Sunday, October 19, 2014

उपेक्षित है लक्ष्मी का वाहन उल्लू

जिसके नाम का उच्चारण ही भयकारक है ऐसा पक्षी है उल्लू। उल्लू से अनेक अंधविश्वास जुडे हुए हैं। जैसेकि यदि उसे ढ़ेला मारा तो  जिसप्रकार से पानी में ढ़ेला धीरे-धीरे घुल जाता है उसी प्रकार से मारनेवाला छीज-छीजकर मर जाता है। उल्लू को भूत-भविष्य-वर्तमान सबका पता रहता है मानो वह कोई त्रिकालज्ञ हो। उल्लू दुष्ट शक्तियों का वाहक होता है, आदि। ऐसे अशुभ, विनाशसूचक जिसे मूर्ख माना जाता है जिससे हम डरते हैं, घृणा करते हैं को देवी लक्ष्मी का वाहन होने का सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ यह हमें विचार में डाल देता है। 

इस संबंध में लोगों की धारणाएं हैं कि लक्ष्मी और उल्लू में एक दो समानताएं हैं। पहली, दीपावली में अमावस्या की रात्री में ही लक्ष्मी की पूजा की जाती है और ऐसा माना जाता है कि इस रात लक्ष्मी घूमती रहती है और ऐसी अंधियारी रात्री में उन्हें उल्लू जैसा निशाचर ही तो वाहन के रुप में मिल सकता है। दूसरा, उल्लू अंधकार में रहता है और लक्ष्मीजी भी अंधकार के मार्ग से ही आती हैं भले ही वह ज्योतिरुपेण क्यों ना हो, अनुचित आय भी तो अंधकार में ही प्राप्त होती है। ऐसी भी धारणा है कि, उल्लू निशाचर होने के साथ ही हिंसक होता है, प्रकाश से डरता है ऐसे वाहन पर बैठकर आनेवाली लक्ष्मी अपकारक ही होगी, लक्ष्मी नहीं वह अपलक्ष्मी होगी। लक्ष्मी तो विष्णूप्रिया है यदि उसे आमंत्रित ही करना है तो विष्णु के साथ ही आमंत्रित करना चाहिए जो विष्णु के साथ गरुड पर बैठकर ही आए। 

उल्लू का वेदकालीन नाम 'उलूक" है और उलूक ऋषी तो मृत्युज्ञानी। इस दृष्टि से तो उल्लू भी ऋषितुल्य हुआ। कुछ लोग यह मानते हैं कि उल्लू की विष्ठा का तिलक कपाल पर लगाएं तो भूत-भविष्य का ज्ञान हो जाता है। ऐसा उल्लू जो लक्ष्मी का वाहन है और लक्ष्मी यानी समृद्धि-संपन्नता। फिर उल्लू अशुभ कैसे? 'उलूक" तो नाम है वैशेषिक दर्शन के आद्यप्रवर्तक 'कणाद" का जिनके उदर निर्वाह का साधन था खेत में पडे हुए अन्न के कण एकत्रित कर उससे अपनी क्षुधा शांत करना। उनकी इस उच्छवृत्ति के कारण लोग उन्हें कणभक्ष या कणभुज कहते थे। उनकी दिनचर्या थी दिनभर ग्रंथरचना और रात्रि में आहार प्राप्ति हेतु विचरण। इसलिए लोग उन्हें 'उलूक" कहने लगे। कण भर अन्न पर जीकर ज्ञानसाधना करनेवाला 'कणाद" यानी 'उलूक"। उलूक गणों का कोहबर भी है और 'उलूकी" नाम है मातृदेवता का। संस्कृत में उलूक को कौशिक भी कहते हैं।

महाभारत से ज्ञात होता है कि शकूनी मामा उलूक जाति का था उसके जन्म के समय उल्लू चिल्लाया था। उसके रथ का ध्वजचिन्ह उल्लू ही था। ऐसा अपशकुनी, अशुभ, तिरस्करणीय शकूनी का चरित्र हमारे सामने आता है महाभारत में और सारी उजाड कथा हमारे ध्यान में आ जाती है। शकूनी और उल्लू का संबंध सामने आकर वीराने खंडहरों में सुनसुनान स्थानों पर मिलनेवाला, विचरनेवाला उल्लू का संबंध सर्वनाश से जुडना समझ में आ जाता है। श्रीलंका में भी इसे अशुभ पक्षी मानते हैं। रोम में तो कहावत है कि यदि उल्लू ने रोम में प्रवेश नही किया होता तो रोम का विनाश नहीं हुआ होता। परंतु, यूनानी इसे शास्त्र और कला का निदर्शक प्राणी मानते हैं। प्रसिद्ध पक्षीविद्‌ सालेम अली के अनुसार उल्लू एक बुद्धिमान प्राणि है। जहां तक अशुभ का प्रश्न है, उल्लू का किसी भी प्रकार की विनाशलीला से संबंध नहीं है। वास्तव में कतई ऐसा नहीं है कि किसी अट्टालिका पर उल्लू बैठे और उसके बोलना प्रारंभ करते ही वह खंडहर में तब्दील हो जाए।

फिर भी आश्चर्य तो बच ही रहता है कि आखिर देवताओं की कल्पना करनेवालों ने उल्लू को लक्ष्मी का वाहन क्यों बनाया? भाषा के प्रयोग में लक्ष्मी को सौंदर्य और समृद्धि के प्रतीक के रुप में प्रयोग में लाया जाता है। चित्रों में भी लक्ष्मी अत्यंत सुंदर रुप में दर्शाई जाती है। सौंदर्य का प्रतीक कमल उसका आसन है। फिर सौंदर्य का प्रतीक लक्ष्मी का वाहन कुरुप और अशुभ उल्लू ही क्यों? यह असंगति इतनी अग्राह्य प्रतीत होती है कि हंसवाहिनी सरस्वती की भांति उल्लूवाहिनी लक्ष्मी के चित्र सहसा दिख ही नहीं पडते। कमलासन लक्ष्मी के चित्र ही मिलते हैं और दीपावली पर इन्हीं चित्रों की पूजा भी की जाती है।

भारतीय संस्कृति की कल्पना में प्रायः सभी देवताओं के वाहन हैं। वाहन का अर्थ 'यान" है, जो किसीको वहन करता है अर्थात्‌ ले जाता है। प्राचीनकाल में यानों को पशु ही चलाते थे। अतः पशु ही मुख्य रुप से वाहन थे। पशुओं की पीठ पर बैठकर भी यात्रा की जाती थी। अतः पशुओं को ही सामान्यतया वाहन माना गया साथ ही कुछ पक्षियों को भी देवताओं के वाहन बना दिया गया। भारतीय संस्कृति कोई साधारण संस्कृति तो है नहीं कि केवल प्राचीन वाहन प्रथा के आधार पर देवताओं के वाहनों की कल्पना कर ली। इसके पीछे कुछ दार्शनिक रहस्य भी है। इसीलिए कुछ पक्षियों को भी वाहन के रुप में सम्मिलित कर लिया गया वरना हमारे देश में तो इतना बडा कोई पक्षी होता ही नहीं है कि उस पर कोई मनुष्य सवार हो सके। वाहन गति का सूचक है। सजीव वाहन का ग्रहण  सांस्कृतिक धारणाओं की सजीवता और गतिशीलता का द्योतक है। जैसेकि सरस्वती विद्या की देवी है तो, लक्ष्मी शील, सौंदर्य एवं समृद्धि की अधिष्ठात्री है। संकेत यह है कि सजीव भाव और गतिशील साधना के द्वारा ही देवताओं के प्रतीकों से लक्षित सांस्कृतिक तत्त्वों को जीवन में प्रतिष्ठित किया जा सकता है। 

पशु भूमि पर चलते हैं और पक्षी हवा में उडते हैं। भूमि यथार्थ की और हवा कल्पना की सूचक है। शिव के समान जिन देवताओं की धारणा में यथार्थ की प्रधानता है उनके वाहन पशु हैं। यथार्थ की गति भी पशुओं की भांति मंद होती है। यहां सिंह अपवाद है। कल्पना वायु के समान सूक्ष्म और पक्षियों के समान उसकी गति तीव्र होती है। विद्या, कला, सौंदर्य आदि में कल्पना ही प्रधान होती है। अतः सरस्वती, लक्ष्मी आदि के वाहन पक्षी हैं। ध्यान योग्य बात यह है कि वाहनों के चयन में सौंदर्य की अपेक्षा उपयोगिता पर बल दिया गया है। उपयुक्तता के आधार पर ही उल्लू को लक्ष्मी के वाहन के रुप में मान्यता दी गई है।

सौंदर्य और कल्याण तो आंतरिक भाव हैं। जो बाहर से कुरुप और अशुभ दिखते हैं उनके अंदर भी सुंदरता और मंगल भाव हो सकते हैं। वैसे भी उल्लू तो मात्र वाहन है लक्ष्मी तो कमल पर ही विराजती हैं। धन तो अस्थायी है आज है कल नहीं। इसी भांति लक्ष्मी भी चंचल, अस्थिर है। संचय करने पर भले ही वह स्थिर दिखे परंतु, उत्तराधिकारियों के हाथों में आते ही वह अपना चंचल स्वरुप दिखला ही देती है। किसी को उल्लू कहना यानी वह मूर्ख है ऐसा समझा जाता है। परंतु, वास्तव में उल्लू एक बुद्धिमान और उद्यमी पक्षी है। जब सारी दुनिया सोती है तब रात्री में जागनेवाला मानो यह कोई संयमी मुनी। अंधेरे की राख मला हुआ कोई निस्संग योगी। उसकी दृष्टि तमोभेदिनी।

इसी प्रकार से लक्ष्मी के साधक व्यवसायी उद्यमी उद्यम के लिए उस समय सजग होते हैं जब दूसरे लोग सोते रहते हैं या जिस उद्यम के बारे में वे सोच रहे होते हैं उसके प्रति दूसरे अनभिज्ञ रहते हैं। रात्रि के अंधकार में जब लोग बाहर निकलना भी पसंद नहीं करते ना ही उन्हें कहीं समृद्धि की संभावना नजर आती है। ऐसे में तीव्र दृष्टि से वे साधक समृद्धि का मार्ग ढूंढ़ ही लेते हैं। यहां अंधकार भविष्य का सूचक है और चूंकि भविष्य अदृष्ट होने से अंधकारमय ही होता है। भविष्य के इस अंधकार में जिस के संबंध में लोग सजग नहीं होते ये लक्ष्मी के साधक समृद्धि के मार्ग को खोज लेते हैं।

जिन खंडहरों में या वीरानों में उल्लू घूमता है वे दूसरों की असफल या खंडित योजनाओं के प्रतीक हैं जो अपने वैभव को बनाए ना रख सके परंतु, ये उद्योगीजन इन्हीं खंडित योजनाओं को साकार कर यश प्राप्त करते हैं, लक्ष्मीपति बनते हैं। वीरान स्थान प्रतीक है अछूत क्षेत्रों का जिनमें कम ही लोग जाते हैं या जाने से डरते हैं। रात के अंधेरे में उल्लू इन्हीं वीरानों को आबाद करते हैं। इसी प्रकार उद्यमीजन इन्हीं अछूते क्षेत्रों में अपना भविष्य आजमाते है, सफलता एवं समृद्धि को प्राप्त करते हैं। उल्लू अन्य पक्षियों की भांति झुंड में नहीं रहता निर्भय हो अकेला ही वीरानों में रहता है और अपनी तीव्र दृष्टि (उल्लू के दृष्टपटल मनुष्य से पांच गुना होते हैं), से वह देख लेता है, तीक्ष्ण कानों से वह सुन लेता है जो हमें ना तो दिखाई देता है ना ही सुनाई देता और अपनी इन प्रभावी शक्तियों का उपयोग कर अपना शिकार हासिल कर लेता है। ठीक इसी प्रकार से लक्ष्मी के साधक उद्यमी भी अपना लक्ष्य हासिल कर के ही दम लेते हैं। 

लक्ष्मी के वाहन उल्लू के शिकार होते हैं चूहे, छछूंदर, सांप, कीडे-मकोडे, गिरगिट, गिलहरियां जो फसलों को हानि पहुंचाने में लगे रहते हैं। इस प्रकार से उल्लू तो किसान मित्र हुआ। बेहतर होगा कि शुभाशुभ के झंझटों को छोड हम उल्लू की उपेक्षा करना छोडें, उसके संबंध में भ्रांत धारणाओं के त्यागें। अंधविश्वास में लिप्त हो उसकी हत्या करना छोडें।      
  

Thursday, October 16, 2014

व्रतों के जंजाल में उलझती महिलाएं

वर्तमान में स्त्री-पुरुष समानता की बातें चरम पर हैं। हर क्षेत्र में महिलाओं का दखल बढ़ता जा रहा है। लिंग पर आधारित भेद को नकारकर पुरुषों के एकाधिकार, वर्चस्व को चुनौती दी जा रही है। लेकिन व्रत रखने के मामले में महिलाओं का एकाधिकार सा ही है। इन व्रतों की विशेषता यह है कि ये सभी पति या बेटों यानी पुरुषों को केंद्र में रखकर उन्हीं के लाभ के लिए, देवी-देवताओं के प्रकोप से घर-परिवार को बचाए रखने के लिए पत्नी या मां के रुप में महिलाओं द्वारा ही रखे जाते हैं।

पूरे सप्ताह में एक दिन भी ऐसा नहीं होगा जिस दिन हिंदू महिलाएं व्रत ना रखती हों। सप्ताह के इन दिनों के अतिरिक्त संकष्टी चतुर्थी, रामनवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्री, एकादशी आदि के व्रत अलग हैं और भी कई व्रत हैं जिनकी सूची बडी लंबी है जो दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है। व्रत में देवी-देवताओं के पूजन के अलावा विशेष किस्म के वृक्षों-पत्थरों आदि की भी पूजा की जाती है।

कई लोगों को याद होगा कि 1975 के आसपास एक  फिल्म आई थी 'जय संतोषी मां"। इसके पूर्व इस देवी का कहीं अता-पता ना था परंतु यह पिक्चर क्या सुपरहीट हुई महिलाएं संतोषी माता का व्रत रखने लगी। वैसे अब यह व्रत रखा जाता है कि नहीं इस संबंध में मैं कुछ कह नहीं सकता परंतु, सुनने में जरुर आता नहीं। हां, अब साई बाबा का बुखार अवश्य ही चरम पर है और हो सकता है कि जिस प्रकार से साई बाबा के मंदिर रातोरात उग आते हैं वैसे ही हो सकता है महिलाएं साईबाबा का भी व्रत रखने लगी हों, तो कह नहीं सकते। यह भी हो सकता है कि शायद पुरुषों ने इस मामले में महिलाओं के एकाधिकार को भंग भी कर दिया हो। लेकिन यह बात निश्चित है कि साईबाबा से मनौतियां भरपूर चढ़ावे सहित जरुर दिल खोलकर मांगी जा रही हैं।

व्रतों की होड में क्या शिक्षित क्या अशिक्षित सभी महिलाएं जोरशोर से लगी रहती हैं। महिलाओं की हालत यह है कि भले ही बच्चों के पाठ्यक्रम की पुस्तकों की उन्हें कोई जानकारी ना हो परंतु, भिन्न-भिन्न व्रतों-उपवासों की बखान भरी कब कौनसी विधि रखना, क्या चढ़ावा चढ़ाना, मुंहमांगी मुराद कैसे पूरी होगी और यदि व्रत भंग हुआ तो क्या हानियां होगी से भरपूर पुस्तकें जरुर इन महिलाओं के संग्रह में मिल जाएंगी।

चूंकि, व्रत रखनेवाला स्वयं भी कार्यसिद्ध हो इसलिए जुट जाता है तो सफलता मिलने की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं। यदि सफलता मिल गई तो उस देवी या देवता का माहात्म्य बढ़ जाता है परिणामस्वरुप भक्तों की संख्या भी बढ़ जाती है। कार्यसिद्धि के पश्चात भक्त का कर्तव्य बनता है कि वह पुनः व्रत रखे और उद्यापन करे जिसमें बहुत व्यय करना पडता है। ना करने पर देवी-देवताओं का कोपभाजन बनने का भय रहता है। इन उपवासों के साइड इफेक्ट के रुप में कमजोरी की शिकायत उपवासकर्ता द्वारा की जाती है जबकि कोई विशेष शारिरीक श्रम किए होते नहीं है बल्कि तरमाल सुतने का कार्यक्रम जरुर किया गया होता है फिर भी शिकायत तो करना ही पडती है। भले ही हमेशा रुखा-सूखा जाया जाता हो परंतु, कुछ विशेष व्रतों पर विशेष खाने-पीने की व्यवस्था की ही जाती है। मानो व्यंजन नहीं बने तो व्रत के पुण्यलाभ से वंचित रह जाएंगे। इसमें घर का बजट बिगडना तय ही होता है।

व्रत यानी धार्मिक दृष्टि से किया जानेवाला उपवास या प्रतिज्ञा, रखने में कोई हानि नहीं यदि उससे मन को सकारात्मक विचारसरणी की शिक्षा या अनुशासन मिलता हो तो उसका भौतिक फल लाभ मिल सकता है। इस दृष्टि से व्रत रखने में कोई हानि नहीं। लेकिन ये व्रत तो वर्तमान में अंधविश्वास, बाजारवाद का शिकार हो गए हैं और घर का बजट ही बिगाडने पर उतारु हैं। उदाहरणार्थ कुछ वर्षों पूर्व एक स्थान पर आग लगी तो तर्क यह दिया गया कि शीतलासप्तमी को घर के लोगों ने गरम भोजन किया इसके फलस्वरुप आग लगी और हानि हुई। अब इसे अंधविश्वास नहीं तो क्या कहा जाए। हमारी गलतियों से घटी दुर्घटना की जिम्मेदारी देवी-देवताओं पर थोपना कदापि उचित नहीं। हिंदू धर्म की विशालता को छोटा करने के समान है। हम तो ईश्वर को दयालु, मित्र, सखा मानते हैं। अपने तारणहार, दुखहर्ता के रुप में पूजते हैं, ऐसा ईश्वर भला हमारी छोटी सी चूक की इतनी बडी सजा हमें कैसे दे सकता है।  

आजकल करवा चौथ और वैभव लक्ष्मी व्रत रखने का चलन बडे जोरों पर है। करवा चौथ के व्रत पर बाजारवाद किस प्रकार से हावी है यह टी. व्ही. पर साफतौर से देखा जा सकता है। प्रतिदिन भले ही महिलाएं सादगी से रहती हों परंतु, इस व्रत पर भडकीली साडियां पहनने, ओढ़ने की होड लग जाती है। जमकर सोलह श्रंगार किया जाता है लॉकर से निकालकर गहने पहने जाते हैं। नई प्रसाधन सामग्री खरीदने में महिलाएं जुट जाती हैं। रोज पति को ताने सुनाए जाते हों लेकिन इस दिन चरण स्पर्श किए जाते हैं। दिन भर भूखे रहकर पति के दीर्घायु की कामना की जाती है फिर शाम को जमकर भारी भोजन भरपेट किया जाता है इससे स्वास्थ्य गडबडा जाए तो भी चलेगा, भई साल भर में एक बार ही तो यह व्रत दिवस आता है। अब इन्हें कौन समझाए कि यदि व्रत रखने मात्र से पति दीर्घायु होने लगते तो दूसरे धर्मों की औरतें भी यह व्रत न रखने लग जाती।

यही हाल वैभव लक्ष्मी व्रत का है जहां जाओ वहां महिलाएं यह व्रत रखते नजर आ जाएंगी। इस व्रत में लक्ष्मीनारायण की पूजा, पक्वानों का भोग और दान-दक्षिणा की विधि होती है। इस व्रत का स्वागतार्ह भाग यह है कि इस व्रत को रखने की शर्त यह है कि इसमें मन को सदैव प्रसन्न रखना होता है और शाम को उपवास समाप्ति के समय घर के सभी लोग एकत्रित भोजन करें यह नियम होता है। आजकल की भागदौड भरी जिंदगी में एकत्रित भोजन करना दुश्वार होता जा रहा है ऐसे में यदि इस धार्मिक नेम से यह साध्य होता हो तो निश्चय ही प्रशंसनीय है। यदि व्रत ऐहिक वैभव की आशा किए बिना केवल मनःशांति के लिए किया जाए तो स्वागतार्ह है। परंतु इसलिए किया जाए कि रातोरात ऐश्वर्यसंपन्न हो जाएंगे तो यह चिंता का विषय है। यदि ऐसा है तो इसका अर्थ यह हुआ कि इन महिलाओं को व्रत किसलिए रखे जाते हैं का अर्थ ही समझा नहीं है। व्रत में व्रती को अपने अंदर की आंतरिक शक्ति को जागृत करना होता है। जीवन के आव्हान को स्वीकार कर व्यवसाय में सफलता का मार्ग ढूंढ़ें तो लक्ष्मी प्रसन्न होगी। मेरा कार्य ही मेरी पूजा है इस श्रद्धा के साथ अपना नियत कार्य करें तो क्या यह भी वैभव लक्ष्मी का पूजन नहीं होगा। 

वर्तमान में महिलाएं अधिकारों के नाम पर हर मामले में हक जताते नजर आती हैं, बराबरी का दावा करती रहती हैं। विवाह के पश्चात पति से नहीं पटी तो पति तो क्या पूरे परिवार को डराने-धमकाने से बाज नहीं आती। कोर्ट-कचहरी कर तिगनी का नाच नचा देती हैं तब तो उन्हें सीता-सावित्री नजर नहीं आती। अंत में केवल यही कहना है कि व्रत-उपवासों से ही देवी-देवता प्रसन्न होते हैं या नहीं? यह तो कोई नहीं जानता लेकिन इन व्रतों की भरमार से व्रत रखनेवाले का स्वास्थ्य और परिवार की व्यवस्था अवश्य प्रभावित हो जाती है। व्रत दिवस पर घंटों भगवान के दर्शनार्थ मंदिर की कतार में लगना, फिर सत्संग-प्रवचन के नाम पर भीड में धक्के खाते फिरने में कोई तुक नजर नहीं आती इससे तो अच्छा है कि कोई उपयोगी कार्य किया जाए। 

Saturday, October 4, 2014

आखिर कब आचरण में लाएंगे हम संपूर्ण स्वच्छता को

आज से कुछ वर्षों पूर्व मैंने एक लेख पढ़ा था उसमें प्रसिद्ध उद्योगपति राहुल बजाज ने कहा था यदि हम केवल स्वच्छता को ही अपनालें तो केवल पर्यटन उद्योग से ही हम पर्याप्त रोजगार उत्पन्न कर सकते हैं। दूसरी बात उन्होंने उन छोटे-मोटे धंधे करनेवालों के संबंध में कही थी कि वे किस प्रकार से विदेशियों को ठगते हैं। इन्हीं मुद्दों को लेकर आमिर खान ने टी.व्ही. पर 'शर्म का ताज", और 'अतिथि देवो भव", सत्यमेव जयते जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से प्रचार कर हमारा आचरण किस प्रकार का है और किस प्रकार का होना चाहिए का संदेश दिया था।

भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम ने भी अपने हैदराबाद के प्रसिद्ध भाषण में जो कुछ कहा था उसका लब्बेलुआब कुछ इस प्रकार का था कि, आप सिंगापूर की सडकों पर सिगरेट का टुकडा नहीं फैंकते, किसी स्टोर में नहीं खाते। ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के समुद्र तटों पर कचरा नहीं फैंकते। जापान की सडकों पर पान खाकर नहीं थूकते। परंतु, भारत में हमारा आचरण वहां हम जो आचरण करते हैं ठीक उसके विपरीत होता है। अमेरिका में हर कुत्ते का मालिक उसके कुत्ते के मल त्याग के पश्चात उसको स्वयं साफ करता है यूं ही सडक को खराब करने के लिए छोड नहीं देता। इसके विपरीत भारत में लोग सुबह-शाम कुत्ते को लेकर घूमने निकलते हैं और उनके कुत्ते जगह-जगह मल-मूत्र विसर्जन करते फिरते हैं और बाद में वे ही लोग शिकायत करते फिरते हैं कि नगर पालिका साफ सफाई नहीं करती। लेकिन हम हमारे गिरेहबान में झांककर नहीं देखते।

कुछ वर्ष पूर्व मैं पूणे गया था वहां एक उद्योगपति ने तिरुपति बालाजी की प्रतिकृति वाला मंदिर बनाया है उस मंदिर परिसर की शौचालयों सहित स्वच्छता देखते ही बनती थी। परंतु, चारों ओर ध्यान से देखने पर नजर आया कि जगह-जगह पर सिक्यूरिटी गॉर्ड लगे हैं इसलिए यह स्वच्छता है। यही हाल अंतरराष्ट्रीय एअरपोर्ट का है वहां जो स्वच्छता नजर आती है वह इसीलिए है कि वहां सतत स्वच्छता चलती ही रहती है। यदि सतत स्वच्छता ना चले तो क्या होता है यह मैंने इंदौर-भोपाल के बीच चलनेवाली डबल डेकर ट्रेन में देखा है जिसका किराया लगभग रुपये 450 है। उस ट्रेन में हर डिब्बे में कचरे का डिब्बा रखा हुआ है परंतु लोग ट्रेन में खाते-पीते हैं और कचरे को जहां बैठे थे वही कहीं तो भी डाल देते हैं, घुसैड देते हैं। 

उपर्युक्त पर से यह साफ दिख पडता है कि अस्वच्छता के मामले में हममें अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं, अस्वच्छता फैलाने में कोई किसी से कम नहीं। हम अफ्रीकियों के बारे में कोई बहुत अच्छे विचार नहीं रखते। परंतु, वे भी इस मामले में हमसे बेहतर हैं। मैंने अपने भाई जिन्होंने युगांडा (कम्पाला) की यात्रा की है उन्हीं से यह जाना है कि वहां कोई सडक किनारे पेशाब करते नहीं दिख पडेगा। वैसे मैंने वहां की सडकों के चित्र देखे हैं जिन पर कागज का एक टुकडा तक नजर नहीं आता जबकि हमारे यहां मुंबई के पेडर रोड, मलाबार पर तक गंदगी दिख पडती है। यह देखकर लगता है कि दुनिया में शायद सबसे गंदे लोग हम ही हैं।

कहने को तो हम लोग बडे धार्मिक हैं और हमारा देश बडा धर्म प्रधान है और सभी धर्म स्वच्छता पर जोर देते हैं। महामहोपाध्याय डॉ. पांडुरंग काणे लिखित 'धर्म शास्त्र का इतिहास" (भाग 1) का उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं होगा। जिसमें मल-मूत्र त्याग एवं देह की स्वच्छता एवं शुद्धि के नियम विस्तार से 'आह्निक एवं आचार" के अंतर्गत देते हुए जो पर्यावरण हितेषी भी हैं। एक स्थान पर कहा गया है 'बस्ती से दूर दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम जाकर मल-मूत्र त्याग करना चाहिए।" (मनु 5/126) प्रातः समय शरीर-स्वच्छता तो सामान्य शौच (शुद्धता, पवित्रता) का एक अंग है। गौतम (8/24) के मत से शौच एक आत्मगुण है। ऋगवेद (7/56/12) ने शुचित्व पर बल दिया है। हमारे यहां स्नान किए बगैर कोई धार्मिक कर्मकांड किया ही नहीं जा सकता। हर पर्व पर पवित्र नदियों में स्नान किया जाता है। चाणक्य ने भी नदी में मल-मूत्र त्याग करने को मना किया है।  

कुरान में भी कहा गया है अल्लाह तआला खूब पाक रहने वालों को पसंद फरमाता है। पैगंबर की आज्ञा है कि प्रार्थना के समय  शरीर अपवित्र हो गया हो तो स्नान करना चाहिए वैसी आवश्यकता ना होने पर प्रत्येक प्रार्थना के समय कम से कम 'वुजू" तो भी करना चाहिए। वुजू का बहुत महत्व है। क्योंकि, पैगंबर ने कहा है कि जो प्रार्थना के पूर्व वुजू करता है उसके हाथ-पांव आदि अवयव न्यायदिवस के दिन पूर्णिमा के चांद के समान चमकेंगे इस कारण वह भीड में भी उठकर दिखेगा और उसे स्वर्ग की ओर बुलाया जाएगा। इसलिए वुजू (नमाज के लिए नियम पूर्वक हाथ-पांव और मुंह आदि धोना) करें यह पैगंबर का कहना है। बाइबल भी सीखाती है 'क्लीनलीनेस इज नेक्सट टू गॉडलीनेस" जो अंग्रेजी में एक वाक्यांश भी है जिसका अर्थ है ः ईश्वरीय ही है स्वच्छता। स्वच्छता ईश्वर के निकट ले जाती है। 

अमेरिका के लोग हर रविवार चर्च जाते हैं उनमें से कई चर्च द्वारा किए जानेवाले धर्मांतरण के या अन्य अवांछित राजनैतिक क्रियाकलापों से सहमत नहीं होते, उसका विरोध भी करते हैं। परंतु, वे चर्च में बडी श्रद्धा से अपनी सेवाएं किसी ना किसी रुप में अवश्य प्रदान करते हैं। इस संबंध में एक इंदौर के प्रसिद्ध आश्रम के ब्रह्मचारी ने जो एक सन्यासी के साथ ही थे ने चर्चा के दौरान कहा अपने यहां तो इसके उलट होता है। हमारे आश्रम में लोग आते हैं और स्वच्छता में हाथ बंटाने की बात तो दूर रही पर गंदगी अवश्य फैला जाते हैं।    

गांधीजी देश के पहले ऐसा नेता हैं जिन्होंने शौचालयों की ओर लोग का ध्यान आकृष्ट किया था। उनके कई अनुयायियों ने आजीवन सार्वजनिक सफाई का काम किया। गांधीजी के अनुयायी अप्पा पटवर्धन ने तो 1928 से ही संडास-मूत्रालय-सफाई बाबद अनेक उपक्रम, प्रचार, प्रयोग और सत्याग्रह किए थे। सेनापति बापट (12-11-1880 से 28-11-1967) जो सशस्त्र क्रांतिकारी, तत्त्वचिंतक और संघर्षशील समाज सेवक थे सुबह उठकर गांव के रास्तों पर झाडू लगाना और शौचालय स्वच्छ करना के व्रत को उन्होंने जीवन भर जीया। बाबा आमटे जब वर्धा नगरपालिका के अध्यक्ष थे तब उन्होंने सफाईकर्मियों की हडताल के समय सडकों पर उतरकर स्वयं सफाई कार्य किया था।

भारत सरकार ने सन्‌ 1886 में केंद्रिय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम प्रारंभ किया था जो 1999 में संपूर्ण स्वच्छता अभियान (टीसीसी) में रुपांतरित हो गया। 2012 में निर्मल भारत अभियान को भी इसी मकसद से शुरु किया गया। जब जयराम रमेश ग्रामीण विकास मंत्री तब उन्होंने शौचालयों की आवश्यकता की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए कई बयान दिए उनमें विवादस्पद भी थे, उसी समय मोदी ने भी पहले 'शौचालय फिर देवालय" का नारा दिया था। परंतु जैसी चाहिए वैसी सफलता हासिल हो नहीं पाई। अब मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद 2 अक्टूबर से गांधीजी की 150वीं जयंती 2019 से पहले गांधीजी के स्वप्न स्वच्छ भारत को साकार करने के लिए संपूर्ण भारत को स्वच्छ बनाने के लिए स्वच्छ भारत अभियान का श्रीगणेश स्वयं हाथ में झाडू लेकर स्वच्छता कर किया है। जिसे अच्छा प्रतिसाद भी मिला है। 

लेकिन क्या इससे सचमुच भारत स्वच्छ हो जाएगा? क्योंकि, यह कार्य प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है जो प्रेरणास्पद तो निश्चय ही है और यह बात भी निश्चित ही है कि इस कार्य में, जो चाहिए वह लक्ष्य हासिल करने में जब तक समाज का साथ नहीं मिलेगा सफलता मिलना मुश्किल ही है।
वन्य प्राणी सप्ताह 2 से 8 अक्टूबर
नासमझ कौन मनुष्य या पशु - पक्षी
world animal day 4th october

प्राचीनकाल से ही मनुष्य का पशु-पक्षियों से अटूट संबंध रहता चला आया है जो आज तक अबाध है। यह संबंध संस्कृत सुभाषितों, कहावतों, किस्से-कहानियों से लेकर मुहावरों, गीत-कविताओं से लेकर पौराणिक आख्यायनों तक में हम भारतीयों में ही नहीं तो विदेशियों तक में नजर आता है। परंतु, हम इनका उल्लेख अधिकांशतः इन्हें हीन, निर्बुद्ध समझकर ही आपस में एकदूसरे को अपमानित महसूस हो इसीको मद्देनजर रख गाली के रुप में करते हैं। उदाहरण के रुप में चिडियाघर का उल्लेख आते ही हमारी नजरों के सामने अजीबोगरीब जानवरों का जखीरा जमा हो जाता है। जबकि वहां प्रकृति की सुंदरता करिश्माई अंदाज में मौजूद होती है। जहां से हम बहुत कुछ सीख भी सकते हैं। जिराफ की गर्दन बहुत लंबी और बडी अजीब दिखती है परंतु, अधिकांश लोगों को यह मालूम ही नहीं होगा कि जिराफ और मनुष्य दोनो की गर्दन की हड्डियां समान संख्या में होती हैं। इसी प्रकार से हाथी की सूंड दिखने में बेहद बेढ़ंगी हो परंतु वह भी प्रकृति की अद्‌भुतता समेटे हुए है, वह एक साथ मुंह, नाक, कान का काम जो करती है।

'गधे के सिर से सिंग" यह मुहावरा हम तब उपयोग में लाते हैं जब कोई अचानक गायब हो जाता है। गधा हमारे यहां मूर्खता के प्रतीक के रुप में जाना जाता है जबकि किसी व्यक्ति को गधा कहना यानी उसका नहीं वरन्‌ गधे का ही अपमान करना है। क्योंकि शायद आप स्वयं नहीं जानते कि गधे की गणना बुद्धि के धनी जीवों में की जाती है और गधा सदियों से आदमियों का पालतू है और  मनुष्य का साथ निभाता चला आया है। कभी भारत, सीरिया, इजिप्त आदि में गधे बहुतायत से पाए जाते थे पर अरब देशों में इनका भारी मात्रा में शिकार किया गया और अब ये वहां करीब-करीब विलुप्त ही हो गए हैं। भारत में भी अब ये बहुत कम ही बचे हैं।

किसी मंद गति व्यक्ति को देखकर हम उसे कछुए की उपाधि बडी सहजता से दे देते हैं लेकिन विश्व में अनेक स्थानों पर कछुए का प्रतीकात्मक महत्व है उसे कहीं शुभ तो कहीं अशुभ माना जाता है। भारतीय आख्यायन के अनुसार दशावतारों में एक कूर्म  अवतार भी है। किसी को कछुआ कहने से पहले सोचिए कि आखिर कछुआ अपनी किस विशेषता के कारण दीर्घजीवी है। लकडबग्घे को हम घृणास्पद जीव समझते हैं जबकि वह तो जंगल का दरोगा है, जंगल को स्वच्छ रखनेवाला प्राणी है। वस्तुतः हमें तो उससे हमदर्दी जताना चाहिए। लेकिन अफसोस है कि लकडबग्घे के संबंध में बहुत कुछ जानकारी हमें उपलब्ध ही नहीं है। बल्कि ट्यूमर के इलाज में उसकी जीभ व गठिया में उसकी चर्बी उपयोगी होने कारण आज वह बेमौत मारा जा रहा है।

भेडिये को एक खलनायक की तरह ही पाशविकता से भरा, शोषक के रुप में दुनिया के हर तानाशाह की शक्ल में भेडिये को ही प्रस्तुत किया जाता है। हिंदी कवियों ने तो मानो भेडियों के विरुद्ध अभियान सा ही छेड रखा है। भेडियों को मारने के लिए बाकायदा पुरस्कार भी घोषित किए जाते हैं। अब भेडिये ने आदमी का कितना क्या बिगाडा है यह तो नहीं मालूम परंतु अपने आपको सभ्य कहलवाने वाले आदमी ने जरुर भेडियों का संहार करने में कोई कोरकसर बाकी नहीं छोड रखी है। तभी तो सन्‌ 1973 में स्टाकहोम में बचेखुचे भेडियों को बचाने के लिए वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों को एक सम्मेलन आयोजित करना पडा था। वास्तव में भेडिये अपनी छवि के विपरीत बेहद शर्मीले और मनुष्य से लुकछिपकर जीनेवाले, चौकस व जरा सी आहट होते ही भाग खडे होनेवाले तथा समूह में रहकर छोटे-मोटे शिकार कर पेट भरनेवाले होते हैं। अब भेडिये के दर्शन हमें चिडियाघर में ही होते हैं।

यही हाल चमगादड का है आज से लगभग छः दशक पूर्व जिस संचार सिद्धांत के द्वारा रडार का निर्माण मनुष्य ने किया उस संचार के सिद्धांत का उपयोग आज से लाखों साल पहले से चमगादड करते चले आ रहे हैं। उसकी प्राकृतिक रडार पद्धति का मुकाबला आज भी आसान नहीं। इसीलिए कई संचारिकी यांत्रिकी इस अनोखे जीव का अध्ययन करते रहते हैं। उडते समय चमगादड उच्च आवृत की ध्वनी तरंगे छोडते हैं और जब ये तरंगें किसी अवरोध या कीडे-मकोडों से टकराकर वापिस लौट आती है तो उनके कान इन्हें तत्काल ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार से मार्ग के अवरोध की सूचना उन्हें पहले ही से मिल जाती है। इसी कारण यदि वे लाखों की संख्या में भी निकले तो मजाल है जो कोई किसीसे टकरा जाए। वे अपनी अपनी तरंगों के माध्यम से एक दूसरे के साथ संपर्क बनाए अपना अपना मार्गक्रमण निर्बाध करते रहते हैं। 

अन्य अनेक जीवों की तरह चमगादड भी इस समय दुनिया के सबसे अधिक खतरे में पडे हुए जीवों में से एक है। क्योंकि, गलतफहमी तथा अंधविश्वासों चलते इन्हें डरावना मान भूत-प्रेत-चुडैलों से जोडा जाता है। वास्तविकता यह है कि चमगादड विश्व के बडे भले और लाभदायक प्राणियों में से एक है और इससे हमें कोई खतरा नहीं। परंतु, दुर्भाग्यवश इन्हें कई देशों में किसी भी तरह का कोई संरक्षण ना होने के कारण इनकी कई प्रजातियां विलुप्ती की कगार पर हैं और बची-खुची प्रजातियों को संरक्षण की आवश्यकता है। उत्खनन गतिविधियों ने इनके रहवास की गुफाओं को बहुत क्षति पहुंचाई है। अंधविश्वास के चलते इनके मांस को कामेच्छावर्द्धक मान इनका शिकार व्यापारिक तौर पर हो रहा है। ये कटिबंधीय वृक्षों के प्राकृतिक संवर्द्धन के लिए अनिवार्य हैं। 'फ्रूट बेट्‌स" नस्ल का चमगादड एक रात में 60,000 तक बीज बिखेर देता है। परागण के अलावा चमदागड की बीट उसमें नत्रजन की उपस्थिति के कारण अच्छा खाद है। रात में उडनेवाले कीट-पतंगों का शिकार कर, फसलों की रक्षा एवं प्रकृति के संतुलन में हाथ बंटाता है, हमें, हमारे उपयोगी मवेशियों व फसलों को बीमारियों से बचा समूचे वातावरण को स्वच्छ रखता है। 

अब सवाल यह उठता है कि आखिर मनुुष्य को यह अधिकार किसने दे दिया कि विभिन्न पशु-पक्षियों के प्रति मिथ्या प्रचार करे, उनका संहार करे और ऐसे में नासमझ किसे समझें आदमी को या पशु-पक्षियों को। 

Tuesday, September 23, 2014

नवदुर्गोत्सव 
विश्व भर की संस्कृतियों में महत्व है मातृ-पूजा का 

मोहनजोदडों की खुदाई में प्राप्त हुई मूर्तियों से शक्ति पूजा के प्रमाण मिलते हैं। वैदिक साहित्य में शक्ति उपासना के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। ब्रह्म का आदि संकल्प 'एकोहंबहुस्यम्‌" को ही आद्यशक्ति अथवा महाविद्या कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश इसी आद्यशक्ति से उद्‌भूत हुए हैं। योगशास्त्र की कुंडलिनी भी वह आद्यशक्ति ही है। भक्तिमार्ग के इष्टदेवों की अर्धांगिनी भी यही आद्यशक्ति  है। बौद्धों की ज्ञान की देवी प्रज्ञापरमिता आद्यशक्ति का प्रतीक है। प्राचीनतम बौद्धागमों में वर्णित महामुद्रा को ही शाश्वत नारी अथवा महाभगवती प्रज्ञापारमिता के रुप में परिभाषित किया गया है। बौद्धतंत्र की अधिष्ठात्री देवी भगवती तारा है। तिब्बती भाषा में प्रज्ञा की प्रकाशरुपिणी विश्वमाता को 'दाम-त्शिंग-उलमा" नाम से जाना और पूजा जाता है। चीन की सभ्यता-संस्कृति भी बडी प्राचीन है।  चीनी दार्शनिक सिद्धांतों में यांग (चियेन) और चिंग (कुन) को भारतीय पुरुष और प्रकृति के समान मान्यता प्राप्त है। चीनी मान्यता है ताओ ने एक को पैदा किया उस एक ने दो को तथा दो ने तीन को पैदा किया और तीन से ही संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति हुई। जो हो हम कह सकते हैं कि चिएन और कुन ही सारी शक्तियों के माता-पिता हैं। श्रीलंका में देवी कात्यायनी की पूजा की जाती है। रावण भी इसकी उपासना करता था। जैन धर्म में चक्रेश्वरी, अंबिका, पद्मावती, और सिद्धायिका की पूजा की जाती है। 

सुमेरियन संस्कृति में मातृ देवता के रुप में देवी निन्नी को पूजा जाता था। असीरियन इश्तार के रुप में तो ग्रीक अफ्रोडाइटी और व्हीनस और मिनर्वा रोमन स्त्री देवता प्रसिद्ध हैं। अफ्रीका की आदिम जातियों में शक्ति पूजा किसी ना किसी रुप में विद्यमान रही है। नाइजीरिया के पूर्वी प्रदेशों में शक्ति की देवी 'डायना" की उपासना सात दिनों तक की जाती थी फिर आठवें दिन मिट्टी की एक मूर्ति बनाकर इसमें मंत्र पढ़ते हुए जंगली फल-फूल भरकर इस मूर्ति को बाज के रक्त से नहलाकर पवित्र करते। आदिवासी अपने वस्त्र उतारकर मूर्ति की बारी-बारी से परिक्रमा कर पहले अपना सिर फोडते फिर घाव में मूर्ति की मिट्टी भरते। इसके पीछे मान्यता यह थी कि इससे शरीर में घाव के माध्यम से शक्ति का प्रवेश होता है। सूडान में शक्ति की देवी दुर्गा का रुप 'डिनो देवी" को मिला है। इसकी मुखाकृति बिल्ली जैसी होती है। यह बहुत पानी बरसाती है।   

विश्व की एक और प्राचीन संस्कृति इजिप्त की है। इजिप्त के अति प्रारंभिक देवताओं में मातृ साधना की उपासना को मान्यता प्राप्त थी। इस आइसिस देवी को विभिन्न नामों और रुपों में पूजा जाने लगा। ग्रीक पौराणिक आख्यायनों के अनुसार हेरा देवी प्रेम और विवाह की देवी है। अर्तेमिस पशुओं की देवी है। तो, अहेना पुरुष और नारी दोनो ही रुपों में पूजित है। अनोन्का को आंतरिक शक्ति के समान मान्यता प्राप्त है। इस्लाम के आगमन के पूर्व अरब लोग जिन पर बहुत श्रद्धा रखते थे ऐसी तीन देवियां थी - (अल) उज्जा, लात और मनात। ये देवियां प्रसन्न होने पर भक्त की इच्छा पूरी करती हैं इस पर अरबों की दृढ़ श्रद्धा थी। ये तीन देवियां अल्लाह की कन्याएं थी ऐसा माना जाता था।

बाइबल में ईश्वर की आत्मा को स्त्रीलिंगी रुप में दर्शाया गया है। ईसाई धर्म के अनुयायी माता मरियम की उपासना ईश्वर की मां के रुप में करते हैं। ईसा का जन्म मेरी से बिना जोसफ के साथ संसर्ग हुए हुआ यह कथा ईसा पूर्व आदिमाता के स्वरुप की ओर इंगित करती है। रोमन कैथलिक ईसाई माता मरियम की प्रार्थना बडी श्रद्धा के साथ करते हैं। प्रोटेस्टंट ईसाई मरियम को जीसस की भौतिक माता के रुप में मान्यता देते हैं परंतु, पूज्य भाव से नहीं।  इस प्रकार हम देखते हैं कि पूरे विश्व में सर्वत्र किसी ना किसी रुप में मातृ उपासना मिल ही जाती है। 

Sunday, September 21, 2014

महाराष्ट्रीय साधु - संतांचे राष्ट्रीय कार्य !

भारताच्या इतिहासाचा अभ्यास करताना आढ़ळते की आमच्या देशातील साधु-संतांनी धर्मप्रचारा बरोबरच विविधरुपेण सामाजिक, साहित्यिक, राजकारणी व शिक्षणासंबंधी कार्य करुन देशाच्या उन्नतीस हातभार लावला आहे. बौद्धधर्माला सम्राट अशोकाचा राजाश्रय मिळाल्यामुळे त्यास अंतरराष्ट्रीय स्वरुप प्राप्त झाले. हिंदुचीन (इंडोचायना), हिंदुएशिया (इंडोनेशिया), बाली, बोर्नियोचे हिंदु आपला गोत्रपुरुष कौंडिण्य ऋषी सांगतात. अशामुळे भारतीय सभ्यतेचा प्रभाव दूरपर्यंत स्थापित झाला.  

मध्ययुगात धार्मिक नेत्यांचा राज्यशासकांवर चांगलाच प्रभाव होता. देवगिरीच्या यादवांवर पंडित हेमाद्रि व बोपदेव, विजयनगर साम्राज्याचे संस्थापक स्वामी विद्यारण्य व महाराष्ट्राचे ज्ञानेश्वर, तुकाराम, एकनाथ, रामदास आदी संत, बंगालात श्रीकृष्ण चैतन्य, आसामात शंकरदेव, आजच्या उत्तरप्रदेशात सुरदास, तुलसीदास, कबीर आदी, गुजराथात नरसीमेहता, स्वामीनारायण व बुंदेलखंडात स्वामी प्राणनाथ, पंजाबात गुरुनानकदेव, आदी साधुसंतांनी भारतीय सभ्यतेचे रक्षण, प्रचार व प्रभाव वाढ़विण्यास, स्थायी करण्याचे जे गौरवास्पद कार्य केले तो भारतीय इतिहासाचा एक विलक्षण अभिमानास्पद अध्याय आहे.

पण महाराष्ट्राच्या इतिहासात राजकीय व धार्मिक उन्नतीची एक बेमालूम सांगड बनली आहे. त्यामुळे राष्ट्रोद्धाराचे कार्य केवळ महाराष्ट्रातच उत्तमप्रकारे संपन्न झाले. महाराष्ट्रीय साधुसंतांनी धार्मिक, सामाजिक, राजकीय, साहित्य व शिक्षणविषयी अद्‌भुतकार्य केले व निस्संदेह हे म्हटले जाऊ शकते की यांच कार्यांच्या आधारावरच पुण्यश्लोक छत्रपती शिवाजी महाराज आपले हिंदवी स्वराज्य स्थापित करु शकले. राज्याकडून साधुसंत व गुणीजनांना आश्रय दिला जात असे. मुसलमानांच्या आक्रमणकाळापासून म्हणजे 12व्या शतकांपासून सतत मराठाशाहीच्या शेवटच्या काळापर्यंत महाराष्ट्रीय साधुसंतांनी देशाच्या संपूर्ण उन्नती करण्यात काही कसर सोडली नाही.

महाराष्ट्राचे शेवटचे हिंदुराजे देवगिरीचे यादवराजा साधु-संत व विद्वानांचे मोठे पोषक राहिले. तेव्हांच ज्ञानेश्वरांनी भगवद्‌गीतेवरील आपली प्रसिद्ध 'ज्ञानेश्वरी" टीका लिहिली. बल्लाळराजांचे वेळी मुकुंदराज प्रसिद्धीस आला. त्याचवेळी त्याने आपला प्रसिद्ध ग्रंथ 'विवेकसिंधु" लिहिला. 12व्या शतकांत मराठींत जे जे ग्रंथ प्रसिद्ध झाले, त्यांत ह्या मुकुंदराजाचे ग्रंथास अग्रस्थान दिले पाहिजे. पुढ़े मुसलमानांच्या स्वाऱ्यांना सुरुवात झाली व जसेच मुसलमान राज्यसत्तेचा आधार महाराष्ट्रात निर्माण झाला तसेच परक्या धर्मापासून जनतेला वाचविण्याकरिता महाराष्ट्रातल्या साधुसंतांनी पण एकेश्वरवाद, समताभाव आदींचा प्रचार करुन हिंदुधर्माच्या उज्जवलतेला कायम राखिले.

त्याकाळात महाराष्ट्रात भागवतधर्म तथा भक्तीमार्गाचा अधिक प्रचार झाला. या धार्मिक जागृतिच्या कार्यात सगळ्या जातींनी म्हणजे  ब्राह्मण, मराठा, कुणबी, माळी, शिंपी, सोनार, कासार, कुंभार, आदी. स्त्री, दासींपासून मेहतरांनी सुद्धा हातभार लावला होता. त्यामुळे सर्वसाधारण जनतेवर भारतीय सभ्यतेचा स्थायी प्रभाव पडून परकी धर्माची मूळे दक्षिणेत जोर पकडू शकली नाहीत. याउलट शेखमहमंद सारखे कित्येक मुसलमान पण त्या धार्मिक चळवळीत हिंदुतत्त्वज्ञानाच्या रंगात रंगून गेले. ज्ञानेश्वरांच्या काळातच बौद्धधर्माचे परिवर्तित व संशोधित स्वरुप महानुभाव तथा जयकृष्णी पंथाचा प्रचार झाला व त्याने नंतर पंजाब आणि अतिदूर काबुल पर्यंत मठ स्थापित करुन आपल्या सिद्धांतांना पसरविले.

ज्ञानेश्वरांनी लोकांना स्पष्टपणे समझविले की ः देवाच्या दरबारात उच्चनीचचा भेद नसतो. नीचांच्या स्पर्शाने न तर गंगा अपवित्र होते व वायु देखील खराब होत नाही तसेच पृथ्वी पण अस्पृश्य होत नाही. त्यांच्या परंपरेचे महात्मा एकनाथ होते. जे आपल्या धार्मिक आचरणां व उदार विचारांमुळे आदर्श साधु म्हणविले गेले. एकदा त्यांनी श्राद्धाचे अन्न एका भंग्याला खावयास देऊन दिले यावर ब्राह्मण कोपले तेव्हां एक अपूर्व चमत्कार दाखवून त्यांनी सगळ्यांना संतुष्ट केले होते. आपल्या उदार विचारांनी व आदर्श आचरणानी एकनाथांनी समाजाला धर्माचे निश्चित स्वरुप दाखवून अस्पृश्याना देखील आत्मसात करुन कृतिमतेला दूर हाकलले.

तुकारामांनी पण मोठे उदार विचार प्रकट केले आहेत ः उंच नीच कांही, नेणे हा भगवंत। तिष्ठे भाव भक्त, देखोनिया।। अर्थात्‌ देव उच्च-नीच बघत नाही, भक्ताच्या भावनांनाच बघतो. अशाप्रकारचा उपदेश करुन समता व भक्तीचा प्रचार केला. आज देखील महाराष्ट्रात वारकरी पंथात भेदभावावांचून सगळ्यांचा समावेश होतो. याप्रकारे परकी सत्तेचे आधिपत्य आणि त्यांच्या सभ्यतेस रोखण्या करिता परधर्मींवर पण प्रभाव स्थापिण्याकरिता या संतांनी स्वभाषा, स्वधर्म व स्वदेशाच्या उचित स्थितिचे विवेचन करुन लोकांच्या मनात स्वराज स्थापित करण्याची आशा संचारून छत्रपती शिवाजी महाराजांकरिता कार्यक्षेत्र तयार केले होते.

छत्रपतींच्या भावी कार्याचे महत्व मुक्तेश्वरांनी अशाप्रकारे दाखविले आहे - साधलिया स्वराज्य संपत्ति। यज्ञीं देव तृप्त होती।। श्राद्धीं पितृगण अतिथि। अन्नदानें तोषती। जैसे कंटक मर्दावे पायी। तेंवी दुर्जन दंडावे।।

याप्रकारे ज्ञानेश्वरांपासून शिवाजी महाराजांच्या पूर्ववर्ती एकनाथ, तुकाराम सारख्या संतांनी अदमासे 300 वर्षांपर्यंत स्वधर्म व स्वाभिमानाच्या विचारांना प्रसृत करुन देशाची अद्‌भुत सेवा केली.

Saturday, September 13, 2014

हिन्दी दिवस 
निज भाषा हिन्दी

'मैं भारत से उसी प्रकार बंधा हुआ हूं, जिस प्रकार कोई बालक अपनी मां की छाती से चिपटा रहता है। क्योंकि, मैं अनुभव करता हूं कि वह मुझे मेरा आवश्यक आध्यात्मिक पोषण देता है। उसके वातावरण से मुझे अपनी उच्चतम आकांक्षाओं की पुकार का उत्तर मिलता है।" मातृभूमि के प्रति विशुद्ध (संस्कृतनिष्ठ) मातृभाषा हिन्दी में यह वचन और किसी के नहीं तो श्रीमन्‌ मोहनदास करमचंद गांधी के हैं जो उनके अपने पत्र यंग इण्डिया (young india)(6 अप्रैल 1921  April 6th 1921) में प्रकाशित हैं।

 तथापि, इतिहास को यदि 'इति-ह-आस" के रुप में देखा जाए तो कहना होगा कि, हिंदू-मुस्लिम एकता का गांधीजी का आत्यन्तिकता का भाव  इस चरमावस्था पर पहुंच चूका था कि, इस हेतु वे किसी बडे से बडे त्याग और बलिदान के लिए तत्पर हो चूके थे। गांधीजी की इसी दृष्टि ने 'हिन्दी" के स्थान पर 'हिन्दुस्तानी" को प्रतिष्ठित करके छोडा। और जब राजनीति प्रभावित भारतीय जीवन गांधी की आंधी के वशीभूत हुआ तो जैसाकि होता है सावरकरजी के तर्क को कि 'हमारी भारतीय भाषाओं में अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि के जो शब्द हैं, उन्हें ना तो हमने आत्मसात किया है, ना ही उन्हें अपनी भाषाओं में होनेवाले विभाषाओं के वे शब्द हमारी विजय के चिन्ह नहीं तो हमारी देह पर हुए प्रहारों के घाव हैं" को अनसुना कर दिया गया। ऐसे में सत्तर वर्ष पूर्व की वह हिन्दी जिसके वर्तमान रुप को हम नाममात्र के लिए भलेही हिन्दी कहें, पर यथार्थ में वह हिन्दुस्तानी है - हिन्दी, अरबी, फारसी का मिलाजुला रुप है। इतना ही नहीं तो उससे बढ़कर है। 'हिन्दुस्तानी" के रुप में जब मुक्त द्वार की नीति अपनाई गई तो स्वच्छंदियों ने उसमें अंग्रेजी भाषा के शब्द घुसेडने में किसी संकोच का अनुभव नहीं किया और उसी निःसंकोच भाव के फलस्वरुप आज क्या दूरदर्शन, क्या समाचार पत्र और क्या साहित्य सभी में एक संकर भाषा को देख, पढ़, सुनने पर समाज विवश है, फिर जीवन के सामान्य व्यवहार की भाषा का तो कोई प्रश्न ही नहीं। 

बानगी के लिए एक आयोजक के वचन देखिए - 'देवियों और सज्जनों, आज के प्रोग्राम के चीफ गेष्ट मिष्टर .... का भाषण आपने सांति से सुना इसलिए हम आपके तहेदिल से शुक्रगुजार हैं।" अपने इन्हीं भावों को आयोजक इन शब्दों में व्यक्त कर सकते थे - 'देवियों और सज्जनों, आजके कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सम्माननीय....  के विचार आपने शांतिपूर्वक सुने इस हेतु हम आपके ह्रदय से आभारी हैं।" ऐसा करने में किसी भाषा की उपेक्षा, अपमान का कोई प्रश्न ही नहीं। सभी भाषाओं का अपना-अपना क्षेत्र होता है, वहां उनका प्रयोग होना चाहिए। स्पष्ट है कि इस प्रकार यथासंभव शुद्ध भाषा का प्रयोग किसी अन्य समाज या भाषा के विरोध या अपमान के लिए नहीं तो अपनी भाषा पर गर्व के अस्मिता भाव से करने का आग्रह है, दुराग्रह नहीं। 

गांधीजी ने राष्ट्रभाषा के जो पांच प्रमुख लक्षण बताए हैं उनमें तीसरा लक्षण उस भाषा का अधिकतर लोगों द्वारा प्रयोग। वीर सावरकरजी ने भी हिन्दी के राष्ट्रभाषा होने के प्रमाण में यही कहा है कि समग्र रुप में हिन्दी भाषा सम्पूर्ण भारत के बहुजन समाज में अन्य किसी भी भाषा से अत्यधिक प्रमाण में बोली जाती है, समझी जाती है और लिखी जाती है। हिन्दी के राष्ट्रभाषा होने का एक अन्य महत्वपूर्ण तत्त्व यह भी है कि यह किसी विदेशी, विधर्मी, विजातीय, संस्कृति द्वारा हम पर थोपी नहीं गई है अपितु इसी भूमि की प्राचीन सम्पन्न भाषा संस्कृत से इसका उद्‌भव हुआ है। संस्कृत से प्राकृत भाषाओं के उद्‌भव का इतिहास लगभग एक सहस्त्र वर्ष तक पीछे जाता है। वैसे हिन्दी भाषारुपी सरस्वती की सुप्त धारा की शोध की जाए तो कुछ आश्चर्यजनक तथ्य इस प्रकार प्रकट होता है कि जैन और बौद्ध मत के प्रचारक जब इनके उद्‌भवस्थल पूर्वी भारत से ठेठ दक्षिणी भारत पहुंचे तो ईसा की द्वितीय शती से छठी शती के उस काल में जैन बौद्ध मत के मूलतः पाली, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के साहित्य ने उत्तर तथा दक्षिण में भाषा सेतु का महनीय काम किया। उसी प्रकार आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य और मध्वाचार्य जैसे आध्यात्मिक चिन्तकों के देशाटन से भाषाएक्य का सूत्र प्रबल बना। क्या आश्चर्य की शताब्दियों पूर्व दक्षिण की इन महान विभूतियों की विचारधाराओं का निरुपण हिंदी साहित्य में हुआ। 

भारत के लिए एक सम्पर्क भाषा के रुप में अंग्रेजी को अनिवार्य बतानेवालों को यह कौन बतलाए कि उस प्राचीनकाल में दक्षिण द्राविडभाषी जन तीर्थाटन हेतु अविरतरुप से उत्तरी भारत आते थे और तत्कालीन प्राकृत भाषाओं के माध्यम से ही उनका संवाद सम्पर्क निर्बाध रुप से होता रहता था।  यहां तक की मुस्लिम आक्रमण और शासनकाल के आरंभिक दिनों में मुसलमानों ने भी हिन्दी को संपर्क भाषा के रुप में अपनाया। और यह भी इतिहास ही है कि इन्हीं मुस्लिम आक्रांताओं के साथ हिन्दी तब दक्षिणी हिन्दवी, खडी बोली के रुप में दक्षिण में भावाभिव्यक्ति का माध्यम बनी। 

भारत की एक राष्ट्रीयता की धारणा के अनुसार ही एक राष्ट्रभाषा की भावना भी समय के साथ स्पष्ट हुई। राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय आदि ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के पद पर प्रतिष्ठित करने की भावना को सर्वप्रथम अभिव्यक्ति देकर मानो इस पुनीत घोषणा करने का सम्मान बंगाल को प्राप्त करा दिया। 1905 में नागरी प्रचारिणी भाषा सभा काशी के तत्वाधान में आयोजित सम्मेलन में लोकमान्य तिलक ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और देवनागरी लिपि को राष्ट्रलिपि घोषित किया। और इस प्रकार इस राष्ट्र की स्वतन्त्रता को प्राप्त करने हेतु चलायमान संघर्ष में मानो एक उमंग भर दी। 1910 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना के साथ ही राष्ट्रभाषा और राष्ट्रलिपि की प्रतिष्ठापना हेतु संगठित प्रयास आरम्भ हुए।

1918 में गांधीजी की अध्यक्षता में इन्दौर में सम्पन्न हिन्दी साहित्य सम्मेलन के आठवे अधिवेशन के साथ ही दक्षिण भारत में हिन्दी प्रसार यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। 1937 में राजगोपालाचारी का अन्तरिम शासन जब तमिलनाडु अर्थात्‌ तत्कालीन मद्रास प्रांत में था तब उन्होंने पूरे प्रांत में माध्यमिक स्तर तक विद्यालयों में हिन्दी को अनिवार्य विषय बना दिया था। इस प्रकार तब राष्ट्रभाषा समझी जानेवाली हिन्दी का रथ अबाध गति से दौड रहा था। दाल में काला उजागर तब हुआ जब देश के स्वतंत्र हो जाने पर संविधान सभा की राष्ट्रभाषा समिति की बैठक में 12 दिसम्बर 1949 को राजभाषा के प्रश्न पर हुए मतदान में हिन्दी के पक्ष-विपक्ष में समान मत आने पर डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के अध्यक्षीय मत से हिन्दी विजयी हो पाई। वैसे 1944 में तमिलनाडु में ई. पी. रामस्वामी नायकर जो मूलतः हिन्दी समर्थक और सेवक थे के द्वारा द्रविड कषगम पार्टी का गठन और उसके तत्वाधान में 'रेस्पेक्ट मूवमेंट" चलाकर पहली बार हिन्दी विरोध का शंखनाद किया। इस हिन्दी विरोध के पीछे नायकर का तर्क यह था कि हिन्दी के प्रबल होने से दक्षिण पर ब्राह्मणों और उत्तर भारतीयों का शासन हो जाएगा। सी. एन. अन्नादुराई ने तो हिन्दी विरोध को ही प्रमुख प्रश्न बनाते हुए द्रविड कषगम से अलग द्रविड मुनेत्र कषगम की स्थापना की थी और दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में हिन्दी विरोध प्रबलतम हो गया था। फिर भी संविधान समिति में जो स्थिति उजागर हुई थी वह अकल्पनीय थी।

हमारे संविधान के भाग 17 अनुच्छेद 343 में हिन्दी को राजभाषा मानते हुए यह निश्चय किया गया कि हर पांच वर्ष में एक-एक आयोग इस तरह तीन आयोग बनाकर 1965 तक हिन्दी और अंग्रेजी का समानान्तर स्वरुप चलाते हुए उस वर्ष अंग्रेजी को बिदा किया जाए। पर लगता है सहेतुक रुप से ढ़ील दी गई और 1963 में एक नवीन राजभाषा विधेयक के माध्यम से यह निर्णय किया गया कि जब तक हिन्दी अंग्रेजी का स्थान लेने में सक्षम नहीं हो जाती अंग्रेजी चलती रहेगी और 1967 में राजभाषा विधेयक में एक संशोधन के द्वारा यह प्रावधान कर दिया गया कि जब तक एक भी अहिन्दी भाषा राज्य चाहेगा संघ शासन का कार्य अंग्रेजी से चलता रहेगा। इस प्रकार जनतन्त्र की घुमावदार गलियों में हिन्दी को घुमाफिराकर लगता है मूलस्थान पर पहुंचाने की चेष्टाएं चल रही हैं। हिन्दी के साथ इस तरह का खिलवाड राजनीति द्वारा किया जा रहा है तो उधर हिंदी सेवी कहलानेवाले अपना सम्मान करवाने तथा अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियां बताने में लगे रहे और हिन्दी के प्रति अपना दायित्व नहीं निभाया। परिणामतः एक समय बना हिन्दी का माहौल जाता रहा और नवीन पीढ़ियां स्वार्थवश अंगे्रजी की ओर पग बढ़ा रही हैं। अपनी रानी बिटिया को गुलाब को पिंकी, गुडिया को डॉली, सोनिया को गोल्डी बनाकर स्वयं मम्मी-पापा बना रही है।

कहना अनावश्यक है कि राष्ट्रभाषा कहलाए जानेवाली हिन्दी के संबंध में अनेक प्रमाण जो हम विस्तारभयावश दे नहीं रहे हैं यह सिद्ध करते हैं कि स्थिति चिंताजनक और चिंतनीय है। परंतु, स्थिति चिंताजनक है कहकर मुंह लटका कर बैठने हताश होने से कोई सुधार सम्भव नहीं और जो कुछ सम्मुख है उसे कोसने से समस्या का समाधान तो निकलनेवाला है नहीं। समस्या का समाधान तो यही है कि निज भाषा हिन्दी की उन्नति और उत्थान के लिए यथार्थ में राष्ट्रभाषा में रुप में हिन्दी को सम्मानित स्थान दिलवाने के लिए नए सिरे से कार्य प्रारम्भ किया जाए। 'गतं न शोच्य" की भावना से एक नई पट्टी पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा की गरिमा प्रदान करने का श्रीगणेश करें।