Friday, November 28, 2014

हिंदुस्थान ही नहीं सारा विश्व ही परेशान है ढ़ोंगी गुरुओं की महामारी से
रामपाल की भयानक करतूतों का पर्दाफाश होने के बाद समाज में तीव्र प्रतिक्रिया हुई जो कि स्वाभाविक भी थी। कई लोग यह प्रतिक्रिया देते नजर आए कि ऐसे पाखंडी साधु-महाराज, पीर-फकीर अपने घिनौने कारनामे केवल इस देश में ही अंजाम दे सकते हैं। मानो विदेशों में ऐसे पाखंड फैलानेवाले संप्रदाय, धर्मगुरु हैं ही नहीं या ऐसा वहां कुछ होता ही नहीं है। यह एक बहुत बडी गलतफहमी है। अंधविश्वास, अंधश्रद्धा हर देश में व्याप्त है जो केवल कम या अधिक हो सकती है। दूर क्यों जाएं? हमारे पडौसी देश पाकिस्तान में ही पीरों ने गजब की उधम मचा रखी है। जो क्रूर, अमानवीय, अत्याचारी कुकर्मों द्वारा भयानक अंधेरगर्दी उन्होंने मचा रखी है वह जानना हो तो, तहमीना दुर्रानी की 'ब्लॉस्फेमी" पढ़ लें, रोंगटे खडे हो जाएंगे। 

तहमीना दुर्रानी पाकिस्तानी पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री मुस्तफा खर की आठवीं पत्नी थी और एक सुंदरी से विवाह करने के लिए तहमीना को खर ने तलाक दे दिया था। इन पीरों की करतूतों का विवरण तहमीना ने 'ब्लॉस्फेमी" में किया है। तहमीना की लेखनी के माध्यम से पीर की पत्नी बार-बार कहती है कि पीर अल्लाह का नाम लेकर खतरनाक शैतानों का जीवन जीता है। हालांकि यह सब एक उपन्यास की तरह लिखा गया है लेकिन तहमीना पाकिस्तान की ऐसी पहली लेखिका है जिसने इन पीरों का कच्चा चिट्ठा खोला है। ये पीर किस प्रकार राजनीति-सत्ताकेंद्रों को प्रभावित करते हैं और किस प्रकार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तक इन पीरों का आशीर्वाद लेने के लिए इनके डेरों पर जाते हैं यह सब हमें पता चलता है। यह पूरी पुस्तक पढ़कर जुगुप्सा ही पैदा हो जाती है कि  आखिर ये पीर इंसान हैं या शैतान। जो अपने विरोधियों को इस्लाम का दुश्मन बडी आसानी से करार देते हैं। अब तो कई पाकिस्तानी लेखक इन पीरों को बेनकाब करने के लिए आगे आ रहे हैं। परंतु, इन पीरों की दुकानें बदस्तूर जारी ही हैं। पाकिस्तान के कई अमीर, उद्योगपति, व्यापारी, जमींदार और मंत्री तक इन पीरों के अनुयायी हैं।

संप्रदायों के गुरुओं के इंफेक्शन से उन्नत, विज्ञान-बुद्धिवाद से लैस कहे जानेवाले पाश्चात्य देश तक पीडित हैं। स्वीटजरलैंड के आल्प्स पर्वतीय क्षेत्र के चेरी नामक गांव में अक्टूबर 1994 में चर्च जैसे दिखनेवाले एक फार्म हाउस से पुलिस ने जली हुई लाशें निकाली थी। कुछ के चेहरे प्लास्टिक की थैली में लपेटे हुए थे एवं कुछ को गोली मारी गई थी। 1994 से 1997 तक स्वीटजरलैंड के अलावा कनाडा के एक शहर में भी 74 लोगों ने अपनी जान दी। ये सभी 'ऑर्डर ऑफ सोलर टेंपल" नामक पंथ के सदस्य थे। इनमें कुछ आत्महत्याएं भी थी तो कुछ हत्याएं।

अमेरिका के केलिफोर्निया के 'हैवन्स गेट" इस संप्रदाय के 40 अनुयायियों ने इस शरीर से मुक्ति पाने के लिए अपनी जान दे दी जिससे कि वे आत्मा को एक अमर यात्रा पर ले जा सकें। कुछ पुरुषों ने तो वंध्याकरण तक करवा लिया था जिससे मृत्यु पश्चात उन्हें लिंगभेद से मुक्ति मिल जाए। टेक्सास राज्य के वाको शहर के समीप एक पशु पालन केंद्र को अमेरिकी सेना ने इस जानकारी पर कि यहां ईसाई धर्म के 'सेवन्थडे एडवेंस्टिस" पंथ से अलग होकर नया पंथ बनानेवाले और स्वंय को पापी परमेश्वर करार देनेवाले डेविड कोरेश और उनके शिष्य छुपे हुए हैं। डेविड का कहना था कि उसके संप्रदाय में शामिल होने के लिए कुंआरी युवतियों को शरीर संबंध स्थापित करना अनिवार्य है। वास्तव में ऐसे धर्मवादी नेता अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को करीब-करीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते हैं और वे असहाय हो उनके बताए रास्ते पर चल पडते हैं। सरकार को उसकी अश्लीलता पर पहले से ही संदेह था इसलिए सेना ने उसकी घेराबंदी कर दी। उसने अपने शिष्यों को बतलाया कि गोली और बम से मारे जाने पर वे सीधे 'स्वर्ग" जाएंगे। अंततः सारे के सारे 84 लोग गोलाबारी और बमबारी में मारे गए।

इसी प्रकार का एक और वाक्या गुआना में भी हुआ था जहां जिम जोन्स नामक व्यक्ति ने स्‌न 1955 में स्थापित 'पीपल्स टेंपल" में 18 नवंबर 1978 को उसने अपने समस्त शिष्यों को आत्मघात का क्रांतिकारी निर्देश दिया था। जिसका टेप मिला था। इस टेप में वह वार्तालाप था जिसमें उस सामूहिक आत्महत्या का जिक्र था जिसके द्वारा उन लोगों ने जहर पीकर या अन्य तरीके से आत्महत्याएं की थी। उनको प्रेरित करनेवाला व्यक्ति था जिम जोन्स जिसने उनसे कहा था कि हमें गरिमा के साथ मरना है। अनुयायियों के रोने पर उसने कहा ऐसे रोकर मरेंगे तो हमें सामाजिक कार्यकर्ता या साम्यवादी के तौर पर कभी भी याद नहीं किया जाएगा। इन वीभत्स लाशों के पाए जाने पर पूरी दुनिया में खलबली मच गई थी।

क्रिश्चनिटी में भी अनेक पंथ-संप्रदाय हैं। रेवरंड सून म्यूंग मून को उनके अनुयाय साक्षात ईश्वर मानते हैं। यह कोरियन ईसाई गुरु एक धार्मिक नेता होने के साथ मीडिया मोगल (प्रभावशाली व्यक्ति) भी है। इसके अनुयायियों को 'मूनीज" कहते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की जीत का श्रेय भी इसने लिया है। यह संप्रदाय गुप्त रुप से काम करता है और खतरनाक रुप से दिमाग को नियंत्रित करनेवाले संप्रदाय के रुप में जाना जाकर इसके लाखों अनुयायी और इसके पास करोडों डालर हैं। इसी तरह का एक और चर्च है 'यूनिवर्सल एंड ट्रायफंट" (कट) (2जुलाई 1973) इस चर्च की संस्थापक है एलिजाबेथ क्लेअर प्रोफेट (पैगंबर) के प्रोफेट पति मार्क ने 'समीट लाइटहाउस" की स्थापना की थी जो अब 'कट" का ही अंग है। यह संप्रदाय चर्चा में तब आया था जब इसने  80 के दशक में परमाणु युद्ध की भविष्यवाणी की थी।

इस पंथ के बारे मेें प्रसिद्ध विज्ञान लेखक रान हबर्ड ने 1950 में एक पुस्तक लिखी थी जिसकी लाखों प्रतियां बिकी थी। उनका कहना है लाखों डालर्स कमाने का सबसे बढ़िया तरीका है नए धर्म की स्थापना करना। जिस प्रकार से पत्रकार, राजनेता, समाजसेवक बनने के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं है, उसी प्रकार से 'गुरु" बनने के लिए भी किसी निर्धारित योग्यता की आवश्यकता नहीं है। धन कमाने का यह 'इंस्टंट" माध्यम है। अच्छा व्यक्तित्व, वाक्‌चातुर्य और थोडा सामान्य ज्ञान का होना गुरु बनने के लिए पर्याप्त है। अशिक्षित, अज्ञानियों के अलावा आज की इस भागमभाग भरी दुनिया में तनावों, मानसिक चिंताओं से त्रस्त लोग भी बहुत हैं और जिन्हें जहां कहीं भी थोडी शांति मिलने की संभावना नजर आती है वहां वे खींचे चले जाते हैं। बस इन गुरुओं को और इन चेलों को भी ऐसों की ही तो तलाश रहती है बस इस चक्कर में सभी मालोमाल हैं। 

उपर्युक्त कथित घटनाक्रमों पर से ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सभी धर्मों में ऐसे ही शैतानी गुरु होते हैं। जो अपने शिष्यों-अनुयायियों का अवांछित शोषण विभिन्न तरीकों से करते हैं। अच्छे-बुरे लोग, धर्मगुरु और उनके अच्छे-बुरे कार्य भी हर धर्म में करनेवाले होते ही हैं। लेकिन इन राक्षस गुरुओं व इनके इन अवांछित क्रियाकलापों के कारण अच्छे जनहितैषी कार्य करनेवाले धर्मगुरुओं के कार्यों में जरुर बाधाएं उत्पन्न हो जाती हैं और शक्की मिजाज लोग इनके अच्छे कार्यों को भी गलत नजरों से देखने से बाज नहीं आते।
समाज को इन तथाकथित अवतारी और चमत्कारी गुरुओं से सावधान करने के लिए सन्‌ 1995 में दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय रेशनलिस्ट कांफ्रेस भी हो चूकी है। जो जनता में जागरुकता लाने का कार्य कर रही है। वैसे भारत में वैदिककाल से ही वेद-उपनिषदों को माननेवाले तो लोकायतिक (चार्वाकवादी) दोनो ही रहे हैं। फिर भी हम अंधश्रद्धाओं में डूबे हुए हैं। समाज को हिला देनेवाले खुलासों द्वारा जो अवैज्ञानिक क्रियाकलाप और अंधश्रद्धाओं का उदात्तीकरण पूरे विश्व में चल रहा है की जानकारी देने के लिए हैरी एडवर्डस्‌ जो ब्रिटिश सिक्रेट एजेंसी में थे ने सन्‌ 2006 में एक पुस्तक 'स्केप्टिक्स गाईड" में 107 अध्यायों के द्वारा अंधश्रद्धाओं की अच्छी खबर ली है। इस पुस्तक के अंतिम अध्याय में लेखक के अंधश्रद्धा और वैज्ञानिकता के परिणाम इस विषय में प्रस्तुत विचार चिंतनीय होकर गहरी तंद्रा में लीन समाज की आंखे खोल देने के लिए पर्याप्त हैं। 

Saturday, November 22, 2014

बढ़ता ही जा रहा है ढ़ोंगी गुरुओं का तिलिस्म

लगभग दो सप्ताह चले अभियान और करोंडों रुपये खर्च होने के बाद तथाकथित गुरु रामपाल महाराज ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उसे राष्ट्रद्रोह, हत्या आदि सहित कई धाराओं के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश करने के पश्चात जेल भेज दिया गया है। इसी के साथ फिर से ढ़ोंगी साधुओं, बाबाओं, महाराजाओं, गुरुओं के कारनामे चर्चा में आ गए। आश्चर्य है कि 21वीं सदी में जहां विज्ञान चरम की ओर बढ़ रहा है वहीं इन नकली गुरुओं की देश में बाढ़ सी आ गई है।

किसी समय जिनके बडे जलवे हुआ करते थे लेकिन बाद में जिनको जेल यात्राएं करना पडी, कुछ तो अभी भी जेल में ही हैं, ऐसे तथाकथित धर्मगुरुओं के चित्रों सहित उनके कारनामों का स्मरण भी मीडिया नेे मौके का फायदा उठाकर लगे हाथ हमें करवा दिया। जैसेकि आसाराम, चंद्रास्वामी, बाबा रामरहीम आदि। अब समाचार पत्रों में रामपाल के कुकर्मों, उसकी संपत्ति, उसके आश्रम में पाई गई अय्याशी की सामग्रियों के बारे में जमकर छापा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि इन गुरुओं, बाबाओं ने जो स्वंय परमेश्वर होने का दावा करते हैं ने अपना साम्राज्य एक रात में तो फैला नहीं लिया! अब रामपाल सहित जिन बाबाओं के समाचार  छापने की होड सी मची है। जब अपने पाखंड का जाल फैलाकर अपनी ताकत बढ़ा रहे थे उस समय तो सभी चुप्पी साधे बैठे रहे।

वास्तव में इन ढ़ोंगी महाराजाओं के पीछे होता है दादा (माफिया), पूंजीपति, स्वार्थी-सत्तालोलुप राजनेताओं का समर्थन और जब अति हो जाती है तथा इन गुरुओं का बचाना असंभव सा हो जाता है या इस चौकडी में फूट पड जाती है तभी वास्तविकता सामने आने लगती है। यह सोच पूरे समाज में पूरी तरह से व्याप्त है अन्यथा तो क्या मीडिया और क्या बुद्धिजीवी एवं जनता के समझदार लोग सब डर, स्वार्थ और हमें क्या की मानसिकता के चलते जानकर भी अनजान बने रहते हैं। कई बार तो मीडिया के बहुत बडे वर्ग का हित भी इस गठजोड से सधते रहता है यह भी एक कारण है।

भारत की धर्मभीरु जनता (शिक्षित-अशिक्षित दोनो ही) अज्ञान, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा के जाल में बुरी तरह फंसी हुई है। गांव-गांव में भूतबाधा, असाध्य बीमारियों के इलाज, गुप्तधन प्राप्ति, मनचाही संतान की चाह एवं कई कुरीतियों के नाम पर अनेकानेक ढ़ोंगी साधु-बाबा-तांत्रिक अमानवीय क्रूरकर्म, नरबलि सहित इनके साथ करते रहते हैं। जिनके कारनामे पकड में आने पर समय-समय पर छपते ही रहते हैं। लोगों को फुसलाने के लिए अधिकांशतः ये ढ़ोंगी चमत्कार दिखलाने के साथ ही मुफ्त रहवास, उनके संप्रदाय में रोजगार के नाम पर सेवा-चाकरी और प्रचार का काम करवाते हैं एवं मुफ्त भोजन-भंडारे का भी सहारा लेते हैं।  दकियानूसी विचारों के पीलिया से अनेक वर्षों से ग्रस्त हमारे समाज में हो चूके अनेक समाज सुधारकों के डोज हजम नहीं हुए तभी तो आज परमाणु युग में भी जनता का झुकाव विध्वंसक, घातक अंधश्रद्धाओं की ओर ही है।

इन अंधश्रद्धाओं और ढ़ोंगी बाबाओं के तिलिस्म में फंसे लोगों का मजाक उडाने, उन पर तरस खाने की अपेक्षा सामाजिक दृष्टि से घातक अंधश्रद्धाओं के संहार के लिए विज्ञानवादी, तार्किक-बुद्धिनिष्ठ, विवेकशील दृष्टिकोण की जडें समाज में जमाना आवश्यक है। इसके लिए जनशिक्षा और सामाजिक प्रबोधन पर बल देना होगा। शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शास्त्रीय विश्लेषण सीखानेवाली चिकित्सक प्रवृत्ति निर्मित करने, उसको बढ़ावा देने पर बल देना पडेगा(उदाहरण के लिए प्रेमचंद की कहानियां)। देश के विकास एवं प्रगति के लिए अंधश्रद्धा निर्मूलन आवश्यक है चाहें तो इसके लिए कानून बनाएं और समाज को इन ढ़ोंगी गुरुओं, बाबाओं से बचाना समय की मांग है। इस संबंध में यह कहावत बहुत सटीक है जो नारु उन्मूलन के दौर में सरकार ने प्रचारित की थी - 

'पानी पीयो छान के, गुरु करो जान के।""

Tuesday, November 18, 2014

विश्व शौचालय दिवस विशेष 19 नवंबर
जीवन के अभिन्न अंग हैं ः शौचालय एवं स्वच्छता 
 
शौचालय के महत्व, उसकी आवश्यकता, कमी एवं इसके प्रति उपेक्षा को देखते हुए इस समस्या के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित हो इसके लिए 19 नवंबर को विश्व-शौचालय दिवस मनाने का निर्णय संयुक्त राष्ट्र संघ ने लिया है। भारत में तो यह विषय सर्वाधिक उपेक्षित था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस गंभीर समस्या की ओर सरकारों का ध्यान गया है और पहले जयराम रमेश और फिर प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने स्वच्छता एवं शौचालय इस विषय को 15 अगस्त को लाल किले से भाषण देते समय उठाकर सर्वाधिक चर्चित कर दिया है। 

फिर मोदी ने 2 अक्टूबर गांधी जयंती पर स्वच्छ भारत का अभियान छेड इस मुद्दे को जन चर्चा का विषय बना लोगों को जागरुक बनाने का अभियान 9 लोगों को जोडो कर कर दिया और इसका अच्छा प्रतिसाद सेलेब्रिटिज की ओर से भी आया है। वैश्विक हस्ती बिल गैट्‌स ने भी मोदी की शौचालयों की प्रतिबद्धता के लिए अपने ब्लॉग पर भूरी-भूरी प्रशंसा की है। वैसे इसके परिणाम आने में समय लगेगा अभी हाल फिलहाल तो कोई विशेष फरक नजर आया नहीं है। क्योंकि इस विषय में सर्वाधिक बडी बाधा स्वयं जनता ही है और जब तक उसकी मानसिकता नहीं बदलेगी तब तक भरपूर सफलता मिलना असंभव सा ही है। 

इसके उदाहरण स्वरुप पंजाब के सामुदायिक शौचालयों का उल्लेख किया जा सकता है जिनका निर्माण तो कर लिया गया परंतु, उपयोगकर्ता ही गायब हैं। महाराष्ट्र में भी लाखों शौचालय बने हैं और इतने ही गायब भी हैं, क्योंकि कइयों का उपयोग तो ग्रामीण जन भूसा रखने के लिए कर रहे हैं। कई सार्वजनिक शौचालयों की दुर्दशा, दुरुपयोग, टूटफूट तो साधारण बात है। परंतु, हद तो तब हो जाती है जब कार्यालयों में मालिकों या अधिकारियों को उनके वाश रुम के दुरुपयोग, दुर्दशा की शिकायतें मिलती है और सफाई कर्मी आकर शिकायत करते हैं कि अपने कर्मचारियों को शौचालयों का उपयोग करना तो सीखाइए। इस मामले में तो शिक्षित-अशिक्षित दोनो ही एक समान हैं। एक परामर्शदाता अभियंता के कार्यालय में जो स्वयं अपने शौचालयों की स्वच्छता का मुआयना करते हैं के अनुसार उन्होंने उनके कार्यालय में स्वयं एक इंजीनिअर को वाशबेसिन में तम्बाखू-सुपारी थूकते रंगे हाथों पकडा उनका कथन है कि जो सफाईकर्मी इस गंदगी को हाथ से साफ करता है क्या वह इंसान नहीं है? हालात यह हैं कि लोग डस्टबीन और पीकदान में फर्क ही नहीं समझते और डस्टबीन में ही थूक देते हैं यह भी एक कार्यालय और दुकानदार की शिकायत मैंने सुनी है। 

इसी समय यह बतला देना उचित होगा कि किसी भी व्यक्ति को घिन जो आती है वह गीली गंदगी की किंतु, कई लोग जो बडे जोर-शोर से सडकों पर कचरा उठाते, सफाई करते फोटो छपवा रहे हैं वे केवल सूखा कचरा उठाते ही नजर आते हैं, गीला नहीं। जबकि मोदी ने दिल्ली के पुलिस स्टेशन पर स्वच्छता की थी उसमें गिली गंदगी भी थी। कचरे की ही जब बात चली है तो इंदौर के एमटीएच कंपाउंड में सेंट्रल कोतवाली के पीछे स्थित सरकारी मकानो की हालत यह है कि उनकी खुली नाली में मल तैरते हुए मिल जाएगा और कचरे का ढ़ेर अलग ही है। जबकि सामने ही स्वास्थ्य विभाग का कार्यालय भी है, निकट ही प्रेस क्लब भी है।

लोगों की मानसिकता बयान करने के लिए एक और उदाहरण है स्कीम 78 नं का। वहां स्थित एक प्लाट खाली पडा है जहां लोग कचरा फैंक जाते हैं वहां का जागरुक पार्षद अवश्य समय-समय पर कचरा गाडी भेजकर कचरा उठवाता रहता है लेकिन लोग ऐसे हैं कि कचरा उठते समय कचरा न तो कचरा गाडी में डालते हैं न ही उस स्थान पर जहां कचरा उठाया जा रहा है। वे कचरा उस स्थान पर डालते हैं जो साफ हो चूका है वह भी निगम कर्मियों के सामने ही और इसी प्रकार के लोग नगर निगम को आगे बढ़कर कोसते नजर आ जाएंगे। इस प्रकार के दृश्य कहीं भी देखे जा सकते हैं।

कुछ लोगों का कथन है कि यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही स्वच्छता अभियान चलाया जाता तो शायद स्थिति वह ना होती जो आज नजर आ रही है। कहने को तो यह कथन बडा आकर्षक लगता है परंतु, इस संबंध में मेरा कहना यह है कि उस काल की परिस्थितियों पर तो गौर करें। उस समय जातिवाद चरम पर था, लोगों की शिक्षा दर मात्र 18 प्रतिशत थी और लोगों की मानसिकता यह थी कि सफाई कार्य करना सफाई कर्मियों का ही काम है। आज भी इस संबंध में मानसिकता कुछ विशेष बदली नहीं है भले ही शिक्षा का प्रतिशत बढ़कर 74 हो गया है। इस कारण इस तरह की बातें करना व्यर्थ सा ही लगता है। (गांधीजी और उनके शिष्यों ने जरुर इस संबंध में उल्लेखनीय कार्य किया जो एक अलग लेख का विषय है) हां एक प्रगति अवश्य हो गई है वह है विभिन्न शब्दों के प्रयोग की- संडास, लेट्रिन से होते हुए टॉयलेट और अब वॉशरुम कहलाने लगे हैं बस। शौचालय शब्द का प्रयोग तो आमजनता कम ही करती है और यह तो समाचार पत्रों में प्रयुक्त किए जानेवाला शब्द है एवं स्वच्छता गृह शब्द तो लगभग चलन में ही नहीं है। 

हमारी नगरपालिकाओ की नीति शौचालयों-मूत्रालयों के संबंध में कुछ ऐसी है कि वे स्वयं होकर इनका निर्माण करने में अग्रणी नहीं होते जब समस्या गंभीर हो जाती है, जनता त्रस्त हो जाती है, समाचार पत्रों में समाचार छपने लगते हैं या किसी क्षेत्र विशेष के रहवासी अश्लीलता, गंदगी एवं दुर्गंध से बेजार हो जाते हैं और जनता आंदोलन पर उतारु हो जाती है तब जाकर कहीं इनके निर्माण की ओर इनका ध्यान जाता है। वास्तव में शौचालयों का निर्माण आबादी के मान से किया न जाकर इसमें भी तुष्टीकरण की नीति अपनाई जाती है। जहां 10 की आवश्यकता है वहां दो का ही निर्माण कर तुष्ट करने की कोशिश की जाती है। बरसों से यही सिलसिला चला आ रहा है। शहरों की आबादी बढ़ती ही चली जा रही है, मूत्रालयों की आवश्यकता भी उसी अनुपात में बढ़ रही है परंतु, कई वर्षों से उनके विस्तार की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है (अक्सर बडे शहरों एवं घनी आबादीवाले क्षेत्रों जैसकि बस, रेल्वे स्थानकों आदि पर लोग कतारों में खडे दिख पड जाते हैं) बल्कि जो हैं उनमें से भी कई को गायब कर दिया गया है। निर्माण भी अव्यवस्थित ढ़ंग से होता है कहीं-कहीं तो ढ़ाल उल्टा ही दे दिया जाता है, पार्टीशन की ऊंचाई रखते समय सामान्य बुद्धि तक का प्रयोग नहीं किया जाता। कहीं ड्रेनेज ही नहीं है फिर भी निर्माण और उपयोग भी प्रारंभ कर दिया जाता है, कहीं व्यापारी अपने लाभ के लिए उन्हें तोड देते हैं, उन पर अतिक्रमण कर लेते हैं। लगता है मूत्रालयों के निर्माण का कोई मानकीकरण ही नहीं किया गया है। यह भी देखने में आ रहा कि रेल्वे जो अपने निर्माण में गुणवत्ता का ध्यान रखता है वहां भी अब शौचालयों के निर्माण में गुणवत्ता उपेक्षित हो गई है जबकि बातें बॉयो टॉयलेट की की जा रही हैं।

शौचालयों से जुडी और भी कई समस्याएं जिनका निराकण भी आवश्यक है जैसेकि 2019 तक लक्ष्य पूर्ति कैसे होगी? हम इतनी सीवरेज और सीवर शोधन यंत्र व्यवस्था किस प्रकार से कर सकेंगे, फ्लश के लिए पानी कहां से आएगा, आदि? कई स्थानों पर तो ढूंढ़े से भी शौचालय मिलते ही नहीं। जो बने भी हैं वे टूटे-फूटे पडे हैं उनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं। सबसे बडी बात यह है कि इस संपूर्ण चर्चा में केवल उपयोगकर्ता और निर्माण की ही बात की जा रही है परंतु, सफाईकर्मियों का पक्ष तो उपेक्षित, अनुल्लेखित ही है कि इतने प्रशिक्षित सफाईकर्मी आएंगे कहां से? वैसे सुलभ इंटरनेशल के बिंदेश्वर पाठक ने इस संबंध में सहायता का प्रस्ताव रखा है। फिर भी यह प्रश्न बचा ही रहता है कि इन सफाईकर्मियों को पर्याप्त सुरक्षा साधन भी तो लगेंगे, जो फिलहाल कार्यरत सफाईकर्मियों को ही उपलब्ध नहीं हैं तो, भविष्य के लाखों लगनेवाले सफाईकर्मियों को कहां से उपलब्ध हो पाएंगे और क्या यह काम जो लोग जन्मजात कर रहे हैं क्या वे ऐसे ही आजीवन करते रहेंगे?

 इस संबंध में उल्लेखनीय कार्य किया था अप्पा पटवर्धन ने जिन्हें कोंकण (महाराष्ट्र) का गांधी कहा जाता है जिन्होंने 'ब्राह्मण भंगी प्रभु संतान; सफाई पूजा एक समान" की घोषणा देते हुए मालवण में सफाई काम किया था। अप्पा के आत्मचरित्र 'माझी (मेरी) जीवन यात्रा" (कुल पृ. 740) की प्रस्तावना में काका कालेलकर लिखते हैं ः ''अस्पृश्यता-निवारण में भी अंत्योदय का तत्त्व स्वीकारना चाहिए, ऐसा कहनेवाला हमारा एक पक्ष है। और इसके लिए कम से कम मैला उठानेवाली जाति से पाखाने का काम छुडवाना ही चाहिए ऐसा कार्यक्रम भी सुझाया गया है। इस मामले में अप्पा ने अपने प्रयत्नों का चरम गांठा है।"" इसके लिए अप्पा ने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 'संडास-मूत्रालयों के नए-नए प्रयोग किए थे।" विनोबा भावे के शब्दों में 'हम दोनो महात्मा गांधी के आश्रम में थे। वे सफाई का काम करते थे और शिक्षक भी थे।" चूंकि उनके कार्य का जो महत्व है वह अलग से देना ही योग्य होगा इसलिए लेख को यहीं विराम देता हूं।

Saturday, November 15, 2014

इस्लाम एक बाह्याचारी धर्म ! !

मुसलमानी धर्म के पांच बाह्यांग हैं - नमाज, संगठन (उम्मा), धार्मिक दृष्टि से निषिद्ध वस्तुओं का त्याग, कुरान पठन और मक्का की यात्रा (हज)। बदलते समय के साथ मुसलमान इस संबंध में शिथिल होते चले गए हैं किंतु, बाह्याचार को आवश्यकता से अधिक महत्व देना कम नहीं हो सका है और अब वे इन उपर्युक्त बाह्यांगों पर अधिक बल देने के स्थान पर दाढ़ी, टोपी, बुरका, टखनों के ऊपर तक का पायजामा और घुटनों के नीचे तक का कुर्ता पहनने पर जोर देने लगे हैं फिर भले ही वे कितने भी अजीब क्यों ना दिखाई दें। 

यहां तक तो ठीक है परंतु, समस्या तब पैदा होती है जब वे अपना यह बाह्याचार दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं जैसेकि  कुछ माह पूर्व एक मौलाना द्वारा सार्वजनिक रुप से मोदी को टोपी पहनाने का प्रयास करना। इसी प्रकार से सन्‌ 1992 में केरल के त्रिचूर जिले के थ्रिसूर कस्बे में कैथलिक ईसाइयों द्वारा संचालित एक स्कूल में जिसमें 1700 से अधिक छात्र थे। जो मुस्लिम छात्र परीक्षा परिणाम संतोषजनक दे नहीं सके थे टोपी पहनकर स्कूल आ गए। इसे गणवेश के नियमों का उल्लंघन मान स्कूल प्रशासन द्वारा टोपी पहन कक्षा में ना बैठें या कक्षा से बाहर चले जाएं कहा। छात्रों द्वारा ना मानने के कारण स्कूल बंद कर दिया गया। स्कूल के हेडमास्टर और मैनेजर को सिर काटने की धमकी वाले पत्र भी भेजे गए। इन मुस्लिम छात्रों को टोपी पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति देने पर शेष छात्रों ने बहिष्कार कर दिया था और एक लंबे समय तक स्कूल बंद रहा था।

इसी से मिलते जुलते विवाद भारत ही नहीं अन्य देशों में भी मुस्लिमों द्वारा शैक्षणिक या अन्य संस्थानों या कामकाजी एवं सार्वजनिक स्थानों पर कभी बुरके तो कभी दाढ़ी पर से खडे किए जाते हैं। बुरके से इस्लाम की पहचान को जोडना या उसे शरीअत का स्तंभ मानना, फोटोयुक्त पहचान पत्र पर बेजा बहस करना, शर्तें डालना दकियानूसीपन है, कट्टरता है। यहीं नहीं इस दकियानूसीपन, कट्टरता के चरम का प्रदर्शन पश्चिमी देशों में भी किया जा रहा है। जो ब्रिटिश मुस्लिम सांसद के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. कलाम सिद्दीकी के हिजाब पर के कथन से पता चलता है वे कहते हैं ''जब हम पुरुष सडक पर चलते हैं तो हम भीड का हिस्सा मात्र होते हैं। जब हमारी महिलाएं हिजाब पहनकर सडक पर चलती हैं तो अपने साथ इस्लाम का झंडा लिए चलती हैं। वे एक राजनीतिक उदघोष करती हैं कि यूरोपीय सभ्यता हमें अस्वीकार्य है, कि यह एक रोग है, मानवता के लिए महामारी है। वे एक प्रकार से जेहाद का उदघोष करते चलती हैं।""(हिंदू वॉइस जुलाई 2007 पृ.13)  आखिर यह सब क्या दर्शाता है यही ना कि इस्लाम एक दिखावे का, बाह्याचारी धर्म है। 

यह बाह्याचार पर जोर मात्र अपनेआपको दूसरे धर्मावलंबियों से अलग दिखाने के लिए है। उदाहरण के लिए इस हदीस को देखें - मूंछ और दाढ़ी के बारे में पैगंबर कहते हैं ''बहुदेववादियों से उल्टा काम करो - मूंछे बारीक छांटों और दाढ़ी बढ़ाओ।"" इस हदीस का मंडन करते हुए हदीस के अनुवादक कहते है ः ''इस्लाम ने आस्था और सदाचार के आधार पर एक नया भाईचारा रचा। ... चेहरों की पहचान के लिए मुसलमानों को हुक्म दिया गया है कि वे मूंछे छांटें तथा दाढ़ी बढ़ाएं, जिससे कि वे उन गैर-मुस्लिमों से अलग दिखें जो दाढ़ी साफ रखते हैं और मूंछें बढ़ाते हैं। बालों को रंगने के बारे में पैगंबर कहते हैं ः यहूदी एवं ईसाई अपने बाल नहीं रंगते, इसलिए इसका उल्टा करो।" यहां तक कि नमाज के लिए अजान यानी नमाज के लिए बुलावा का तरीका भी यहूदियों, ईसाइयों एवं अग्निपूजकों से मुसलमानी व्यवहार को अलग बनाने के लिए पुकारने की व्यवस्था प्रचलित की गई।  

इस सब के संबंध में 'हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन" इस पुस्तक में पृ. 200,1 पर 'अंर्तमुखी भावना का अभाव" शीर्षक तले रामस्वरुप लिखते हैं - ''पैगंबर मुहम्मद की आचार संहिता में अंर्तमुखी भावना का भी अभाव है। उस संहिता में इस सत्य का संकेत तक नहीं मिलता कि मनुष्य का बाह्याचार उसके विचारों तथा उसकी आकांक्षाओं से उद्‌भूत होता है, और उसके विचार तथा उसकी आकांक्षाएं उसके अहंभाव तथा उसकी अविद्या में जड जमाए हुए हैं। यह माना कि पैगंबर से कई सौ साल पूर्व ही मध्य एशिया में बौद्ध धर्म का प्रसार हो चूकने पर भी पैगंबर मुहम्मद भारतीय योग पद्धति से अपरिचित रहे। किंतु जिस सामी परंपरा से उनका परिचय था और जिसको अनेक अंशों में उन्होंने अपनाया था, वह परंपरा अंर्तमुखी भावना से अपरिचित नहीं थी। उस परंपरा के ईसा मसीह ने उपदेश दिया था कि 'दुष्ट विचार, हत्या, व्यभिचार, झूठी गवाही और देवनिंदा का उदय 'ह्रदय में होता है।" किंतु पैगंबर मुहम्मद ने ईसा मसीह से कुछ नहीं सीखा। यह कहना पडेगा कि पैगंबर ने एक बाह्याचारी मजहब की स्थापना की। 
अंतर को शुद्ध किए बिना किसी श्रेष्ठ सदाचार की सृष्टि नहीं हो सकती। मजहबी निष्ठा कभी भी अंतर की शुद्धि, आत्मबोध और अंतर के सुसंस्कार का स्थान नहीं ले सकती। अशुद्ध ह्रदय तो मनुष्य की तृष्णा, हिंसा वृत्ति तथा कामुकता को ही आवृत कर पाती है। अशुद्ध ह्रदय निष्ठा का बाना ओढ़कर एक अल्लाह नामधारी ऐसे पिशाच की पंथमीमांसा ही प्रस्तुत कर सकता है जो काफिरों के खून का प्यासा रहता है। अशुद्ध ह्रदय में जिहाद, लूटखसोट और कर संग्रह की भूख ही भरी रहती है।

जहां दार्शनिक चिंतन का अभाव है और अंतर को सुसंस्कृत बनाने का अभ्यास नहीं किया जाता, वहां उदात्त भावों का उदय हो ही नहीं पाता। ऐसा मजहब हमारे ऊपर एक बाह्याचार ही लाद सकता है, और बाह्याचार के विरुद्ध हमारे अंतर में अनास्था और विद्रोह रहते हुए भी हमें उसका पालन करने के लिए विवश करता है।""  

यह कथन इसी बात को पुष्ट करता है कि इस्लाम एक बाह्याचारी धर्म बनकर रह गया है और जब तक मुसलमान अंतर्मुखी हो इस बात पर गौर नहीं करते और आचरण में नहीं लाते कि, पैगंबर ने मक्काकाल में हीरामठ (गुफा) में बैठकर जो चिंतन मनन किया था वह शांति और ज्ञान प्राप्ति के लिए ही किया था और जो कुरान की पहली पांच आयतें उन्हें प्राप्त हुई थी उसका पहला वाक्य ही है 'इकरा" अर्थात्‌ पढ़, पैगंबर की एक हदीस है 'ज्ञान प्राप्ति के लिए चीन भी जाना पडे तो जाओ", इस्लाम एक बाह्याचार पर जोर देनेवाला धर्म ही बना रहेगा। 

Thursday, October 30, 2014

छोडें मोदी का अंधविरोध और अंधश्रद्धा भी

नरेंद्र मोदी इस समय भारतीय राजनीति का ऐसा चर्चित चेहरा हैं जिसका डंका ने केवल देश में अपितु विदेशों में भी बज रहा है।  जिन्होंने अपने तौर-तरीकों, सूझबूझ और कार्यपद्धति से स्थापित राजनीति की मान्यताओं को ही बदल दिया है। लोकसभा चुनाव की अभूतपूर्व विजय के बाद जब उन्होंने सत्ता संभाली तब कुछ समय तक वे और उनके मंत्रीमंडल के सदस्यों ने चुप्पी सी साध ली थी। तब उनका मजाक उडाया जाने लगा कि मनमोहन तो अकेले ही मौनी बाबा थे लेकिन अब तो मोदी से लेकर उनके सारे मंत्री भी मौनी बाबा बन गए हैं। और अब जब मोदी मुखर हो गए हैं तो आलोचना की जा रही है कि पहलेवाला प्रधानमंत्री तो बोलता ही नहीं था और यह प्रधानमंत्री है कि बोलता ही चला जा रहा है। एक चर्चा यह भी की जा रही है कि इस प्रधानमंत्री ने तो एक नया ही धंधा चालू कर दिया है पहले खुद विदेश जाना फिर विदेशी मेहमानों को देश में बुलाना और रोज भाषण ठोकते फिरना। मतलब यह कि मोदी कुछ भी करें या ना करें वे चर्चा में बने ही रहते हैं। वैसे यह भी एक बडी उपलब्धी ही है कि एक लंबे समय तक बिना कोई पत्रकार वार्ता किए ही वे हमेशा हॉट टॉपिक बने रहे हैं।

कुछ लोग उनके हर कार्य को ही शक की नजर से देखने के आदि हैं। वे कुछ भी करें वे आलोचना करने में ही लगे रहते हैं। तो, कुछ लोग इतना भी करने की जहमत उठाना नहीं चाहते। वे तो सिर्फ आलोचना करने में ही व्यस्त रहते हैं। कुछ लोग उन्हें मुस्लिम विरोधी बताने में ही अपनी सारी ऊर्जा खर्च करते रहते हैं इसके लिए उनके पास सबसे बडा आधार होता है गोधरा कांड का। अब उन्हें एक नया आधार और मिल गया है कश्मीर का कि वे वहां दीपावली पर ही क्यों गए? ईद पर क्यों नहीं? यह लोग इस बात को समझ ही नहीं रहे हैं कि इस समय कश्मीर के बाढ़ पीडितों को आवश्यकता है उसकी जो उनकी पीडा को समझें, उन्हें सांत्वना दे और यही तो प्रधानमंत्री मोदी ने किया है। ये शकी, रात-दिन आलोचना करने में लगे लोग यह समझ ही नहीं रहे हैं कि इन हरकतों से वे अपरोक्ष रुप से मोदी ही की सहायता कर रहे हैं, उन्हें लाभान्वित कर रहे हैं और स्वयं को हार के मार्ग पर ले जा रहे हैं।

यदि उन्हें मोदी से इतनी ही खुन्नस है तो उन्हें चाहिए कि वे निरी आलोचना करते बैठे रहने की बजाए मोदी के भाषणों-वक्तव्यों-कार्यों का तथ्यात्मक विश्लेषण करें। उसमें की कमजोरियों को उजागर करें। यदि उन्हें लगता है कि उनके भाषणों-वक्तव्यों में अतिरेक है, कोई असत्य है तो उन्हें जनता के सामने लाएं साथ ही योग्य विकल्प भी प्रस्तुत करें अन्यथा मोदी तो इसी प्रकार से बडी-बडी घोषणाएं, कार्ययोजनाएं बडे-बडे मेगा शो के माध्यम से करते ही रहेंगे और जनता में अपनी पैठ मजबूत करते ही रहेंगे और ये आलोचक अगली हार के लिए फिर से शापित रहेंगे।

इन उपर्युक्त के अलावा एक बहुत बडा वर्ग मोदी के अंधश्रद्धों का भी है जिनका एक सूत्री कार्यक्रम यही चलता रहता है कि मोदी के भाषणों की कैसेट इधर-उधर बजाते फिरना। इसके बाद जो समय बच जाता है उसका सदुपयोग ये लोग कांगे्रस की आलोचना में लगा देते हैं। उनकी आलोचना का रुख कुछ इस प्रकार का रहता है कि मानो कांग्रेस ने पूरे देश का सत्यानाश ही फेर दिया है और जो कुछ अच्छा दिख रहा है उसकी शुरुआत मानो मोदी के आने के बाद ही हुई है और जो कुछ भी कमीपेशी नजर आ रही है उसकी जिम्मेदार कांग्रेस ही है। इन दोनो ही पक्षों का हाल यह है कि ये दोनो ही आपको अपने पक्ष में ही देखना चाहते हैं, तटस्थता की कोई गुंजाईश ही नहीं छोडी जाती वर्ना .... यह सब देख सुनकर माथा पीट लेने का जी करता है। 

मेरा इन अंधश्रद्धों से कहना है कि अपनी सारी ऊर्जा उपर्युक्त कार्य में नष्ट करने की बजाए वे अपनी कुछ ऊर्जा मोदी के स्वच्छ भारत के अभियान में लगाएं। गांधीजी के तो कई अनुयायी आजीवन सार्वजनिक स्वच्छता के काम में जुडे रहे थे। मुझे तो अभी तक  केवल एक ही मोदी भक्त (जिनसे मैं परिचित भी हूं) नजर आया है जो टीव्ही पर आनेवाले विज्ञापन एकला चालो एकला चालो एकला चालो रे की तर्ज पर अपने घर के अंदर ही नहीं तो बाहर अपने घर के आसपास भी स्वच्छता करते नजर आता है। वह भी बिना किसी प्रचार या स्वार्थ के। 

वैसे भी इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर रहा है कि मोदी ने देशवासियों के मन में आशा की किरण जगाई है, वे देश से निराशा का वातावरण दूर करने में भी कुछ हद तक सफल रहे हैं। परंतु, यह भी सच है कि कृषि क्षेत्र के हालात बदतर हैं, बाजारों में सन्नाटा छाया हुआ है, आर्थिक हालात अभी भी गंभीर बने हुए हैं के समाचार छप रहे हैं, आगे की राह कठिन है। बेहतर होगा कि शांत रहकर संतुलित प्रतिक्रियाएं जाहिर करें, मोदी के कार्यों का मूल्यांकन करने का अभी समय आया नहीं है, कुछ राह देखिए, जो कुछ वे कर रहे हैं उनका परिणाम तो आने दीजिए - जिसमें समय लगना स्वाभाविक है।  

Monday, October 27, 2014

आइएस द्वारा इराक में इस्लाम का इतिहास ही दोहराया जा रहा है

भारत, यूरोप से लेकर अमेरिका तक के युवा इनमें कई युवतियां भी शामिल हैं जिस रफ्तार से अल बगदादी और उसके आतंकी  संगठन आइएसआइएस की ओर आकर्षित हो रहे हैं उससे इस समय सारा विश्व आतंकित और भयभीत है। बगदादी के आइएस (इस्लामिक स्टेट) ने जिस बर्बरता से इराक के तिरकित शहर में 1700 लोगों को सामूहिक रुप से मौत के घाट उतार दिया उसके दिल दहला देनेवाले वीडियो इंटरनेट पर लोड किए गए हैं। इसके अलावा इस संगठन द्वारा ब्रिटिश नागरिक एलन हैनिंग, राहतकर्मी डेविड हेंस, अमेरिकी पत्रकार जिम फोली, अमेरिकी इजराईली पत्रकार स्टीवन स्कॉटलाफ के सिर कलम करने के भी वीडियो, चित्र प्रकाशित हो चूके हैं। जिन्हें सर कलम करते समय केशरिया (भगवा) कपडे पहनाए गए हैं। भले ही इस इस्लामी स्टेट के विरुद्ध सब लोग एकजुट हों इसका आवाहन किया जा रहा है, अमेरिका निर्णायक कारवाई की बात कर रहा हो परंतु, यह सब जो कुछ भी आइएस द्वारा किया जा रहा है इसके पूर्व भी अरब भूमि में दोहराया जा चूका है। इसका गवाह इस्लाम का इतिहास है जिसे सारी दुनिया शायद विस्मृत कर चूकी हो। परंतु भारत के लोगों को तो इसका ज्ञान भी होगा क्या इस संबंध में शंका ही है। अतः लोगों को इस इतिहास का ज्ञान हो इसके लिए वह इतिहास यहां लिखना पड रहा है।

हजरत मुहम्मद ने अपने अपने जीवन के मदीनाकाल खंड के दस वर्ष के दौरान कुल 82 लड़ाइयां लड़ीं, उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण लड़ाई ''खंदक युद्ध'' के नाम से प्रसिद्ध है, जिसका 1400 वां (हिजरी) स्मृति दिन सन्‌ 1985 में धूमधाम से मनाया गया था। इस लड़ाई में मूर्तिपूजकों पर विजय संपादन के बाद ''जिब्रैल के जरिये अल्लाह का हुक्म पाकर पैगंबर मुहम्मद कुरैजा (मदीना का यहूदी कबीला) के किले के पास जा पहुंचे, जहां कबीले के सब लोगों ने पनाह ली थी। वे उनसे बोले 'ऐ बंदरों और सूअरों के भाईबंदों! हम आ गए हैं। अल्लाह ने तुमको जलील किया है और अपना कहर तुम पर नाजिल किया है।" रसूल ने पच्चीस रातों तक उनको घेरे रखा, जब तक कि वे टूट ना गए और अल्लाह ने उनके दिलों में दहशत पैदा न कर दी।" उन्होंने बिना शर्त समर्पण कर दिया और वे बंदी बना लिए गए। ('हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन" पृ. 120) हदीसों और पैगंबर के प्रामाणिक जीवन चरित्रों में इन कैदियों के भाग्य का बखान उल्लासपूर्वक किया गया है। हम यहां विलियम म्यूर की किताब 'लाइफ ऑफ महोमेट" में जिल्द 3 पृ. 276-279 पर संक्षिप्त में की गई कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं - 

'मर्दों और औरतों को रातभर अलग-अलग बाडों में बंद रखा गया... (उन्होंने) पूरी रात प्रार्थना करते हुए, अपने शास्त्रों के अंश दोहराते हुए और एकदूसरे को अविचलित रहने का प्रबोधन देते हुए गुजारी। उधर रातभर कब्रें या खाइयां ... बाजार में खोदी जाती रहीं ... सबेरे जब ये तैयार हो गईं तो पैगंबर ने जो स्वयं इस क्रूर घटनाक्रम की देखरेख कर रहे थे, हुक्म दिया कि बंदियों को पांच-पांच या छह छह की टोलियों में बारी बारी से लाया जाए। हर टोली को उस खाई के किनारे बिठा दिया गया जो उसकी कब्र के लिए नियत थी। वहां टोली में से हरेक का सिर काट डाला गया। एक टोली के बाद दूसरी इस तरह वे लोग लाए जाते रहे और उनकी निर्मम हत्या होती रही, जब तक वे सब खत्म ना कर डाले गए ...... 

'बदले की प्यास बूझा लेने के बाद और बाजार को आठ सौ लोगों के खून से रंग लेने के बाद और उनके अवशेषों पर तेजी से मिट्टी डाल देने का हुक्म दे देने के बाद, लूट के माल को चार श्रेणियों में बांटा गया - जमीन, बरतन-भाण्डे ढ़ोर-डांगर और गुलाम।  पैगंबर ने हर श्रेणी में से अपना पांचवा हिस्सा ले लिया(छोटे बच्चों को छोडकर जिनको उनकी माताओं के साथ गिना गया) एक हजार कैदी थे। इनमें से अपने हिस्से में आए कैदियों में से पैगंबर ने कुछ गुलाम औरतों और नौकरों को उपहार के रुप में अपने दोस्तों को दे दिया और बाकी औरतों और बच्चों को नजद के बद्द कबीलों में बेचने के लिए भेज दिया। उनके बदले में घोडे और हथियार ले लिए। 

इस पूरे किस्से को पैगंबर मुहम्मद के जीवनीकारों इब्न इसहाक, तबरी और मीरखोंद ने वर्णित किया है। तबरी पहले के एक जीवनीकार वाकिदी के हवाले से बतलाते हैं कि पैगंबर ने खुद 'गहरी खाइयां खुदवाई, खुद वहां बैठे रहे और उनकी मौजूदगी में अली और जुबैर ने कत्ल किए।" एक अन्य जीवनीकार इब्न हिशाम कुछ ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो दूसरे विवरणों में छूट गई दिखती हैं। उनके किस्सों में से एक से यह पता चलता है कि मुहम्मद ने स्थानीय संघर्षों का अपने स्वार्थ के लिए कैसे इस्तेमाल किया। मदिना के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण और गैर-यहूदी कबीले थे बनू औस और बनू खजरज। बनू कुरैजा के यहूदी बनू औस के साथ संधिबद्ध थे और इसलिए बनू खजरज उन्हें पसंद नहीं करते थे। इसलिए पैगंबर ने जब यहूदियों के सिर काटने का हुक्म दिया तो 'खजरज बडे शौक से सिर काटने लगे। रसूल ने देखा कि खजरज लोगों के चेहरों पर खुशी थे किंतु औस लोगों के चेहरों पर ऐसा कोई भाव नहीं था। रसूल को शक हुआ कि औस और बनू कुरैजा में पहले मैत्री थी इसीलिए औस के लोग हत्या करते हुए हिचकिचा रहे थे। जब सिर्फ बारह कुरैज बच गए तो पैगंबर ने उन सबको औस लोगों को सौंप दिया। हर दो औस के हिस्से में एक यहूदी आया। पैगंबर ने कहा ः तुम में से अमुक उसे मारेगा और अमुक उसे खत्म करेगा।""

इस पूरे घटनाक्रम पर भाष्य करते हुए 'हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन" के लेखक रामस्वरुप कहते हैं - जो लोग पैगंबर का अनुसरण करते हैं, उन्हें नई चेतना और नई निष्ठा के साथ नया आदमी बनना होगा। उन्हें इस्लाम की प्रखर पाठशाला में अपने मानस को कठोर करना पडेगा, इस्लाम की रक्तरंजित रस्मों में हिस्सा लेना होगा। उन्हें ऐसे कामों में सहभागी बनना होगा, जो उसी मात्रा में पूरे माने जाएंगे जिस मात्रा में कि उनकी चरित्र हानि हो सकेगी। कोई व्यक्ति जिसमें अपनी कोई निष्ठा बची हो, निर्भर करने योग्य नहीं रहता। किसी भी स्थिति में इस्लाम के अनुयायियों को यह मौका नहीं मिलना चाहिए कि वे अपनेआपको श्रेष्ठ समझें और किसी काम से सिर्फ इसलिए परहेज करें कि उनकी नजर में वह काम अन्यायपूर्ण अथवा क्रूर है। उन्हें जो भूमिका निभानी है इसीके हिसाब से अपनी चेतना को संवारना चाहिए और जो नए काम उन्हें सौंपे जाएं उनको करने लायक बनना चाहिए।

कुरान की सूर अल अहजाब की आयतें 26 और 27 में लड़ाई और न्याय का वर्णन इस प्रकार से आया हुआ है: ""और अहले किताब (यहूदी) में से जिन लोगों ने उन (हमलावर) गिरोहों की सहायता की थी अल्लाह ने उनके दिलों में ऐसा रोब डाल दिया कि एक गिरोह (पुरूषों) को तुम कत्ल करते रहे और दूसरे गिरोह (स्त्रियों व बच्चों) को तुमने कैद कर लिया और (अल्लाह ने) तुमकों उनकी जमीन, उनके घरों और उनके माल का वारिस बना दिया, और ऐसी(उपजाऊ) जमीन का भी जिस पर अभी तुमने कदम नहीं रखे। अल्लाह हर चीज पर सामर्थ्यवान है।"" अर्थात्‌ यह सब कुछ अल्लाह की मदद से और उसके मार्गदर्शनानुसार तथा इच्छानुसार ही हुआ है।

इस दंड के संबंध में न्यायाधीश सैयद अमीर अली ने 'The Spirit of Islam' में लिखा है : ""थोड़ा सोचिए अगर अरबों की तलवार ने अपना काम अधिक दयालुता से किया होता तो हमारा (मुस्लिमों का) और आकाश तले के अन्य प्रत्येक देश का भविष्य आज क्या होता ? अरबों की तलवार ने, उनके रक्तांकित कृत्यों से संसार के हर कोने के पृथ्वी पर के सभी देशों के लिए दया लाने का काम (Work of Mercy) किया है।'' (पृ. 81,82) उनका अंतिम निष्कर्ष यह है कि: ''किसी भी भूमिका में से हो पूर्वाग्रह रहित मानस को ऐसा ही लगेगा कि, बनी कुरैजा को कत्ल किया था इसलिए पै. मुहम्मद को किसी भी तरह से दोषी ठहराना सम्मत नहीं।'' (पृ.82)

एक बात बची रहती है वह यह कि जिन पत्रकारों को बगदादी की फौज ने मौत के घाट उतारा उन्हें केशरिया कपडे क्यों पहनाए गए? तो, उसका आधार हमें हदीसों (पैगंबर की उक्तियां और कृतियां) में मिलता है। वह इस प्रकार से है ः पैगंबर ने 'भगवा रंग के कपडे पहनने के लिए अनुयायियों को प्रतिबंधित किया था। इस संबंध में उनका कहना था ः 'ये कपडे (हमेशा) श्रद्धाहीन (गैरमुस्लिम) उपयोग में लाते हैं, (इसलिए) तुम उन्हें उपयोग में मत लाओ।" (मुस्लिम 5173) एक व्यक्ति केशर में रंगे कपडे पहने हुए था। यह देखकर कि पैगंबर ने वे कपडे पसंद नहीं किए उसने उनको धो डालने का वायदा किया। लेकिन पैगंबर बोले ''इनको जला दो।"" (मु. 5175) न केवल कपडे बल्कि केशों को भी केशर द्वारा नहीं रंगना चाहिए। (5241) 

स्पष्ट है कि बगदादी अपने इस्लामी स्टेट में जो कुछ भी कर रहा है उसकी प्रेरणा वह इस्लाम के 1400 से अधिक वर्षपूर्व के  इतिहास से ग्रहण कर रहा है। वह भी यह बिना सोचे कि अब वो जमाना बीत चूका है। आजके इस आधुनिक युग में ऐसी बातों के लिए कोई स्थान ही नहीं है। लेकिन वह तो उसी इतिहास, उन्हीं बाबाआदम के जमाने की बातों को सर्वकालिक सत्य मानकर बतलाकर युवाओं को बरगला रहा है और उसके भडकाऊ प्रचार के चक्कर में पडकर कई मुस्लिम युवा अपना जीवन बर्बाद करने पर उतारु हैं और अपने निर्दोष साधारण जीवन जीनेवाले परिवारजनों को कष्ट और असहनीय पीडा भोगने के लिए पीछे छोड बगदादी की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। यह निश्चय ही बहुत बडी चिंता का विषय है।

Tuesday, October 21, 2014

चरमराती डाक-व्यवस्था की सुध कौन लेगा !

ब्रिटिश राज की भारत को तीन अच्छी देन हैं ः भारतीय रेल, भारतीय सेना और भारतीय डाक। भारतीय डाक व्यवस्था दुनिया की सबसे उन्नत व्यवस्थाओं में से एक है, जो एक लंबा सफर तय कर चूकी है। आज की इस भागमभाग भरी, गलाकाट प्रतिस्पर्धा के दौर में भी उसने अपना महत्व बनाए रखा है इसकी पुष्टि बढ़ती स्पीड-पोस्ट सेवा के ग्राहकों की सूची से मिलती है। यह विशेष स्पीड-पोस्ट सेवा कुछ अधिक मूल्य लेकर उच्च सेवा, तीव्र गति से देने के उद्देश्य से शुरु की गई थी। इस सेवा के बढ़ते ग्राहकों की संख्या डाक विभाग की विश्वसनीयता और बेहतरी को ही दर्शाती है। वैसे उसमें भी कुछ त्रुटियां हैं जैसेकि संवादहीनता एवं समन्वय की कमी जिन्हें दूर किए जाने की तत्काल आवश्यकता है। 

परंतु, जब साधारण डाक वितरण की ओर दृष्टि डालते हैं तो बिल्कूल विपरीतता ही दृष्टिगोचर होती है। डाक देर से मिलने की शिकायत करना तो लोग भूल ही गए हैं। क्योंकि, अब डाक मिल जाना ही बहुत बडी बात हो गई है। पहले मुहल्ले या कालोनी में डाकिये (पोस्टमेन) का दिख पडना आम बात थी, परंतु अब उसके दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं। जबकि पहले दिन में दो बार डाक बांटी जाती थी और तीसरी डाक के रुप में रजिस्ट्री, मनिऑर्डर आदि तो, चौथी डाक के रुप में कभी-कभी आनेवाले टेलिग्राम जो अब बंद हो गए हैं; होती थी। इस समय डाक वितरण की जो बदहाल स्थिति है उसके पीछे सबसे बडा कारण एक लंबे समय से डाकियों की भर्ती न होना भी है। जबकि समय के साथ कई डाकिये सेवानिवृत्त होते चले गए, जनसंख्या वृद्धि और नगरों के फैलाव के कारण ग्राहक एवं मकानों की संख्या तो बढ़ गई लेकिन डाकियों की संख्या बढ़ने के स्थान पर कम हो गई और कार्यक्षेत्र एवं कार्यभार अवश्य बढ़ गया है जिसकी भरपाई आउटसाइडर (ओएस) से काम कर करवाई जा रही है, इनकी अपनी अलग ही पीडा है शोषण की। दस पंद्रह वर्षों तक काम करने के बाद भी उनका नियमितीकरण नहीं हुआ है। स्टाफ की इस कमी के कारण डाक विभाग का काम बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

कुछ वर्षो पूर्व तक लगभग हर चौराहे या महत्वपूर्ण स्थानों पर पोस्ट ऑफिस का लाल डिब्बा हुआ करता था। कई स्थानों पर लाल डिब्बे के अलावा लोकल डाक के लिए हरा डिब्बा तो, सफेद डिब्बा राजधानी या महत्वपूर्ण शहरों के लिए हुआ करता था। जिनसे दिन में कितनी बार कितने-कितने बजे डाक निकाली जाएगी लिखा रहता था। इन डिब्बों से डाक निकालकर छंटाई कर सीधे गंतव्य की ओर रवाना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे ये डिब्बे गायब होते चले गए और अब तो लाल डिब्बे ही बडी मुश्किल से नजर आते हैं जिसमें सारी डाक पहले एकत्रित की जाती है फिर छंटाई कर उसको गंतव्य स्थान की ओर जिलों के माध्यम से रवाना किया जाता है। उदाहरण के लिए पहले खरगोन जिले के गोगांवा डाक पहुंचाना हो तो सीधे गोगांवा ही भेज दी जाती थी लेकिन अब बदली हुई व्यवस्था के अंतर्गत डाक पहले जिला स्थान यानी खरगोन जाएगी फिर गोगांवा इसमें समय अधिक लगता है और डाक देरी से पहुंचती है। यह सब स्टाफ की कमी की वजह से हो रहा है और डाक वितरण की व्यवस्था गडबड हो रही है। 
  
एक जमाना था जब शहर के पोस्टमास्टर जनरल का सम्मान कलेक्टर से अधिक हुआ करता था लोग उसे अतिथि के रुप में आमंत्रित किया करते थे। समाचार पत्रों में समाचार छपा करते थे कि किस तरह बिना ठीक पते या आधे-अधूरे पते के, गलत पता लिखा होने के बावजूद पत्र गंतव्य तक सही सलामत पहुंचा। डाकिये से लोग आत्मीयता रखते थे। यह सारा सम्मान, आत्मीयता का कारण था डाक विभाग की उत्कृष्ट सेवा। परंतु, कुछ भ्रष्ट एवं कामचोर कर्मचारियों एवं डाकियों के कारण इस सम्मान-आत्मीयता एवं विश्वसनीयता में कमी अवश्य आई है, परंतु डाक विभाग का महत्व आज भी बरकरार है इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब रफी अहमद किदवई संचार मंत्री बने तब उन्होंने डाक तंत्र को मजबूत बनाने के प्रयत्न किए थे। यह समर्थन आगे भी जारी रहा। परंतु, धीरे-धीरे ढ़र्रा बिगडने लगा। यूपीए सरकार के समय जब ज्योतिरादित्य सिंधिया संचार मंत्री थे तब उनके कार्यकाल में अवश्य कुछ सुधार नजर आने लगा था। सिंधिया ने कई ई.डी. या ओएस यानी आउटसाइडर को संभागों, प्रदेशों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में जूते, चप्पल, झोलों का वितरण समय पर किया था, डाकियों को तीन साल में वर्दी विभाग द्वारा दी गई। डाक विभाग के आधुनिकीकरण के तहत कमप्यूटराजेशन आरंभ किया, छोटे-छोटे पोस्ट-ऑफिसों में तक कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी गई। पूरे विभाग में एक उत्साह का वातावरण बनाने में वे सफल रहे उसके फलस्वरुप कार्यपद्धति में सुधार आना प्रारंभ हुआ। परंतु, उनके बाद फिर से डाक विभाग की गाडी पुराने बदहाल ढ़र्रे पर लौट आई। अब हालात यह हैं कि पोस्टमेन के पास वर्दी ही नहीं है तो वाशिंग अलाउंस मिलने का सवाल ही नहीं उठता। उसके पास उसका पहचान पत्र तक नहीं, नाम पट्टिका नहीं, मोनो जो उसके कंधों की शोभा बढ़ाता था वह भी नहीं। अब उसमें और किसी अनजान से कोरियर कर्मचारी में कोई फर्क नहीं बच रहता।

राजे रजवाडों की सरकारों के समय में संदेशों का आदान-प्रदान हरकारों के द्वारा होता था। वर्तमान समय में पोस्टमेन द्वारा होता है। कुछ वर्ष पूर्व पोस्टकार्ड की लागत बहुत कम थी मात्र पंद्रह पैसे जो अब पचास पैसे है। वर्तमान में अंतरदेशीय पत्र दो रुपये पचास पैसे और लिफाफा पांच रुपये का है। जो महंगाई और लागत को देखते हुए जनता के लिए बहुत ही सस्ता और विभाग के लिए महंगा सौदा। सरकार को चाहिए कि आधुनिक टेक्नालॉजी का उपयोग कर अपनी सेवाओं की उत्कृष्टता-गुणवत्ता को बढ़ाए; कार्यपद्धति को अधिक सुगम और कार्यकुशलता बढ़ाए। ईमानदार, कार्यकुशल एवं दक्ष पोस्टमेन, कर्मचारी, अधिकारियों को पुरस्कृत करे और मक्कार, कामचोर बेईमानों को डाक विभाग से निकाल बाहर करे। डाक सामग्री की कीमतें बढ़ाने के साथ ही साथ उन्हें पर्याप्त मात्रा में पोस्ट आफिसों पर उपलब्ध भी कराए। जब सभी चीजों और सेवाओं की कीमतें सभी क्षेत्रों में बढ़ाई जा रही हैं चाहे वे बैंकिंग सेवाएं हो, इंश्योरंस हो या रेल सेवा तब पोस्ट आफिस द्वारा घाटा खाकर सेवा देने में कोई तुक नजर नहीं आती बनिस्बत इसके की सेवाओं को ही बंद कर दे। जैसाकि सुनने में आ रहा है कि पोस्टकार्ड का प्रकाशन जो कि नासिक से होता है विभाग बंद करने जा रहा है। इसके लिए तर्क दिया जा रहा है कि लागत बहुत अधिक है और आजकल वाट्‌स एप, मोबाईल, फेसबुक के जमाने में लोग पोस्टकार्ड को उपयोग में ही नहीं लाते और जो स्टॉक है वही अनबिका पडा है। कुछ हद तक तो यह ठीक है परंतु एक बहुउपयोगी सेवा को इस तरह के तर्क देकर बंद कर देना कुछ गले नहीं उतरता। 

आज भी शहरों में ही एक बहुत बडा वर्ग है जो इन साधनों का ऐसा उपयोग धडल्ले से नहीं करता जैसाकि बतलाया जा रहा है। सभी जगह इंटरनेट सुविधाएं नहीं हैं। कई लोग तो जिस एसेमेस की दुहाई दी जा रही है को पढ़ना तो दूर की बात रही आते से ही डिलीट कर देते हैं। आज भी भारत का ग्रामीण भाग 70 प्रतिशत है जो 2036 तक 60 प्रतिशत रहने की संभावना है। 80 प्रतिशत पोस्ट आफिस भी तो ग्रामीण क्षेत्र में ही हैं। कुछ इसी प्रकार के तर्क मोबाईल के बढ़ते प्रयोग को देखकर लैंडलाइन के बारे में भी व्यक्त किए गए थे। परंतु, आज भी लैंडलाइन का महत्व बरकरार है उपयोग करनेवाले आज भी लैंडलाइन का ही उपयोग कर रहे हैं। पत्र पढ़ने से आत्मीयता का भाव जगता है। साने गुरुजी का कहना था 'पत्र आधी भेंट होती है" इसलिए भेंट भले ही ना हो परंतु, पत्र भेजना चाहिए। आदतें तो बनाने से बनती हैं। 

पोस्ट कार्ड के माध्यम से कई समाज जागरण के और समाजोपयोगी अभियान भी तो संचालित किए जा रहे हैं। उदाहरणार्थ महाराष्ट्र के सातारा के वाई के प्रदीप लोखंडे ने सन्‌ 2000 में पुणे में 'रुरल रिलेशन्स" नामकी संस्था ग्रामीण क्षेत्र की भावी पीढ़ि को शैक्षणिक दृष्टि से दृढ़ करने और ग्रामीण क्षेत्र के विकास के लिए स्थापित की है। इसके द्वारा 'ग्यान की" यह ग्रंथालय उपक्रम प्रारंभ किया गया है जिसके तहत अभी तक 1255 ग्रंथालय दान किए गए हैं। इस उपक्रम द्वारा प्रभावित हुए विद्यार्थियों ने प्रदीप लोखंडे को 94000 पत्र लिखकर अपना अभिप्राय सूचित किया है। हर रोज उन्हें 200 से 400 पत्र प्राप्त होते हैं। एक और उदाहरण लें ः 'गोरखपुर मांगे एम्स" अभियान के तहत 139139 पोस्टकार्ड भेजे गए थे। इस प्रकार से पोस्ट कार्ड द्वारा अभिव्यक्ति व जनजागरण एवं रचनात्मकता के और भी कई अभियान पूरे देश में संचालित किए जा रहे हैं। 

इसलिए इस बहुउपयोगी पोस्टकार्ड को बंद करने की बजाए इसकी कीमतें बढ़ाई जाए। जब रिजर्व्ह बैंक ने ही पचास और पच्चीस पैसे के सिक्कों को बंद कर दिया है तो पोस्ट कार्ड की कीमत पचास पैसे और अंतरदेशीय की कीमत ढ़ाई रुपये रखने की तुक ही समझ से परे है। आखिर डाक विभाग का एक बहुत बडा योगदान देश में साक्षरता बढ़ाने और आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास में रहा है यह कैसे भुलाया जा सकता है। इसी पोस्ट कार्ड के माध्यम से सरकार ने कई नारों द्वारा जनजागरण अभियान चलाए हैं। घाटा पूर्ति के लिए पोस्ट कार्ड पर विज्ञापन भी तो छापे जा सकते हैं। चाहें तो क्या नहीं हो सकता, कहते हैं इंदिरा गांधी ने 1980 में ही पोस्ट कार्ड बंद करने का निर्णय लिया था। उनका कहना था कि वसूली गई रकम की तुलना में छपाई और वितरण सेवा नहीं पुसाती। उस समय के पोस्टमास्टर जनरल जे. एल. पठान ने संतोषी माता को 16 पत्र भेजने के शगूफे को उपयोग में ला डाक विभाग को लाभ में लाया था। आज भी यदि कोई  अभियान जिससे लोग पोस्ट कार्ड लिखने की ओर प्रेरित हों, उसका उपयोग फिर से बढ़े, प्रारंभ करें का चलाया जाए तो सफलता क्यों नहीं हासिल की जा सकती। 

उदाहरण के लिए त्यौहारों के मौसम में यदि जनता कोे उच्च गुणवत्तावाली सेवाएं डाक विभाग प्रेम-स्नेह पत्र समय पर डिलीवर करे तो डाक विभाग घाटे से तो उभरेगा ही साथ ही लोग उसकी ओर फिर से आकर्षित भी होंगे। दशहरा-दीवाली जैसे त्यौहारों पर एक साधारण सा दस रुपये का ग्रीटिंग भेजने के लिए पांच रुपये का टिकिट लगाए जाने के स्थान पर यदि तीन रुपये का शुल्क लिया जाए और समय पर डिलीवर किया जाए तो जनता को पोस्टमेन त्यौहारों पर दिखेगा और लोगों का ध्यान भी उसकी समय पर दी गई सेवाओं की ओर आकर्षित होकर वह फिर से पोस्ट आफिस का रुख करेगा जो कि अब कम हो गया है। समय पर डाक पहुंचाने के लिए इंडियन एयरलाइंस के विमानों का भी प्रयोग बढ़ाया जाए जिससे कि डाक समय पर पहुंच सके आखिर वह एयर लाइंस डाक विभाग को छूट भी तो देती है।

डाक विभाग एवं उसकी सेवाएं फिर से एक बार बहुत लोकप्रिय हों, वह बदहाली से उभरे इसके लिए एक अभियान सा चलाया जाना चाहिए जिसके द्वारा लोगों में फिर से पोस्टमेन और डाक व्यवस्था में पुराना विश्वास, आत्मीयता बहाल हो, उनको भारतीय डाक विभाग का उज्जवल इतिहास बताया जाए। लोग जानते ही नहीं हैं कि भारतीय डाक विभाग से कई बडे नामचीन लोग जुडे रहे हैं। जैसेकि, नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक सी. व्ही. रमन, फिल्म अभिनेता देवानंद, साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद, महाश्वेता देवी, राजिंदर बेदी आदि। भारत में वायसराय रहे लॉर्ड रीडिंग भी डाक विभाग से जुडे रहे हैं, अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन पोस्टमेन थे। महात्मा गांधी पोस्ट कार्ड के अच्छे प्रशंसक एवं उपयोगकर्ता थे। लोगों ने पोस्टकार्ड पर क्या-क्या न उकेरा है। उसका उपयोग किस प्रकार से बडे पैमाने पर जन जागरण एवं समाज के उपयोग के लिए किया है। डाक विभाग ने इस लंबे सफर में कितने कष्ट सहकर, समय आने पर जान की बाजी लगाकर भी लोगों को सेवाएं दी हैं। इन सबसे बढ़कर बात यह है कि भारत सरकार का एक कर्मचारी अपने कार्यक्षेत्र में आनेवाले हर घर तक पहुंच रखता है यह बहुत महत्वपूर्ण बात है।