वंश, मूल, रंग, महाद्वीपों के लोग रह रहे हैं। प्रजातंत्र, समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धार्मिक सहिष्णुता-अधिकारों के सिद्धांतों को सर्वव्यापी मान्यता मिलती जा रही है। ऐसे में मिस्त्र, सीरिया, इराक से ईसाइयों के पलायन, उनके उत्पीडन और उनके पूजास्थलों के जलाए जाने, उनसे असहनीय संरक्षण कर की मांग की घटनाओं के कारण वे वहां से पलायन के लिए बाध्य हो रहे हैं। इस कारण पोप को इस प्रकार का बयान देना पड रहा है।

पोप की चिंता निश्चय ही जायज है। क्योंकि, वे इस्लाम के इतिहास से वाफिक हैं कि किस प्रकार से पूर्व में खलिफाओं के काल में ईसाइयों को इसी प्रकार की परिस्थितियों का सामना करना पडा था और ईरान को तो देखते-देखते अग्निपूजक पारसी विहीन ही कर दिया गया था। दअवतुल कुरान भाष्य खंड 2, पृ. 1125 से हमें ज्ञात होता है कि, जब इस्लाम अवतरित हुआ तब अरबस्थान में छः धर्म थे ः ''मुसलमान, यहूदी, साबिई, ईसाई, मजूसी (अग्निपूजक पारसी) और बहुदेववादी (मूर्तिपूजक)।"" लेकिन ये सब समय के साथ गायब होते चले गए यह कैसे हुआ? 

सन्‌ 639 में दूसरे खलीफा उमर ने सेनापति अमर बिन अल-आस को येरुशलेम जीतने का आदेश दिया जो कि सेमेटिक धर्मों की पुण्यभूमि है और इसे 'पैगंबरों का शहर" भी कहा जाता है। पैगंबर मुहम्मद की 'मेराज" (स्वर्गारोहण) यात्रा के समय उनको ले जानेवाला घोडा कुछ समय के लिए यहां रुका था उस समय यहां की एक चट्टान पर उनके पद चिन्ह अंकित हुए थे और तभी से यह भूमि मुस्लिमों के लिए पवित्र है। पैगंबरत्व के आरंभिक चौदह वर्षों तक मुहम्मद साहेब और मुसलमान यरुशलेम की ओर ही मुंह करके नमाज पढ़ा करते थे। मक्का-मदीना के बाद यही स्थान मुसलमानों के लिए पवित्र है।

दस दिनों के घेरे के बाद भी विजय हासिल नहीं हुई। इसके बाद सेनापति उबैदा सहायता के लिए आया। उबैदा ने वहां के गव्हर्नर और जनता को लिखित सूचना भेजी कि, ''हमारी मांग है कि, तुम प्रतिज्ञापूर्वक जाहिर करो कि, अल्लाह एकमात्र है और मुहम्मद उसके पैगंबर हैं। अगर तुम्हें यह मान्य न हो तो जिजिया दो और हमारे मांडलिक बनो। अगर तुमने इसे नकार दिया तो मैं ऐसे लोग लेकर आया हूं कि, तुम लोग जितना सुअर के मांस और शराब पर प्रेम करते हो उससे अधिक वे मृत्यु पर प्रेम करते हैं। मैं तुममें से लडनेवाले मनुष्यों का कत्लेआम किए और तुम्हारे बच्चों को गुलाम बनाए बगैर यहां से हिलनेवाला नहीं।"" इस समय मुस्लिम सैनिक प्रार्थना करते समय कुरान की ''ऐ मेरी कौम के लोगों! इस पवित्र धरती में प्रवेश करो जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए सुनिश्चित कर दी है। और पीछे न हटो वरना नामुराद हो जाओगे।"" (5ः21) इस आयत का जोर-जोर से पाठ करते थे। 

उबैदा ने घेराबंदी में चार महिनों तक किसी प्रकार की ढ़ील नहीं दी। अंत में बिशप ने संवाद साधा कि, ''क्या तुम्हें यह मालूम नहीं है कि यह पवित्र शहर है और इस पुण्यभूमि में जो हिंसा करता है वह ईश्वर के कोप को निमंत्रित करता है।""

उबैदा ने उत्तर दिया ''हां, हमें मालूम है कि, यह पैगंबरों की भूमि है। यहां वे चिरविश्राम कर रहे हैं। यहीं से पैगंबर मुहम्मद ने स्वर्गारोहण किया था। हमें मालूम है कि, तुम से अधिक इस भूमि के योग्य हकदार हम हैं। अल्लाह जब तक यह शहर हमारे कब्जे में दे नहीं देगा, तब तक हम यह घेराबंदी नहीं उठाएंगे।""

बिशप ने शहर की शरणागति का निर्णय लेते हुए उबैदा को कहलवाया कि, शरणागति स्वीकारने और करार करने के लिए खलीफा स्वयं यहां आएं। सेनानियों ने विचार किया कि 'जब बिना शस्त्र काम हो रहा है तो व्यर्थ खून क्यों बहाया जाए?" खलीफा उमर ने अपने सहयोगियों से विचार-विमर्श किया। अली (पैगंबर मुहम्मद के दामाद और चौथे खलीफा) ने कहा कि, यरुशलेम यहूदी और ईसाइयों का पवित्र शहर होने के कारण खलीफा को स्वयं वहां जाना चाहिए।

इस अनुसार खलीफा यरुशलेम के लिए रवाना हुए। सर्वप्रथम वे मौके के स्थान जबिया जहां से दमास्कस, जॉर्डन, यरुशलेम  आदि सभी दिशाओं की ओर रास्ते निकलते थे पहुंचे। वहां के बिशप खलीफा से मिलकर करार करने के उद्देश्य से पहुंचे। करार के अनुसार वहां के ईसाइयों की जान-माल की रक्षा प्रदान की गई। इसके लिए वहां के लोगों को विशिष्ट दर से जजिया देना था। उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता दी गई। परंतु, यहूदियों को शहर में रहने से प्रतिबंधित किया गया। शर्त के अनुसार उन्हें रोमनों से लडते समय   मुसलमानों की सहायता करना होगी। जिन्हें यह करार मान्य न हो वे वहां से निकल जाने की स्वतंत्रता प्रदान की गई।

करार की शर्तें इस प्रकार से थी- 1. ईसाई वहां नए चर्च ना बनाएं। 2. वर्तमान में स्थित चर्चों के दरवाजे मुस्लिम यात्रियों के लिए खुले रखे जाएं और उनमें मुस्लिमों को तीन दिन और रात रुकने की अनुमति हो। 3. चर्च के घंटे की आवाज एक ही बार आना चाहिए। 4. चर्च पर क्रॉस ना लगाया जाए ना ही किसी सार्वजनिक स्थान पर लगाया जाए। 5. ईसाई स्वयं के बच्चों को कुरान ना पढ़ाएं। 6. अपने धर्म के संबंध में खुले तौर पर कुछ ना बोलें। 7. अन्य लोगों का धर्मांतरण करने के प्रयत्न ना करें। 8. अपने रिश्तेदारों को इस्लाम स्वीकारने से ना रोकें। 9. वे मुस्लिमों जैसा पोशाक न करें, उनकी जैसी टोपी, पगडी या चप्पलें ना पहनें। उनके जैसे बाल ना बनाएं। 10. वे अलग दिखें इसलिए कमर पट्टा उपयोग में लाएं। 11. सिक्कों पर अरबी भाषा का प्रयोग ना करें। 12. वे मुस्लिमों जैसा सलाम ना करें। 13. मुस्लिमों जैसे उपनाम ना रखें। 14. कोई मुसलमान सामने आए तो खडे रहें और उसके बैठने के बाद ही बैठें। 15. वे प्रत्येक मुस्लिम यात्री का अपने घर पर तीन दिन आतिथ्य करें। 16. वे शराब ना बेचें। 17. शस्त्र धारण ना करें। 18. घोडे या ऊंट पर सवारी करते समय जीन का उपयोग ना करें। 19. जो पहले किसी मुसलमान के यहां नौकरी में हो उसे अपने यहां नौकरी ना रखें। इन शर्तों को स्वीकारने और इनकी मर्यादा में ही खलीफा उमर ने उन्हें जान-माल की सुरक्षा, चर्च उपयोग में लाने की छूट और धार्मिक स्वतंत्रता का आश्वासन दिया। इस करार पर इतिहासकार इरविंग का अभिप्राय बडा ही उल्लेखनीय है परंतु, लेख की सीमा को देखते हुए यहां नहीं दे रहे हैं। 

इसके बाद खलीफा उमर यरुशलेम पहुंचे वहां बिशप और शहरवासियों ने उनका स्वागत किया और शहर की चाबियां खलीफा को सौंप दी। अल्लाह ने यह पवित्र भूमि अपने को प्रदान की है इस बाबत अब उमर और मुसलमानों को कोई आशंका ना रही। इस समय उमर ने कुरान की (44ः25 से 28) आयतें कहीं। जो हरे-भरे खेतों, फलबागों और समृद्धी के संबंध में हैं। बिशप ने उन्हें वहां के सबसे बडे चर्च में प्रार्थना करने की विनती की। परंतु, उमर ने नकारते हुए कहा ः ''अगर मैंने यहां प्रार्थना पढ़ ली तो उसके आधार पर मुसलमान एक दिन इस चर्च को कब्जे में ले लेंगे और चर्च को मस्जिद बना देंगे।"" इसके बाद उन्होंने चर्च की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ी उसी समय उस सीढ़ी पर एक समय में एक से अधिक मुसलमानों को नमाज पढ़ने से उन्होंने प्रतिबंधित किया था। परंतु, आगे चलकर उसकी बगल में ही मुस्लिमों ने मस्जिद का निर्माण किया और उन सीढ़ियों का आधा भाग और चबूतरा उसमें समाविष्ट कर डाला। पॅलेस्टाईन के अन्य भागों को जीतने के निर्देश दिए। बाद में अनेक शहरों के लोगों ने यरुशलेम के माफिक करार कर शरणागति स्वीकार की और इस प्रकार मुसलमान पॅलेस्टाईन के राजा बने।

इसी प्रकार इजिप्त की राजधानी अलेक्जांड्रिया को मुस्लिम सेनापति अमर ने निर्णायक लडाई लडकर जीत लिया और उस पर इस्लाम का ध्वज फहरा दिया। अलेक्जांड्रिया की संपत्ति लूटने के लिए मुस्लिम सैनिक अधीर हो रहे थे। उनके लिए लडाई का इहलोक का सच्चा बदला वही था। तलवार के बल पर विजय प्राप्त हुई होने के कारण वह उनका अधिकार ही था। सेनापति अमर ने खलीफा उमर से इस संबंध में मार्गदर्शन मांगा। उमर ने आदेश दिया कि, शहर में लूटमार न करने दी जाए, वहां की संपत्ति जनसेवा और धर्मप्रसार के लिए सुरक्षित रखी जाए। इसकी बजाए उन्हें देने के लिए इस्लाम का स्वीकार न करनेवाली जनता पर जजिया लगाने का आदेश दिया। इस संबंध में उमर का कहना था, ''जजिया युद्धलूट से अधिक लाभकारी है। युद्धलूट (कुछ लोगों के लिए ही होती है) शीघ्र समाप्त हो जाती है, तो जजिया (सभी लोगों के लिए और आगे भी) चलता रहता है।"" यहां उमर ने राज्य को मिली हुई संपत्ति बांटने के प्रस्ताव को ठुकरा कर मिलनेवाले जजिया से सैनिकों को पारिश्रमिक देने की योजना थी।

आदेशानुसार जजिया देनेवालों की गणना की गई। उनकी संख्या छः लाख निकली। प्रतिव्यक्ति दो दीनार जजिया लगाया गया। एक प्रमुख ने आकर विनती की कि, एकमुश्त रकम जजिया के रुप में ले ली जाए। तब अमर ने चर्च की ओर ऊंगली उठाकर उत्तर दिया ''अगर तुम मुझे इस जमीन से छत तक भर जाए इतना (धन) दिया तो भी मैं इंकार नहीं करुंगा। तुम हमारे लिए कमाई का साधन हो।""

आज वही परिस्थिति मध्यपूर्व के कुछ देशों में निर्मित हो गई है। एक समाचार के अनुसार जिस प्रकार से 'सातवीं सदी में ईसाइयों को खलीफा के संरक्षण में रहने के लिए आधा औंस सोना देना पडता था। सोना नहीं देने की स्थिति में दो विकल्प थे। या तो धर्मपरिवर्तन करो या फिर मरने के लिए तैयार रहो। फरवरी में उत्तर सीरियाई शहर रक्का में रहनेवाले 20 ईसाइयों को भी यह विकल्प दिया गया था। इस बार संरक्षण की कीमत 650 सीरियाई पौंड थी। युद्धग्रस्त क्षेत्र में दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे लोगों के लिए यह धनराशी बहुत अधिक थी। ... रक्का के 3000 में से अधिकतर भाग चुके हैं। युद्ध और क्रांति से आक्रांत मध्यपूर्व के कुछ देशों में पिछले दस वर्षों से ईसाइयों की स्थिति कमोबेश रक्का के बचे हुए ईसाइयों के समान है। ... मिस्त्र में सत्ता परिवर्तन के  बाद ईसाइयों को साम्प्रदायिक हिंसा का कहर झेलना पडा था। मुसलमानों की भीड ने 63 चर्च जला दिए थे। 2003 से अब तक दस लाख ईसाई सीरिया से पलायन कर चूके हैं।"(दैनिक भास्कर 4मई 2014, पृ.10) ऐसी भीषण परिस्थितियों में पोप और वेटिकन की चिंता को अनुचित कदापि नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, समाचार के अनुसार ''वर्तमान परिस्थितियों में 2020 तक मध्यपूर्व में ईसाइयों की आबादी एक करोड 20 लाख से घटकर आधी रह जाएगी।"" 

Wednesday, April 23, 2014

प्रथम विश्व युद्ध की भीषण त्रासदी - रासायनिक हथियार

प्रथम विश्वयुद्ध 1 अगस्त 1914 को प्रारंभ होकर 11 नवंबर 1918 को समाप्त हुआ। (28 जुलाई को सर्वप्रथम ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध शुरु किया था।) यह युद्ध ब्रिटेन की अगुवाई में मित्र राष्ट्रों (फ्रांस, रशियन साम्राज्य, इटली, अमेरिका के संयुक्त संस्थान) और आस्ट्रिया-हंगरी-प्रशिया (वर्तमान जर्मनी) बल्गेरिया और उस्मानी साम्राज्य (तुर्की) के बीच हुआ था। इसमें मित्र राष्ट्र विजयी हुए थे। इस वर्ष इस विश्वयुद्ध के सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस संदर्भ में ब्रिटेन में हुए एक सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि वहां की वर्तमान पीढ़ी को इस युद्ध के संबंध में कोई विशेष जानकारी नहीं है। 

हमारे यहां भी हालात कुछ इससे अलग नहीं जबकि भारत ने ब्रिटिश उपनिवेश के रुप में इस विश्वयुद्ध में भाग लिया था और हमारे भारतीय सैनिक भी इस विश्वयुद्ध में शामिल हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के संबंध में जरुर कुछ जानकारी हमारे यहां के लोगों के है क्योंकि इस दौरान भारत की स्वतंत्रता की लडाई चरम की ओर बढ़ रही थी। इस युद्ध मे भी भारत ने ब्रिटिश उपनिवेश के रुप में भाग लिया था। इन विश्वयुद्धों का हमसे संबंधित एक और मुद्दा है- गांधीजी ने प्रथम विश्वयुद्ध के समय भारतीय ब्रिटिश सेना में भर्ती हों को प्रोत्साहन दिया था और एक अभियान सा छेड दिया जबकि दूसरे विश्वयुद्ध के समय उन्होंने भारतीयों के सेना में प्रवेश का विरोध किया था। जबकि वीर सावरकर ने भारतीयों के सेना में प्रवेश का आवाहन कर सैनिकीकरण का नारा दिया था। 

इस प्रथम विश्वयुद्ध का सबसे नृशंस अमानवीय पहलू यह है कि इस युद्ध में रसायनों का हथियार के रुप में किया गया प्रयोग जिसके कारण हजारों लोग बहुत बुरी तरह मारे गए थे। बडी-बडी कंपनियां जैसेकि बायर, हेक्सट आदि तक इस रासायनिक युद्ध में संलग्न थी। ये जर्मन कंपनियां थी और इनके कुछ रसायनज्ञ तो जर्मन सरकार के युद्ध सलाहकार के रुप में भी कार्य करते थे। परंतु, इसका मतलब यह नहीं कि रासायनिक हथियारों का विश्वयुद्ध में प्रयोग सबसे पहले जर्मनों ने किया था। सबसे पहला प्रयोग फ्रांस ने अगस्त 1914 में जर्मनी के विरुद्ध इथाइल ब्रोमोएसिटेट के बम फेंक कर किया था। यह शस्त्र कोई विशेष घातक नहीं था इससे शत्रुपक्ष को केवल छींकें आती थी और वह हैरान हो बंदूकों से निशाना साध नहीं पाता था बस। इस कारण इसकी कोई विशेष  दखल युद्ध इतिहास में ली नहीं गई। 

जिस आंसू गैस का उपयोग दंगाइयों के विरुद्ध करते हुए हम पुलिस को देखते हैं उसका सबसे पहला प्रयोग हथियार के रुप में 31 जनवरी 1915 को जर्मनी ने रशिया के विरुद्ध किया था परंतु यह प्रयोग प्रभावी ना रहा। आपको आश्चर्य होगा कि इस अमानवीय कृत्य को बढ़ावा देने में उद्योगपति भी सक्रिय थे और उनका साथ दे रहे थे यहूदी मूल के नोबल पुरस्कार प्राप्त फ्रिट्‌ज हेबर। जिनकी यहूदी जाति के लाखों लोगों को हिटलर ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान गैस चैम्बर में ढ़केलकर बहुत बुरी मौत मारा था। और सबसे बडे आश्चर्य की बात यह है कि इस हेबर को जिसको जर्मनी के राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया था उसीको आगे चलकर हिटलर ने 1934 में यहूदी होने के कारण जर्मनी से भगा दिया। इसी हेबर ने अपने घातक हथियार के रुप में क्लोरिन का उपयोग करना तय किया और 22 अप्रैल 1915 को बेल्जियम के एप्रेस नामक स्थान पर शाम को मित्र राष्ट्रों की फौज के विरुद्ध यह गैस छोडी गई। पहले तो कुछ अजीब सी गंध महसूस हुई। सैनिक कुछ समझते इसके पूर्व ही हरे-पीले बादल उनके सिरों पर मंडराने लगे उनका सांस लेना दुभर हो गया, ऐसा लगने लगा मानो उनका गला कोई घोंट रहा है। जानलेवा खांसी के साथ खून आने लगा और मुंह से झाग निकलने लगा और देखते ही देखते हजारों सैनिक काल के गाल में समा गए। 

इस रासायनिक युद्ध के विरुद्ध ब्रिटेन चुप ना रहा जनाक्रोश रोकने के लिए पहले तो उसने बचाव के लिए मुखौटे तैयार किए परंतु यह निरुपयोगी नजर आने पर उसने बडी संख्या में रसायनज्ञों को भर्ती करना शुरु किया। क्लोरिन का निर्माण किया गया और बेल्जियम स्थित जर्मनों पर इस क्लोरिन से हमला करना तय किया। परंतु, प्रकृति ने साथ नहीं दिया हवा उल्टी दिशा में बहने से गैस जर्मनों को हानि पहुंचाने के स्थान पर ब्रिटिश सैनिकों पर ही कहर ढ़ाने लगी, जर्मनों के यह बात ध्यान में आते ही उन्होंने गोलाबारी प्रारंभ कर दी और दोहरी हानि उठा ब्रिटिश सेना को पीछे हटना पडा। मित्र राष्ट्रों ने भी ईंट का जवाब पत्थर से देना तय कर रासायनिक हथियार तैयार करने की प्रयोगशालाएं खडी करना और वहां प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रयोग में इतने मनुष्यों को हानि पहुंची, दुष्परिणाम भोगने पडे कि, सेना के अधिकारियों में ही क्रोध निर्मित होने लगा साथ ही प्रयोग के लिए मनुष्य भी मिलना दुश्वार हो गया। अंततः कुत्ता, बिल्ली आदि जो मिले उस जानवर पर प्रयोग किए गए। यह बात अलग है कि न चाहते हुए भी इन जानवरों को इकट्ठा करने का काम जरुर कुछ लोगों को मिल गया। 
इसी दौरान जर्मनी जिसका की रसायन उद्योग पर एक प्रकार से एकाधिकार सा ही था ने फॉस्जेन जैसा घातक रासायनिक हथियार तैयार कर लिया। 19 दिसंबर 1915 को इसका प्रयोग मित्र राष्ट्रों पर किया गया। क्लोरिन को तो गंध होती है परंतु, फॉस्जेन तो गंधरहित होकर क्लोरिन से कई गुना घातक भी था। इसको सूंघते ही कुछ ही क्षणों में गले में खराश, आँखों में जलन होने लगती है कुछ घंटों के बाद पीडित मनुष्य के फेंफडों में पानी भरने लगता है और इसके बाद उसके लिए थोडी सी भी हलचल नामुमकिन हो जाती है, ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है, नाडी व दिल तेज गति से धडकने लगते हैं और प्राण निकल जाते हैं।

मित्र राष्ट्र भी पीछे न रहे उन्होंने भी फॉस्जेन का निर्माण कर लिया एवं उसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए उसमें क्लोरिन को मिला दिया। और 16 जून 1916 में इस का उपयोग जर्मनों के विरुद्ध एक घातक हथियार के रुप में सोम की लडाई में किया। यह हथियार इतना घातक सिद्ध हुआ कि प्रभावित क्षेत्र के मनुष्य तो मनुष्य पशु-पक्षी, कीडे-मकोडे तक मर गए। यहां तक कि झाडियां तक जल गई। इसकी घातकता को देख सैनिक तो क्या नागरिकों तक के दिलों में दहशत बैठ गई। लेकिन सेनाधिकारी इसके बगैर चारा नहीं यही तर्क प्रस्तुत करते रहे। कई टन फॉस्जेन मित्र राष्ट्रों ने उपयोग में लाया। 

जर्मनों की मगरुरी दूर करने के लिए ब्रिटेन ने लिव्हन्स प्रोजेक्टर नामका एक अत्यंत सस्ता यंत्र बनाया जिसकी कीमत उस जमाने में मात्र 16 शिलिंग थी। जिसके माध्यम से फॉस्जेन गैस के बम जर्मनों पर अप्रैल 1917 से लेकर युद्ध समाप्त होने तक लगातार बरसाए गए। यह इतने संहारक थे कि देखते ही देखते गांव के गांव साफ हो गए। कभी - कभी तो मात्र दहशत फैलाने के लिए गैस के स्थान पर इन बमों में भयंकर बदबूदार बोन ऑइल या एमाइल एसिटेट भरकर फैंके जाते थे। जर्मन डर के मारे इधर-उधर भागते फिरते। उपर्युक्त प्रकार के गैस के बम करोडों की संख्या में जर्मनों पर फैंके गए।

जब मित्र राष्ट्रों ने सारी नैतिकता, नियम त्याग दिए तो जर्मन भी भला क्यों पीछे रहते जर्मनों ने इससे भी अधिक भयानक अतिसंहारक अस्त्र का निर्माण कर लिया। वह था बदनाम सबसे जहरीला मस्टर्ड गैस (यानी डायक्लोरेथाइल सल्फाइड)। फिर से उसी एप्रेस को प्रयोग स्थली बनाया गया जहां से इस भयानक रासायनिक युद्ध की शुरुवात हुई थी। इस गैस का परिणाम यह होता था कि जो भी इसके संपर्क में आता इसके प्रकोप से बच नहीं पाता था। इसका द्रव्य रुप शरीर के जिस भाग को स्पर्श करता वह भाग फूल जाता मरणांतक पीडा होती, बगल में, जांघों में फफोले से आ जाते, पीडित को उलटियां होने लगती, फफोलों की लाली जाने के बाद पीलापन आ जाता, आवाज चली जाती, वेदनाएं बढ़ती ही चली जाती। इसकी सबसे बडी भयंकरता यह थी कि यह रंगरुप विहीन द्रव्य रुप में जमीन पर पडा रहता संपर्क में आनेवाले को चपेट में ले लेता। ठंड के दिनों में यह जम जाता और वर्ष भर प्रभावी बना रहता। यह इतना भयंकर था कि यदि दूर से भी कोई इसे सूंघ ले तो इसके प्रकोप से बच नहीं सकता था। रोगी का इलाज करनेवाले डॉक्टर, नर्सेस तक इसकी चपेट में आ जाते थे। 

मित्र राष्ट्रों ने भी युद्ध समाप्त होने के दो माह पूर्व सितंबर 1918 में मस्टर्ड गैस तैयार कर लिया परंतु उसके पूर्व उन्होंने टनों से फॉस्जेन गैस का उपयोग जर्मनों के विरुद्ध किया। जर्मनी ने भी मस्टर्ड गैस का अंधाधुंध प्रयोग कर अपनी बढ़त बनाए रखी। अंततः अमेरिका के आ जाने और मित्र राष्ट्रों द्वारा मस्टर्ड गैस के प्रयोग से और अनेक मोर्चों पर युद्ध प्रारंभ हो जाने के कारण अंत में जर्मनी की पराजय हुई। इस प्रकार से रसायन शास्त्र के बलबूते मित्र राष्ट्र विजयी हुए साथ ही लाखों लोग इन घातक रसायनों के शिकार होकर अपाहिज हो गए। हजारों लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पडा। परंतु, इन अमानवीय कृत्यों के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया गया उलटे नए-नए रासायनिक हथियारों की होड लग गई जो द्वितीय विश्वयुद्ध में उपयोग में लाए गए। युद्धोपरांत 1919 में हेबर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। काहे के लिए तो रसायन शास्त्र की सेवा के लिए।

Thursday, March 13, 2014

मानवता के संहारक - रासायनिक एवं जैविक हथियार 

मानव का इतिहास युद्धों से भरा है। प्राचीन काल से ही शत्रु को मारने, उसे समाप्त करने के लिए नई-नई विधाओं का प्रयोग युद्ध इतिहास का अंग रहा है। इराक ने कुर्दों पर घातक रसायनों का हमला कर एक लाख से अधिक कुर्दों को मार डाला था। हाल ही में सीरिया के राष्ट्रपति असद ने गृहयुद्ध के दौरान जिस प्रकार से रासायनिक हथियारों को उपयोग में लाया है वैसा उपयोग इतिहास के लिए कोई नया नहीं है। इनमें से एक शत्रु को विभिन्न पद्धतियों से विष का प्रयोग कर समाप्त करना भी है। विष भी तो एक रसायन ही है।

 हमारे भारत के इतिहास में भी शत्रु पर विष प्रयोग कर उसे मारने के प्रयास के उदाहरण हैं। दुर्योधन द्वारा भीम को भोजन में विष देकर में गंगा में बहा देने का उदाहरण तो बहुत ही प्रसिद्ध है। विषकन्याओं का उल्लेख भी मिलता है। आचार्य वाग्भट के अष्टांग ह्रदय यानी सार्थ वाग्भट ग्रंथ के 35 और 36 वें अध्याय विष के संबंध में ही हैं। चालुक्य नरेश सोमेश्वर के मानसोल्लाह ग्रंथ में विष के तीन प्रकार स्थावर, जंगम और कृतिम रुप से मानव द्वारा निर्मित किए गए विषों का वर्णन मिलता है। परंतु, हमारे यहां विष या विषैले रसायनों का प्रयोग युद्ध में बडे पैमाने पर कर एक प्रकार का सामूहिक नरसंहार करने के उदाहरण नहीं मिलते। इसका श्रेय अन्य देशों को ही जाता है।

ईसा से 1000 वर्ष पूर्व के चीनी ग्रंथों में विषैली वायु तैयार कर उन्हें युद्ध में उपयोग लाने के वर्णन मिलते हैं। ईसा से सात शताब्दी पूर्व असीरियनों (मेसोपोटोमिया की सभ्यता के लोग) द्वारा शत्रु के पीने के पानी के कुंअॆ में विष डालने के उदाहरण दर्ज हैं।  स्पार्टा के योद्धाओं ने एथेन्स के कुओं में बडे पैमाने पर विष डालकर अनेक यूनानियों को मार डाला था। ईसा से लगभग 600 वर्ष पूर्व ग्रीकों द्वारा युद्ध में विषैले रसायनों का प्रयोग कर नदी को विषैली बनाने का उल्लेख मिलता है। ई. पू. 431 से 404 के काल में विश्वप्रसिद्ध स्पार्टा का युद्ध में विषैले रसायनों द्वारा विषैली गैस तैयार कर दम घोंटकर शत्रुओं को मारा गया था। जिसे आज हम जैविक या बायोलॉजिकल युद्ध कहते हैं उसका भी प्रयोग इस युद्ध में हुआ था।

यूनानी पुराणों में विषैले बाण किस प्रकार तैयार किए जाते थे के वर्णन विस्तार से मिलते हैं। आज भी गैंगरीन, टिटेनस जैसी बीमारियों के नाम सुनकर हमारे रोंगटे खडे हो जाते हैं। वे बीमारियां इन बाणों के लगने के बाद हो जाया करती थी। यूनानियों ने तो ऐसे रसायन तैयार कर लिए थे कि जब वे इन्हें पानी पर छोडते तो पूरे पानी में ही आग लग जाती और दुश्मनों की नौकाएं जल जाती। रोमनों ने भी विषैले हथियार तैयार करने में महारत हासिल कर रखी थी। ईसा से लगभग 184 वर्ष पूर्व ख्यात योद्धा हन्निबल ने तो विषैले सांपों से भरे मटके ही निर्णायक हथियार के रुप में यूनानियों के जहाजों पर पर्गोमान के युद्ध में फैंक कर लडाई को जीत लिया था। ईसा से लगभग 80 वर्ष पूर्व रोमननों ने ऐसी गैस का निर्माण किया था जो दुश्मन को अंधा कर देती थी। इसके द्वारा उन्होंने कई युद्ध भी जीते। इस गैस का उपयोग बाद में ईसाइयों ने तुर्कों को रोकने के लिए किया था। ई.स. 673 में ईसाइयों ने मुसलमानों को रसायनों का प्रयोग कर कॉन्सटंंटिनोपोल की लडाई में पानी में जलाकर मार डाला था।

विषैले रसायनों के अतिरिक्त जैविक युद्ध के तंत्र को भी ट्रॉय के युद्ध में अपनाया गया था। यह युद्ध ईसा से 1100 से 1300 वर्ष पूर्व हुआ था। ईसायुग के आरंभिक दिनों में यूरोप में ऐसी भयंकर अमानवीय प्रथा कि किसी खतरनाक अपराधी को किसी मृत देह से बांधकर किसी महाभयानक रोग से ग्रस्त हो तिल-तिलकर मरने के लिए छोड दिया जाता था। यूरोप के इतिहास में काफ्फा (यूक्रेन) के युद्ध में मंगोल तार्तारों ने प्लेग से मृत रोगियों के शरीरों को एक बडी गुलैल की सहायता से शत्रुओं पर फैंका। कभी-कभी वे मनोरंजन के लिए मरे हुए चूहे भी शत्रुओं पर फैंका करते थे। समय के साथ प्लेग ने शत्रुओं में जोर पकडा। उसी काल में वहां व्यापार के सिलसिले में आए हुए इटली के व्यापारी इन रोगों के वाहक बनकर यूरोप पहुंचे और धीरे-धीरे पूरे यूरोप में प्लेग फैल गया और इसमें करोडों लोग बलि चढ़ गए। तुर्कों ने भी संक्रमित मृत पशु शरीरों को दुश्मनों के जल स्त्रोतों में फिंकवा कर इस महामारी को फैलाने में अपना योगदान दिया। लगभग तीन सौ वर्ष पूर्व नेपोलियन ने भी इस प्रकार के क्रूर अमानवीय तरीके को अपनाया था। 18वीं शताब्दी में उत्तरी अमेरिका में ब्रिटिशों ने रेडइंडियनों की आबादी को कम करने के लिए चेचक की महामारी को फैलाया था। इससे हजारों लोग मारे गए। रुस ने भी स्वीडिश नगरों में प्लेग संक्रमित पशुओं को फैंक कर बीमारी को फैलाया था।

तो यह था मानवता के संहारक रासायनिक एवं जैविक हथियारों के प्रयोग का संक्षिप्त इतिहास जिसे और भी भयंकर तरीके से दोनो विश्वयुद्धों में दोहराया गया और आज भी यह खतरा सिर पर मंडरा रहा है। सच कहें तो पहिले महायुद्ध में रासायनिक हथियारों ने जो कहर बरपाया था उसे देखते हुए सभी राष्ट्रों ने इन हथियारों से तौबा कर लेनी चाहिए थी। परंतु, ऐसा हुआ नहीं बल्कि अनेक देशों में जहरीली गैस निर्माण की प्रयोगशालाएं धडल्ले से बनने लगी। रसायन शास्त्र के नए-नए प्रयोग कर अमेरिका ने इसमें महारत हासिल कर ली। 

अमेरिका ने मस्टर्ड गैस से भी अधिक घातक, विषैली लेविसाइट नामक रसायन प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने के पूर्व ही तैयार कर लिया था। परंतु, युद्ध थम जाने की वजह से मित्र राष्ट्रों द्वारा उपयोग में लाया न गया। इसके संपर्क में आनेवाले को ऐसा लगता था कि आँखों में खंजर घोंपे जा रहे हों चमडी उबले हुए आलू के छिलके की भांति निकल जाती थी। इटली और फ्रांस ने भी इसका निर्माण कर लिया था। जापान ने तो रसायन शास्त्र के इस क्षेत्र में बहुत बढ़त बना ली। मस्टर्ड गैस के साथ लेविसाइट गैस भी बना ली। हारने के बावजूद जर्मनी ने भी इस काम को फैला दिया। 'गैस वेफर्स 1918" नामका एक यंत्र जो फॉस्जेन बम की मार सतत कर सके विकसित कर लिया। इंग्लैंड ने भी 'एम डिव्हाइस" नामक अत्यंत जहरीली आर्सेनिक गैस तैयार कर ली। यह गैस किसी भी मुखौटे को भेद सकने में सक्षम थी। 1925 में जिनेवा में एक संधि द्वारा रासायनिक हथियारों के निर्माण को रोकने की पहल की गई। परंतु, विभिन्न कारण बताकर वह करार सबने मिलकर असफल करके ही दम लिया।

अब नए हथियारों के इस्तेमाल की भूमि बनी हमारी भारत की धरती। 1919 में सरहद प्रांत के विद्रोहियों पर ब्रिटिश फौजों ने  इन घातक रासायनिक हथियारों का प्रयोग किया। कितने मारे गए इसका कोई हिसाब नहीं क्योंकि, मृतकों की संख्या को दर्ज करने  की जहमत अंग्रेजों ने उठाई ही नहीं। फ्रांस, स्पेन, रशिया भी पीछे नहीं रहे। रशियनों ने 'प्रोजेक्ट टॉम्का" नाम रखा इन रसायनों की निर्मिती का। 1935 में इटली ने इथोपिया पर टनों मस्टर्ड गैस से हमला किया था। मनुष्य व खेत दोनो बर्बाद हो गए। पीडितों को इतनी यातनाएं भुगतनी पडी कि ऐसा लगने लगा इससे तो मौत भली। परंतु, मुसोलिनी ने आनंद व्यक्त किया।

1936 में जर्मनी ने कुख्यात नर्व्ह गैस यानी 'टबून" का निर्माण कर लिया। बाद में 1939 में 'सरीन" (आयसोप्रोपाइल मिथाइल फॉस्फोनोफ्लुरिडेट) नामका ऐसा खतरनाक रसायन तैयार जैसा कि आज तक निर्मित हो नहीं पाया है। परंतु, अखिल मानव जगत का सौभाग्य कि हिटलर को द्वितीय महायुद्ध में इसे आजमाने की बुद्धि नहीं हुई अन्यथा मित्र राष्ट्रों की विजय असंभव हो जाती।

जापान के अमर्याद क्रौर्य का वर्णन किए बगैर रासायनिक एवं जैविक युद्ध का इतिहास अधूरा रह जाएगा। जापान की चीन से दुश्मनी ऐतिहासिक है और वह भी छठी शताब्दी से चली आ रही है। जापान ने चीन पर 1932 में जैविक हमला किया था जिसमें एक हवाई जहाज से विषाक्त प्लेग के विषाणु छोड गए थे। 1940 के प्रारंभ में जापान जैविक युद्ध यूनिट 731 के तहत विभिन्न रोग जैसेकि टायफाइड, कॉलरा, प्लेग, एंथ्रेक्स आदि बीमारियों के जीवाणु विकसित करने में लगा था और इसके लिए चीनी कैदियों पर प्रयोग किए गए थे और प्रभावों के अध्ययन के लिए कैदियों को जिंदा ही चीरा-फाडा गया था। इन सबके पीछे दिमाग था शिरो इशी नामक के वैज्ञानिक का और यह सब कुछ सम्राट हिरोहितो की जानकारी में उन्हीं के आदेश पर किया गया था। परंतु युद्धोपरांत उसे दंडित करने के स्थान पर अमेरिका में उसे विश्वविद्यालय में पढ़ाने और शोधकार्य के काम पर लगाया गया। यह इसलिए कि अमेरिका को उसका शोधकार्य चाहिए था। इसी युद्ध में जैविक युद्ध संबंधित कुछ कागजात रशिया के भी हाथ लग गए थे। जिसका लाभ उसने भी अपने जैविक युद्ध कार्य को आगे बढ़ाने में किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात भी इस क्षेत्र में कार्य जारी है। डबल्यू एच ओ के अनुसार लगभग 17 देशों के पास जैविक हथियारों के उत्पादन की क्षमता है। प्रयोगशालाओं से जीवाणुओं के रिसाव का खतरा है और इस प्रकार की दुर्घटनाएं घट भी चूकीहैं। जीवाणुओं के आतंकवादियों के हाथ लगने का खतरा भी सिर पर मंडरा रहा है। इस प्रकार के कुछ हादसे विभिन्न देशों में हो भी चूके हैं। कुछ वर्ष पूर्व भारत में भी इंडियन मुजाहिदीन ने जैविक हमले की धमकी दी थी। इस मामले में अमेरिका भी चिंता प्रकट कर चूका है कि भारत जैविक हमले का शिकार हो सकता है। परंतु, खतरनाक जीवाणुओं की यात्रा बदस्तूर जारी है न जाने यह कब थमेगी।  

Saturday, March 8, 2014

पैगंबर का चित्र 2

पैगंबर का चित्र किसी समाचार पत्र में छपना और मुस्लिमों का उत्तेजित होकर विरोध प्रदर्शन करते हुए सडकों पर उतर आना कोई नई बात नहीं। अब की बार यह वाकया नार्वे की राजधानी ओस्लो में दोहराया गया। कुछ वर्ष पूर्व डेनमार्क में पैगंबर के चित्र छपने पर भी पूरी दुनिया भर के मुसलमान सडकों पर उतर आए थे। और हाल ही में डेनमार्क के कोपेनहेगन में एक मुसलमान को पैगंबर का रेखा-चित्र बनानेवाले कार्टूनिस्ट पर हमले के लिए हथियारबंद होकर उसके घर में घूसने का प्रयास करते हुए पुलिस ने घायल कर गिरफ्तार कर लिया। पैगंबर का चित्र छपने पर मुसलमानों का उत्तेजित होना इसलिए स्वाभाविक है क्योंकि, इस प्रकार का चित्रीकरण इस्लाम को मान्य नहीं। क्योंकि, पैगंबर का कथन है 'उससे बडा अपराधी/अन्यायी कौन है कि जो मेरी निर्मिति जैसी निर्मिति करने (यानी चित्र बनाने, मूर्ति बनाने) का प्रयत्न करता है।" (बुखारी 5953, मुस्लिम 5275) इसी प्रकार से पैगंबर का एक और कथन है- 'चित्र बनानेवाले सभी चित्रकार नरक में जाएंगे।" (मुस्लिम 5272, मजह 5121, मुवत्ता मलिक 1743) 'जिन्हें अल्लाह द्वारा कठोरतम दंड मिलेगा वे (लोग यानी) चित्रकार हैं।"(बु. 5950; मु. 5266,68,73; मजह.3653)  इसी प्रकार से एक हदीस कथन है - 'आयशा (पैगंबर की पत्नी) ने कहा 'प्रतिमा और क्रास हो उस घर में पैगंबर रहते नहीं थे, यदि (वहां) गए तो उन्हें नष्ट कर डालते थे।" (बुखारी 5953) इस प्रकार की और भी कई हदीसें हैं। 

इस प्रकार से चित्र या मूर्ति बनाने की मनाही होने के बावजूद 'हदीस सौरभ" (लेखक-मुहम्मद फारुक खॉं) में पृ. 192 से 194 पर 'मुखारबिन्द" शीर्षक तले तीन हदीसें दी हुई होकर कहा गया है कि ''आपके मुखाकृति आदि के विषय में 'रिवायतें" बहुत हैं। यहां उदाहरणार्थ केवल 'तीन रिवायतें (हदीस बयान करना)" दी गई हैं। शायद इन्हीं पर से चित्रकार या कार्टूनिस्ट उनका रेखा-चित्र बनाते हों। जो भी हो परंतु, मराठी पत्रिका विवेक के 1981 के दीपावली विशेषांक में मलकानीजी ने एक लेख में लिखा है 'ईरान में लगभग सभी घरों में पैगंबर मुहम्मद के चित्र लगे हुए हैं।"

पैगंबर के चित्र के कारण ही 'मुंबई में बडे दंगे का आरंभ 17 अक्टूबर 1851 को हुआ। श्री बैरामजी गांधी नामके एक पारसी सज्जन उन दिनों 'चित्रज्ञान-दर्पण" नामका एक समाचार पत्र चलाते थे। वे प्रत्येक अंक में किसी विशिष्ट व्यक्ति का चित्र प्रकाशित कर उसका परिचय देते थे। इसी क्रम में एक बार उन्होंने मुहम्मद पैगंबर का चित्र के साथ परिचय प्रकाशित किया। इस्लाम के अनुसार मुहम्मद का चित्र प्रकाशित करना हराम होकर उस अपराध का दंड बडा ही भयंकर होता है। इसकी गांधीजी को शायद कल्पना न हो। 17 अक्टूबर जुम्मे के दिन सुबह दस बजे मुसलमानों की भीड दीन-दीन चिल्लाते हुए मुंबई की जामा मस्जिद से निकल पडी। टोलियों में घूमते दंगाई जहां भी पारसी दिखाई दे उसे पीटते चले गए। जब मामला पुलिस से न सम्हल सका तब सेना को बुलाया गया। वैसे इस दंगे में पुलिस कमिश्नर फ्रेंक साऊटर ने बडी कडाई बरती थी। एक माह तक पारसी मुसलमानों की शत्रुता चलती रही, मारपीट चलती रही। अंत में सरकार के प्रयासों से पारसी तथा मुसलमानों की एक संयुक्त सभा आयोजित की गई जिसमें चित्रज्ञान दर्पण में मुहम्मद साहेब का चित्र प्रकाशित करनेवाले गांधीजी ने क्षमायाचना की और मुंबई के पहले दंगे का अध्याय समाप्त हुआ।" 

इसी प्रकार से 'द इंडियन पोस्ट' नामके अंग्रेजी समाचार-पत्र ने 15 अगस्त 1988 के अपने अंक के एक नियमित स्तम्भ 'द वीक इन हिस्ट्री" में इस प्रकार संक्षिप्त जानकारी प्रकाशित की थी कि '20 अगस्त 570ई. को इस्लाम के संस्थापक मुहम्मद का जन्म मक्का के एक गरीब कुरैशी अरब परिवार में हुआ था।" इसके साथ ही मुहम्मद साहेब का एक छोटा सा स्केच (चित्र) प्रकाशित किया गया था। पर यह क्या संपादक महाशय को धन्यवाद की जगह धौंस-धमकियां मिली। तंजिम ई अल्लाह हो अकबर का बारह सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल उसी दिन 'द इंडियन पोस्ट" के कार्यालय पर जा धमका और रोष व्यक्त करते हुए विद्वान संपादक श्री विनोद मेहता को कल के अखबार में खुली माफी मांगने की हिदायत दे आया। बेचारा संपादक घबरा गया और उसने उनकी बात मान ली।" 

इसी प्रकार की असहिष्णुता केवल चित्र प्रकाशन तक ही सीमित नहीं है जरा-जरा सी बात पर मुस्लिम समाज उत्तेजित हो जाता है और सडकों पर उतर आता है। इसके भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं। उदा. 'गैर मुस्लिमों द्वारा अल्लाह शब्द के उपयोग के संबंध में मलेशिया में हाईकोर्ट द्वारा कैथोलिक न्यूजलेटर हेराल्ड को अपने बहासा मलेशिया संस्करण में ईश्वर के संदर्भ में अल्लाह शब्द का उपयोग कर सकता है का फैसला देने को लेकर कई चर्चों को निशाना बनाना।" नीदरलैंड जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का चरम रखनेवाले देश में 'मुस्लिम महिलाओं के विरुद्ध हिंसा कुरान सम्मत होने का चित्रीकरण 'सबमिशन" नामक चित्रपट में करने के अपराध में वॅन गॉग को गोली मारी। वॅन गॉग द्वारा घुटने के बल बैठकर दया की भीख मांगने के बावजूद पहले गोली मारी फिर छुरे से हमला किया। बाद में कुरान की आयतें लिखी हुई चिट्ठी छुरे की सहायता से उसके सीने में घोंपी। जिसमें अमेरिका, यूरोप, नीदरलैंड को नष्ट करने की दर्पोक्ति थी। पहले भी वॅन गॉग द्वारा सेमेटिक परंपरा पर लेखन किया गया था। यह भी एक उसका अपराध था।" 

'मुंबई का दूसरा दंगा भी पारसी और मुसलमानों में ही हुआ था। सन्‌ 1874 में एक पारसी सज्जन रुस्तमजी जालभाई ने आयर्विंग नामक अमरीकी लेखक के कुछ लेखों को अनुवादित कर प्रकाशित किया। इस प्रकाशन में मुहम्मद पैगंबर के संबंध में जो कुछ था वह मुसलमानों की दृष्टि से उनके रसूल का अपमान करनेवाला लेखन था। बस फिर क्या था 13 फरवरी को मुसलमान जामा मस्जिद से निकल पडे और पारसी दिखा कि पिटाई करते चले गए। अरब, पठान, सिंधी मुसलमानों ने पारसियों की सम्पत्ती की लूट मचाई, पारसियों की दो अग्यारियों में भी तोडफोड की। ऐसी अवस्था में प्रशासन को सेना की सहायता लेनी पडी।"

इसी प्रकार से कुछ वर्षों पूर्व एक फिल्म 'मुस्तफा" का नाम बदल कर 'गुलाम ए मुस्तफा" रखने के लिए विवश किया गया था। कहा गया था कि 'मुस्तफा" इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद का एक नाम था। वैसे इसे असलियत माना नहीं जा सकता इसलिए कि यह उनका नाम था ही नहीं। हां, इतना जरुर है कि जब मुसलमानों की मुहम्मद साहेब के प्रति श्रद्धा बढ़ी तो जैसाकि मनुष्य मात्र का स्वभाव है, सम्मान के साथ-साथ उनके लिए श्रेष्ठता सूचक शब्दों का, उपाधियों का होने लगा। 'मुस्तफा" अरबी भाषा का शब्द होकर उसका अर्थ होता है, पुनीत, निर्मल, शुद्ध। मतलब कुछ मुसलमान 'मुहम्मद साहेब" को 'मुस्तफा" याने पुनीतात्मा" कहने लगे। किसी देवता, प्रेषित, सन्तपुरुष के लिए सम्मानजनक विशेषण को निमित्त बनाकर विवाद को यदि चलाया जाए तो फिल्मवालों के लिए नामकरण एक आफत ही बन जाएगा। अब यही देखिए भगवान विष्णु के एक हजार नाम हैं तो भगवान शिव के सातसौ। तैंतीस करोड देवी-देवताओं को माननेवाला यह बहुदेववादी हिंदू समाज यदि इस प्रकार की दकियानूसी पर उतर आए तो!
  
नार्वे के इन उपर्युक्त प्रदर्शनकारियों ने हाथ में तख्तियां ले रखी थी जिन पर लिखा था 'सभी धर्मों को सम्मान दो, मुस्लिमों को नीचा दिखाना बंद करो।" प्रथमदृष्टया मुस्लिमों की मांग उचित ही नजर आती है। परंतु, मांगने से सम्मान नहीं मिलता। यदि आप सम्मान चाहते हैं तो, आपको भी दूसरों को सम्मान देना होगा; उनसे सहिष्णुता का व्यवहार करते हुए उनकी भावनाओं-आस्थाओं के प्रति सम्मान दर्शाना होगा। तभी आप उनसे सम्मान की, बराबरी से व्यवह्रत किए जाने की आशा कर सकते हैं, मांग कर सकते हैं। लेकिन मुस्लिम अपने आचरण द्वारा कहीं भी इस प्रकार का यानी कि दूसरे धर्मों को सम्मान और बराबरी का दर्जा देने का, सहिष्णुता का व्यवहार करते नजर नहीं आते। वे तो सर्वश्रेष्ठता की ग्रंथी से पीडित नजर आते हैं। 

यदि मुसलमान अपने पैगंबर के चित्रीकरण से आहत महसूस करते हैं, 75 लाख की आबादीवाले एक छोटे से देश स्विट्‌जरलैंड में मीनारों पर प्रतिबंध से मुसलमानों की धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों काहनन होता है और वे वैसाही चाहते हैं जैसाकि वे प्रदर्शन ेके दौरान तख्तियों पर लिखकर दर्शा रहे थे तो, मुसलमानों को अपनी अतिअसहिष्णुता को त्यागकर मुहम्मदसाहेब के मक्काकालीन जीवन का आदर्श सामने रख संयम, सहिष्णुता, शांति की नीतियों का अवलंबन करना होगा। जैसाकि उनके कई मुस्लिम धार्मिक विद्वान, नेता और विचारक कहते रहते हैं। इस संबंध में मौ. वहीदुद्दीन का यह अभिप्राय यथार्थ है ः 'मुसलमानों के मनों में सबसे प्रभावी विचार इस्लाम का हित किस प्रकार से होगा यह होना चाहिए, स्वयं का व्यक्तिगत हित नहीं। उनकी सारी चिंता का विषय इस्लाम के संदेश का प्रसार होना चाहिए। अगर स्वयं के हित और धर्मप्रसार का हित इनमें विरोध आया तो धर्मप्रसार के हित को अग्रक्रम मिलना चाहिए। धर्मप्रसार के हित के लिए ही पैगंबर ने (इस प्रकार की प्रतिकूल परिस्थिति में) संयम का उपदेश दिया हुआ है।"