Friday, January 10, 2014

आखिर हिंदू गर्व किस बात पर करें ? 2

आखिर हिंदू गर्व किस बात पर करें ? 2

9. विवेकानंद के पश्चात राष्ट्रवादी सुधारक के रुप में वीर सावरकर के सामाजिक कार्यों की दो विशेषताएं थी अस्पृश्योद्धार और विज्ञाननिष्ठ रुढ़िभंजकता। अस्पृश्यता यानी कई वर्षों से दृढ़ हो चूकी विषवल्ली। अस्पृश्यता का निमूर्लन करने के लिए रत्नागिरी की स्थानबद्धता के काल में सावरकर ने पराकाष्ठा के प्रयत्न किए। दिनभर महारों और चमारों की बस्तियों में घूमे। उनमें साक्षरता निर्मित की। स्वच्छता की परिपाटी दी। उनसे गीतापठन, गायत्रीपठन, कीर्तन, सहभोजन के कार्यक्रम गणेशोत्सव में करवाए। पतितपावन मंदिर की स्थापना की और सभी को मंदिर प्रवेश की अनुमतिवाले भारत के पहले मंदिर के रुप में प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने समाज को अंतर्मुख किया और उनमें अभिवृद्धि के लिए ज्ञानामृत का प्रसाद दिया। स्पर्शबंदी, रोटीबंदी, शुद्धिबंदी, आदि नासमझ रुढ़ियों पर प्रखर आक्रमण कर इन बेडियों से मुक्त करने के लिए 'समाजचित्र" पुस्तक की रचना की। निरर्थक रुढ़ियों को तोडने के लिए केवल प्रबोधन ही नहीं किया अपितु स्वयं के आचरण से इन कार्यों में आदर्श निर्मित किया। इस कार्य में वे लीन हो गए थे और कहा था ''मेरी मृत्यु के बाद मेरे शव को ब्राह्मण, महार, मराठा, डोंब आदि सभी जातियों के लोग कंधा दें, ऐसा होने पर ही मेरी आत्मा को शांति मिलेगी।""


स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पंचवर्षीय योजनाएं आयोजित की गई। जब इंदिरागांधी प्रधानमंत्री थी उन्होंने 20 सूत्रीय कार्यक्रम द्वारा आर्थिक कार्यक्रम दिया था। परंतु, बहुत थोडे ही लोगों को मालूम होगा कि, इन दोनो ही कार्यक्रमों के मूल आधार के रुप में जंचे ऐसा 10 सूत्रीय कार्यक्रम 'वर्गहितों का राष्ट्रीय समन्वय" इस नाम से लगभग 75 वर्ष पूर्व ही सावरकर ने देश को दिया था।


तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु की इच्छा थी कि धर्म के नाम पर स्त्रियों और दलितों पर होने वाला अन्याय थमे, इसलिए उन्होंने हिंदू कोड बिल पारित करवाया, बहुत जूझने के बाद ही वह पारित हो सका था। समान नागरिकता कानून को मूलभूत अधिकारों में गिना जाए और इस बाबत न्यायालय में न्याय मांगा जा सके की व्यवस्था की जाए की मांग मीनूमसानी ने की थी। इस मांग को डॉ. आंबेडकर, श्रीमति अमृतकौर और हंसा मेहता आदि का जोरदार समर्थन था। सावरकर भी इसी मांग के समर्थक थे। इस कानून के बिना समान नागरिकत्व भ्रम सिद्ध होगा, ऐसा इन लोगों का प्रतिपादन था। बिल्कूल अल्पमत से यह मांग उस समय नामंजूर हो गई, परंतु सूचकों की नैतिक विजय हुई। क्योंकि, राज्य के निर्देशक तत्त्वों में 44वी धारा सर्वसम्मती से स्वीकृत की गई । यह धारा कहती है 'भारतीय नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।" नेहरुजी को लगता था कि यह समान नागरिकता की दिशा में उठाया हुआ पहला कदम है। परंतु, इस कदम के बाद आगे आज तक कोई कदम नहीं उठाया गया।


उस एक हिंदूकोड बिल से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। वास्तव में हमें इन और इन जैसे हो चूके अनेकानेक समाजसुधारकों पर ही गर्व करना चाहिए जिनके कारण हमारा समाज आधुनिकता के दौर में पहुंचा, हम इतने प्रगत हो सके। परंतु, यह प्रयास तब अधूरे से जान पडते हैं जब हम देखते हैं कि आज भी समाज में भेदभाव, ऊंच-नीच की भावना जीवित है, कट्टरता बढ़ रही है, सहिष्णुता कम हो रही है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने तो 'पाखंड खंडिनी पताका" फहराई थी पर हमारा पाखंड कम होने का नाम नहीं ले रहा। उदाहरणार्थ ः पंढ़रपूर की यात्रा जो पिछले सात सौ वर्षों से चल रही है के दौरान वारकरी संप्रदाय के अनुयायी एक दूसरे के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए एक दूसरे के पांव छूते हैं। उधर यात्रा से लौटते ही ऊंच-नीच, जातीय असहिष्णुता पर उतारु हो जाते हैं। आज भी दलित को घोडी चढ़ने से रोकने की घटनाएं होती हैं। 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं" कहना हमारा तभी सार्थक सिद्ध होगा जब हम यह पाखंड छोड उपर्युक्त समाजसुधारकों के बताए मार्ग पर बढ़ेंगे, उनके समाज सुधार के कार्यों को अनवरत आगे बढ़ाते रहेंगे।


यह लेख अधूरा ही रह जाएगा मुस्लिम समाज, जो भारत का एक अविभाज्य भाग है, की चर्चा के बगैर । यदि हम उस 19वी शताब्दी पर दृष्टि डालते हैं तो हमें ज्ञात होगा कि उस शताब्दी के सबसे बडे मुस्लिम नेता सर सय्यद अहमद थे। वे मुसलमानों में सुधार चाहते थे। उन्हें आधुनिक शिक्षा देना उनका ध्येय था। इसके लिए उन्होंने अलीगढ़ कालेज की स्थापना की थी। इस कारण उनकी प्रशंसा शिक्षा महर्षी के रुप में की जाती है। परंतु उनके इस कार्य का परिणाम देशविभाजन के रुप में सामने आया।
मुस्लिम समाज के साथ शोकांतिका यह है कि उनके समाज में समाज सुधार की वह परंपरा ही नहीं है जो हिंदुओं में है जिसके कारण कि वे आधुनिकता के दौर में पहुंच सके। ऐसी बात नहीं है कि उनके यहां आधुनिक बनो, शिक्षाग्रहण करो, स्त्री स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की बात करनेवाले, कुरीतियों का त्याग करो का उपदेश देनेवाले है ही नहीं, ऐसे समाज सुधारक हुए भी हैं और हैं भी लेकिन अल्प। जैसेकि, हमीद दलवाई, असगरअली इंजीनिअर, अब्दुल कादर मुकादम, शाहिर अमरशेख (मेहबूब हसन शेख 1916-1969) आदि। परंतु उनका समाज इतना दकियानूसी है कि वह कुरीतियों का त्याग करना ही नहीं चाहता और इन समाज सुधारकों की उपेक्षा एवं एक प्रकार से बहिष्कार ही करता है। और उनके विचार अरण्यरुदन बनकर रह जाते हैं।


असगरअली इंजीनिअर, आदि जैसे सेक्यूलर, उदारवादी, पुरोगामी, समाजवादी, सुधारवादी, राष्ट्रवादी, मानवतावादी विचारों के लोगों को प्रामाणिकतापूर्वक लगता है कि मुस्लिम परिवर्तनशील बनें, आधुनिक मूल्यों का स्वीकार करें, आधुनिक बनें इसके लिए वे कुरान के नए अर्थ निकालकर उनमें आधुनिक मूल्य हैं दिखाने का प्रयत्न करते रहते हैं। परंतु, उनका समाज ही उनके इन नए विचारों को स्वीकारने को तैयार नहीं। वे अंग्रेजी अखबारों में आजीवन लिखते रहे और पुरोगामी के रुप में हिंदुओं से प्रशंसा प्राप्त करते रहे। उनके समाज ने तो उन पर यहां ही नहीं बल्कि विदेशों में तक प्राणघातक हमले किए। जब वे एक परिषद में काहिरा गए थे तब वहां उनके साथ जबरदस्त मारपीट की गई थी और वे मरते-मरते बचे थे।


हमीद दलवाई जो समाजवादी विचारों के थे। उनके और उनके जैसेही कुछ स्वतंत्र विचारों के मुसलमानों का मत है कि सर्वसामान्य मुस्लिम समाज जिस विचारसरणी का आचरण करता है उससे उनका हित होनेवाला न होकर उनका सच्चा हित इसीमें है कि उन्हें हिंदूसमाज से एकरुप हो जाना चाहिए। दलवाई का कहना था ''हमारे धर्म में हस्तक्षेप मत करो, हमें विशेषाधिकार दो, इन मांगों को मुसलमानों ने छोड देना चाहिए।"" ''इस्लाम की फालतू घोषणाओं के पीछे न लगते मुस्लिम युवाओं को इस्लाम का अर्थ व्यक्तिगत धर्माचरण करने की छूट मानकर व्यवहार करना चाहिए। अधिक लडोगे तो अधिक बिगडेगा और मुस्लिम समाज के साथ सहानुभूति रखनेवाले समाज का विश्वास भी गमा बैठोगे। बहुसंख्यकों का विश्वास संपादन करना यही अल्पसंख्यकों का कर्तव्य है।"" हमीद दलवाई के इन विचारों को सुननेवाला मुस्लिम समाज ना होकर हिंदू समाज हुआ करता था। इसका अर्थ हमीद दलवाई के विचारों से मुस्लिम समाज और उनके नेता कितने दूर थे यह पता चलता है।


गांधीजी की पुनर्जन्म सिद्धांत, कर्म सिद्धांत में आस्था थी और यही जाति व्यवस्था का आधार थी। यह आधार वर्णाश्रम व्यवस्था को खींचता था। हालांकि जीवन के अंतिम दिनों में गांधीजी यह मानने लगे थे कि जाति व्यवस्था से जुडी वर्णाश्रम व्यवस्था, अस्पृश्यता का भाव गलत है और इस विषवृक्ष को हर कीमत पर काट देना चाहिए।


सावरकरजी का कहना था धर्म की पोथी में क्या सत्य है और क्या असत्य, इसका निश्चय हम विवेक की कसौटी पर करें। वर्तमान जातिभेद जन्मजात न होकर पोथी की उपज मात्र है। हमारे धर्मबंधुओं को बिनाकारण पशु से भी अधिक 'अस्पृश्य" मानना यह मनुष्य जाति का ही नहीं अपितु हमारी स्वयं की आत्मा का भी घोर अपमान है। दर्शन मात्र से जो अपवित्र हो जाता है वह ईश्वर ही नहीं। जिस रुढ़ि के कारण तनिक भी सामाजिक लाभ न होते हुए मानवमात्र कष्ट का भागी बनता है वह तो अधर्म है। जिस समाज की जहां होना चाहिए वहां तो आस्था नहीं होती और जहां नहीं होना चाहिए वहां होती है, वह समाज मटियामेट हो जाता है।


डॉ. अंबेडकर जिन्होंने अपने अंतिम समय में बौद्ध धर्म को स्वीकार लिया था, जो हिंदू धर्म का ही संस्कारित संपादित रुप है। बौद्ध चिंतन का मूल बीज भाव है कि बैर बैर का अंत नहीं होता, हो नहीं सकता। अबैर से ही बैर का अंत हो सकता है यही सनातन धर्म है। उनका कहना था हमें भारतीय होने की व्यापक मानववादी भूमि पर सोचने की हर कीमत पर आदत डालनी चाहिए। उनके शब्द हैं 'मुझे अच्छा नहीं लगता जब कुछ लोग कहते हैं कि हम पहले भारतीय हैं और बाद में हिंदू अथवा मुसलमान। मुझे यह स्वीकार नहीं है। धर्म, संस्कृति, भाषा आदि की प्रतिस्पर्धा, निष्ठा के रहते हुए भारतीयता के प्रति निष्ठा नहीं पनप सकती। मैं चाहता हूं कि लोग पहले भी भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहें, भारतीय के अलावा कुछ नहीं।"

आखिर हिंदू गर्व किस बात पर करें ? 1


स्वामी विवेकानंद ने हिंदुओं का अस्मिता बोध जगे, हिंदुओं में आत्मसम्मान, आत्मगौरव का भाव वृद्धिंगत हो के लिए 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं" का उद्‌घोष किया था। परंतु, इस नारे को परवान चढ़ाने का श्रेय संघ-परिवार को जाता है। हिंदुओं के लिए तो यह उद्‌घोष प्राणप्रिय है। परंतु साथ ही यह भी एक कटु सत्य है कि इस नारे का जयकारा लगानेवाले कइयों से यदि यह पूछा जाए कि क्यों कहें हम गर्व से हिंदू हैं तो, इसका उत्तर वे दे नहीं पाते, बगले झांकने लगते हैं। वास्तव में अधिकांश नारा लगानेवाले लोग मात्र यांत्रिक ढ़ंग से नारा लगाते रहते हैं, कुछ लोग अवश्य अज्ञानी होते हैं तो, कुछ लोग अपनी भाव-भावनाओं को शब्दों में अभिव्यक्त करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं इसलिए उत्तर दे नहीं पाते। कुछ लोग अवश्य इसका उत्तर अपनी-अपनी पद्धति से दे देते हैं।


मेरा स्वयं का मत यह है कि, एक समाज के सातत्य और शाश्वत अनुजीवन के लिए आधुनिकीकरण एक निश्चित एवं आवश्यक उपचार है। इसके अंतर्गत समाज सुधार, आचरण संहिता में तालमेल बैठाना आता है, राष्ट्रीय समाज के भिन्न-भिन्न घटकों में पारस्परिक संबंधों को अनुशासित करनेवाले नियमों में संशोधन, समय-समय पर सामाजिक संगठनों के कार्यकलापों का नियमन करनेवाली विधियों का परिष्कार और जहांकहीं-जबकभी विकृति उत्पन्न हो जाए तो उसे दूर करना आता है। इस दृष्टि से विचार किया जाए तो, 19वी शताब्दी में जब भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात हुआ, हिंदू समाज-सुधारकों राजाराममोहन राय और स्वामी विवेकानंद तथा स्वामी दयानंद ने अनुभव किया कि परंपरागत हिंदुत्व अव्यवस्थित था एवं प्रगति तथा परिवर्तन से मेल नहीं खाता था और हिंदुत्व का आधारभूत संशोधन इसके पुनरुत्थान के लिए आवश्यक था। मेरी दृष्टि में हमें गर्व हमारे इस प्रकार के समाजसुधारकों पर होना चाहिए जिन्होंने कि इस परिपाटी को उस काल में भी और बाद में भी आगे बढ़ाया।


इस कडी में कई समाज सुधारक हुए हैं। महाराष्ट्र में तो इसकी अखंड परंपरा सी ही है। जिसमें विष्णुबुआ ब्रह्मचारी, ज्योतिबा फुले, न्यायमूर्ति रानडे, लोकमान्य तिलक, आगरकर, वीर सावरकर, डॉ. आंबेडकर, शाहू महाराज, बाबा आमटे, आदि हुए हैं। इन समाज सुधारकों की प्रचुरता के कारण इनका वर्गीकरण तक किया गया है। 1. धर्मश्रद्ध सुधारक, 2. धर्मश्रद्धाहीन सुधारक, 3. कर्मयोगी सुधारक, 4. सुधारकों के सुधारक, 5. राष्ट्रवादी सुधारक, 6. समाजशास्त्रज्ञ सुधारक। महाराष्ट्र के बाहर ईश्वरचंद्र विद्यासागर, पंडित मदनमोहन मालवीय, ठक्कर बापा, महात्मा हंसराज आदि हुए हैं। शताब्दियों के कालखंड में इस देश में अनेकानेक समाज सुधारक हुए हैं। परंतु, हम केवल 19वी और 20वी शताब्दी के कुछ चुनिंदा समाज सुधारकों के कार्यों पर ही विषय समझने की दृष्टि से संक्षेप में विचार करेंगे।


1. सर्वप्रथम हम भारतीय प्रबोधन के आद्य शिल्पकार बंगाल के राजा राममोहनरॉय (1772-1833) जिन्होंने स्वयं के वैचारिक कार्य की शुरुआत धर्मचिकित्सा से की और मूर्तिपूजा पर आघात करनेवाली एक पुस्तिका आयु के 16वे वर्ष में लिखी जिसका पर्यवसान घर-त्याग के रुप में सामने आया के कार्यों से शुरु करेंगे। अपनी धर्मचिकित्सा से वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वेद-पुराण, उपनिषद, स्मृतियां सभी मनुष्य निर्मित हैं तथा इनकी आलोचना की जा सकती थी। इन पुराणों में आधुनिकता को अपनाने की कोई गुंजाइश नहीं। उन्होंने किसी भी सुधार के लिए सार्वभौमिक मूल्यों के मानदंडों की सिफारिश की। वे धर्मांतरण विरोधी होकर ईसाई मिशनरियों के कटु आलोचक भी थे। उनके विशाल मानवतावादी दृष्टिकोण से ही उनकी उदारमनस्क आधुनिकता निर्मित हुई थी। उनकी आधुनिकता यूरोपीयन बुद्धिवाद पर आधारित न होकर धर्मश्रद्धा से स्फुरित नीतितत्त्वों पर थी और इनसे निष्पन्न हुई मानवता ने ही स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व इन अभिजात तत्त्वों का समर्थन किया था।


सतीप्रथा की वीभत्स रीति के विरुद्ध उन्होंने जो प्रखर शस्त्र उठाया था उसका उद्‌गम उनकी संस्कारित मानवता में ही था। ब्रिटिश भी इस रीति के विरुद्ध थे परंतु, अपने विरुद्ध विद्रोह ना हो जाए के भय से चुप थे, किंतु राममोहन रॉय सतत प्रयत्नशील रहे और अंततः 1829 में सर विल्यम बैंटिक ने सतीप्रथा कानून लागू किया। सती, विधवा पुनर्विवाह या मुद्रण स्वतंत्रता बाबत किए हुए उनके यत्नों का जो महत्व है उससे अधिक महत्व उनके शिक्षाविषयक किए गए कार्यों का है। घातक परंपराओं से जकडे भारत और सारी घातक परंपराओं को फेंक देनेवाले भारत के मध्य का पुल उन्हें कहा जाता है। राजा की उपाधि उन्हें मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने दी थी।


2. महाराष्ट्र के बाहर के अधिकांश लोगों के लिए विष्णुबुवा ब्रह्मचारी (1825-1871) का नाम अनजान है। इस उपेक्षित पहले हिंदू मिशनरी ने मार्क्सवाद प्रसृत होने के पूर्व ही साम्यवाद पर आधारित स्वतंत्र निबंधमाला लिखकर खलबली मचा दी थी। वह भी इतनी कि 'इलेक्सट्रेटेड लंदन न्यूज" में उनका फोटो हिंदुस्थान का क्रांतिकारी कहकर छापा गया था। उनके सामाजिक मत भी इसी प्रकार से प्रगतिशील थे। जातिभेद नष्ट हों, संबंध-विच्छेद एवं पुनर्विवाह कुछ मर्यादा में योग्य माना जाए। उनके ये मत उस काल में क्रांतिकारी ही थे। वे अस्पृश्यता नहीं मानते थे। उनका प्रतिपादन था शाकाहार ही सच्चा आहार है परंतु, मांसाहार को निषिद्ध नहीं माना था। अंधश्रद्धा द्वारा लादे हुए निर्बंध उन्हें मान्य ना थे। वेद-पुराण पर उनकी पूर्ण श्रद्धा थी परंतु, बुद्धिप्रामाण्य पर उनका विश्वास था। 1850 से 1857 तक मुंबई की चौपाटी पर चले उनके व्याख्यान इतने प्रभावी थे कि ईसाई मिशनरियों को अपना बाडबिस्तर समेटना पडा था। परिणाम सरकार ने उनके भाषणों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद वे कलकत्ता, मद्रास आदि स्थानों पर प्रचारार्थ गए।


3. एक जाति, एक धर्म, एक भगवान के उपदेष्टा केरल के लोकप्रिय संत श्रीनारायण गुरु (1854) ने समाज की अव्यवहारिक, घातक और अनिष्टकारी प्रवृतियों को समाप्त किया, जिससे हिंदू समाज को खंडित होने से रोका जा सका। श्रीनारायण गुरु ने निम्न जाति के स्थाई विकास के लिए शिक्षा पर बल दिया। निम्न जातियों में आत्मसम्मान की भावना जागृत की इसके लिए संगठित व सबल होने का मंत्र दिया। अनेक कुरीतियों से समाज को मुक्त करने की दिशा में प्रयास किया। भूत-प्रेतों की मादक पदार्थों द्वारा पूजन की पद्धति को समाप्त किया। उन रुढ़ियों को समाप्त कर दिया जिनकी उपयोगिता समाज के लिए नहीं थी। उनका विशेष ध्यान इस ओर था कि निम्न जातियों के हिंदुओं में उच्च जातियों द्वारा दुर्व्यवहार के फलस्वरुप परस्पर मनोमालिन्य निर्मित ना हो जिससे कि हिंदू समाज ही खंडित हो जाए। उन्होंने सफलतापूर्वक अपने अनुयायियों को धर्मांतरित होने से रोका।


4. दूसरी ओर स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) ने वेदों को छोडकर सभी हिंदू पुराणों के अवमूल्यन का सुझाव दिया। उन्होंने स्त्री शिक्षा और स्त्री-पुरुष समानता पर प्रमुख बल दिया। समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अभियान चलाया। देश में जाति-पाति, ऊंच-नीच, छूआछूत, सतीप्रथा, बाल विवाह, नरबलि, गौहत्या, अंधश्रद्धा, धार्मिक संकीर्णता, पाखंड आदि समस्याओं से मुक्ति के लिए एक नए स्वर्णिम समाज की स्थापना के उद्देश्य से आर्यसमाज की स्थापना की। पट्टाभिसीतारमैया ने उन्हें राष्ट्रपितामह की उपाधि दी थी।


5. साधारणतया महामना पंडित मदनमोहन मालवीय की जो छवि जनमानस में बसी हुई है वह है राजनीति के मंच पर 'नरम" और धर्म तथा समाज के आंगन में 'कट्टर रुढ़िवादी"। परंतु, उनकी यह छवि एकपक्षीय व एकांगी है। उनके जीवन-चित्रपट में विविध रंगों से सराबोर झांकियों की कमी नहीं जिनमें हम उन्हें अपनी 'नरम नीति" व कट्टरवादिता को क्षणभर में एकओर रख एकदम 'गरम" व क्रांतिकारी 'सुधारवादी" के रुप में परिणत होते हुए भी पाते हैं। उदाहरणार्थ, जो मालवीयजी 1922 में देशभावना की परवाह ना करते हिंदू-विश्वविद्यालय के प्रांगण में 'प्रिंस ऑफ वेल्स" को माला पहनाते दिख पडते हैं वही मालवीयजी 1930 के स्वतंत्रता की लडाई में मुंबई की सडकों पर बरसते पानी में रातभर सशस्त्र पुलिस के सम्मुख सीना तानकर डटे दिख पडते हैं। जिन्हें गोलमेज परिषद के लिए गंगाजल ले जाते हम पाते हैं वही मालवीयजी काशी के धर्मध्वजियों को ललकारते हुए 'अछूत" कहे जाने वाले तिरस्कृत अपने देशबंधुओं को सह्रदयता से धार्मिक मंत्रदीक्षा देते हुए भी हमने पाया है।


मालवीयजी के सनातन धर्मसिद्धांतों के प्रति आस्थावान होने का अर्थ यह नहीं कि वे सुधार एवं प्रगतिविरोधी थे। वे ही तो थे जिन्होंने अकेले ही अपनी हिंदूजाति को शिक्षा का धनी बनाने हेतु, 'हिंदू विश्व-विद्यालय" जैसी आधुनिक संस्था खडी कर दी थी। क्या ऐसे महामना पर स्वप्न में भी इस पुण्यभूमि की प्रगति की राह रोकने का आरोप लगाया जा सकता है। वस्तुतः उनकी तथाकथित 'कट्टर रुढ़िवादिता" की तह में दृढ़ सिद्धांतवादिता थी जो 'प्रगति" के नाम पर इस प्राचीन भूमि के सांस्कृतिक उत्तराधिकार के आधारभूत सिद्धांतों का व्यापार कर उसे बेच डालने को तैयार नहीं थी। मालवीयजी देश के अनेक अन्य सुधारवादी विचारकों की भांति पुरातन की नींव पर पुनर्निर्माण और पुनर्संस्कार द्वारा पुनरोदय के पोषक थे वह विध्वंस और आमूलचूल परिवर्तन द्वारा एक सर्वथा अपरिचित संस्कृति को देश पर लाद देने के समर्थक नहीं थे। वह हमारी जीवनधारा में बाद को उत्पन्न विकृतियों को दूर करने की आतुरता के संकोच से रंचमात्र भी पीछे ना थे।


6. गांधीजी का उन धर्मशास्त्रों में विश्वास नहीं था, जो जातिप्रथा को पवित्र घोषित करते हैं। इस संबंध में उन्होंने कहा ''यह दुख का विषय है कि आज धर्म का मतलब क्या खाना है और क्या नहीं है के अर्थ में लिया जाता है। कौन बडा है कौन छोटा इसीकी व्याख्या की जाती है। इससे बडी नादानी और कुछ नहीं हो सकती। जन्म और आचार किसीकी श्रेष्ठता नहीं नाप सकते। चरित्र ही एकमात्र मापदंड है। कोई भी शास्त्र जो जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को छोटा या अछूत घोषित करता है, हमारी श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकता। यह ईश्वर की अवहेलना है।""


7. शक्ति-सामर्थ्य के उपासक स्वामी विवेकानंद ने धर्म हिंदुस्थान का प्राण है का उद्‌घोष करते हुए कहा था- अपन हिंदू हैं। 'हिंदू" शब्द से मुझे कोईसा भी बुरा अर्थ ध्वनित नहीं करना है। इसमें कुछ बुरा अर्थ है इससे मैं सहमत नहीं। भूतकाल में सिंधू के एक ओर रहनेवाले वे हिंदू इतना ही इसका अर्थ है। जो अपना द्वेष करते आए हैं उन्होंने इस शब्द को बुरा अर्थ चिपकाया होगा। परंतु उसका क्या! हिंदू शब्द में जो उज्जवल है, जो आध्यात्मिक है उसका निर्देश हो; अथवा जो लज्जास्पद है, जो पांवोंतले कुचले गए हैं, जो दीन हैं इस प्रकार का बोध हो यह अपने पर निर्भर करता है। हिंदू शब्द को किसी भी भाषा का अधिकाधिक गौरवपूर्ण अर्थ अपनी कृति से ला देने के लिए अपन सिद्ध हो जाएं। आगे वे कहते हैं ः अपन भारतवासी हैं इस पर गर्व करो और गर्व से कहो ः


''मैं भारतवासी हूं। प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र और दलित भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी और भंगी भारतवासी ये सारे मेरे भाई हैं।"" कमर में कौपीन हो तो भी उच्चरव में घोषणा कर ः ''प्रत्येक भारतवासी मेरा बंधु है। भारतीयत्व ही मेरा जीवन, भारत के देवी-देवता मेरे भी देवी-देवता। यह विशाल भारतीय समाज यानी मेरे बाल्यकाल का हिंडोला, यौवन का नंदनवन, और वृद्धावस्था की वाराणसी।"" ऊठ बोल ः ''हिंदुस्थान की धूली ही मेरा स्वर्ग। हिंदुस्थान का सद्‌भाग्य ही मेरा सद्‌भाग्य।"" अरे भाई दिनरात इसीका जयजयकार कर।


उनका कहना था ः उदार बनो। मतांध, एकांतिक मत बनो, आत्मपरीक्षण करो। ध्यान रखो, जीवन का एकमात्र चिंह है गति और विकास। अपने को अभी बहुत कुछ सीखना है। मरने तक नई और श्रेष्ठ बातें सीखने के लिए प्रयत्नशील रहना है। अन्यों के पास जो जो अच्छा है उसे सीखो, योग्य पद्धति से आत्मसात करो, धोखा है तो पाश्चात्यों के अंधाधुनिकीकरण का। पाश्चात्य देशों का आधुनिकीकरण तभी हो पाया जब शिक्षा और संस्कृति सफेदपोशों तक ही मर्यादित न रहते समाज के सभी स्तरों तक पहुंची। ब्रिटिशों द्वारा हिंदुस्थान को जीतना इसलिए आसान रहा क्योंकि उनकी राष्ट्रभावना जागृत थी और हमारी नहीं। क्योंकि उनके यहां निचले स्तर तक शिक्षा और संस्कृति थी। शिक्षा, केवल शिक्षा के कारण ही आत्मश्रद्धा का जन्म होता है।


उनकी दृष्टि में बाल-विवाह घृणास्पद है, छूआछूत, गूढ़वाद, अंधश्रद्धा अवनति व साक्षात मृत्यु चिंह हैं। अंतरजातिय विवाह की आवश्यकता है। बहुजनों की शिक्षा लोकभाषा में होना चाहिए। शिक्षा के सिवाय स्त्रियों का सच्चा विकास होगा नहीं। स्त्री पुरुष समान हैं। स्त्रियों का अभ्युदय हुए बगैर भारत का कल्याण होना असंभव है।


इस प्रकार से यदि हम देखें तो जितने भी समाज सुधारक इन प्रमुख उदाहरणों के सिवाय भी हुए हैं सभी ने प्रमुखता से स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के साथ ही साथ धर्मचिकित्सा कर स्त्री शिक्षा-स्वतंत्रता-अधिकार, स्त्री-पुरुष समानता का बोध जगाया। छूआछूत, ऊंच-नीच, अंधविश्वास आदि पर कडे प्रहार कर कुरीतियों को नष्ट करने, समाज को सबल बनाने, हिंदू अस्मिता जगाने के लिए भगीरथी प्रयास किए। परंतु, इन सामाजिक सुधारों में कम से कम महाराष्ट्र में तो भी एक कमी रह गई थी और वह यह कि आंदोलनों का सारा जोर व विस्तार नगरीय क्षेत्र तक ही मर्यादित था। परंतु, 80% ग्रामीण भाग जो किसानी-मजदूरी से संबंधित हैं कीसमस्याओं को प्रधानता ना मिल सकी।


8. इस वैचारिक खाई को पाटने महात्मा फुले, कर्मवीर शिंदे, प्रा. श्री. म. माटे, वीर सावरकर आगे आए। इनमें महात्मा फुले आद्य समाज सुधारक हैं। उन्होंने किसानों के सर्वांगीण विकास के लिए कितना सुक्ष्म और चौतरफा अध्ययन किया था यह उनके ग्रंथ 'शेतकऱ्याचा आसूड" (किसान का कोडा) से दिख पडता है। उन्होंने अनाथ निर्दोष बच्चों के पालन-पोषण के लिए पहला अनाथाश्रम खोला। उन्होंने अपना पूरा जीवन शोषित-पीडित और दलित सर्वहारा की मुक्ति के लिए सतत संघर्ष करते हुए गुजार दिया। प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए लार्ड लिंटन ने एक्ट लागू किया था, उसके विरोध में उनके साप्ताहिक दीनबंधु ने ही आवाज उठाई थी। .........

श्री गजानन महाराज और श्रीसाईबाबा में समसमानता


श्री दासगणू रचित "श्रीगजानन विजय-ग्रन्थ' में "सन्त इस भूमि पर चलते फिरते परमेश्वर हैं' का उल्लेख अनेक बार आया है; उनका यह कथन निस्संदेह सत्य ही है। क्योंकि, सन्त षडरिपुओं (काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह, मत्सर) का दमन कर सदैव आनन्द मग्न, ईश चरणों में लीन अवस्था को प्राप्त कर चूके होते हैं। अपने परोपकारी चरित्र के कारण वे सत्कर्मों के प्रेरक ठहरते हैं। उनकी प्रेरणा से, उनके कहने पर अनेक धनी लोग, समाज हित के लिए अनेक कार्य उदा.ः मन्दिर, धर्मशाला, जरुरतमंद बालकों के लिए स्कूल, कॉलेज, छात्रावासों का, निर्धन-असहाय लोगों के लिए अस्पतालों आदि का निर्माण तथा अन्नछत्रों का संचालन करते नजर आते हैं। उनके विद्वतता भरे पवित्र वचनों व उन पर आधारित पवित्र-ग्रन्थों से प्रेरित हो अनेक लोग सद्‌मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित हो जाते हैं और यह देख-पढ़-सुन और अनुभव कर विद्वतजन भी उनके चरणों में शीश नवां अपने को कृतार्थ समझते हैं। वे अपनी कृपा से लोगों के इच्छित मनोरथ पूरे करते हैं। परंतु स्वयं निरीच्छ हमेशा ईश्वर भजन-पूजन, स्मरण में डूबे रहते हैं। इस धरती पर सन्त ही, परमेश्वर हैं जान। वे सागर बैराग के मोक्ष प्रदाता मान।।


गजानन महाराज भी इसी प्रकार के एक पहुंचे हुए सिद्ध पुरुष थे। ""जिनकी वृत्ति शिरडी के श्रीसाई बाबा के समसमान थी। यह सरसरी तौर पर देखने मात्र से ही पता चल जाता है। वे एकदूसरे कोअंतःसाक्षी से जानते थे, ऐसा माना जा सकता है। जिस दिन गजानन महाराज समाधि में लीन हुए उस दिन दिनभर साईबाबा शोकमग्न रहे। जिस गजानन महाराज का देहावसान हुआ, उस दिन साईबाबा जमीन पर लौट लगाकर विव्हल होकर अनेक बार चिल्लाए कि मेरे प्राण जा रहे हैं। श्री दादासाहेब खापर्डे (जिनका उल्लेख श्रीगजानन विजय ग्रन्थ के दसवें और पंद्रहवें अध्याय में लोकमान्य तिलक के संदर्भ में व श्रीसाई सच्चरित्र के सातवें और सत्तावीसवें अध्याय में आया है) का यह भी कहना था कि, श्रीगजानन महाराज ने अपने परिवारों के सम्पूर्ण कल्याण का कार्य देह त्याग करते समय श्रीसाई बाबा पर सौंपा था। इसलिए उसके बाद और तभी से वे स्वयं और हमारी मातुश्री दोनो ही श्रीसाई बाबा को गुरु स्थान पर मानने लगे थे। अर्थात्‌ ही यह अंशतः श्रद्धा का विषय है।'' (श्रीगजानन विजय ग्रन्थ अभिप्राय पृ.13 बा.ग.खापर्डे सुपुत्र श्री दादा साहेब खापर्डे) श्री खापर्डे ही नहीं अपितु नागपूर के प्रसिद्ध धनी व्यक्ति बूटी और नाशिक के धुमाल वकील भी दोनो सन्तों के समान रुप से भक्त थे।


यह ""दादासाहेब खापर्डे कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। वे एक धनाढ्‌य और अमरावती के सुप्रसिद्ध वकील तथा केन्द्रीय धारा सभा (दिल्ली) के सदस्य थे। वे विद्वान और प्रवीण वक्ता भी थे। इतने गुणवान होते हुए भी उन्हें बाबा के समक्ष मुंह खोलने का साहस न होता था। अधिकांश भक्तगण तो बाबा से हर समय अपनी शंका का समाधान कर लिया करते थे। केवल तीन व्यक्ति खापर्डे, नूलकर और बूटी ही ऐसे थे, जो सदैव मौन धारण किए रहते तथा अति विनम्र और उत्तम प्रकृति के व्यक्ति थे। दादा साहेब विद्यारण्य स्वामी द्वारा रचित पंचदशी नामक प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंन्थ जिसमें अद्वैत वेदान्त का दर्शन है, उसका विवरण दूसरों को तो समझाया करते थे, परंतु जब वे बाबा के समीप मस्जिद में आए तो वे एक शब्द का भी उच्चारण ना कर सके। यथार्थ में कोई व्यक्ति, चाहे वह जितना वेदवेदान्तों में पारंगत क्यों न हो, परंतु ब्रह्मपद को पहुंचे हुए व्यक्ति के समक्ष उसका शुष्क ज्ञान प्रकाश नहीं दे सकता।'' (श्री साई सच्चरित्र, रचयिता कै. श्री गोविन्दराव रघुनाथ दाभोलकर "हेमाडपन्त', हिन्दी अनुवादक श्री शिवराम ठाकुर श्री साईबाबा संस्थान विश्वस्त व्यवस्था, शिर्डी 2007)


"शुष्क ज्ञान प्रकाश नहीं दे सकता' इस कथन को भूल जाने के कारण ब्रह्मगिरी गोसावी (जिसका उल्लेख श्रीगजानन विजय-ग्रन्थ के आठवें अध्याय में आया है) फजीहत को प्राप्त होता है तो, कीर्तनकार गोविन्दबुवा अपनी योग्यता को दादासाहेब खापर्डे के ही समान जानने के कारण महाराज के सामने मौन हो, झट शरणागत हो महाराज के शेगांव में आगमन के महत्व को जान गांववासियों को उपदेश देते हैं कि "तुम्हे अमूल्य निधि प्राप्त हो गई है उसे सम्भालो तुम्हारा गांव अब प्रति पंढ़रपूर बन गया है। क्योंकि, महाराज स्वयं पांडुरंग हैं, उनकी सेवा करो, उनकी आज्ञा का पालन करो, उनके वाक्यों को वेद वाक्य मानो।' (श्रीगजानन विजय दूसरा अध्याय) इसका सुफल भी उन्हें प्राप्त होता है ( नववां अध्याय) और वे महाराज की कृपा के पात्र बनते हैं।


कीर्तनकार गोविन्द बुवा ने महाराज को जो पांडुरंग कहा है उसका साक्षात्कार महाराज ने पंढ़रपूर में बापूना काले को विट्ठल रुप में दर्शन देकर करवा दिया तो, साईबाबा ने "नाम सप्ताह' में स्वयं भगवान विट्ठल को प्रकट करवा कर दासगणू को जो कहा था कि - ""विट्ठल अवश्य प्रकट होंगे। परंतु, साथ ही भक्तों में श्रद्धा एवं तीव्र उत्सुकता का होना भी अनिवार्य है। ठाकुरनाथ की डंकपूरी, विट्ठल की पंढ़री, रणछोड की द्वारका यहीं तो है। किसको दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। क्या विट्ठल कहीं बाहर से आएंगे? वे तो यहीं विराजमान हैं। जब भक्तों में प्रेम और भक्ति का स्तोत्र प्रवाहित होगा तो विट्ठल स्वयं ही यहां प्रगट हो जाएंगे।'' (श्रीसाई सच्चरित्र अध्याय 4 पृ.20) कुछ इसी प्रकार के वचन महाराज ने "श्रीगजानन विजय'18वें अध्याय में बापूना काले को विट्ठल रुप में दर्शन देने के बाद जब बाकी सह तीर्थयात्रियों द्वारा हमें भी विट्ठल दर्शन करवाने की प्रार्थना करने पर कहे थे। तो भक्तों द्वारा सोमवती पर्व पर तीर्थस्थल ओंकारेश्वर की यात्रा और नर्मदास्नान के संदर्भ में कहे थे - मेरे पास ही नर्मदा, क्यों जाऊं ऊंकार। मैं मठ में ही बैठकर, करुं नर्मदा पार।। फिर समझाय गजानना, मन्दिर में जो कूप। इसमें है जो जल भरा, वही नर्मदा रुप।। और भक्तों को देवी नर्मदा के दर्शन के करवाने के साथ ही देवी नर्मदा के स्वयं के मुंह से उनका अपना परिचय भी दिलवा दिया कि - कन्या मैं उंकार की, नाम नर्मदा होन।। (ग.वि.अध्याय चौदह) इतना ही नहीं तो सत्रहवें अध्याय में सभी पवित्र तीर्थों के स्नान का पुण्य लाभ सभी लोगों को करवाने के लिए नरसिंगजी के कुंवे से सप्तसिंधु को प्रकट करवाने का चमत्कार कर दिखलाया। इसी प्रकार की समसमानताएं तो अनेक हैं परंतु, एक महत्वपूर्ण समानता जो दोनो के ही चरित्र वर्णन के ग्रन्थों "श्रीगजानन विजय' एवं "श्रीसाई सच्चरित्र' के तेरहवें अध्याय में है जिनका उल्लेख दोहों के रुप में कवि श्री सुमन्तानन्दजी ने अत्यंत श्रद्धा एवं भक्ति से भरकर इस प्रकार से किया है - अध्यात्म आरोग्य पर, तेरहवां अध्याय। कवि सुमन्त अरु गजानना, दोनो के मन भाय।। हम सब इस अध्याय से, ऐसी शिक्षा पायं। अध्यात्म आरोग्य का, संगम दिया कराय।।


श्रीदासगणू ने भी श्री गजानन महाराज के चरित्र पर रचे गए "श्रीगजानन विजय-ग्रन्थ' में साईबाबा का उल्लेख अनेक बार किया हुआ है। क्योंकि, वे मूलतः साईबाबा के ही भक्त थे और उन पर पूर्व में ग्रन्थ रचना कर भी चूके थे और अंत में श्रीगजानन महाराज को संत शिरोमणि मान उन पर इस विजय ग्रन्थ की रचना की थी। ईश्वर की ओर जाने के तीन मार्गों का ज्ञान अपने परम भक्त बालाभाऊ को करवाते समय उन्नीसवें अध्याय में गजानन महाराज ने साईबाबा को अपना बंधू बतलाया है। इस प्रकार का उल्लेख श्रीदासगणू ने अपने विजय ग्रन्थ में किया है।

Monday, January 6, 2014

 नाम में क्या रखा है?
कणाद  shirishsapre.com

हिंदी में कहावत है यथा नाम तथा गुण, जैसा नाम वैसा काम और कुछ लोग अपने जीवन काल में अपने कार्यों से इन कहावतों को सार्थ सिद्ध करते भी नजर आते हैं और इनमें से कई तो इतिहास में अपना नाम भी दर्ज कर जाते हैं। इन नामों तथा इनके द्वारा किए गए कार्यों से प्रभावित होकर, प्रेरित होकर अपना बेटा भी कुछ ऐसा ही कर गुजर जाए जिससे इतिहास में उसका भी और अपने खानदान का भी नाम रौशन हो जाए। सोचकर माता-पिता अपने बेटों का नाम ऐसे महापुरुषों के नाम पर से रख देते हैं। ऐसे बेटे कितना क्या करते हैं यह तो ऊपरवाला जाने। परंतु, इनमें से कई बेटे कभी-कभी ऐसा कुछ कर गुजर जाते हैं कि कहना पडता है, नाम में क्या रखा है? नाम बडे और दर्शन खोटे।

उपर्युक्त पंक्तियां लिखने का कारण है आतंकी 'उमर फारुक अब्दुल मुतल्लब" जो दिसंबर 2009 की ख्रिस्मस पर अमेरिका में विमान में विस्फोट कर 9/11 की पुनरावृत्ति करने में नाकाम रहा। इस आतंकी के साथ इस्लाम के दो महापुरुषों के नाम जुडे हुए हैं। 1). उमर फारुक और 2). अब्दुल मुतल्लब। अब्दुल मुतल्लब पैगंबर मुहम्मद के दादा थे और उन्हींने मुहम्मद साहेब के माता-पिता की मृत्यु के बाद उनकी परवरिश की थी। वे ही उन्हें उनके पैदा होते ही मक्का के काबागृह में ले गए थे और ईश्वर के प्रति आभार प्रकट किया था। मुहम्मद साहेब पर उनका इतना प्रभाव था कि इस्लाम के इतिहास में प्रसिद्ध हुनैन युद्ध के समय जब शत्रुओं ने उनकी सेना पर एक संकरे दर्रे में अचानक हमला कर दिया और उनकी सेना घबराकर भागने लगी तब अपनी सेना में जोश भरने के लिए उन्होंने कहा था 'अब अग्निभट्टी भडकी हुई है। मैं पैगंबर हूं; झूठ नहीं बोलूंगा। मैं अब्दुल मुत्तल्लब का अंश हूं।" ये अब्दुल मुत्तल्लब मक्का के निकट की हिरा पहाडियों की गुफाओं में चिंतन-मनन, ध्यान के लिए जाया करते थे। जहां आगे चलकर मुहम्मद साहेब भी तपस्या के लिए जाने लगे और इसी हिरा की एक गुफा में एक दिन जब वे ध्यानस्थ अवस्था में बैठे हुए थे तभी अचानक उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ, पैगंबरत्व प्राप्त हुआ। उनके सामने मनुष्य रुप में एक देवदूत 'जिब्रिइल" आ खडा हुआ और उन्हें कुरान की सूर 'अलकि" क्र.96 की पांच आयतें प्राप्त हुई। जिसका पहला शब्द था 'इकरा" अर्थात्‌ 'पढ़!" पढ़ शब्द इन पांच आयतों में दो बार आया हुआ है। हदीस के अनुसार 'ज्ञान प्राप्त करना अल्लाह की सर्वोत्कृष्ट उपासना है।" 'ज्ञान प्राप्त करने के लिए चीन भी जाओ।" इतना महत्व है पढ़ने का इस्लाम में। परंतु, इस आतंकी ने तो जब उसके अभिभावकों ने उसे पढ़ने के लिए लंदन भेजा तो, उसने उनसे संबंध विच्छेद कर दिए और बजाए पढ़ाई के आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त हो गया और एक घिनौने कुकृत्य को अंजाम देने के पूर्व ही पकडा गया।

उमर फारुक इस्लाम की 'आदर्श खिलाफत" 'खुलफा-ए-राशिदीन" के दूसरे आदर्श खलीफा थे और मुहम्मद साहेब के ससुर थे। उनके जमाने में मक्का में जो 17 लोग साक्षर थे उनमें से वे एक थे। उन्हें यहूदियों की हिब्रू भाषा भी आती थी। उनका इस्लाम स्वीकार का क्रम 40वां था। वह पैगंबर काल का छठा वर्ष चल रहा था। भले ही इस्लाम का प्रकट रुप में प्रचार शुरु हो गया था फिर भी सार्वजनिक रुप से नमाज पढ़ी नहीं जा सकती थी। अपन मुस्लिम हो गए हैं यह भी प्रकट रुप से कहा नहीं जा सकता था। मुहम्मद साहेब ने उमर को यही सलाह दी थी कि, वे अपने धर्मांतरण को प्रकट ना करें। परंतु, उनकी यह सलाह पसंद न आने के कारण उन्होंने पूछा 'ऐ, पैगंबर! अपना धर्म सत्य होकर भी अपन प्रकट रुप से प्रार्थना क्यों नहीं कर सकते? अपन मुस्लिम हो गए हैं यह प्रकट रुप में कहने का समय अभी आया नहीं है क्या?" पैगंबर ने उमर को वैसा करने की अनुमति दे दी।
इसके तत्काल बाद उन्होंने वे मुस्लिम हो गए हैं की घोषणा कर दी। दूसरे दिन उमर और मुहम्मद साहेब के चाचा हमजा के नेतृत्व में दो पंक्तियों में मुस्लिम काबागृह में गए, उसकी परिक्रमा की और नमाज पढ़ी। वहां उपस्थित कुरैश (मुहम्मद साहेब भी इसी कुरैश टोली के थे) यह सब शांति से देखते रहे। उमर के कारण वे कुछ कर ना सके। उनकी नमाज की ओर देख वे दुःख से कहने लगे ः'सचमुच उमर को इस्लाम स्वीकार करवा कर मुस्लिमों ने कुरैशों से बदला लिया है।" इसके बाद मुहम्मद साहेब ने उमर को 'अल-फारुक" (सत्य और असत्य को अलग करनेवाला) की उपाधि प्रदान की। इसके बाद शेष बचे मुस्लिम जाहिर रुप से गर्व से कहने लगे कि वे मुस्लिम हैं और सार्वजनिक स्थानों पर नमाज पढ़ने लगे; इस्लाम का नया पर्व प्रारंभ हो गया।

उमर द्वारा दी गई सलाह को मुहम्मद साहेब बडी गंभीरता से लेते थे। नमाज की अजान के लिए मनुष्य की आवाज उपयोग में लाई जाए की सलाह इन्होंने ही दी थी। मद्यनिषेध का आदेश निकालने का पैगंबर से आग्रह उमर का ही था। वही आदेश कुरान 5ः51 में आया हुआ है। इस्लाम के इतिहास में प्रसिद्ध बद्र युद्ध जिसमें थोडे से मुस्लिम अल्लाह की मदद से अपने से तीन गुना शत्रुओं से विजयी हुए थे जिससे वे प्रेरणा लेते हैं कि युद्ध में विजयी वे ही होंगे में मुसलमानों ने 70 लोगों को बंदी बनाया था। इन कैदियों को कोई बदला लेकर मुक्त कर दिया जाए कि उन्हें कत्ल कर दिया जाए, ऐसा प्रश्न उपस्थित हुआ। इस संबंध में उमर ने मत दिया 'ऐ, पैगंबर! ये अल्लाह के शत्रु हैं। इन्हें कत्ल किया जाना चाहिए। ये श्रद्धाहीनों/मूर्तिपूजकों के नेता हैं.... ऐसा करने पर अल्लाह इस्लाम को शक्तिशाली करेगा और मूर्तिपूजकों को अवनत करेगा।" मुहम्मद साहेब ने उमर से कहा 'ऐ उमर, तुम पैगंबर नूह जैसे हो जिन्होंने कहा था ''ऐ परवरदिगार! दुनिया में श्रद्धाहीनों का कोई घर (तबाह करने से बाकी) न छोड।"" (71ः26) और तुम पैगंबर मूसा जैसे हो जिन्होंने कहा था ''ऐ हमारे परवरदिगार! इनकी (श्रद्धाहीनों की) सम्पदा को मिटा दे और इनके दिलों को कठोर कर दे कि उनको ईमान (इस्लाम पर श्रद्धा) लाना नसीब न हो, यहां तक कि दुखदाई अजाब को (आखिर अपनी आँखों) देखें।"" (10ः88) बाद में मुहम्मद साहेब ने बदला लेकर कैदियों को छोड दिया। दूसरे दिन मुहम्मद साहेब ने उन्हें कहा 'ऐ उमर, अल्लाह ने कैदियों संबंधी तुम्हारी सूचना को मान्य कर लिया है। इसके बाद मुहम्मद साहेब ने हाल ही में अवतरित हुई 8ः67 आयत सुनाई ''जब तक अच्छी तरह (श्रद्धाहीनों की) खूँरेजी (हत्याकांड) न कर लें पैगंबर को मुनासिब नहीं कि उसके पास कैदियों का जमाव हो; तुम तो (बदले में धन लेकर कैदियों को छोडने और) संसार के माल असबाब चाहने वाले होओ अल्लाह (तुम्हारे हाथों दीन को कायम करवा कर तुम्हारे लिए) आखिरत (की चीजें देना) चाहता है।"" इस प्रकार से उमर की सूचना पर अल्लाह ने अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई।
पर्शियन और रोमन सम्राटों को अनेक लडाइयों में धूल चटानेवाला यह मुस्लिम सम्राट (खलीफा) जिस साधारण अरब पद्धति से यात्रा कर उधर गया उसको इतिहास में विशेष रुप से दर्ज किया गया है। जेरुसलेम शहर में प्रवेश के समय उनके स्वागत के लिए बिशप सहित अनेक नगरवासी नगर के बाहर एकत्रित हुए थे। बिशप ने उमर को शहर की चाबियां सौंपी। मुस्लिम जेरुसलेम के राजा बने। हाथ में लाठी और सादे फटे-पुराने अरब पोशाक में उमर, भारी महंगे वस्त्रों में बिशप और रोमन सेनानियों के साथ भव्य और पवित्र शहर में प्रवेश और पैदल चलते देख सभी नगरवासी आश्चर्यचकित रह गए। वहां के पवित्र और ऐतिहासिक स्थल देखते हुए बिशप सहित उमर उस समय के शहर के सबसे बडे चर्च में पहुं्‌चे। वहीं पर प्रार्थना करने की (नमाज पढ़ने की) बिशप ने उनसे विनती की। उसे नकारते हुए उमर ने कहा ''अगर मैंने यहां (नमाज पढ़ी) प्रार्थना की तो उसके आधार पर मुसलमान एक दिन इस चर्च पर कब्जा जमा लेंगे और इसकी मस्जिद बना डालेंगे।"" इसके बाद उन्होंने चर्च की सीढ़ियों पर नमाज पढ़ी। उसी समय उसी सीढ़ी पर एक समय में एक से अधिक मुस्लिमों को नमाज पढ़ने से प्रतिबंधित किया। परंतु, बाद के काल में उसके बगल में ही मुस्लिमों ने मस्जिद का निर्माण किया और सीढ़ियों का आधा हिस्सा और चबूतरे को उसमें समाविष्ट कर डाला।
ऐसे दिलेर और समझदारी से भरे खलीफा उमर को ही इस्लाम में पैगंबर के बाद सबसे अधिक सम्मान प्राप्त है। इस्लाम का प्रसार करने और उसे वटवृक्ष के रुप में रुपांतरित करने का श्रेय उन्हें ही प्राप्त है। अपने दस वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने लगभग 58 लाख वर्ग कि. मी. क्षेत्र जीता था। जो वर्तमान भारत का लगभग 1.7 गुना होता है।

कुर्आन भाष्य कहता है ''जिहाद ईमान (इस्लाम पर श्रद्धा) की कसौटी है।""(दअ्‌वतुल कुर्आन खंड 3, पृ.1832) और यह जिहाद कुरान द्वारा किया जाना चाहिए। जैसाकि उमर ने उपर्युक्त संदर्भ में मक्काकाल में तब करके दिखलाया था जब मुसलमान अल्पसंख्य थे और परिस्थितियां विपरीत थी। विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष कर बिना डरे अपने सत्यधर्म (इस्लाम) पर डटे रहना जिहाद के अंतर्गत ही आता है और उमर ने यही तो किया था। कुरान की सूर 'अल-फुर्कान" की आयत 52 कहती है ''तो इन काफिरों की बात तुम न मानो और इसके द्वारा उनके साथ बरदस्त जिहाद करो।"" इस पर कुर्आन भाष्य कहता है '' इस आयत में काफिरों (इस्लाम पर श्रद्धा न रखनेवालों) के साथ बडे जिहाद (अर्थात्‌ जिहाद ए अकबर) का आदेश दिया गया है। जिसका मतलब यह है कि इस दावती संघर्ष में कुरान तुम्हारा हथयार हो कुफ्र (इस्लाम से इंकार) और शिर्क (अनेकेश्वरवाद) के खंडन में कुर्आनी आयतों को पेश किया जाए ... उनकी काफिराना बातों का तोड कुरान के द्वारा किया जाए।"" (द.कु.खंड2, पृ.1243) भाष्य आगे कहता है ''आज भी इस्लाम की दावत (निमंत्रण) देने के क्षेत्र में जिहाद (संघर्ष) करने की अत्यधिक आवश्यकता है। अर्थात्‌ अरबी न जाननेवालों के सामने कुर्आन को उसके अनुवाद के साथ प्रस्तुत करना और विरोधी के हथियारों के मुकाबले में कुर्आन को ढ़ाल बनाना बहुत बडा जिहाद है। जो समय का अतिमहत्वपूर्ण तकाजा है और इस राह के मुजाहिद (धर्मयोद्धा) वही लोग बन सकते हैं जिन पर कुर्आन की धुन सवार हो और वे उसके नायक बनकर आगे आएं।""(1243) इस संबंध में एक हदीस है - पैगंबर ने कहा 'कुरान का प्रचार करो.... उसके लिए इस जन्म में बदला मत देखो; (अगले जन्म में) इसके लिए प्रचंड बदला मिलने वाला है।"
खलीफा उमर मक्काकाल में इसी 'जिहाद ए अकबर" के मार्ग पर चले थे और सफल भी हुए थे और इसीके फलस्वरुप मुसलमानों को अपने प्रकट रुप में नमाज पढ़ने अर्थात्‌ धर्मपालन का अधिकार प्राप्त हो सका था। मुहम्मद साहेब को भी हिरा की गुफा में यही 'जिहाद ए अकबर" का ज्ञान प्राप्त हुआ था। जो 'सब्र" के उपदेश के रुप में पूरे मक्काकाल में दिया गया था और स्वयं उन्होंने भी आचरण में लाकर दिखलाया था। ''सब्र" का वर्णन कुरान में 70 से भी अधिक बार हुआ है इससे उसकी आवश्यकता और महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है।""(द. कु. खंड 1, पृ.67) लेकिन इस आतंकी उमर फारुक अब्दुल मुत्तल्लब ने तो अपने कुकृत्य द्वारा यही सिद्ध किया है कि नाम बडे और दर्शन खोटे।
सावरकर - सूर्य नमस्कार !

सावरकर नाम है एक बहुआयामी व्यक्तित्ववाले आज के युग के मानवतावादी महर्षि का! एक ऐसे प्रखर सूर्य का जिसके प्रखर हिंदुत्व दर्शन के कारण अच्छे-अच्छों की आँखें चौधिया गई थी। परंतु, इसी कारण से उनके अन्य समाजोद्धारक विचार व आचार उपेक्षित ही रह गए। विशेष रुप से मूलतः भक्तिभावी स्वभाव के हम लोगों को आचरण पसंद नहीं। इसीलिए तो सावरकर का समाज-सुधार जो एक जमाने में गाया जाता था वह आज सुनने को भी नहीं मिलता।

वीर सावरकर का हिंदू-राष्ट्र कोई एकांगी, फुसफुसा अथवा अस्थायी आधार पर खडा किया हुआ नहीं है। हिंदू-राष्ट्र के प्रबल व प्रभावी निर्माण के लिए राज्यक्रांति के समान ही समाजक्रांति भी की जाना आवश्यक है। एक क्रांति के बिना दूसरी क्रांति घटित होना ही कठिन; घटित हुई भी तो टिकना तनिक भी संभव नहीं। हिंदू संगठन के आंदोलन की तत्त्वात्मक और कार्यात्मक योजना वीर सावरकर अंडमान से रिहा होने के पूर्व से ही आंक रहे थे। सन्‌ 1924 में वे कैद से छूटकर रत्नागिरी में स्थलबद्ध हुए। उस दिन से उन्होंने इस योजना की उसके इस दोहरे स्वरुप की कार्यवाही को करना प्रारंभ किया। तभी से वे प्रचार करने लगे और उनके कार्यक्रम स्थलबद्धता की चौखट में बैठ सकें ऐसे प्रत्यक्ष प्रयोग भी उन्होंने चालू किए। उन्होंने उनके अंगोपांगो का विशदीकरण करनेवाले अनेक स्वतंत्र ग्रंथ और श्रद्धानंद, केसरी, किर्लोस्कर आदि सामयिक पत्र-पत्रिकाओं में स्फुट लेख भी लिखे थे।

1924 में सशर्त रिहा होने के बाद पहले तीन साल यानी 1926 के अंत तक सावरकरजी ने अस्पृश्यता निवारण, स्वदेशी प्रचार और बलसंवर्धन के लिए व्यायामशालाओं का प्रसार इन तीन बातों पर मुख्यतः बल दिया। आगे पूरे महाराष्ट्र में उनके जिस भाषाशुद्धि के आंदोलन नेे खलबली मचा दी उस भाषाशुद्धि का कार्य भी इसी काल में शुरु हुआ था। इसके उदाहरण हैं ः 'हवामान"  को 'ऋतुमान", रत्नागिरी के 'नेटिव्ह जनरल लायब्ररी" का रुपांतर 'नगरवाचनालय" या 'नगर ग्रंथालय" में हुआ। इसी प्रकार से पाठशालाओं में 'हाजिर" के स्थान पर 'उपस्थित" की पुकार करना, आदि। किसी भी नई बात के आरंभकाल में जैसी हेठी, निंदा होती है उसी प्रकार की भाषाशुद्धि के मामले में भी घटित होने लगी। इसी काल में सावरकरजी ने विद्यार्थियों के लिए हिंदी की कक्षाएं चलाई। सावरकरजी को हिंदी ही राष्ट्रभाषा के रुप में अभिप्रेत थी। मगर वह हिंदी संस्कृतनिष्ठ होना चाहिए, ऐसा उनका आग्रह था। उन्होंने लिपिशुद्धि और भाषाशुद्धि मंडलों की स्थापना की, जातिभेदोच्छेदक संस्थानों को जन्म दिया। पहले भारतीय वायुवीर रत्नागिरी के कॅप्टन दत्रातय लक्षमण पटवर्धन तथा 'डी लॅकमन" की देखरेख में 'रायफल क्लब" की स्थापना की। सावरकरजी ने  समाजक्रांति को पूरक ऐसा एक 'अखिल हिंदू उपहार गृह" शुरु किया। उस उपहार गृह के संचालक श्री गजाननराव दामले थे। वहां चाय-चिवडा महार के हाथ से मिलता था। वहीं सावरकरजी अतिथियों से मिलते थे।

अस्पृश्योद्धार के साथ ही सावरकरजी का शुद्धिकरण का कार्य भी शुरु था। उनके द्वारा किया गया महत्वपूर्ण शुद्धिकरण था धाक्रस परिवार का। दस पंद्रह वर्ष पूर्व ईसाई बन चूके इस परिवारा को सावरकरजी ने शुद्धि समारोह कर फिर से हिंदू धर्म में लिया था। समाज में समरस किया इतना ही नहीं तो उनकी दो उपवर कन्याओं के विवाह योग्य ऐसे वरों से करा दिए। और एक लडकी के विवाह में तो श्री धाक्रस के आग्रह पर कन्यादान भी किया। सावरकरजी द्वारा प्रचारित बातों से अब समाज अभ्यस्त होने लगा था।  परंतु, इस पर संतुष्ट न रहते गतिमान रहना सावरकरजी के किसी भी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण भाग होता था। इसलिए देवालय की 'सीढ़ी के बाद सभा मंडप आंदोलन" सावरकरजी ने शुरु किया। स्पृश्यास्पृश्यों के समिश्र मेले सभा मंडप में जाने पर किसी भी प्रकार की आपत्ति नहीं इस प्रकार का प्रचार शुरु किया। किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अस्पृश्य माने गए बंधुओं को साथ लेकर वे मंदिर जाने लगे। इस आंदोलन को लेकर अनेक लोग उन्हें छोडकर जाने लगे। बस सुधारक ही बचे रह गए। सामान्य लोगों को अस्पृश्यों का देवालय प्रवेश उस काल में भयंकर भ्रष्टाचार लगा इसमें कोई आश्चर्य नही। सावरकरजी अपने किसी भी नए आंदोलन का उपक्रम सार्वजनिक गणेशोत्सव और रत्नागिरी के पुरातन श्री विट्ठल मंदिर से करते थे। गणेशोत्सव समिति सावरकरजी का व्यासपीठ था। अस्पृश्यता धर्मसम्मत होने के कारण उसका पालन किया जाना चाहिए ऐसा कहे जानेवालों के व्याख्यानों का आयोजन जानबूझकर सनातनी करते थे। तो, अस्पृश्यता निषेध के सुधारक। इस प्रकार की यह खींचतान लगभग दो साल चली।  इस कारण समाज ऊपर से नीचे तक हिल उठा।  अस्पृश्यता बाबद अनुकूल या प्रतिकूल चर्चाओं के बिना रत्नागिरी में अन्य विषय ही नहीं बचा था।

1928 में दशहरे के शुभ दिन, परधर्मियों को हम अपने घरों में जहां तक प्रवेश देते हैं वहां तक तो भी अस्पृश्यों को प्रवेश देने के लिए तैयार हिंदू नागरिकों के घरों में, अपने सवा सौ अनुयायियों और 8-10 अस्पृश्यों सहित सावरकरजी ने समारोहपूर्वक प्रवेश किया और उन सभी के नाम प्रकाशित किए गए। पाठशालाओं में भी अस्पृश्य समझे जानेवाले बच्चों को मिश्रित रुप से बैठाया जाए, उन्हें पाठशालाओं के बरामदों अथवा कक्षा में एक ओर न बैठाया जाए। यह बात सावरकरजी हिंदू संघटन की दृष्टि से अत्यंत ठोस और मूलगामी समझते थे। परंतु, सावरकरजी के इस आंदोलन को भी तीव्र विरोध का सामना करना पडा। कई पाठशालाओं में शिक्षकों की हडतालें हुई तो, कई गांवों में गांववासियों ने विरोध किया। कुछ स्थानों पर स्पृश्यों द्वारा दिए गए स्थान वापिस ले लिए गए। तो कुछ स्थानों पर अस्पृश्यों ने यदि अपने बच्चों को पाठशालाओं में भेजा तो बहिष्कार किया जाएगा की धमकियां दी गई। 

देवालय प्रवेश के साथ ही सावरकरजी को समाज के पतन का कारण बनी 'बंदियों" को तोड डालना था और इसलिए पुराने देवालयों में अस्पृश्यों के प्रवेश आंदोलन के साथ ही जिस देवालय में अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के समान प्रवेश और अन्य अधिकार होंगे ऐसा अखिल हिंदुओं के लिए श्री पतित पावन मंदिर का निर्माण सेठ श्री भागोजी कीर की सहायता से किया। 10 मार्च 1929 को मंदिर का शिलान्यास श्रीमत्‌ शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी के करकमलों द्वारा हुआ। उपस्थित स्पृश्यास्पृश्यों के प्रचंड जनसमुदाय के सामने सावरकरजी ने इस देवालय के उद्देश्यों की रुपरेखा निम्नानुसार कथन की -

1). इस देवालय में शंख, चक्र, पद्म, गदाधारी भगवान श्रीविष्णू की देवी लक्ष्मी सहित स्थापना की जाएगी। 2). उस मूर्ति की पूजा करने का अधिकार जातिनिर्विशेष ढ़ंग से सभी हिंदुओं को समान रुप से रहेगा। 3). मगर, ऐसी पूजा करनेवाले को सर्वप्रथम देवालय के प्रांगण में स्नान कर व शुद्ध वस्त्र धारण करने के बाद में ही पूजा के लिए मंदिर के गर्भगृह में जाने का अधिकार होगा। 4). देवालय का पुजारी 'स्वधर्मक्षम" होना चाहिए, फिर वह किसी भी जाति का हो। इस प्रकार सभी हिंदुओं के लिए खुला रहनेवाला देवालय अखिल महाराष्ट्र तो क्या परंतु, अखिल भारत में भी दुर्लभ होने के कारण इस मंदिर को एक विशिष्टता प्राप्त हुई। इस समय  सावरकरजी ने अपने भाषण में कहा था ''अस्पृश्यों को प्रेम से स्पृश कर उनका अंगीकार करनेवाले दो ही शंकराचार्य हुए हैं। पहले, पीठ स्थापक आद्य शंकराचार्य काशी में स्नान कर वापिस आते समय मार्ग में अद्वैत तत्त्वज्ञानी अस्पृश्य को आलिंगन देनेवाले और दूसरे यह शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी जो अखिल हिंदुओं के प्रतिनिधि के रुप में आए हुए पांडु विठु महार को हार और हाथ अपने गले में डालने देकर उस पांडोबा के साथ ही स्वयं भी कृतार्थ हुए। यह श्री पतित पावन मंदिर स्मृति है सनातनियों के विरोध की परवाह न करते अस्पृश्यता के कलंक को धो डालने के वीर सावरकर के क्रांतिकारी कार्य की।

श्री पतित पावन मंदिर के कारण सावरकरजी को बिना किसी अवरोध के सामाजिक क्रांति का कार्य करने के लिए स्वतंत्र व्यासपीठ प्राप्त हुआ। जब सनातनियों ने अस्पृश्यों को गणेशोत्सव के लिए विट्ठल मंदिर के सभामंडप में प्रवेश को नकारा तो, सावरकरजी ने सभासदत्व से त्यागपत्र देकर अखिल हिंदू गणेशोत्सव में भाग ले सकें ऐसा अखिल गणेशोत्सव श्री पतित पावन मंदिर में शुरु किया। इसी उत्सव में डेढ़ हजार स्त्रियों द्वारा भाग लिया हुआ हल्दी-कुंकु कार्यक्रम भी संपन्न हुआ। विशेष रुप से दर्ज करने लायक बात है पांच अस्पृश्य लडकियों द्वारा गायत्री मंत्र पठन की स्पर्धा में भाग लेना। शिवू भंगीने शास्त्रशुद्ध स्वरों में सैंकडों लोगों के सामने तीन बार गायत्री मंत्र का उच्चारण कर पुरस्कार जीता। सबसे महत्वपूर्ण बात थी सावरकरजी द्वारा 'हिंदुओं के जातिभेद" इस विषय पर हुए व्याख्यान। हिंदूजाति की वर्तमान दुर्बल, अव्यवस्थित स्थिति के लिए महत्वपूर्ण कारण है 'हिंदुओं के बीच का जातिभेद"। हिंदुओं की  शक्ति को बांझ कर डालनेवाली अधिकांश सभी दुष्ट रुढ़ियों का मूल इस जातिभेद में ही है, ऐसी उनकी दृढ़ धारणा थी। और इसीलिए जातिभेद के उच्छेदन का आंदोलन उन्होंने हाथ में लेना तय किया।

उन्होंने केसरी में 'जातिभेद के इष्टनिष्टत्व" इस शीर्षक तले लेखमाला लिखी और इस प्रश्न को महाराष्ट्र में गति दी। प्रचलित जातिभेद की अनिष्टता युवाओं के मानस पर अंकित होना चाहिए इसलिए उन्होंने रत्नागिरी में युवाओं का 'हिंदू मंडल" स्थापित कर उसमें जातिभेद के अनिष्टत्व को सिद्ध करने के लिए चर्चा करते थे। उनका कहना था जातिभेद सप्तपाद प्राणी है। वे पांव हैं - वेदोक्तबंदी, सिंधुबंदी, शुुद्धिबंदी, स्पर्शबंदी, रोटीबंदी व बेटीबंदी। इनमें से मुख्यतः तीन पांव स्पर्शबंदी, रोटीबंदी और बेटीबंदी तोडी कि जातिभेद समाप्त हुआ ही समझ लीजिए। इसके लिए 'जातिभेदोच्छेदनार्थ अखिल हिंदू सहभोजन करिष्ये" इस प्रकार का संकल्प कर सहभोजन होना चाहिए। 16 सितंबर 1930 को पहला सहभोजन रत्नागिरी में हुआ। इस समारोह के कारण रत्नागिरी ही नहीं तो पूरे महाराष्ट्र में खलबली मच गई। रत्नागिरी में पहले से ही चल रहे सावरकरजी के भाषाशुद्धि, लिपिशुद्धि, अस्पृश्यता निवारण, शुद्धिकरण, पाठशालाओं में अस्पृश्य बच्चों को मिश्रित ढ़ंग से बैठाना, 'अखिल हिंदू उपहारगृह की स्थापना", अस्पृश्यों का देवालय प्रवेश, अस्पृश्यों के साथ हिंदू नागरिकों के घरों में प्रवेश आदि अभियानों के बाद अब जातिभेदोच्छेदनार्थ सहभोजन ने आग में घी डालने का काम किया। पहले से ही उन्हें रुढ़ीप्रिय समाज पाखण्डी, 'सबगोलंकारी" अर्थात्‌ छूत-छात न माननेवाला कहता था। पहले कुछ अनुयायी मंदिरों में अस्पृश्यों के साथ प्रवेश प्रकरण के कारण छोड गए थे अब उसमें और बढ़ोत्री हुई। तथापि, 'वरंजनहितं ध्येयं न केवला न जनस्तुती" इस ध्येय वाक्य से प्रेरित सावरकरजी ने चिंता न की।

जात्युच्छेदक सहभोजनों और सहभोजकों का सनातनियों द्वारा बहिष्कार की धूम मची हुई थी कि जिस देवालय में अस्पृश्यों को सवर्ण हिंदुओं के समान ही प्रवेश और अन्य सभी प्रकार के अधिकार हों ऐसे 'अखिल हिंदुओं के लिए श्रीपतितपावन मंदिर" जो सेठ भागोजी कीर की सहायता से निर्मित किया गया था के उद्‌घाटन के समय श्री भागोजी कीर जाति से भंडारी होने के कारण वेदोक्त पद्धति से हम धार्मिक विधि नहीं करेंगे, ऐसा शास्त्री-पंडितों ने कहा, तब सावरकरजी एक ओर तथा शास्त्री-पंडित दूसरी ओर इस पद्धति से दो दिन तक शास्त्रार्थ चला। सावरकरजी का धर्मग्रंथों का अध्ययन कितना प्रबल है इसका प्रत्यय सबको इस समय हुआ। शंकराचार्य डॉ. कूर्तकोटी ने भागोजी कीर के कर कमलों द्वारा वेदोक्त विधि से धार्मिक विधि होने में कोई आपत्ति नहीं ऐसा निर्णय दिया। फिर भी शास्त्री-पंडितों को वह मान्य नहीं हुआ। श्रद्धालु प्रकृति के सेठजी ने कहा पुराणोक्त तो पुराणोक्त परंतु, मूर्ति की प्रतिष्ठा समय पर हो। सावरकरजी तत्काल बोले प्रत्येक हिंदू को वेदोक्त अधिकार है। इस सिद्धांत का त्याग करना हो तो, सबसे पहले मेरा त्याग करो। परंतु, यदि सिद्धांत का त्याग नहीं करनेवाले हो तो पूर्वास्पृश्यों का जो हजारों का समुदाय आज आया हुआ है उन हजारों हिंदुओं के हाथों से देवमूर्ति उठाकर जयजयकार कर हम उस मूर्ति की स्थापना करेंगे। यही हमारी विधि होगी। 'हिंदू धर्म की जय"  का हजारों कंठों से निकलनेवाला जयघोष ही हमारा वेदघोष होगा और 'भावेहि विद्यते देवो" हमारा शास्त्राधार।

अंत में मसूरकर महाराज के आश्रम के वे.शा.सं. विष्णू शास्त्री मोडक द्वारा महाराज की आज्ञानुसार कीर सेठजी के कर कमलों द्वारा वेदोक्त विधि से देवप्रतिष्ठादिक सारे धर्म विधि भलीभांति पूर्ण किए गए। और दिनांक 22 फरवरी 1931 को श्री पतितपावन की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा श्री शंकराचार्य के कर कमलों द्वारा 'हिंदू धर्म की जय" गगनभेदी नारों के साथ की गई। इस समारोह में पूणे के श्री राजभोग द्वारा शंकराचार्यजी की पाद्यपूजा की गई। दूसरे दिन दि. 23 को अन्नसंतर्पण के कार्यक्रम में 'सावरकरजी का पाखंडी सहभोजन नहीं होना चाहिए" का आग्रह अनेक सनातनियों के साथ ही श्री मसूरकर महाराज, संत पाचलेगांवकर महाराज और स्वयं डॉ. कूर्तकोटी ने भी किया। सहभोजन, जातिउच्छेदन इस प्रकार के आंदोलन आततायी और पांखडी हैं। सावरकरजी के इन आंदोलनो को हमारी बिल्कूल भी सहमति नहीं है, ऐसा वे जाहिर रुप से कहने लगे।

परंतु, इस अन्नसंतर्पण का जात्युच्छेदक सहभोजन कार्यक्रम सावरकरजी द्वारा स्थगित किया जाना संभव ही नहीं था। इस समारोह में दूर-दूर से आए हुए लोगों को रत्नागिरी में की गई सामाजिक क्रांति का प्रदर्शन दिखाने का अवसर गंवाना सावरकरजी जैसे आग्रही प्रचारक को मान्य होनेवाला नहीं था। उन्होंने कीर सेठजी के पास न्याय्य मांग की ''अन्न संतर्पण के भोजन की इच्छा रखनेवालों की स्वतंत्र पंगत रखने की व्यवस्था करें, जो उस पंगत में बैठना चाहें बैंठे। सनातनियों की जातिगत पंगत का हम सहभोजक विरोध नहीं करेंगे। वे भी हमारी पंगत का विरोध ना करें। उनकी प्रामाणिकता को हम मान्य करते हैं। वे हमारी प्रामाणिकता को मान्य करें।"" सावरकरजी के जातिभेदोच्छेदक सहभोजन की परंपरा आगे चलकर हमारे इंदौर में भी चटनी-रोटी सहभोजन के रुप में पहुंची।

22 फरवरी को ही मंदिर के सभामंडप में दोपहर को मुंबई के अस्पृश्यता निवारक परिषद का छठा अधिवेशन हुआ। अध्यक्ष के रुप में सावरकरजी को चुना गया। सुभेदार घाटगे (पुणे) ने तो 'हमारे सच्चे शंकराचार्य" की उपाधि सावरकरजी को प्रदान की। स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा अधिक कर्मठ रुढ़ीग्रस्त होती हैं। इस कारण जात्युच्छेदन के आंदोलन ने स्त्रियों में जड पकडी तो वह अधिक शाश्वत स्वरुप का होने का संभावना थी। इसके लिए उनमें भी खुल्लमखुल्ला रोटीबंदी तोडने की प्रवृत्ति शुरु करना आवश्यक था। परंतु, यह काम सरल नहीं था। इसके लिए बहुत मेहनत करना पडी। वर्ष-दो वर्ष के प्रयत्नों के बाद तीस-पैतीस सुविद्य स्त्रियां और बीस-पच्चीस अस्पृश्य स्त्रियों का पहला सहभोजन 21 सितंबर को हुआ। इसी मंदिर में सावरकरजी अस्पृश्यों को यज्ञोपवित भी बांटते थे।

1933 में शिवरात्री पर रत्नागिरी में जन्मजात अस्पृश्यता का मृत्युदिवस मनाना रत्नागिरी की हिंदूसभा ने तय किया। उस 'दिन" के लिए पूणे के डिप्रेस्ड क्लास मिशन के कर्मवीर शिंदे और दलित वर्ग के नेता पा. ना. राजभोग आए थे। समारोह के अध्यक्षीय भाषण में कर्मवीर शिंदे, जिन्होंने अस्पृश्यता निवारण के कार्य में अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत किया था, ने कहा ''रत्नागिरी के सामाजिक परिवर्तनों को मैंने सूक्ष्मता से देखा है। इस पर से मैं निःशंक रुप से कह सकता हूं कि, यहां घटित हो रही सामाजिक क्रांति अभूतपूर्व है, सामाजिक सुधार का कार्य मैंने जीवन भर किया है। वह इतना कठिन और क्लिष्ट है कि, मैं भी बीच-बीच में निरुत्साहित हो जाता हूं। परंतु, यह क्लिष्ट काम मात्र सात वर्षों में रत्नागिरी जैसे सनातनी नगर में सावरकरजी ने कर दिखाया। यह रत्नागिरी केवल अस्पृश्यता का उच्चाटन कर ही रुकी नहीं अपितु जन्मजात जातिभेद के उच्चाटन करने के लिए कटिबद्ध हुई। आप लोगों को अस्पृश्यों के साथ सहभोजन, सहपूजन आदि सारे सामाजिक व्यवहार प्रकटरुप से करते हुए मैंने देखा है। इससे मैं इतनी प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूं कि, यह दिन देखने के लिए मैं जीवित रहा बडा अच्छा रहा।   

वीर सावरकर की यह क्रांति आगे खंडित हो गई। परिणामस्वरुप 1927 में महाड में डॉ. आंबेडकर द्वारा की गई घोषणा 1956 के दशहरे पर अमल में लाई गई। परंतु, उसके पूर्व ''1938 में पूना ओ.टी.सी में एक दिन डॉ. आंबेडकर पधारे। उन्होंने डॉक्टरजी से पूछा, 'इन स्वयंसेवकों में कोई महार जाति के हैं क्या?" डाक्टरजी ने कहा, 'होंगे लेकिन हम उनकी जाति-वार याददाश्त नहीं रखते, इच्छा हो तो कमरे में चलकर जानकारी ले सकते हैं।" वे बोले, 'हॉं, मैं जानकारी लेना चाहता हूँ।" इस पर दोनो कमरे में गए और स्वयंसेवकों से पूछा, 'यहां कोई महार जाति के कोई हैं क्या?" कुल करीब 200 स्वयंसेवकों में से 8 या 9 स्वयंसेवक महार जाति के निकले। उनसे आंबेडकरजी ने पूछा, 'क्या आप अन्य स्वयंसेवकों के साथ ही खाना खाते हैं?" उत्तर मिला, 'जी हॉं," और सबने मिलकर बतलाया कि वहॉं वे कोई भेदभाव महसूस नहीं करते।"

आंबेडकर आश्चर्य-चकित हो गए और बोले, 'मैंने ऐसा दृश्य अपने जीवन भर कहीं नहीं देखा। परंतु डॉक्टर! आपके इस मार्ग से पूरी महार जाति का उद्धार करने में सैंकडों साल लग जाएंगे। मुझे उतना 'धैर्य" नहीं है। इनका उद्धार तुरंत हो, ऐसी मेरी इच्छा है।" डाक्टरजी हॅंसकर बोले, 'आपकी इच्छा ठीक है, पर मैं कहूँगा, 'हेस्ट मेक्स वेस्ट" और इतना कहकर डॉक्टरजी आंबेडकरजी को अपने साथ अपने निवास-स्थान पर ले चले गए।""(राष्ट्रधर्म मार्च 1989पृ.102 युगान्तर विशेषांक) 24 मई 1956 बुद्धजयंती पर नरे पार्क में डॉ. आंबेडकर ने निर्वाण की घोषणा की कि 14 अक्टूबर 1956 विजयादशमी को अनुयायियों सहित मैं बौद्धधर्म ग्रहण करुंगा। डॉ. आंबेडकर को इस विचार से परावृत्त करनेवाली एक भी हिंदू शक्ति नहीं थी ऐसा ही कहना पडेगा।

''डॉक्टर साहब के धर्मांतर करने के निश्चय का जब श्री गुरुजी को पता चला तब उन्होंने अविलम्ब ठेंगडीजी को डॉक्टर साहब के पास चर्चा करने हेतु भेज दिया। 'डॉक्टर साहब, सुना है कि आप हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले हैं?" 'हॉं,मैंने पक्का निर्णय किया है।" 'परंतु आप जो विचार बताते हैं वही सब हममें से कुछ युवक प्रत्यक्ष आचरण में अनेक वर्षों से ला रहे हैं।" 'आप युवक याने आर.एस.एस. ही है?"  'जी हॉं, हममें कुछ सवर्ण भी हैं, कुछ दलित वर्ग के भी हैं। जो सवर्ण हममें हैं वे ऐसा विचार करते हैं कि भूतकाल में हमसे जो कुछ पाप हुआ सो हो गया है उसका प्रायश्चित करने को हम तैयार हैं। हमको सब हिंदू मात्र का संगठन करना है।" 'बहुत ही अच्छा है परंतु इस पर मैंने कुछ सोचा ही नहीं ऐसी तुम्हारी धारण है क्या?" 'आपने इस पर सोचा नहीं होगा यह कैसे हो सकता है डॉक्टर साहब!" ठेंगडीजी ने कहा।

'तो फिर मेरे प्रश्न का उत्तर दो।" 'पूछिए आपका प्रश्न डॉक्टर साहब!" 'तुम्हारे आर.एस.एस. का कार्य कब प्रारंभ हुआ।" 'सन 1925 में।" 'याने कार्य प्रारंभ हुए कितने वर्ष हो गए?" 'साधारणतः 27-28 वर्ष।" 'देशभर में आर.एस.एस. वालों की कुल  कितनी संख्या है?" 'मुझे तो इसकी कल्पना नहीं है।" 'अच्छा! तो मेरे अनुमान से देशभर में 26-27 लाख स्वयंसेवक होंगे।" 'हो सकते हैं।" 'तो तुम ही बताओ कि 26-27 लाख सवर्ण और दलित लोगों को आपकी संस्था में लाने में अगर आपको 27-28 वर्ष लगे हैं तो पूरे दलित वर्ग को संघ में लाने के लिए कितने वर्ष लगेंगे?" 'परंतु... .. डॉक्टर साहब... 'बीच में मत बोलो। तुम क्या कहने वाले हो वह सब मुझे पता है। तुम जो geometric progression बतानेवाले हो उसकी भी कुछ मर्यादा है। बकरी कितनी भी बडी हो जाए तो भी बैल नहीं बन सकती। मुझे अपने ही जीवन में इस समस्या का हल करना है। इसको निश्चित दिशा देनी है।""  ठेंगडी मौन रह गए।" (स्वदेश दीपावली विशेषांक 1973 पृ.25) और प्रत्यक्ष नागपूर में ही दशहरे के विजयदिवस पर तथाकथित अस्पृश्यों का बडा भाग हिंदूधर्म समाज से अलग हो गया।

Saturday, January 4, 2014

आक्रमक वहाबी विचारधारा से पीछा छुडाता मुस्लिम जगत

आक्रमक वहाबी विचारधारा से पीछा छुडाता मुस्लिम जगत


इस समय इस्लामी जगत आतंकवादी कृत्यों का प्रतीक बन चूकी वहाबी विचारधारा के विरोध में आंदोलित है। विश्वप्रसिद्ध अल -अजहर के उस्ताद हों या भारत के मौलाना या अन्य इस्लामिक विद्वान सभी दुनिया भर के मुसलमानों को वहाबी विचारधारा से सावधान रहने की अपील कर रहे हैं।


इस आक्रमक वहाबी विचारधारा का प्रणेता है मुहम्मद इब्न अल्‌ वहाब (1703-92)। वहाब अल्लाह के 99 नामों में से एक है। इस इस्लामिक विद्वान ने विशुद्ध इस्लाम का समर्थन किया था व उसे सऊदी राजाश्रय भी मिला था। उसके विचारों को विश्वव्यापी ख्याति भी मिली। उसीके कारण बाद में विशुद्ध इस्लाम को प्रस्तुत करनेवाले को 'वहाबी" कहा जाने लगा। वहाब पर हनबाली न्यायप्रणाली का विद्वान इब्न तैमय्या का प्रभाव था। वह कुरान का शब्दशः अर्थ ग्राह्य मानता था। युद्धलूट के संबंध में तैमय्या के विचार इस प्रकार के हैं ः ''सचमुच सत्य यह है कि, अल्लाह ने युद्धलूट उसकी सेवा करनेवाले (यानी श्रद्धावान अर्था्‌त मुसलमान) के लिए निर्मित की है क्योंकि, उसने प्राणीमात्र को उसकी सेवा करने के लिए ही जीवन दिया है... जो उसकी सेवा नहीं करते उनकी (यानी श्रद्धाहीन अर्थात्‌ गैरमुस्लिम) मालमत्ता जो उसकी सेवा करते हैं उन श्रद्धावान सेवकों के लिए उसने (अल्लाह ने) कानूनसम्मत की हुई है।"" 'मूलतः वह धन-संपत्ति श्रद्धावानों की ही थी परंतु, श्रद्धाहीनों ने उसका अपहार कर लिया था। परंतु, युद्धलूट के रुप में अल्लाह ने वह मालमत्ता मूल हकदार मालिक को वापिस कर दी।" इस तैमय्या के बारे में मौ. मौदूदी का कहना है ः ''वे बहुत श्रेष्ठ दर्जे के धार्मिक एवं इस्लामी कानून के विद्वानों में से एक थे। विशेष रुप से पिछली दो शताब्दियों में उनके विचारों का मुस्लिमों पर प्रचंड प्रभाव हुआ है।""


भारतीय उपखंड का (मुस्लिमों का) पहला जनप्रिय नेता के रुप में प्रशंसित सय्यद अहमद बरेलवी (शहीद) के जिहाद आंदोलन को वहाबी आंदोलन भी कहा जाता है। वस्तुतः सय्यद अहमद के कार्य व विचार स्वतंत्र होकर केवल 'विशुद्ध इस्लामवाद" यह एक ही मुद्दा दोनो के बीच समान है। सय्यद अहमद के आंदोलन को वहाबी कहना सरासर गलत है। उनके आंदोलन का नाम 'तारिकत-इ-मुहम्मदिया" है (मुहम्मद का मार्ग) है। उस पर सच्चा प्रभाव था तो भारतीय शाहवलीउल्लाह और पुत्र शाह अब्दुल अजीज का। अतः उनके आंदोलन को 'वलीउल्लाह" कहना उचित होगा। परंतु अधिकांश ने सय्यद के आंदोलन को वहाबी ही कहा है। इस वलीउल्लाही आंदोलन को बाद में पाकिस्तान निर्माण के लिए हुए आंदोलन का पूर्वसंकेत माना जाता है साथ ही 1857 के संघर्ष को भी उनके आंदोलन का परिपाक माना जाता है।


वहाबी दावा करते हैं कि हम ही विशुद्ध इस्लाम का प्रतिनिधित्व करते हैं यह कोई पृथक विचारसरणी नहीं है। इसीलिए वे स्वयं को 'सलफी" कहते हैं। 'सलफी" व 'वहाबी" शब्द अनेक बार पर्यायवाची के रुप में प्रयुक्त किए जाते हैं। परंतु, इस प्रकार का उपयोग अनुचित है। 'सलफ" यानी पूर्वजसे 'सलफी" शब्द आया है। 'सलफी" का शब्दशः अर्थ 'प्रारंभ का मुसलमान"। मुस्लिमों की पहली तीन पीढ़ियों को आदर्श माना जाता है। इनमें सहाबा या सहाबी (यानी पैगंबर के साथी), ताबईन (जिन्होंने सहाबी को देखा है), तबअताबईन जिन्होंने 'ताबईन" को देखा है। यह इस्लामी धारणा है कि इन प्रारंभिक मुसलमानों ने इस्लाम को प्रायोगिक रुप में किस प्रकार से जीया जाए यह दिखलाया था। उनके दिखलाए मार्ग को अनुकरणीय माना जाता है (मिनहाज-अस्‌-सलफ)। सलफीयों का यह काल तीनसौ वर्षों का है। उस जमाने में जिस प्रकार का व्यवहार होता था वैसा ही व्यवहार आज भी मुसलमानों द्वारा किया जाना चाहिए की विचारसरणी को 'सलफी" माना जाता है। सलफी विचारप्रणाली में दो प्रवाह हैं वहाबी और कुत्बी।


इस्लाम में चार न्यायप्रणालियां हैं। हनाफी, शाफई (शफी), हनबाली और मालिकी। इन चारों में से किसी भी एक न्यायप्रणाली से वहाबी बंधे हुए नहीं हैं। इनका पूरा जोर कुरान और हदीस (पैगंबर की उक्तियां एवं कृतियां) के हूबहू पालन पर रहता है। वहाबी इज्मा (किसी एक बात पर बहुमत होना) या कियास (विचार, अनुमान) जो इस्लामी कानून के मानवी स्त्रोत हैं पर विश्वास नहीं करते। ये अल्लाह के एकत्व पर अत्यंत श्रद्धा रखते हैं इसी कारण इन्हें 'अद्‌ दावा लिल तौहीद" भी कहते हैं। उनकी भूमिका यह है कि इस्लाम के चार खलिफाओं का काल जो इस्लाम का स्वर्णयुग कहलाता है (खिलाफते राशिदून) का शासनकाल आदर्श होकर उसके बाद के खलीफा मार्गभ्रष्ट थे। यदि मुस्लिम शासक इस्लामी कानून का अक्षरशः पालन करता हो तो ही मुस्लिम समाज उसके प्रति निष्ठा रखे।


अल्लाह के सिवाय यहां तक कि पैगंबर तक का आवाहन करना गैर-इस्लामी है। मक्का-मदीना-अलअक्सा को छोडकर अन्य किसी भी मस्जिद की यात्रा करना, पैगंबर का जन्मदिन मनाना, कब्रों पर चादर-फूल चढ़ाना या कब्र के सामने घुटने टेकना या बलि चढ़ाना, मृतक के सामने मातम मनाना या कुरानपठन करना को इनका विरोध रहता है। फोटो लेना, संगीत-नृत्य का भी ये विरोध करते हैं। गंडा-ताबीज के तो ये घोर विरोधी हैं। वहाबीयों की मस्जिदें अत्यंत सादी होती हैं। ये सोने के अलंकार व रेशमी वस्त्रों के पहनने को भी पसंद नहीं करते और ये विचार इस्लाम से सुसंगत ही हैं।


कुत्बी सय्यद कुत्ब शहीद (1906-66) के अनुयायियों को कहते हैं। कुत्बी स्वयं को 'सलफी" कहते हैं। कुत्ब का प्रभाव इस्लाम का पहला मूलतत्त्ववादी कहा जानेवाला संगठन 'अखवानुल मुस्लिमून" यानी मुस्लिम ब्रदरहुड (स्थापना 1928 में हसन अल्‌ बन्ना द्वारा) के साथ ही उसके बाद बने अनेक संगठनों पर भी है। सय्यद कुत्ब के अनुसार इस्लाम केवल दो ही समाजों को जानता है ः एक इस्लामी समाज और दूसरा अज्ञानयुक्त समाज (गैरइस्लामी)। इस्लाम का अनुसरण न करनेवाले मुस्लिम शासक को पदच्युत कर देना चाहिए जबकि वहाबीयों का कहना रहता है इस्लामी राज्य के मुस्लिमों को मुस्लिम शासक के साथ वफादार रहना चाहिए। इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि सऊदी शासक के विरुद्ध कार्रवाई करनेवाला ओसामा बिन लादेन वहाबी ना होकर कुत्बी था।


सय्यद कुत्ब की जिहाद के संबंध में भूमिका हैः 'पृथ्वी पर 'अल्लाह का राज्य" स्थापित करना इस्लाम का ध्येय है। 'इस्लाम मनुष्य को उदात्त बनाने के लिए, पृथ्वी के और इसलोक के, रक्त और मांस के बंधनों से उसे मुक्त कराने के लिए आया हुआ है"। वे लिखते हैं : ''सत्य और असत्य इनका सहअस्तित्व पृथ्वी पर रह नहीं सकता। जब इस्लाम पृथ्वी पर अल्लाह का राज्य स्थापित करने की और मानव को दूसरों की पूजा से मुक्त करने की, सार्वजनिक घोषणा करता है, तब उसका विरोध वे ही करते हैं कि जिन्होंने पृथ्वी पर अल्लाह के राज्य पर कब्जा कर रखा है। वे (लोग) कभी भी शांति लाने वाले नहीं हैं। फिर इस्लाम उन्हें नष्ट कर उनके सामर्थ्य से मानव को मुक्त कराने के पीछे पड़ता है......यह हमेशा चलने वाली स्थिति है। जिहाद का स्वतंत्रता युद्ध जब तक (पृथ्वी पर) संपूर्ण (अथवा एकमेव) धर्म अल्लाह का नहीं हो जाता, तब तक रूकने वाला नहीं है।""


कुरान के ध्येय के विषय में वे लिखते हैं :''यह धर्म यानी कुछ केवल अरब मनुष्यों की स्वतंत्रता की घोषणा नहीं यह केवल अरबों तक सीमित रहने वाला मर्यादित संदेश नहीं ...'उसका ध्येय अखिल मानव जाति है । उसकी व्याप्ती 'विश्व" है! ...अल्लाह केवल कुछ अरबों का देवता नहीं ... वह विश्व का देवता है! और यह धर्म संपूर्ण विश्व को अपने अल्लाह की ओर लेकर जाने वाला है।"" इस संदर्भ में जिहाद का उद्देश्य बतलाते हुए वे लिखते हैं :''यह सार्वत्रिक क्रांति घटित करवाना जिहाद का कार्य है... यह क्रांति होने पर सर्वत्र शांति का साम्राज्य अवतरित होगा-विचारों में, घरों में, समाज में और अंत में मानव जाति में शांति!"" 'शांति शाश्वत है, युद्ध अपवाद है," इस प्रकार का सिद्धांत प्रतिपादित कर 'एकमात्र अल्लाह के धर्म से जब लोग दूर जाने लगते हैं तब युद्ध की आवश्यकता निर्मित होती है" यह दिखला देते हैं । वे घोषित करते हैं :''इस्लाम में कानूनसम्मत जिहाद एक ही है, वह है संसार पर अल्लाह के धर्म का प्रभुत्व निर्मित करने के लिए किया हुआ युद्ध!"" उनके मतानुसार कुरान की दृष्टि से यही 'अल्लाह के कार्य के लिए संघर्ष" है!


इब्न अब्द-अल-वहाब का जन्म 1703 में सऊदी अरेबिया के आईना गांव में हुआ था। बचपन में ही पिता से उसने हदीस व हनबाली न्यायप्रणाली व कुरानभाष्य की शिक्षा ग्रहण की। हजयात्रा पश्चात कुछ समय मदीना में बीताने के बाद वह नज्द में स्थायी हो गया। नज्द में रहते उसके ध्यान में यह बात आई कि अनेक मुस्लिम कब्रों तथा विशिष्ट मस्जिदों को पवित्र समझ उनको भेंट देते हैं। कुछ मुसलमान मद्यपान व तंबाकू का सेवन भी करते हैं। कुछ लोग जपमाला उपयोग में लाते हैं। पैगंबर द्वारा प्रतिबंधित रेशमी वस्त्र भी पहनते हैं, तो कुछ सूफियों के चक्कर में भी पडे हुए हैं। मुस्लिमों का यह आचरण विशुद्ध इस्लाम से विसंगत था।


अल्लाह के एकत्व के अति आग्रह को जमीनी धरातल पर लाने के लिए उसे राजनैतिक समर्थन की आवश्यकता महसूस हुई। नज्द क्षेत्र के दिरिय्या प्रदेश के प्रमुख मुहम्मद इब्न सौद (मृ.1765) के साथ उसने 1744 में गठबंधन कर लिया। यह गठबंधन राजनैतिक ही नहीं रहा अपितु इब्न सौद ने वहाब की लडकी से विवाह भी कर लिया। इस गठबंधन के अनुसार इब्न सौद श्रद्धाहीनों के विरुद्ध जिहाद करेगा इसके बदले में वह मुस्लिम समाज का इमाम अथवा नेता होगा तो वहाब धार्मिक मामलों का नेता होगा। वहाब के विचारों से असहमत लोगों के विरुद्ध किया गया जिहाद तीस वर्ष चला और रियाद की पराजय के बाद 1773 में सौद घराना सत्ता में आया। इसी सौद घराने पर से सऊदी अरेबिया नाम पडा। सौद के पुत्र अब्दुल अजीज ने 1801 के अप्रैल में धर्मभ्रष्ट शियाओं के तिरस्कार के कारण इमाम हुसैन की दरगाह को ध्वस्त कर दिया था। वहाब (मृ.1791) के बाद भी आज तक उसका प्रभाव कायम है।


वहाबी पंथ के अनुयायी सऊदी का शाह और उनका शाही परिवार कट्टर होकर इस्लाम के अन्य पंथों को न तो उनकी मान्यता के अनुसार हज करने देता है ना ही उनकी सम्मानित धार्मिक पुस्तकों को तक सऊदी में लाने देता है और जो कोशिश करता है उस पर कोडे बरसाये जाते हैं। इसलिए भारत सहित अनेक देशों के लोग सऊदी के इस आतंक और अत्याचार से पीडित हैं। कुछ वर्ष पूर्व भारत के एक सम्मानित मौलाना को बिना हज किए इसलिए भारत रवाना कर दिया गया क्योंकि वे अपने पंथ की इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित पुस्तक का पठन कर रहे थे। पहले उन्हें जेल में डाला गया, फिर भारत भिजवा दिया गया। उनकी पत्नी को स्नानागार तक में बंद करने की गंदी हरकत की गई। इसके विरोध में सन्‌ 1886 में मुंबई सहित अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए थे।


सऊदी अथाह धन-दौलत के बलबूते अपनी यह खतरनाक विचारधारा पूरी दुनिया में निर्यात कर रहा है। खाडी के देशों के अलावा इजिप्त, सूडान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया आदि में इस विचारधारा का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ रहा है। जनरल जिया उल हक के कार्यकाल में पाकिस्तान में वहाबीयों का प्रभाव बढ़ा। सेना में अधिकारियों के प्रमोशन की कसौटी इस्लाम पर श्रद्धा तय कर दी गई। वहाबी मदरसे के स्नातकों को सेना में प्रवेश दिया गया। नतीजा आज पाकिस्तान विनाश के कगार पर है। बांग्लादेश में भी शिक्षा और सेना के क्षेत्र में वहाबी प्रसार बढ़ रहा है। वहां खुदा हाफिज ना कहते सऊदी पद्धति का अल्लाह हाफिज कहना रुढ़ हो रहा है। सऊदी धन के बल पर भारत में भी वहाबी विचारधारा का प्रसार बढ़ रहा है। अहले हदीस नामका संगठन का भारत में विस्तार उसीका एक भाग है। सन्‌ 2007 में वहाबी गुट के मुफ्तियों ने एक फतवा जारी कर ताजमहल और हुमायूं के मकबरे समेत विश्वभर के मकबरों को नेस्तनाबूत करने का ऐलान किया था। 

छोड दें अल्लाह के राज की बातें

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यदि हम इस्लामी जगत पर दृष्टि डालें तो यह दिख पडेगा कि पूरा का पूरा इस्लामी जगत आपसी विवादों, झंझटों, प्रतिस्पर्धाओं में उलझा हुआ है। ये सब मतभेद वैचारिक तो हैं ही लेकिन इस कदर हिंसक, जानलेवा हैं कि मानो ये एक ही धर्म के पालन करनेवालों के न होकर एक दूसरे के कट्टर दुश्मनों के हों। पाकिस्तान में ये झगडे शिया-सुन्नी-कादियानी या अहमदियाओं के बीच हैं। जो अत्यंत हिंसक होकर वहां रोज ही किसी ना किसी मस्जिद या सार्वजनिक स्थान पर हिंसा के मंजर नजर आना आम है। अहमदियों को तो पाकिस्तान ही नहीं वरन्‌ अनेक इस्लामिक देशों में गैर मुस्लिम ही घोषित कर दिया गया है। पडोसी बांग्लादेश भी इस्लामी कट्टरपंथ का सामना कर रहा है।


भारत में यही कलह बरेलवी देवबंदियों के बीच नजर आती है। ये दोनो ही संप्रदाय सुन्नी हैं और भारतीय मुस्लिमों की जनसंख्या का बहुसंख्य हैं। इनमें भी बरेलवी बहुसंख्य हैं यही स्थिति पाकिस्तान एवं बांग्लादेश में भी है। बरेलवी लचीली विचारधारा रखते हैं जबकि देवबंदी कट्टर होते हैं, संख्या में कम होने के बावजूद वे अधिक संगठित और आक्रमक होते हैं। उनके भारत में अनेक संगठन एवं प्रकाशन संस्थाएं हैं। विभाजन पूर्व हिंदुस्थान के बरेलवी पाकिस्तान आंदोलन में बडी संख्या में सहभागी हुए थे। जबकि बहुसंख्य देवबंदियों ने पाकिस्तान निर्माण का विरोध किया था। 1885 में कांग्रेस की स्थापना का देवबंद ने स्वागत किया था। इन्हीं देवबंदियों को राष्ट्रीय मुसलमान कहा गया। इनका विरोध भारतप्रेम के कारण ना होकर वे संपूर्ण भारत को इस्लाममय देखना चाहते थे इसलिए था। वर्तमान में पाकिस्तान में कार्यरत 'जमीयत उलेमा इ इस्लामी" नामका देवबंदी संगठन उन चंद देवबंदियों का है जिन्होंने पाकिस्तान का समर्थन किया था। जिन्हें शब्बीर अहमद उस्मानी ने संगठित किया था। कांग्रेस का समर्थन करने के लिए देवबंदी उलेमाओं ने 1919 में 'जमियत उलेमा इ हिंद" नामका भारतव्यापी संगठन खडा किया था। मौ. आजाद उसके अनेक वर्षों तक अध्यक्ष रहे थे।


कुरान और पैगंबर की सुन्नाह पर आधारित 'विशुद्ध इस्लाम" पर देवबंदी जोर देते हैं। मुस्लिमों के दैनिक जीवन के व्यवहार में प्रवेश कर चूकी गैरइस्लामी प्रथाओं का समूल नाश करने के लिए देवबंदी प्रयत्नशील रहते हैं। पैगंबर के बतलाए मार्ग पर ना चलने के कारण ही मुस्लिमों की दुर्दशा हो गई है एवं खोया हुआ वैभव प्राप्त करने के लिए मुसलमानों को पुनः विशुद्ध इस्लाम का अचूक पालन करना चाहिए। समाज सुधार के नाम पर इस्लाम में किसी भी तरह के बदलाव का देवबंदी तीव्र विरोध करते हैं। देवबंदियों का आग्रह रहता है कि सच्चे मुसलमान को राष्ट्र की नहीं अपितु वैश्विक मुस्लिम 'उम्मा" की सीमाओं को स्वीकारना चाहिए। तबलीगी जमात और सिमी इसीके अपत्य हैं। कंधारकांड का आतंकवादी मसूद अजहर देवबंदी ही है। पाकिस्तान के जनरल मुशर्रफ और जनरल जिया उल हक भी देवबंदी ही हैं।


बरेलवी पैगंबर के साथ-साथ खलीफा और इस्लाम के सेवक के रुप में पीर, फकीर और औलियाओं को भी मानते हैं। कब्र के सामने घुटने टेकना, उसके चुंबन लेना, उस पर फूल बिखेरना, चादर चढ़ाना, उनके नाम पर भोज आयोजित करना तथा मृतकों के नाम से फातेहा पढ़ना जिसे हम श्राद्ध भी कह सकते हैं। बनाए हुए पकवानों को वितरित किया जाता है (नजर और नियाज)। इस प्रकार से कब्र के सम्मान करने पर अल्लाह का 'तबर्रुक" (आशीर्वाद) प्राप्त होता है और यह इस्लाम से सुसंगत ही है यह बरेलवियों का मानना है। विवाह के अवसर पर नाच-गाना करते हैं। भले ही नमाज के लिए उपस्थित ना हों परंतु, पीर के स्मृतिदिन पर हाजिर रहना अनिवार्य मानते हैं। कुरान के अतिरिक्त हदीस व शरीअत संबंधी अन्य पुस्तकों के साथ-साथ इस्लाम के इन उपर्युक्त बुजुर्गों की पुस्तकों का अध्ययन भी बरेलवी करते हैं और उन्हें अपने जीवन में आचरण में लाने का प्रयत्न भी करते हैं। देवबंदी ऐसा कुछ नहीं करते बल्कि विरोध ही करते हैं।


'अल्लाह का पैगंबर पर प्रेम रहे और उन्हें शांति मिले" (पीबीयूएच, सलल्लाहू अलैहिवसल्लम) का उद्‌गार बरेलवी बडी जोर से और विशिष्ट प्रसंगों पर (विशिष्ट प्रार्थना के बाद, अजान अथवा नमाज की पूर्व सूचना के समय) निकालते हैं, यह देवबंदियों को मान्य नहीं। बरेलवियों का मानना है कि पैगंबर अतिमानवी थे तो देवबंदी उन्हें 'इन्सान इ कामिल" परिपूर्ण मनुष्य मानते हैं। पैगंबर के जन्मदिवस का उत्सव समारोहित करना देवबंदियों को मान्य नहीं। इससे अल्लाह के एकत्व को ठेस पहुंचती है, ऐसा उनका कहना है। जबकि बरेलवी मानते हैं कि पैगंबर 'इल्म ए गायब" (गूढ़ ज्ञान) थे। बरेलवी संस्थापक अहमद रजाखान के कुरान भाष्य पर सऊदी में बंदी है। सन्‌ 2002 में जनरल मुशर्रफ ने आतंकवाद के आरोप तले जिन 12 संगठनों पर बंदी लाई थी उनमें 'दावत ए इस्लामी" भी शामिल था। यह देवबंदियों की तबलीगी जमात का समानांतर संगठन है। दावत ए इस्लामी का आग्रह रहता है कि महिलाएं बुरका पहने, मुस्लिम घर में टीव्ही ना रखे। इसके सदस्य जब आपस में मिलते हैं तो एक दूसरे को 'मदीना ए मदीना" कहते हैं। मतभेद होना कोई बडी बात नहीं परंतु यह मतभेद वैचारिक न रहते कई बार बरेलवी और देवबंदी आपस में सशस्त्र-हिंसक संघर्ष पर भी उतर आते हैं।


इस प्रकार के संघर्ष देश ही नहीं विदेशों में भी नजर आते हैं। प्रायः अन्य धर्मीय लोग अपने-अपने पवित्र स्थलों पर तो भी हिंसक संघर्ष को टालते हैं। परंतु, मुस्लिम तो हज जैसी पवित्र तीर्थ यात्रा जिसे हर मुसलमान ने जीवन में एक बार तो भी करना चाहिए और जो इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है पर भी अपने मतभेदों को भूला नहीं पाते और हिंसक हो जाते हैं। ईरान-इराक के बीच चले आठ वर्ष लंबे युद्ध के दौरान कुवैत और सऊदी ने इराक का साथ दिया था। बदला लेने के लिए ईरान ने हजयात्रा का पूरा लाभ उठाया और सऊदी कोटे को नकार कर दो लाख से अधिक ईरानियों को हजयात्रा पर भेज दिया जो रास्ते भर सऊदी और अमेरिका हाय हाय के नारे लगाते रहे। तीन साल तक हजयात्रा के दौरान सशस्त्र संघर्ष होता रहा। हजयात्रा के दौरान अनेक बार दंगे और मारपीट की घटनाएं होती रहती हैं।


शिया-सुन्नी विवाद तो जगजाहिर है। कुछ कट्टर सुन्नी विद्वान शियाओं का उपहास 'रफीदी" (नकारनेवाले) के रुप में करते हैं। कुरान की कुछ आयतों (3ः7, 3ः110) का अर्थ शिया अलग निकालते हैं। दैवी न्याय के विषय में दोनों में मूलभूत अंतर है। परलोक में अल्लाह को प्रत्यक्ष देखना संभव है यह सुन्नी धारणा है तो, ऐसा संभव नहीं यह शिया धारणा है। भले ही शिया-सुन्नी एक ही कुरान को मानते हैं परंतु, दोनो को प्रमाण के रुप में मान्य हदीस संकलन भिन्न-भिन्न हैं। अजान (नमाज की पुकार), नमाज के समय और उसकी पद्धति में शिया-सुन्नियों में मतभेद हैं। शिया पांच की जगह तीन बार ही नमाज पढ़ते हैं। शिया जमीन पर 'तुरबा" (करबला की मिट्टी अथवा पत्थर का टुकडा) रखते हैं और सिर झुकाते समय टुकडे को मस्तक लगाते हैं। शिया और सुन्नी दोनों में ही कई पंथोपपंथ हैं।


दकियानूसी कहकर देवबंदियों की आलोचना होती है तो आतंकवादी कहकर तबलीगी और वहाबी दोषी माने जाते हैं जबकि सहिष्णु कहकर सूफियों को जाना जाता है वैसे सूफी सहिष्णुता में कितना तथ्यांश है यह एक अलग विषय है। परंतु, सूफी जो शिया अथवा सुन्नी कोई भी हो सकता है किंतु अधिकांशतः सुन्नी ही होते हैं। सूफियों का मत है कि शियाओं की 'इमामह" संकल्पना सूफी विचारों से विसंगत है। अनेक शियाओं ने सूफियों का जबरदस्त विरोध किया है।सेलजूक और ऑटोमन सुन्नी तुर्कों ने शियाओं पर अत्याचार किए थे। ईरानी शिया आका मुहम्मदअली ने अनगिनत सूफियों का कत्लेआम कर 'सूफी-कुश" की पदवी हासिल की थी। ईरान शिया शासित है और वह शिया शासित कैसे हुआ -''सन 1490 के आसपास इस्माईल नामक युवक ने संपूर्ण ईरान जीत लिया, उसे सुन्नीयों से अत्यंत घृणा थी। वह स्वयं शिया था। उसने सुन्नीयों के सामने दो विकल्प रखे। एक तुम मत परिवर्तन कर शिया बन जाओ अथवा मरने के लिए तैयार हो जाओ। देखते ही देखते ईरान के सुन्नी शिया बन गए।"" ईरान के विदेशमंत्री रहे जावेद जरीफ का कहना है 'मुसलमानों के शिया और सुन्नी समुदाय के बीच तनाव न केवल क्षेत्र विशेष बल्कि दुनिया भर में शांति को खतरा है।"


मुस्लिम समाज मेें अंतरकलह एवं मतभेद केवल उन्हीं देशों में ही नहीं है जहां वे अल्पसंख्य हैं बल्कि इस्लामी देशों में भी है। मध्य एशिया से लेकर दक्षिण पूर्वी एशिया तक के मुस्लिम देश आपसी टकराव के शिकार हैं। इस्लामी कट्टरपंथी उन राष्ट्रों की सरकारों का तख्ता पलटने तक का प्रयास करते हैं जो उदारवादी पश्चिमी दृष्टिकोण रखते हैं। जिन राष्ट्रों पर अमेरिका और पश्चिमी राष्ट्रों का विशेष प्रभाव है वे तो इनके निशाने पर ही रहते हैं। इजिप्त, ट्यूनिशिया, सऊदी अरब, अल्जीरिया आदि। सूडान और नाइजेरिया भी पीडितों में शामिल हैं। सीरिया में सुन्नी चरमपंथी सक्रिय हैं, गृहयुद्ध छिडा हुआ है। सुन्नियों के पीछे सऊदी तो शियाओं के पीछे ईरान होकर वहां इन दोनों द्वारा एक छद्‌म युद्ध लडा जा रहा है।


कुर्दों को 1946 में ईरान ने कुचला तो, 1987-88 में इराक के सुन्नी सद्दाम हुसैन ने 'अन्फल मुहिम" चलाकर कुर्दों का संहार किया। शियाओं को भी कुचला। लाखों कुर्द और शिया विस्थापित हो शरणार्थी के रुप में जीने के लिए विवश कर दिए गए थे। तुर्की ने कुर्दों को शह दी तो ईरान ने शिया विद्रोहियों को। इसी सद्दाम ने 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कुवैत को हडप लिया था। ईरान-इराक युद्ध आठ वर्ष चला लाखों मुसलमान इस युद्ध में मारे गए। उत्तरी यमन और दक्षिण यमन में भी संघर्ष लंबे समय तक चला। अस्थिरता का शिकार बना हुआ मिस्त्र मुस्लिम ब्रदरहुड से परेशान है। तुर्की में भी इस्लामी कट्टरपंथी हावी होना चाहते हैं। लेबनान में शिया चरमपंथी हिजबुल्लाह सक्रिय है। सऊदी की शह पर लेबनान में अराजकता फैलाई जा रही है। आफ्रीका का माली, सोमालिया भी त्रस्त हैं।


शायद ही कोई मुस्लिम राष्ट्र हो जहां आजादी के बाद प्रजातांत्रिक सरकार का गठन हुआ हो और वह भलीभांति काम कर रही हो। सभी मुस्लिम देश कट्टरपंथी आंदोलन की गिरफ्त में हैं। सिंगापूर, मलेशिया और इंडोनेशिया तक में कट्टरपंथी कार्यरत हैं। अनेकानेक आतंकवादी संगठन जैसेकि अलकायदा, अलशबाब, इख्वानुल मुस्लिमीन, तालिबान, बोकोहराम, मोरो लिबरेशन फ्रंट आदि, सक्रिय हैं। इन इस्लामी कट्टरपंथियों से सारी दुनिया परेशान है ये गैरमुस्लिमों को ही नहीं वरन्‌ अपने मुस्लिम बंधुओं को भी नहीं बख्शते। मुस्लिम समाज का एक बहुत बडा भाग करें तो क्या करें की मनःस्थिति में है। क्योंकि, उन्हें धर्म के नाम पर हमेशा से ही संरक्षण मिलता रहा है।


अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस समस्या का क्या समाधान निकाला जाए! जब तक इस्लाम में धर्म और राजनीति के घालमेल को समाप्त नहीं किया जाता जैसाकि ईसाई धर्म में हो चूका है तब तक हल निकलनेवाला नहीं है। धर्म और राजनीति के बीच भेद रेखा खिंचनी ही पडेगी। धर्म के नाम पर सब जायज है यह छोडना ही पडेगा। मतभेदों को दूर करने का सबसे अच्छा मार्ग है प्रजातंत्र। विचारों के आदान-प्रदान की स्वतंत्रता को मान्यता देनी पडेगी। केवल शासन पद्धति ही नहीं अपितु सामाजिक रचना भी प्रजातंत्र में विश्वास रखनेवाली बनानी पडेगी।


मुसलमान इस्लामी देशों में तो दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सुविधा, उनके जायज अधिकारों का हनन करें और गैरमुस्लिम देशों में अल्पसंख्यक बनकर उपर्युक्त सारी चीजें हासिल करने की मांग करें यह गलत है। दार उल हरब को साम-दाम-दंड की नीति अपनाकर दार उल इस्लाम बनाने की मानसिकता को त्यागना पडेगा। धर्मांतरण हिंसा है को मानना पडेगा। भूतकाल में अरब टोलियों ने जो देदीप्यमान इतिहास बनाया था उसकी ओर देखकर वर्तमान में भूतकाल का जीवन जीने की मानसिकता को त्यागना ही होगा। यह समझना पडेगा कि उसी प्रकार से देशों को जीतना संभव नहीं। आज वो शक्तियां भी मौजूद नहीं, आज की शक्तियां एकदम अलग हैं। अब कोई उद्धारकर्ता आनेवाला नहीं है, यह संभव ही नहीं है। हर देश को इस्लामी बनाकर सारी दुनिया को इस्लाममय बनाने का सपना देखना यानी अल्लाह के राज की बातें करना, हुकुमते इलाही के सपने को साकार करने के प्रयत्न करने के दकियानूसी सिद्धांत को छोडना ही पडेगा। वरना सारी दुनिया में हिकारत एवं शक की नजरों से देखे जाते रहोगे, अपमानित होते रहोगे।