Thursday, January 2, 2014


  1. तिरस्कृत बहिष्कृत तालिबा

  2. पिछले दिनों पाकिस्तान के 50 मुस्लिम उलेमाओं (सुन्नी इत्तेहाद काउंसिल) ने संयुक्त रुप से एक फतवा जारी कर 'तालिबान" को इस्लाम से निष्कासित कर तालिबान को 'ख्वारिज" नाम दिया है। फतवे में तालिबान के खिलाफ कार्रवाई में सरकार की मदत करना हर नागरिक का धार्मिक कर्तव्य है का आह्वान किया गया है। इसे देवबंद के दारुल उलूम वक्फ मुफ्ती आरिफ कासमी ने जायज करार दिया है। यह फतवा अब ही क्यों दिया गया पहले क्यों नहीं दिया गया के विवाद में हम पडना नहीं चाहते क्योंकि इस बहस में पडने की बजाए इस 'ख्वारिज" शब्द के पीछे जो इतिहास छुपा हुआ है वह जानना अधिक महत्वपूर्ण है। 'ख्वारिज" 'खारिजी" जो कि एक अरबी शब्द है का बहुवचन होकर उर्दू-हिंदी शब्दकोश के अनुसार इसका अर्थ-बाहरी,  मुसलमानों का एक समूह जो मुस्लिमों के आदर्श खलिफाओं में से चौथे खलिफा अली को नहीं मानता है। और शिया, सुन्नी से इतर है। खारिजी द्योतक है उस समूह का जो 'उम्मा" (मुस्लिम एकता) का विघटन चाहता है और इस्लाम से निकला हुआ है। 

  3. सीरिया के शासक मुविया (पैगंबर की पत्नी उम्म हबीबा का भाई) और खलिफा अली (पैगंबर के दामाद) की खिलाफत (प्रतिनिधित्व, मुहम्मद साहब के बाद उनकी जानशीनी) के प्रश्न पर सिफीन के मैदान पर हुई लडाई में जिसमें दोनो पक्षों के मिलाकर 70 से 90,000 मुस्लिम मारे गए थे और भारी संख्या में लोग जख्मी हुए थे। जिनमें पैगंबर के अनेक सहयोगी होकर उनमें से 25 वो थे जो इस्लाम के इतिहास के प्रसिद्ध 'बद्र" युद्ध में भी भाग ले चूके थे। दोनो ही ओर से मारनेवाले और मरनेवाले सारे मुसलमान ही थे एवं दोनो ही पक्ष अल्लाह के कार्य के लिए, अल्लाह के नाम से और सत्य की विजय के लिए लड रहे थे।

  4. यह प्रचंड हानि देख अली का ह्रदय विदीर्ण हो गया वह कहने लगा इस तरह से तो सारे अरब ही नष्ट हो जाएंगे। पराजय अटल देख मुविया को भी लडाई रोकने की आवश्यकता महसूस हो रही थी। उसके सेनापति अमर ने एक उपाय सुझाया कि अली की सेना में फूट डालने के लिए ''...अपन भाले की नोंक पर पवित्र कुरान की प्रतियां लटकाएं और अली के सैनिकों को तलवार की बजाए अल्लाह के ग्रंथानुसार निर्णय लेने का आवाहन करें।"" ऐसा होने पर अपने को प्रतिसाद मिलेगा अली की सेना में फूट पड जाएगी। इस अनुसार दूसरे दिन कुरान की प्रतियां इकट्ठा की गई, केवल 5000 प्रतियां मिलने पर कुरान के पन्ने फाडकर सैनिकों को दिए गए।  कुछ ग्रंथों के अनुसार केवल सेना के अगले भाग के पांच लोगों ने अपने भालों की नोंक पर पांच प्रतियां खडी की। मुविया के सैनिक जोर-जोर से कहने लगे ''अब मुस्लिमों का रक्त बहाना रोको। अल्लाह के ग्रंथानुसार निर्णय लो। उसमें सारे नीतिमूल्य बतलाए गए हैं। उसमें मुस्लिमों के रक्त को बहाना प्रतिबंधित किया गया है।"" यह आवाहन सुनकर अली की सेना का 20,000 का एक गुट जिन्हें ही बाद में 'खारिजी" यानी 'छोडकर जानेवाले" कहा गया बाजू में हो गया। वे प्रतिपक्ष के सूर में सूर मिलाकर कहने लगे ''अब निर्णय अल्लाह के ग्रंथानुसार ही !""

  5. अली ने उन्हें समझाना चाहा परंतु उसका समझाना व्यर्थ गया है उलटे उन्हीं पर वे आरोप लगाने लगे और इतने आक्रमक तेवर अपना लिए कि असहाय होकर अली ने सेनापति को संदेश भेजकर युद्ध रोकने का आदेश भेजा परंतु उसने इंकार कर दिया और विद्रोही सैनिकों से कहने लगा जब विजयश्री हाथों में आने जा रही है तब तुम युद्धबंदी क्यों चाहते हो? परंतु विद्रोहियों ने अपना आग्रह न छोड कहना आरंभ किया कि, ''कल भी हम अल्लाह के कार्य के लिए लडे थे और आज भी हमने अल्लाह के कार्य के लिए लडाई रोकी है। हम खलिफा (शासक) के आज्ञाधारक ना होकर अल्लाह के आज्ञाधारक हैं।"" अंत में असहाय होकर अली ने अपने युद्धबंदी के निर्णय को अमल में लाया। 

  6. युद्धबंदी मान्य होने के बाद विद्रोहियों के एक नेता कैस ने खलिफा से कहा ''अल्लाह के ग्रंथ का निर्णय मानने का कौनसा अचूक अर्थ मुविया को अभिप्रेत है यह जानने के लिए मुझे उसके पास जाने की अनुमति दोगे क्या?"" अनुमति देना ही पडी। दमास्कस जाकर उसने मुविया से पूछा ''भालों पर कुरान की प्रतियां खडी करने के पीछे तुम्हारा उद्देश्य क्या था?"" मुविया ने उत्तर दिया ''यह कि दोनो पक्ष तलवार की बजाए अल्लाह के ग्रंथ के आधार पर लिए निर्णय को मान्य करें। यानी दोनो ही पक्ष रणभूमि से पीछे हटें, प्रत्येक पक्ष एक विश्वसनीय पंच को नियुक्त करे, वे दोनो पंच (पंचायत) शपथ लेकर अल्लाह के ग्रंथानुसार निर्णय दें कि, कुरान व पैगंबर के वचनों के अनुसार खलिफा पद का अधिकारी कौन है? इसका निर्णय सभी पर बंधनकारक हो।"" 

  7. कैस ने यह निर्णय आकर अली को बतलाया परंतु कैस ने बिना अली की अनुमति के पंचायत के प्रस्ताव को मान्यता दे डाली थी। अली को यह प्रस्ताव मान्य ना था। उसका दावा था कि खिलाफत का प्रश्न विवाद का मुद्दा ही नहीं है। वे कानूनन खलिफा हैं। परंतु विद्रोही सैनिकों ने उन्हें यह निर्णय मान्य करने के लिए बाध्य किया। परंतु, यह निर्णय स्वीकारने के लिए बाध्य करने के बारे में बाद में उन्होंने एक भाषण में कठोर प्रहार करते हुए कहा ''.... तुम्हें अब कभी भी सत्य प्राप्ति या सत्य के दर्शन नहीं होंगे।"" तालिबान के बारे में तो निश्चय ही अली के वचन फलीभूत हुए हैं। तालिबान की मार्गभ्रष्टता के कारण ही आज उन्हें न तो माफी के लायक ना ही उनके कृत्यों को जायज ठहराया जा रहा है और खवारिज का नाम दिया जा रहा है।

  8. अली ने इस पंचायत की जानकारी सैनिकों को देने का काम कैस को सौंपा। जब उसने सेना में जानकारी देना प्रारंभ किया तो  अनेक टोलियों ने आक्षेप लेना प्रारंभ कर दिया। उन सबका कहना था कि पंचायत का प्रस्ताव मान्य करना ही इस्लाम विरोधी है। ''निर्णय देने का अधिकार अल्लाह को है, मनुष्य को नहीं"" इस प्रकार की घोषणाएं शुरु हो गई। अरबी में यह घोषणा इस प्रकार थी ''ला हुकूम इलाहइल्लल्लाह""। अली ने उत्तर दिया ''यह अनुबंध करने के लिए तुम्हींने मुझे बाध्य किया है और अब मैंने वह मान्य करने पर तुम मुझे उसके विरुद्ध जाने के लिए कह रहे हो! क्या एक बार किया हुआ करार तोडा जा सकता है? नहीं, वह इस्लामानुसार अनुज्ञेय नहीं। दिया हुआ वचन अब मैं कैसे तोडूं? इसलिए अब लडाई ना करते पंचायत का निर्णय आने तक राह देखना पडेगी।""जैसे तैसे सैनिक शांत हुए और अली के साथ कुफा आने के लिए राजी हुए।

  9. युद्धभूमि से सभी सैनिक वापिस नहीं आए उनमें से लगभग 12,000 लोगों ने कुफा आने से इंकार कर दिया। इन टूटकर निकलनेवालों को 'खारिजी" कहते हैं। ये वही लोग थे जिन्होंने अली को युद्धबंदी के लिए बाध्य किया था। उन्होंने अपनी नीति घोषित की- ''केवल अल्लाह की आज्ञा पाली जाना चाहिए। निष्ठा केवल अल्लाह के प्रति रखी जाना चाहिए। लोगों को बतलाना हमारा कर्तव्य है कि, ... इस्लाम में खलिफा अथवा राज्यकर्ता नहीं होता। विजय के बाद सारी बातें मुसलमानों द्वारा परस्पर सलाह मशविरे से तय की जाना चाहिए और उसमें के बहुसंख्यों का ही निर्णय माना जाना चाहिए। अली और मुविया दोनो ही मार्गभ्रष्ट हो गए हैं।... हम पहले दोनो के विरुद्ध लडेंगे विजय प्राप्ति व सत्ता हाथों में आने के बाद अल्लाह के ग्रंथानुसार सारी बातें मुसलमानों से विचारविनिमय कर  सभी प्रश्नों पर निर्णय लेनेवाले हैं।"" इस प्रकार से अली और मुविया दोनो के ही विरोध में कट्टर धर्मनिष्ठ मुस्लिमों का तीसरा सशस्त्र गुट तैयार हुआ। ये खारिजी टोली-प्रजातंत्र वृत्ति के थे। किसी के हाथ की कठपुतली बनकर रहना उनके स्वभाव में नहीं था। परंतु, अली के साथ हुई चर्चा के बाद उन्होंने कुफा आकर फैसला आने तक शांत रहने की विनती को मान्य कर लिया।

  10. तय किए हुए अनुसार छः महीने बाद यानी जनवरी 658 में दोनो ही न्याय पंच एकत्रित हुए। परंतु यहां अली के साथ धोखा हुआ और अनपेक्षित रुप से मुविया को खलिफा घोषित कर दिया गया। इस निर्णय के बडे ही दूरगामी परिणाम हुए। यह निर्णय यानी मुविया की राजनैतिक जीत थी और अली के खलिफा पद को प्रचंड धक्का। अली ने यह निर्णय पंचों द्वारा धोखाधडी कर लिया गया होकर अल्लाह के ग्रंथानुसार नहीं है इसलिए मान्य करने से इंकार कर दिया। इस निर्णय के कारण मुस्लिम जगत में परस्पर विरोधी दो शत्रु गुट तैयार हो गए। इतिहास की दिशा ही बदल गई। खलिफा कौन हो, यह प्रश्न निरंतर वादग्रस्त हो गया। शांति की बजाए तलवार से तय किया जाने लगा। ''इस्लाम में खिलाफत के प्रश्न पर से जितना रक्तपात हुआ है उतना अन्य किसी पर भी नहीं हुआ है।''

  11. पंचायत को नकार कर अली ने मुविया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की और असंतुष्ट खारिजियों को भी उसमें शामिल होने का आवाहन किया। खारिजी पंचायत का निर्णय चाहते ही नहीं थे। उन्होंने उत्तर दिया ''तुम्हारी यह लडाई अल्लाह की प्रसन्नता के लिए ना होकर तुम्हारे स्वार्थ के लिए है। हम तुम्हें अल्लाह द्वारा तिरस्कृत धर्मत्यागी (काफिर) समझते हैं। अगर तुम जाहिर रुप से अपनी श्रद्धाहीनता की कुबूली देकर (अल्लाह के पास) पश्चाताप व्यक्त करो तो तुम्हें सहायता करने के बारे में विचार किया जाएगा अन्यथा हम तुमसे पराकाष्ठा की लडाई लडेंगे। अल्लाह तत्त्वहीन (श्रद्धाहीन) लोगों पर प्रेम नहीं करता।"" मैंने कोई सा भी अपराध नहीं किया है कहकर अली ने पश्चाताप व्यक्त करने से इंकार कर दिया। अंत में अली व खारिजियों में कोई समझौता हो ना सका।

  12. खारिजी इस्लाम में निर्मित हुआ आद्य पंथ है। उन्होंने खिलाफत की जो तात्त्विक प्रस्तुती की है इस कारण इस पंथ को बहुत महत्व है। वे इस्लाम के पहले मूलतत्त्ववादी माने जाते हैं। वे विशुद्ध इस्लाम के समर्थक थे। शिया पंथ राजनैतिक आधार पर निर्मित हुआ था तो, यह पंथ धार्मिक आधार पर निर्मित हुआ था। इनकी तात्त्विक भूमिका विस्तार भयावश यहां दे नहीं रहे हैं परंतु खारिजी कुरान की एक आयत (4ः100) से संबंधित है। 'खारिजी" यानी वे लोग जो श्रद्धाहीनों की बस्ती के अपने घर छोडकर अल्लाह के कार्य के लिए दूसरी ओर निकल जाते हैं। वे अत्यंत धर्मनिष्ठ होकर मुस्लिम समाजांतर्गत सामाजिक समता उनका आदर्श था। 'सारे मुसलमान परस्पर बंधु हैं", इस सिद्धांत पर उनका विश्वास था। श्रद्धाहीन कौन इस संबंध में उनकी कुरानाधारित भूमिका बडी विशिष्ट थी- खारिजियों के अतिरिक्त अन्य मुसलमान मुसलमान न होकर श्रद्धाहीन हैं। ... यानी खारिजियों के अतिरिक्त अन्य मुस्लिमों के विरुद्ध लडना उनका धार्मिक कर्तव्य है। वे अल्लाह के राज्य के समर्थक थे। उस राज्य की उन्हें स्थापना करना थी मनुष्य का राज्य उन्हें मान्य नहीं था। इसी कारण से हमने तीसरे खलिफा उस्मान की हत्या की थी, ऐसा वे स्पष्ट रुप से कहते थे और अपनी कृति का समर्थन करते थे। अली ने पंचायत मान्य कर अल्लाह की आज्ञा तोडी है अतः उससे लडने व उसकी हत्या करने के लिए वे तैयार हो गए थे। ऐसे खलिफा के विरुद्ध लडना जनता का अधिकार है इसे ही वे 'अल्लाह का राज्य" कहते थे।

  13. अल्लाह के कार्य के लिए प्राण देना वे अपना जीवन कर्तव्य मानते थे। कुरान की (9ः111) आयत के आधार पर उन्हें 'स्वर्ग प्राप्ति के लिए प्राण बेचनेवाले" कहा जाता है। उनकी इस कट्टरता के कारण उन्हें इतिहासकारों ने 'अतिरेकी", 'धर्मांध" के विशेषण लगाए हैं। परंतु, कुछ लोग उन्हें 'पक्के धर्मनिष्ठ", 'धर्म की शुद्धता का पालन करनेवाले", 'मुहम्मद के सच्चे अनुयायी", 'प्रामाणिक  और एकनिष्ठ श्रद्धावान" कहते हैं। सतत नमाज पढ़ते रहने के कारण उनके माथे पर काले घट्ठे पड गए थे। उनके नेता अब्दुल बि. वहाब का कहना था अल्लाह ने कहा है ''जो अल्लाह के ग्रंथानुसार निर्णय नहीं लेते वे अत्याचारी और अन्यायी हैं।" (5ः44,5,7) उन्होंने अन्य मुसलमानों को जिनमें गर्भवती महिलाएं, बच्चे भी शामिल हैं मारना प्रारंभ कर दिया। पहले तो अली ने उन्हें समझाने की कोशिश की परंतु, अंततः खारिजियों से लडाई अटल समझ अपनी सेना को उन पर हमले करने का आदेश दे दिया।

  14. खारिजियों ने 'चलो स्वर्ग की ओर", 'जल्दी करो" की घोषणाओं के साथ युद्ध शुरु कर दिया। अली की प्रचंड सेना के सामने वे टिक ना सके और लगभग सभी मारे गए। उनकी सारी संपत्ति लूट ली गई। इस्लाम के स्वर्णयुग कहे जानेवाले उस युग में तो अली ने इन इस्लाम से निकलों का संपूर्ण नाश कर दिया परंतु आज के इस आधुनिक युग में इन नए इस्लाम से निकले 'तालिबानियों" का नाश कौन करेगा यह देखना है।

Friday, November 15, 2013

क्या भारत में परदा प्रथा सदा से रही है !


'परदा है परदा है" या 'परदे में रहने दो परदा ना हटाओ" जैसे फिल्मी गीत हो या फारसी शब्द परदा का हिंदी अर्थ घुंघट पर आधारित गीत 'अरे यार मेरी तुम भी हो गजब घुंघट तो जरा ओढ़ो" जैसा लोकप्रिय गीत जिनका आधार महिलाओं से संबंधित शब्द 'परदा" है या कबीर की रचना 'घुंघट का पट खोल रे, तोको पीव मिलेंगे। घट घट में वह सांई रमता, कटुक वचन मत बोल रे।" सुनकर (1960 में घुंघट नामकी एक फिल्म भी बनी है) और उत्तर एवं पूर्वी भारत में फैली पर्दा प्रथा को देखकर लगता है क्या यह प्रथा भारतीय संस्कृति की अविभाज्य परंपरा का भाग है? इसकी सार्थकता क्या है? क्या विश्व में अन्य स्थानों पर भी यह प्रथा थी? यदि थी तो किस प्रकार की थी?



भारत के बाहर के जगत पर दृष्टि दौडाएं तो दिखता है कि ईसा के जन्म से 500 वर्ष पूर्व यूनानी स्त्रियां किसी संरक्षक के बिना घर से बाहर अकेले जा नहीं सकती थी। पति के द्वारा बुलाए अतिथियों से मिलने की अनुमति उन्हें नहीं होती थी। मिनिएंदर ने अपने नाटकों में एक पात्र के द्वारा यह कहलवाया हुआ है  स्वतंत्रता पूर्वक घूमनेवाली स्त्री के लिए गली का द्वार बंद कर देना चाहिए। स्पार्टा में स्त्रियां सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग नहीं ले सकती थी। ईसा से 300 वर्ष पूर्व कुलीन-अभिजात वर्ग की असीरियन महिलाओं में परदा प्रथा थी। साधारण महिलाओं और वेश्याओं को परदे की अनुमति नहीं थी। सीरिया में विवाहित स्त्रियां अपने चेहरे को एक विशेष प्रकार के आवरण से ढ़के रहती थी।



भारत के संदर्भ में ईसा से 500 वर्ष पूर्व रचित निरुक्त में इस तरह की प्रथा का वर्णन कहीं नहीं मिलता। निरुक्तों में संपत्ति संबंधी मामले निपटाने के लिए न्यायालयों में स्त्रियों के आने-जाने का उल्लेख मिलता है। न्यायालयों में उनकी उपस्थिति के लिए किसी पर्दा व्यवस्था का विवरण ईसा से 200 वर्ष पूर्व तक नहीं मिलता।



इस काल के पूर्व के प्राचीन वेदों तथा संहिताओं में पर्दा प्रथा का विवरण नहीं मिलता। ''ऋगवेद (10/85/33) ने लोगों को विवाह के समय कन्या की ओर देखने को कहा है ः 'यह कन्या मंगलमय है, एकत्र होओ और इसे देखो, इसे आशीष देकर ही तुम लोग अपने घर जा सकते हो।" आश्वलायनगृह्यसूत्र (1/8/7) के अनुसार दुलहिन को अपने घर ले आते समय दूलह को चाहिए कि वह प्रत्येक निवेश स्थान (रुकने के स्थान) पर दर्शकों को ऋगवेद (10/85/33) के उपर्युक्त मंत्र के साथ दिखाए। इससे स्पष्ट है कि उन दिनों वधुओं द्वारा अवगुण्ठन (परदा या घुंघट) नहीं धारण किया जाता था, प्रत्युत वे सबके सामने निरवगुण्ठन आती थी।"" (धर्मशास्त्र का इतिहास पृ.336) परदा प्रथा का उल्लेख उल्लेख सबसे पहलेे महाकाव्यों में हुआ है पर उस समय यह केवल कुछ राजपरिवारों तक ही सीमित था। (देखें उक्त पृ. 336,7)



कुछ विद्वानों के मतानुसार रामायण और महाभारतकालीन स्त्रियां किसी भी स्थान पर परदा अथवा घूंघट का प्रयोग नहीं करती थी। जातक कथाओं, भास के नाटकों तथा भवभूति की रचनाओं मेंं कहीं-कहीं स्त्रियों के परदे में रहने का उल्लेख मिलता है। अजंता और सांची की कलाकृतियों में भी स्त्रियों को बिना घूंघट दिखाया गया है। मनु और याज्ञवल्क्य ने स्त्रियों की जीवनशैली के संबंध में कई नियम बनाए हुए हैं परंतु कहीं भी यह नहीं कहा है कि स्त्रियों को परदे में रहना चाहिए। ज्यादातर संस्कृत नाटकों में भी परदे का उल्लेख नहीं है। यहां तक कि 10वी शताब्दी के प्रारंभ में तक भारतीय राजपरिवारों की स्त्रियां बिना परदे के सभा में तथा घर से बाहर  भ्रमण करती थी जैसाकि एक अरब यात्री अबू जैद ने वर्णन किया है। स्पष्ट है कि उस समय तक परदा प्रथा प्रचलित नहीं थी जैसीकि अभी नजर आती है।



अब हम मध्यकाल में देखते हैं 16वी शताब्दी के रुस में पिता एवं भाई भी अपनी पुत्री और बहिन का मुख देख नहीं सकते थे। 17वी शताब्दी तक इंग्लैंड में भी स्त्रियां न तो अकेले यात्रा कर सकती थी न ही अपने किसी पुरुष साथी कर्मचारी को घर आमंत्रित कर सकती थी। अगर कोई स्त्री सार्वजनिक सभा में कोई वक्तव्य दे देती तो वह उसके लिए अत्यंत अपमानजनक माना जाता था।



इतिहासकारों के अनुसार भारत में मुस्लिम साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ परदा प्रथा ने भी हमारी सामाजिक व्यवस्था में अपने पैर जमा लिए। 'धर्मशास्त्र का इतिहास" के अनुसार ''उच्च कुल की नारियां बिना अवगुण्ठन के बाहर नहीं आती थी, किंतु साधारण स्त्रियों के साथ ऐसी बात नहीं थी। उत्तरी एवं पूर्वी भारत में परदा की प्रथा जो सर्वसाधारण में पाई जाती है उसका आरंभ मुसलमानों के आगमन से हुआ।"" ( पृ. 337) इसके तीन कारण थे 1. हिंदू स्त्रियों को सुरक्षा प्रदान करने की दृष्टि से। 2. विजेता शासकों की शैली का चाहे-अनचाहे तरीके से अनुसरण। 3. विपरीत परिस्थितियों के कारण स्त्रियों में बढ़ती अशिक्षा और मुस्लिम शासकों के राज में गिरता स्तर। सर्वप्रथम हिंदू सरदारों और उच्चवर्ग ने शासकों का अनुसरण कर अपने अंतःपुरों में इस प्रथा को लागू किया फिर उनका अनुसरण कर समाज के अन्य वर्गों ने भी उसे अपना लिया।



स्त्री शिक्षा समाप्त होने कम आयु में विवाह होने के कारण अनुभवहीन स्त्रियों का परिवार में सम्मानजनक स्थान नहीं रहा। 15वी 16वी शताब्दी के आते-आते परदा उत्तर भारत की स्त्रियों की सामान्य जीवनशैली बन गई, सम्मान और कुलीनता का हिस्सा बन गया। यहां तक कि खेती मजदूरी करनेवाले वर्ग की महिलाएं तक परदा करने लगी। इससे पुरुषों का वर्चस्व बढ़ता चला गया स्त्रियों का सामाजिक व राजनैतिक गतिविधियों में योगदान समाप्त होता चला गया। यह कैसी विडंबना है कि जो परदा स्त्रियों की कुलीनता, सम्मान का प्रतीक था वही स्त्रियों के लिए दुर्भाग्यशाली बन गया। स्त्रिया दीन हीन जीवन बीताने को बाध्य हो गई। इस दृष्टि से मध्यकाल स्त्रियों के जीवन का काला पन्ना साबित हुआ।



भारत के स्वतंत्रता के आंदोलन के दौरान कई महिलाओं ने परदे का त्याग कर आंदोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था और इसका अनुकरणीय प्रभाव भी पडा था। यह शिक्षा का परिणाम है। परंतु, आश्चर्य इस बात का है कि मध्यकाल की परिस्थितियों में पैदा हुआ, मुस्लिम एवं ब्रिटिश काल में पला-बढ़ा परदा आज भी आधुनिक भारत में पांव जमाए हुए। आधुनिक भारत की स्त्री आज भी इस सडी-गली, अमानवीय, महिलाओं की प्रगति में बाधक  कुप्रथा का अभिशाप क्यों झेल रही है? जो एक प्रकार से भारतीय स्त्री को दोयम दर्जा प्रदान कर रही है।

Sunday, October 27, 2013

स्वदेशी का अंगीकार करें - बहिष्कार करें चीनी सामान का


20 जुलाई 1905 को ब्रिटिश शासन ने बंग-भंग की घोषणा की और उनके इस आव्हान को भरपूर साहस से स्वीकारते हुए लो. तिलक ने साम्राज्यवादी शक्तियों का मुंहतोड उत्तर देने के लिए विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का स्वीकार ये दो सूत्र प्रमुख रुप से दिए। वस्तुतः 'स्वदेशी" और 'बहिष्कार" एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इसीलिए 7 अगस्त 1905 से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं का स्वीकार आंदोलन तीव्रता से प्रारंभ हुआ। अरविंद घोष, रविंद्रनाथ ठाकुर, लालालाजपत राय इस आंदोलन के मुख्य उद्‌घोषकों में से थे। आगे चलकर गांधीजी ने इस स्वदेशी आंदोलन को स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्रबिंदु बनाया। इस आंदोलन के प्रभाव के कारण ही लो. तिलक ने 'हिंद केसरी" की शुरुआत कर हिंदी के प्रचार-प्रसार का अभियान चलाया। पं. मदनमोहन मालवीयजी ने काशी हिंदूविश्वविद्यालय की स्थापना के पश्चात हिंदी एक विषय के रुप में सम्मिलित करके 'अभ्युदय", 'मर्यादा", 'हिंदुस्थान" आदि पत्रों का प्रारंभ एवं सम्पादन कर हिंदी का प्रचार प्रसार शुरु किया।



लो. तिलक के आवाहन पर देश में स्वदेशी और बहिष्कार का आंदोलन चलानेवालों में क्रांतिकारी सावरकर बंधुओं का विशेष स्थान रहा है। 1 अक्टूबर 1905 को पुणे की एक सभा में वीर सावरकर ने छात्रों के सम्मुख विदेशी वस्त्रों की होली जलाने का एक आश्चर्यमयी प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव की स्वीकृति हेतु जब सावरकर तिलक से मिले तो उन्होंने एक शर्त लगा दी कि, दस-बीस वस्त्र जलाने से काम नहीं चलेगा यदि विदेशी वस्त्रों की होली जलानी ही है तो ढ़ेरों कपडे जलाने होंगे। इस शर्त के अनुसार ही सावरकर ने 7 अक्टूबर 1905 को दस बीस नहीं तो ढ़ेरों विदेशी वस्त्रों से लदी एक गाडी की होली जलाई। सावरकर की यह परिकल्पना इतनी अनूठी थी कि पूरे 16 वर्षों के अनंतर क्यों ना हो गांधीजी ने 9 अक्टूबर 1921 को मुंबई में इसी प्रकार विदेशी वस्त्रों की होली जलाई।



गांधीजी में स्वदेशी ललक इतनी जगी हुई थी कि दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित अपनी पत्रिका 'इंडियन ओपीनियन" (गुजराती संस्करण 28 दिसंबर 1907) में गांधीजी ने पाठकों से 'पैसिव रेजिस्टेंट", 'सिविल डिसओबिडिएन्स" और ऐसे ही कतिपय शब्दों के लिए समानार्थक गुजराती शब्द सुझाने का कहते हुए इसके लिए पुरस्कार भी रखा था। गांधीजी के इस आवाहन के प्रत्युत्तर में उन्हें 'प्रत्युपाय, कष्टाधीन प्रतिवर्तन, कष्टाधीन वर्तन, दृढ़प्रतिपक्ष, सत्यनादर, सदाग्रह आदि शब्द जब प्राप्त हुए तो तब उन्होंने उन सब शब्दों के अर्थों का अलग-अलग विश्लेषण करने के तत्पश्चात सदाग्रह शब्द का चयन किया और उसे बदलकर 'सत्याग्रह" कर दिया। इस विषय में तब गांधीजी ने लिखा था ''सिविल डिसओबिडिएन्स" तो असत्य का अनादर है और जब वह अनादर सत्य रीति से हो तो "सिविल" कहा जाएगा। उसमें भी 'पेसिव" का अर्थ समाया हुआ है। इसलिए फिलहाल तो एक ही शब्द का प्रयोग किया जा सकता है और वह है - 'सत्याग्रह"। गांधीजी ने आगे यह भी लिखा था कि ः जल्दी-जल्दी करके चाहे जो शब्द दे डालने से अपनी भाषा का अपमान होता है और अपना अनादर होता है। इसलिए ऐसा करना, और वह भी 'पेसिव रेजिस्टेंस" जैसे शब्द अर्थ देने के सिलसिले में, एक तरह से 'सत्याग्रही" के संघर्ष का ही खंडन हुआ।



सावरकर ने तो 1893 में 10 वर्ष की आयु में ही 'स्वदेशी" का उपयोग करो का विचार प्रस्तुत करनेवाली कविता लिखी थी। यह निर्विवाद है कि लोकमान्य तिलक का बहुत प्रभाव सावरकर पर था और कदाचित्‌ तिलक के ही कहीं किसी भाषण में सावरकर ने वह सुना हो इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लोकमान्य तिलक ने तो 1998 में ही पुणे में स्वदेशी वस्तुओं के विक्रय के लिए एक दुकान प्रारंभ की थी। इनके भी पूर्व बंगाल के भोलाचंद्र ने 1874 में शंभुचंद्र मुखोपाध्याय द्वारा प्रवर्तित 'मुखर्जीज मेगजीन" में स्वदेशी का नारा दिया था। 1870 में 'वंदेमातरम्‌" का महामंत्र देनेवाले बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने 1872 में 'बंगदर्शन" में स्वदेशी का नारा दिया था। वंदेमातरम्‌ के उद्‌घोष ने इसी आंदोलन के दौरान महामंत्र का रुप धर प्रत्येक भारतीय को आंदोलित कर दिया।

उपर्युक्त उदाहरण इसलिए दिए हुए हैं कि स्वदेशी का विचार कितना पुराना है यह पाठक जान सकें। आपको आश्चर्य होगा कि  यह विचार सबसे पहले महाराष्ट्र के निष्ठावान सामाजिक कार्यकर्ता गणेश वासुदेव जोशी (9-4-1828 से 25-7-1880) जिनके द्वारा किए गए सार्वजनिक कार्यों के कारण उनको 'सार्वजनिक काका" ही कहा जाने लगा था, ने दिया था। समाजसुधारक न्यायमूर्ति रानडे के साथ मंत्रणा कर सार्वजनिक काका ने 1872 में स्वदेशी आंदोलन का श्रीगणेश किया था। उन्होंने 'देशी व्यापारोत्तेजक मंडल" की स्थापना कर स्याही, साबुन, मोमबत्ती, छाते आदि स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन करने को प्रोत्साहन दिया था। इसके लिए स्वयं आर्थिक हानि भी सही थी। इस स्वदेशी माल की बिक्री के लिए सहकारिता के सिद्धांत पर आधारित पुणे, सातारा, नागपूर, मुंबई, सुरत आदि स्थानों पर दुकाने प्रारंभ करने के लिए प्रोत्साहित किया था। स्वदेशी वस्तुओं की प्रदर्शनियां भी आयोजित की। उन्हींके प्रयत्नों से आगरा में कॉटन मिल शुरु की गई थी। यही कार्य सावरकर ने 1924 से 1937 तक रत्नागिरी में नजरबंदी की अवस्था में बहुत बडे पैमाने पर किया था।


12-1-1872 को उन्होंने खादी उपयोग में लाने की शपथ ली थी और उसे आजीवन निभाया। खादी का उपयोग कर उसका प्रचार-प्रसार करनेवाले वे पहले द्रष्टा देशभक्त थे। इतना ही नहीं तो खादी का पोशाक कर 1872 में दिल्ली दरबार में भी सार्वजनिक सभा की ओर से गए थे। (जिसकी स्थापना उन्होंने उस काल में पुणे के 95 प्रतिष्ठित लोगों को लेकर कानूनी पद्धति से राजनीतिक कार्य किए जा सकें। जनता की शिकायतें सरकार के सामने प्रस्तुत की जा सके, उसे सार्वजनिक किया जा सके इसके लिए 1970 में की थी। इस प्रकार इस सार्वजनिक सभा को राजनीति का आद्यपीठ या कांग्रेस की जननी भी कहा जा सकता है।)



यह इतिहास कथन इसलिए कि इससे प्रेरणा ले आज फिर से इस स्वदेशी के विचार को अपनाने, इसके प्रचार-प्रसार, आंदोलन की आवश्यकता तीव्रता से महसूस की जा रही है। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग कांग्रेस या किसी विशिष्ट विचार के लोगों का नहीं तो समूचे राष्ट्र का संकल्प था और होना चाहिए। आज वैश्वीकरण के इस दौर में मुक्त द्वार की नीतियों का लाभ उठा चीन अपने सस्ते उत्पादों से पूरे भारत के बाजारों को पाटता चला जा रहा है। हमारे उद्योग-धंधे चौपट हुए जा रहे हैं। चीन का इतिहास विश्वासघात का रहा है वह न केवल हमारी भूमि को दबाए बैठा है, सीमाओं पर समस्याएं खडी कर रहा है वरन्‌ अपने सस्ते सामान का हमारे बाजारों में ढ़ेर लगाकर हमें अन्यान्य तरीकों से हानि भी पहुंचा रहा है, हमारे सामने नई-नई समस्याओं को खडी करने के साथ ही साथ चुनौती भी दे रहा है।



आज बाजार में जिस ओर नजर घूमाइए उस ओर चीनी सामान दिख पडेगा। घरेलू सामान,बच्चों के खिलौने, इलेक्ट्रॉनिक्स सामान, मोबाईल से लेकर हमारे देवी-देवताओं की मूर्तियां तक आखिर क्या नहीं है। यह सारा चीनी सामान हमारे घरेलू उद्योगों द्वारा निर्मित उत्पादों से सस्ता है। बाजार के लिए उत्पादन से सस्ता आायत पड रहा है लेकिन इससे हमारे लघु, मध्यम, कुटिर उद्योग चौपट हुए जा रहे हैं। लाखों लोग बेरोजगारी की गर्त में जा रहे हैं। इस पर चिंतन आवश्यक है। यह एक कुटिल चाल है। आज सस्ता लगनेवाला माल कल बहुत महंगा पडेगा। अंग्रेजों ने भी इसी तरह सस्ता माल उपलब्ध करवा पहले व्यापार फिर देश की दुर्दशा की। आर्थिक गुलामी का अगला पडाव राजनैतिक गुलामी ही है।



सस्ते चीनी सामान के हम आदि होते जा रहे हैं। चीनी उद्योगों ने हमारे उद्योगों को निगलना प्रारंभ कर दिया है इसका ज्वलंत उदाहरण है लुधियाना का साइकल उद्योग। जो पुर्जे पहले देश में बनते थे वे अब चीन से मंगाए जा रहे हैं। हमारे ही पैसों से चीनी मालामाल हो रहे हैं तो हम कंगाल। विश्वासघाती और दादागिरी करनेवाला चीन हमारा हितचिंतक कभी भी नहीं हो सकता। सस्ता मिल रहा है इसलिए चीनी माल खरीदकर हम चीन को दृढ़ कर स्वयं के साथ छल कर रहे हैं। आज कंपनियां, उद्योग गुहार लगा रहे हैं लेकिन कोई सुन नहीं रहा। यह वही चीन है जिसके माओत्सेतुंग ने अनेक बार कहा था - तिब्बत चीन की हथेली है तो नेफा, भूटान, नेपाल, लद्दाख, सिक्किम इसकी उंगलियां हैं। जिन्हें हम हासिल करके ही रहेंगे।

चीन के साथ हमारा निर्यात कम और आयात अधिक है। परिणामतः हमारा धन उनके पास चला जाता है जो हमारे ही खिलाफ उपयोग में लाया जाता है। सर्वेक्षणों के अनुसार बिजली के सीएफएल का प्रमुख कच्चा माल फास्फोरस के लिए हम चीन पर निर्भर हैं। अभी हाल ही में चीन ने फास्फोरस की कीमतें बढ़ाकर हमारी चूलें हिला दीं। दवा उद्योग बल्क ड्रग के लिए पूरी तरह चीन पर निर्भर है। दूरसंचार क्षेत्र का 50% आयात पर निर्भर है उसके 62% पर चीन का अधिकार है। बिजली परियोजनाओं के 1/3 बॉयलर, टरबाईन चीन से आए हुए हैं। देशभर में चल रही विभिन्न परियोजनाओं में चीन कम दरों में ठेके लेकर धीरे-धीरे अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है जो आगे जाकर घातक सिद्ध होंगी। उसकी घटिया मशीनरी, पुरानी पडती जा रही टेक्नालॉजी सस्ते के चक्कर में हम अपनाते जा रहे हैं जो कल को निश्चय ही दुखदायी साबित होगा। चीन हमसे कच्चे माल के रुप में लोह अयस्क, रबर यहां तक कि कपास तक आयात कर रहा है और बाद में निर्मित वस्तुओं के रुप में हमें ही निर्यात के रुप में लौटा रहा है। क्या ईस्ट इंडिया कंपनी के इतिहास को दोहराया नहीं जा रहा है।

हमें एक बार फिर से स्वदेशी का अंगीकार और विदेशी (यानी चीनी) का बहिष्कार के सूत्र को अपनाना होगा। हमें चीनी माल का बहिष्कार कर अपने राष्ट्रधर्म का पालन करना चाहिए। भारतीय उत्पादों की विश्वसनीयता भारत ही नहीं तो पूरे विश्व में चीन की अपेक्षा अधिक है। हमारी प्राथमिकता 'सस्ता" नहीं वरन्‌ 'सुरक्षा, सम्मान, स्वाभिमान" की होना चाहिए।

आज भी प्रासंगिक होने के कारण इस लेख का समापन मैं बंकिमचंद्र चटोपाध्याय व भोलाचंद्र के इन कथनों के साथ करता हूं - ''जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन बैठा है, हम लोग दिन ब दिन साधनहीन होते जा रहे हैं। अतिथिशाला में रहनेवाले अतिथि की तरह हम लोग प्रभु के आश्रम में पडे हैं, यह भारतभूमि भारतीयों के लिए एक विराट अतिथिशाला बन गई है।"" ''आइए हम सब लोग यह संकल्प करें कि विदेशी वस्तु नहीं खरीदेंगे। हमें हर समय यह स्मरण रखना चाहिए कि भारत की उन्नति भारतीयों द्वारा ही सम्भव है।""

Saturday, October 19, 2013

पहली मुस्लिम नारीवादी महिला - रुकय्या सखावत हुसैन


'सुल्तानाज ड्रीम्स" एक काल्पनिक विज्ञानकथा है रुकय्या सखावत हुसैन की। जो एक विलक्षण स्वप्नकथा के रुप में है। जिसमें रुकय्या ने कल्पना की जो उडान भरी है वह किसी को भी आश्चर्यचकित कर सकती है। इस कथा को पढ़ने पर ऐसा लगता है मानो रुकय्या पूरे पुरुषसमाज से बदला सा ले रही है। इस कथा को पढ़ने के पूर्व यह रुकय्या कौन थी यह जान लें।



19वी शताब्दी के जिस काल में महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले शिक्षा की अलख जगा रहे थे, बंगाल में ब्राम्हो समाज का जन्म हो चूका था, उत्तर भारत में आर्यसमाज का आंदोलन परवान चढ़ रहा था। अंग्रेजी शिक्षा का प्रारंभ हुए अधिक समय नहीं बीता था। शिक्षा उच्च वर्ग तक ही सीमित थी। महिला शिक्षा और वह भी मुस्लिम महिलाओं के संबंध में तो और भी दुर्लभ थी। ऐसे काल में 1880 में रुकय्या का जन्म तत्कालीन ब्रिटिश इंडिया और वर्तमान बांग्लादेश के रंगपुर में एक उच्च कुलीन जमीनदार परिवार में हुआ। रुकय्या के पिता सनातनी रुढ़िप्रिय थे, जिनकी दृष्टि में लडकियों की शिक्षा यानी कुरानपठन तक ही सीमित थी। भाषा के मामले में अरबी, फारसी, उर्दू और अंगे्रजी में व्यवहार एवं बांग्ला भाषा विरोध। क्योंकि उनकी दृष्टि में बांग्ला गुलामों और गैर मुस्लिमों की भाषा इसलिए तुच्छ। परंतु इस रुकय्या ने अपने भाई इब्राहीम से बांग्ला पढ़ना लिखना सीखा और वह भी दिल से। उसका विवाह 16 वर्ष की अवस्था में 30 वर्षीय विधुर खानबहादुर सय्यद सखावत हुसैन से  1896 में हुआ। जो अंगे्रजी भाषा में उच्चविद्याविभूषित होकर बिहार में जिला मजिस्ट्रेट थे। उन्होंने भी उसे बांग्ला व अंग्रेजी सीखने व लिखने के लिए प्रोत्साहित किया। उसने कई लघुकथाएं व उपन्यास लिखे। उनकी ही प्रेरणा से रुकय्या ने कोलकाता में मुस्लिम लडकियों के लिए एक स्कूल की स्थापना की जो अब शासन द्वारा संचालित किया जा रहा है। उसकी मृत्यु 1932 में हुई।



रुकय्या स्त्री पुरुष समानता एवं मुस्लिम स्त्रियों की शिक्षा के लिए किए गए कार्यो के लिए जानी जाती हैं। बांग्लादेश में 9 दिसंबर रुकय्या दिवस के रुप में मनाया जाता है। 1926 में उसने बांग्ला महिला शिक्षा सम्मेलन में कहा था ः 'महिला शिक्षा विरोधी कहते हैं महिलाएं उच्छृंखल हो जाएंगी .... यद्यपि वे स्वयं को मुस्लिम कहते हैं उसके बावजूद वे इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विरुद्ध जाते हैं जो स्त्रियों को समानता और शिक्षा का अधिकार देती है। यदि शिक्षित होने के बाद पुरुष राह से नहीं भटकते तो, स्त्रियां ही क्यों?



रुकय्या ने 'सुल्तानाज ड्रीम" नामकी स्वप्नकथा लिखी जिसमें नारीवाद की कल्पना थी। यह स्वप्नकथा सन्‌ 1905 में मद्रास से प्रकाशित होनेवाले 'इंडियन लेडीज जनरल" में प्रकाशित हुई। रुकय्या कल्पना करती है कि आधी रात को उसे एक सपना आता है जिसमें एक स्त्री उसके पास आती है जिसे वह अपनी बहन सारा समझती है। जो उसे चारदीवारी से निकालकर एक दूसरे देश ले जाती है जहां का कामकाज बिल्कुल ही भिन्न है। इस देश की स्त्रियां परदा नहीं करती। यहां चारों ओर स्त्रियां ही स्त्रिया हैं। पुरुष कहीं नजर नहीं आते। पूछने पर पता चलता है कि इस देश में पुरुष घर में बंदिश यानी मर्दानखाने में रहते हैं। घर का सारा कामकाज खाना बनाना, बच्चे संभालना आदि पुरुष ही करते हैं। वे पराई स्त्रियों के सामने आ नहीं सकते। उनकी दुनिया घर की चारदीवारी तक ही सीमित रहती है।



जिन्हें पुरुषों का कार्यक्षेत्र माना जाता है ऐसे सभी कार्य स्त्रियां ही संपन्न करती हैं। कहीं कोई अपराध, अत्याचार, शोषण, हिंसा नहीं क्योंकि ये सारे कार्य पुरुष करते हैं वे घर की बंदिश में हैं। चकित रुकय्या पूछती है हम स्त्रियों को तो प्रकृति ने ही कमजोर बनाया है ऐसी अवस्था में स्त्रियों को इतनी स्वतंत्रता कितनी योग्य है? क्या यहां की स्त्रियों को सुरक्षा की आवश्यकता महसूस नहीं होती? इस पर उसे उत्तर मिलता है जब पुरुष घर में हैं तो स्त्रियों को भय किस बात का? पागल और हिंसक लोगों को जिस प्रकार से पागलखाने में बंद रखा जाता है उसी प्रकार से इन पुरुषों को घर में बंद करके रखना आवश्यक है। रुकय्या कहती है हमारे देश में यह संभव नहीं। इस पर उसे उत्तर मिलता है तुम्हारे देश में पुरुष स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार करता है, कर सकता है परंतु उसे खुला छोड स्त्रियों को ही घर में कैद कर रखा जाता है।



यहां रुकय्या द्वारा यह कहने पर की हम भारतीय स्त्रियां क्या करें? पुरुष तो बहुत शक्तिशाली होता है। इस पर वह स्त्री उसे अद्वितीय उत्तर देती है ः शेर मनुष्य से शक्तिशाली होता है क्या इसलिए वह मनुष्य पर वर्चस्व स्थापित करने का, उसे गुलाम बनाने का प्रयत्न करता है ? तुम भारतीय स्त्रियों को यह मालूम ही नहीं है कि स्वयं का कल्याण किसमें है, ऐसी अवस्था में मैं भला क्या कर सकती हूं? तुमने स्वयं होकर अपने प्राकृतिक अधिकार खोए हैं।



इस विलक्षण स्वप्नकथा में सौर उर्जा की कल्पना का भी रोमांचित कर देनेवाला वर्णन है, स्वतंत्र महिला विश्वविद्यालय की कल्पना भी की गई है। वर्षा पर पूर्ण नियंत्रण का वर्णन है। लडकियों को निशुल्क शिक्षा मिलती है। कानूनन 21 वर्ष की आयु से कम की लडकी का विवाह हो नहीं सकता। धर्म के संबंध में भी इस देश की जो संकल्पना है वह यदि साकार हो जाए तो वास्तव में सारे झगडे ही मिट जाएं यहां का धर्म है 'प्रेम और सत्य"। यहां प्रत्येक का धार्मिक कर्तव्य है कि परस्पर प्रेम का व्यवहार करें और सच बोलें। यहां तक कि इस देश का कामकाज एक महिला ही देखती है और सभी शोधकार्य स्त्रियों द्वारा ही किए जाते हैं।



इस प्रकार की एक से बढ़कर एक विचित्र कल्पनाओं से यह स्वप्न कथा भरी हुई है जो स्त्री स्वतंत्रता, उस पर होनेवाले अन्याय, अत्याचार, उसे घर में कैद रखने, शिक्षा से वंचित रखने आदि की पुरुष मानसिकता के प्रति आक्रोश सा प्रकट करती महसूस होती है। इस कथा के माध्यम से रुकय्या का आत्मविश्वास, उसकी बुद्धिमानी, प्रतिभा के हमें दर्शन होते हैं। यह कथा इसलिए भी महत्वपूर्ण नजर आती है क्योंकि जिन कल्पनाओं को आज हम कुछ अंशों में साकार होते देख रहे हैं वे कल्पनाएं रुकय्या ने आज से 100 से अधिक वर्ष पूर्व ही कर ली थी। एक बात और एक उच्चकुलीन महिला होते हुए भी उसकी कल्पना की उडान आम महिलाओं की भावनाओं से जुडी नजर आती हैं। एक रुढ़िग्रस्त धर्मांध मुस्लिम समाज के स्त्रीविषयक दृष्टिकोण के विरुद्ध खडी हो स्त्री मुक्ति का उद्‌घोष करनेवाली वे पहली नारीवादी पुरोगामी लेखिका हैं। उसकी इस स्वप्नकथा का जब बांग्ला अनुवाद प्रकाशित हुआ तब भी कट्टरपंथी लोग उसे कोई विशेष कष्ट ना दे सके क्योंकि उसका पति ब्रिटिशों का एक बडा अधिकारी मजिस्ट्रेट, मायका भी सक्षम व शासन अंग्रेजों का था। परंतु, फिर भी उसकी इस स्वप्नकथा को धर्मविरोधी, राष्ट्रद्रोही जरुर घोषित किया गया।



 रुकय्या के पूर्व महाराष्ट्र की ताराबाई शिंदे जो एक जमीनदार परिवार की होकर उसे हिंदी, अंग्रेजी, मराठी और संस्कृत भाषा का भी ज्ञान था। उस जमाने में घोडे पर बैठकर अपने खेतों पर जाती थी। उसने भी स्त्री-पुरुष संबंधों पर एक लेख 'स्त्री पुरुष तुलना" पुरुष वर्चस्व के विरुद्ध सन्‌ 1882 में लिखा था परंतु उसे वह चर्चा व प्रसिद्धि ना मिल सकी जो रुकय्या को मिली। एक विशेषता और सन्‌ 1950-60 तक यूरोप, अमेरिका तक में नारीवाद की संकल्पना रुढ़ ना हो सकी थी उससे पूर्व ही ताराबाई शिंदे और रुकय्या जैसी महिलाओं ने स्त्री मुक्तिवादी भूमिका ली थी। आज की नारीवादी महिलाओं के लिए ये महिलाएं निश्चय ही आदर्श सिद्ध हो सकती हैं। क्योंकि नारी समान अधिकारवाद की संकल्पना किसी भी विशिष्ट देश या धर्म के लिए अवतरित हुई ना होकर यह आत्मविश्वास संपन्न स्वतंत्रता की चाह रखनेवाली संवेदनशील स्त्री का एक सुंदर स्वप्न है।

Sunday, October 13, 2013

पहले शौचालय फिर देवालय - मोदी


देर आइद दुरुस्त आइद



आज से कुछ माह पूर्व केंद्रिय मंत्री श्रीजयराम रमेश ने कथन किया था कि देश में मंदिरों से अधिक आवश्यकता शौचालयों की है तो देशभर में अच्छा-खासा विवाद खडा हो गया था और विशेषकर हिंदुत्वादियों ने उन्हें अपने निशाने पर ले लिया था। लेकिन अब श्रीमोदी ने 'पहले शौचालय फिर देवालय" का नारा देकर इस बात की पुष्टि कर दी है कि श्रीजयराम रमेश का दृष्टिकोण ही उचित है, समयानुकूल है।



पूरे देश में लाखों मंदिर-मंदिरी बने हुए हैं। कई सुंदर मंदिर वीरान, जीर्ण-शीर्ण अवस्था में उपेक्षित पडे हुए हैं। उनकी ओर देखनेवाला तक कोई नहीं है। फिर भी नए-नए मंदिरों का निर्माण बेरोकटोक बदस्तूर जारी है। इन मंदिरों के नाम पर धंधेबाजी जमकर चल रही है। भगवान के नाम पर बने ओटलों, चबूतरों के अतिरिक्त किसी बडे भारी पत्थर को गेरु या सिंदूर से पोतकर और वह भी अक्सर सरकारी जमीनों पर तरह-तरह के देवता स्थापित किए जा रहे हैं। यहां तक कि पहले से ही किसी गांव-नगर में अत्याधिक कम शौचालयों की उपलब्धता के बावजूद जो हैं उन शौचालयों के पास नालियों आदि पर कब्जा जमा मूर्तियां स्थापित कर, तस्वीरें टांग सुनियोजित ढ़ंग से शौचलयों को ही गायब कर दिया जाता है और यह हरकतें विशेष रुप से महिला शौचालयों के साथ ही अधिकतर घटित होती हैं। जबकि सार्वजनिक स्वच्छतागृहों की आवश्यकता सबसे अधिक महिलाओं को ही होती है।



इन धंधेबाजों के मंदिर कई स्थानों पर तो बीच सडक मुंह निकाले खडे हैं तो कहीं बीच चौराहों पर ही मंदिर निर्मित कर लिए गए हैं। यह प्रवृति इतनी अधिक बढ़ती जा रही है कि अतिक्रमणकर्ता यह जानकारी होने के बावजूद फलां मार्ग का चौडीकरण प्रस्तावित है अपनी स्वार्थ सिद्धि व वर्चस्व जमाने, दिखाने के लिए तुरंत बडी भारी मूर्तियां स्थापित कर प्रसाद वितरण भी शुरु कर देते हैं। यहीं स्मरण करा दें कि मंदिरों का उल्लेख प्रतीक रुप में किया गया है। जो हाल मंदिरों का है वही हाल अन्य धर्मियों के धर्मस्थलों का भी है। हालात यह हैं कि आगामी कई वर्षों तक यदि धर्मस्थलों के निर्माण को ही रोक दिया जाए तो भी उनकी उपलब्धता में कमी नहीं होगी। निश्चय ही यह असंभव सा ही है लेकिन धंधेबाजों की धंधेबाजी पर तो रोक लगाई ही जा सकती है।



शौचालयों की उपलब्धता, उनकी दुर्दशा, उनकी आवश्यकता वह भी विशेषकर महिलाओं के संबंध में का बयान इसके पूर्व के तीन लेखों में जो 'साप्ताहिक स्पूतनिक" में ही प्रकाशित हुए हैं में मैं कर चूका हूं। अतः शौचालयों की आवश्यकता का प्रतिपादन का कोई औचित्य नजर नहीं आता। फिर भी प्रसंगवशात्‌ गुजरात के संबंध में उल्लेख कर देना उचित होगा कि सन्‌ 2011 के आंकडों के अनुसार शौचालयवाले घरों का प्रतिशत 57.4, सार्वजनिक शौचालय 2.3 और खुले में शौच जानेवाले 40.3 प्रतिशत हैं। इस संबंध में कांग्रेस-वामपंथियों द्वारा शासित रहा केरल अवश्य ही सौभाग्यशाली है जहां का प्रतिशत क्रमशः 95.1, 1.1 एवं 3.8 है।



सन्‌ 2005-6 के आंकडों के अनुसार टॉयलेट सुविधा गुजरात में 43.5 प्रतिशत के पास थी तो केरल में 96.7। यदि बिहार के आंकडे देखें तो सन्‌ 2005-6 में टॉयलेट सुविधा मात्र 17 प्रतिशत थी जो बढ़कर 2011 में 23.1 हो गई। यदि गुजरात से तुलना की जाए तो बिहार इस दौड में निश्चय ही पीछे है। सरकारी स्कूलों में स्थिति सन्‌ 2009-10 के आंकडों के अनुसार गुजरात में लडकियों के लिए पृथक शौचालयों का प्रतिशत 54.6, कॉमन 38.9। बिहार क्रमशः 37.7 व 48.3। पंजाब 98.5 व  92.9 प्रतिशत है।



मोदी द्वारा 'पहले शौचालय फिर देवालय" का नारा देना इसलिए भी महत्वपूर्ण नजर आता है क्योंकि, यह नारा एक हिंदुत्ववादी नेता ने दिया है जिसकी छबि कई लोगों के मन में कारपोरेट के आदमी की है। आज की तारीख में अधिकांश कारपोरेट उनकी तारीफ के कसीदे बांच चूके हैं। परंतु, शौचालयों का महत्व जतलाकर मोदी ने यह संदेश दिया हुआ सा लगता है कि उन्हें 'सोशल इंडिकेटर्स" की भी परवाह है। वे भी सोशल जस्टिस, सोशल रिफॉर्म को महत्व देते हैं। उन्हें आम जनता को शौचालयों की कमी तथा उससे उपजनेवाली समस्याओं का भान है। शायद उनके ध्यान में  यह बात भी आ गई लगता है कि पिछले 20 वर्षों में हम सोशल रिफॉर्म के मामले में बहुत पिछडे गए हैं भले ही प्रति व्यक्ति आय बढ़ी हो।



इसी भाषण में मोदी ने जो एक एनजीओ 'सिटीजन्स फॉर अकांउटेबल गवर्नेस" द्वारा आयोजित युवा छात्रों के सम्मेलन दिल्ली में ता. 2 अक्टूबर 2013 को सवाल-जवाब में दिया था कि पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने एवं इससे रोजगार का उल्लेख भी किया है। परंतु, इसके लिए भी सबसे पहली आवश्यकता स्वच्छता की है। जिसके मामले में निश्चय ही हम कुख्यात हैं। स्वच्छता बरतने के लिए अन्य कई आदतों को बदलने के साथ-साथ स्वच्छतागृहों की बहुतायत आवश्यक है।



मोदी जो अपने दृढ़निश्चय व काम करके दिखानेवाला के रुप में प्रसिद्ध हैं यदि उन्होंने वास्तव में ठान लिया कि 'पहले शौचालय फिर देवालय" तो वह दिन दूर नहीं जब गुजरात खुले में शौच करनेवालों से मुक्त प्रदेश होगा। यदि ऐसा होता है तो निश्चय ही यह एक बहुत बडी क्रांति होगी। अब देखना यह है कि मोदी अपने इस नारे को कितना अमलीजामा पहनाते हैं।

Friday, September 20, 2013

गणतंत्र को आच्छादित करता तंत्र-मंत्र


देश में अज्ञानियों की कोई कमी नहीं है और कम से कम धर्म के मामले में तो अपने भारत में लोग अपने महाअज्ञानी होने का प्रमाण-पत्र हाथ में लिए ही घूमते रहते हैं। आज तक तंत्र-मंत्र के विरोध में न जाने कितनी पुस्तकें लिखी जा चूकी है कि तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और कुछ नहीं अंधविश्वास मात्र है। परंतु हमारे लोग हैं कि मानते नहीं और देश बुरी तरह से तंत्र-मंत्र की चपेट में है। कई लोग तो बाकायदा भारत की तंत्र और तांत्रिक उपलब्धियों पर गर्व करते हैं और उनका तो यहां तक कहना है कि साधक यदि प्रयास करे तो सिद्धियों को भी प्राप्त कर सकता है। इसी अंधश्रद्धा का चमत्कार है कि लाखों लोग प्रतिवर्ष कपोलकल्पित बातों पर विश्वास कर अंधश्रद्धा के अधीन हो जादू-टोने, भूत बाधा दूर करने, रोगमुक्त होने, संतान प्राप्ति, गुप्त धन प्राप्ति के चक्कर में पडकर अपनी धनसंपत्ति, प्रतिष्ठा गंवाने, शारीरिक हानि उठाने से लेकर, नरबलि देने तक के जघन्य अपराधों के शिकार हो रहे हैं। इस अंधविश्वास की बेडियों में अशिक्षित, अनपढ़, गवांर से लेकर विद्वान तक बुरी तरह से जकडे हुए हैं। इसीका फल है कि तथाकथित महाराज, बाबा, पीर-फकीर हलुआ पुडी खाने में लगे हुए हैं।



आखिर यह जादू-टोना है किस चीज का नाम! वस्तुतः जादू-टोना और कुछ नहीं केवल बुद्धि का भटकाव है। जब मनुष्य में आत्मविश्वास कम हो जाता है तब वह अपना विवेक, संयम तथा धैर्य खो बैठता है, उसकी सोचने की क्षमता कम हो जाती है। भटक कर हीन भावना के अधीन हो अंधश्रद्ध हो जाता है और इन तथाकथित महाराजों के चंगुल में फंस जाता है। बाबाओं की दुकानें चल निकलती हैं। जो समाज में भिन्न-भिन्न प्रकार के रुप धर कभी प्रवचनकार, तो कभी तांत्रिक, या सिद्ध पुरुष बन या तो ताबीज बांटते फिरते हैं, भूत उतारने की नौटंकी करते हैं, तो कभी कुछ चमत्कार दिखा अपने भक्तों को मूर्ख बनाते रहते हैं, शोषण करते रहते हैं। कुछ बाबा तो अपनी शक्ति द्वारा बांझ औरतों को गर्भवती औरत में परिवर्तित कर देने का चमत्कार भी दिखला चूके हैं और पर्दाफाश होने पर जेल की चक्की पीसने जा पहुंचते हैं। ऐसे ढ़ोंगी महाराजों के चक्कर में पडकर लोग अपना बंटाधार करवा बैठते हैं।



लेकिन कई मामलों में राजनीतिज्ञ ही इन जैसे बाबाओं को शरण देते नजर आते हैं क्योंकि सत्ता प्राप्ति हेतु वे भी तो इन तथाकथित महाराजों से यज्ञ, तंत्र-मंत्र आदि अनुष्ठान करवाते रहते हैं। तंत्र-मंत्र करनेवाले गुरुओं का इन राजनेताओं पर इतना प्रभाव है कि यदि वे कहें तो ये चुनाव लडने तक से इंकार कर देते हैं। मंत्री पद हासिल करने के लिए नेतागण इनके कहने पर तरह-तरह के अनुष्ठान करने के लिए तत्पर रहते हैं, भले ही इसके लिए इनको हास्यापस्द कृत्य भी क्यों ना करने पडें। इस मामले में उद्योगपति भी कुछ कम नहीं वे भी इनके चक्कर काटते नजर आ जाते हैं। काले धन को सफेद करना यह बाबाओं की बाबागिरी के व्यवसाय का एक हिस्सा जो है। आज इन बाबाओं की दुकानें जमकर चल रही हैं। चढ़ावे में आई रकम इनके चेले उद्योगपतियों-राजनेताओं-सत्ता के दलालों के माध्यम से बाजार में 'इनवेस्ट" की जा रही है और फिर इस इनवेस्टमेंट की रक्षा के लिए इन तथाकथित भ्रष्ट बाबाओं, तांत्रिकों, महाराजों को प्रश्रय दिया जाता है, इनके कुकर्मों को छुपाया जाता है। बांका समय आने पर इनकी रक्षा के लिए ये राजनेता-उद्योगपति ढ़ाल बनकर शासन-प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए आ धमकते हैं। यह नजारा भी लोग समय-समय पर देखते ही रहते हैं।



इन तथाकथित बाबाओं का एक और गोरखधंधा है और वह है अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बलबूते कैंसर से लेकर कई असाध्य बीमारियों से पीडित लोगों को ठीक करने का दावा करना। महानगरों के धनी लोगों की अपनी मनोवैज्ञानिक व व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं जिनके कारण वे अशांत व दुखी रहते हैं। उनकी मनोदशा का लाभ उठाने के लिए इस प्रकार के महाराज सदैव तत्पर रहते हैं। ऐसे स्वयंभू महात्माओं का गरीबों से और पीडितों से कोई लेना देना नहीं रहता वे तो सदैव पांच सितारा होटलों में विराजमान रह कर संभ्रात, कुलीन वर्ग के दुख-दर्द दूर करने में व्यस्त रहते हैं।



इसके लिए इनके अपने तौर तरीके हैं जिसके तहत अखबारों-पत्रिकाओं में विज्ञापन दिए जाते हैं, दावे किए जाते हैं, फिर पहले से ही तैयार कुछ लोग बयान देेने लगते हैं कि हमें लाभ हुआ। ऐसे समय ये धनी व राजनेता काम आते हैं जो स्वयं आगे होकर अपने लाभान्वित होने का कथन करते नजर आते हैं। बस अब क्या कहने इन तथाकथित अध्यात्मिक पुरुषों के वारे-न्यारे होते समय नहीं लगता और जनता की सेवा करने का दावा करनेवाले ये महाराज विमानों में घूमते नजर आने लगते हैं। पत्र-पत्रिकाएं भी इन जैसों की सहायता करने में पीछे नहीं रहती किसी अखबार में इनके चर्चे होने की देर कि इन बाबाओं के दरबार में कतारें लग जाती हैं।



कहते हैं कि जगद्‌गुरु शंकराचार्य की मृत्यु भगंदर रोग से हुई थी और स्वामी विवेकानंद दमे से पीडित थे। अब जब इन जैसे महान अध्यात्मिक पुरुष अपनी व्याधि ठीक ना कर सके तो ये महाराज क्या चीज हैं? मेरा कहना सिर्फ यही है कि इस प्रकार के साधुओं-बाबाओं के प्रचार तंत्र के जाल में फंस अपना समय व धन व्यर्थ ना गवांए। सावधान रहें अपने महान भारत के विशाल गणतंत्र को इन तंत्र-मंत्र वालों की चपेट में ना आने दें। भूत लगना, प्रेत बाधा आदि कुछ नहीं होता, सब बकवास है। यदि आध्यात्मिक तरीकों से बीमारियां ठीक होने लगती तो आध्यात्मिक पुरुषों से भरे इस देश में कोई बीमार ही नहीं पडता, मरीज तो ढूंढ़े से भी नहीं मिलते।



याद रखें संतों की श्रेष्ठता उनके चमत्कारों में ना होकर उनके परउपकारी और महान चरित्र में निहित होती है। महान साधक कभी सिद्धियों के चक्कर में नहीं पडते। भगवान बुद्ध ने तो इस प्रकार के चमत्कारों के प्रदर्शन से दूर ही रहने को कहा था। उनका कहना था यदि कल्याण चाहते हो तो इन चमत्कारों से बचकर केवल सदाचार का अभ्यास करो। महात्मा बुद्ध की यह शिक्षा सर्वोत्तम है।     

Sunday, September 15, 2013

हिंदी दिवस 14 सितंबर


 अंग्रेजी की अंतरराष्ट्रीयता का मिथक



कई लोग कहते हुए मिल जाएंगे कि अंग्रेजी विश्वभाषा है, उसे सीखे बगैर प्रगति कर नहीं सकते। यह पूरी तरह सत्य नहीं है। यह बात वे लोग करते हैं जो अंग्रेजी के सिवाय कुछ नहीं पढ़ते, जिन्हें दूसरी भाषाओं का रत्तीभर ज्ञान नहीं। अंग्रेजी अच्छी तरह से जाननेवाले आखिर इस देश में हैं ही कितने? किंतु इन लोगों ने राजकाज पर अपना वर्चस्व बना रखा है और इन्हीं लोगों ने अंग्रेजी की अंतरराष्ट्रीयता के मिथक का हौआ खडा कर रखा है।

यदि संपूर्ण विश्व परिदृश्य का इस संबंध में निरीक्षण किया जाए तो दिख यह पडेगा कि दर्शन हो या साहित्य, राजनीति का क्षेत्र हो या कला का यहां तक कि विज्ञान का भी तो अंग्रेजी का कहीं भी एकाधिकार नहीं है। विश्व के महान दार्शनिकों में गिने जानेवाले सुकरात, अरस्तू, अफलातून, हीगल, मार्क्स, गौतमबुद्ध, कणाद, कपिल आदि में से ना तो कोई अंग्रेज है ना ही अंग्रेजीभाषी। धर्म के क्षेत्र पर विचार करें तो जितने भी विश्वव्यापी धर्म हैं उनके धर्मग्रंथ मूलरुप से अंग्रेजी में नहीं लिखे गए हैं। अंग्रेजी तो बडी कठिनाई से आधा दर्जन देशों में राजकाज या घर-बाजार की भाषा है। इसका होहल्ला क्या केवल इसलिए है कि कभी विश्व में अंग्रेजों के राज में सूरज डूबता नहीं था!


यदि अकेली अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय भाषा होती तो संयुक्तराष्ट्र में अंग्रेजी के व्यतिरिक्त चीनी, फ्रेंच, स्पेनिश, रुसी यहां तक कि अरबी  भाषा को मान्यता ना होती। अमेरिका में भी अंग्रेजी का एकाधिकार नहीं है। कहीं स्पेनिश तो, कहीं फ्रेंच, डच भाषा का वर्चस्व है। यहां तक कि कई क्षेत्रों में अरबी, उर्दू, हिंदी, पंजाबी बहुतायत से बोली जाती है। अंतरराष्ट्रीय डाक भाषा भी अंगे्रजी ना होकर फ्रेंच है। विश्व में बहुतायत से बोली जानेवाली भाषा स्पेनिश है। एक समय था जब ब्रिटेन में अंग्रेजी को हीन समझा जाता था और प्रभुत्व फे्रंच का था। जितने भी कानून बनते थे वे फे्रंच में बनते थे और ऊँची शिक्षा की भाषा लैटिन थी। जो तर्क आज अंग्रेजी के लिए दिए जाते हैं वही तर्क किसी समय फ्रेंच और लैटिन को बनाएं रखने के लिए दिए जाते थे। अंग्रेजी को लाने के लिए संघर्ष करना पडा, अंग्रेजों का स्वाभिमान अंततः रंग लाया और इंग्लैंड में अंग्रेजी राजकाज की भाषा बनी।



अंग्रेजों ने आयरलैंड की भाषा गेलिक को एक शताब्दी में समाप्त कर अंग्रेजी को थोप दिया था। 1929 में आयरलैंड में गेलिक भाषा के लिए विद्रोह हो गया और अंत में समझौता होकर आयरिश गेलिक भाषा को आयरलैंड में राजकीय भाषा बनने का अधिकार प्राप्त हुआ। इसी प्रकार का विरोध मलेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन, सिंगापुर आदि में भी हो चूका है और अंगे्रजी के वर्चवस्व को वहां नकार दिया गया है। मध्य पूर्व के अरब देशों ने भी अपने निशाने पर अंग्रेजी को ही लिया था। चीन, कोरिया, जापान, वियतनाम ने अपनी भाषा को इतना उन्नत कर रखा है कि सारी प्रौद्योगिकी, आर्थिक, रक्षा, विज्ञान और राजनय के क्षेत्र में सारा काम उनकी अपनी भाषा में ही होता है। उनके यहां एक मोर्चा सतत अंगे्रजी के विरोध में डटा रहता है। वे अपनी प्रौद्यिगिकी भी अपनी भाषा में ही उपलब्ध कराते हैं, आपको उनकी भाषा आती हो या नहीं।



अब यदि हम हमारे देश के संबंध में विचार करें तो क्या देखते हैं कि हिंदी दिवस ने एक प्राणहीन, नीरस परंपरा का रुप धर लिया है। अंग्रेजी स्कूल कुकुरमुत्तों के रुप में उगते चले जा रहे हैं जहां अंग्रेजी के नाम पर अधकचरी पीढ़ी जिन्हें न तो ढ़ंग से हिंदी आती है और ना ही अंगे्रजी समझने-बोलने योग्य हो पाते हैं, तैयार की जा रही है। जबकि हिंदी इतनी प्रभावी है कि वोट मांगना हो तो हिंदी में ही मांगना पडता है, विज्ञापन हिंदी के ही लोकप्रिय हो पाते हैं, हिंदी बिना उनका काम चल नहीं सकता। इन बहुराष्ट्रीय व्यापारिक संस्थाओं को अपना सामान जो बेचना है। हां, इससे एक भय यह अवश्य पैदा हो गया है कि जिस भाषा को राष्ट्रभाषा बनना चाहिए कहीं वह बाजार की भाषा ना बनकर रह जाए! वैसे यह होना असंभव सा ही है, बस आवश्यकता है तो इच्छाशक्ति की जिसके आधार पर ही हम हिंदी को उसका स्थान दिला सकते हैं।



ऊपर वर्णित आंदोलन, उनकी सफलता, उनके स्वाभिमान से हमें प्रेरणा, मार्गदर्शन लेना होगा। वैश्वीकरण से उपजी प्रतिस्पर्धात्मक परिस्थिति का लाभ उठाकर हम हिंदी को और अधिक प्रभावी कर सकते हैं। जब कमाल अतातुर्क ने तुर्की को आधुनिक रुप देना प्रारंभ किया था तब उसने अपने अधिकारियों से पूछा- 'क्या देश का सारा कारोबार तुर्की भाषा में चलाना संभव है?" तब तक सारा कारोबार अंग्रेजी में ही चलता था। अधिकारियों ने कहा, 'सर ! इसके लिए कम से कम छः महीने आवश्यक हैं।" इस पर कमाल ने उत्तर दिया, 'समझो कि वे छः महीने आज रात को ही समाप्त हो रहे हैं और कल सुबह से पूरी तरह तुर्की भाषा में कारोबार करना शुरु करो।" बस तब से आजतक तुर्की का सारा कामकाज तुर्की भाषा में चला आ रहा है। और आज हम जिस विकास-विकास की रट लगाए रहते हैं उस दौड में वह हमसे कहीं आगे है एवं तुर्की भी हमारी तरह एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक देश है। वैश्विक राजनीति में वह कहीं से भी कमतर नहीं है।



वास्तव में आज हमें एक ऐसे क्रांतिकारी नेतृत्व को तलाशना होगा जो वर्तमान में व्याप्त निराशा के वातावरण से देश को उभारने के साथ ही साथ सत्ता में आने के पूर्व भी और आने के बाद भी हिंदी के मुद्दे को ना भूले इसके लिए वातावरण बनाना पडेगा तभी हिंदी दिवस मनाना सार्थक सिद्ध होगा।