Thursday, January 16, 2014
पैगम्बर की दयालुता !!
"No Civilized people of The world is so ignorant of Islamic History......as Hindus'' - M.N.Roy.
यह एक दु:खद कटु सत्य है। वह भी तब, जबकि इस्लाम का मुस्लिम समाज एक हजार से भी अधिक वर्षों से हमारे साथ रह रहा है। आज इस्लाम एक विश्वव्यापी समस्या का रूप धारण कर चुका है और उसका संत्रास तो हम हिंदुस्तान में उसके आगमन के समय से ही भुगत रहे हैं। दु:ख तो तब अधिक होता है जब अपने आपको बुद्धिजीवी, चिंतक, विचारक कहे जाने वाले, समझने वाले समाज के नेतृत्वकर्ता और स्वयं को प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडीया और उसके पत्रकार व्यवसायिकता की रौं मे ंबहकर अपने राजनैतिक और व्यवसायिक लाभ के लिए बिना किसी अध्ययन के जिनको विषय का कौडी का भी ज्ञान नहीं हो ऐसे विषयों में भी नि:संकोच विद्घता झाडने का दु:साहस करते हैं या बिना किसी जानकारी के या गंभीरता के उलजुलूल कथन करते हैं, प्रकाशित करते हैं, कर रहे हैं। यह अत्यंत पीडादायक है। इसी तरह के कुछ कथनों की बानगी प्रस्तुत है:
""जिसमें दया नहीं है, उसमें कोई सद्गुण नहीं है-हजरत मुहम्मद'' लीजिए पेश है हजरत मुहम्मद के दया वाले सद्गुण का एक नमूना:-
हजरत मुहम्मद ने अपने अपने जीवन के मदीनाकाल खंड के दस वर्ष के दौरान कुल 82 लड़ाइयां लड़ी, उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण लड़ाई ''खंदक युद्ध'' के नाम से प्रसिद्ध है, जिसका 1400 वां (हिजरी) स्मृति दिन सन् 1985 में धूमधाम से मनाया गया था। इस लड़ाई में मूर्तिपूजकों पर विजय संपादन के बाद पैगम्बर मुहम्मद ने अपनी 3000 की सेना के साथ यहूदियों की बनी कुरैजा टोली की बस्ती को घेर लिया। पैगम्बर मुहम्मद ने यहूदियों पर शत्रु पक्ष का साथ देने का आरोप लगाया। यहूदियों ने इससे इंकार किया। घेरा पच्चीस दिन चला। उस बस्ती के रहने वाले 2000 यहूदियों ने अंतत: शरणागति स्वीकार की। उन्होंने मदीना छोड़कर चले जाने की अनुमति मांगी परन्तु पैगम्बर मुहम्मद ने इस मांग को ठुकरा दिया और विकल्प सुझाया कि यहूदियों को दंड दिया जाए कि माफी इसका फैसला औस टोली का कोई व्यक्ति करेगा। ( औस टोली और बनी कुरैजा मित्र टोलियां थी, लेकिन अब औस टोली इस्लाम को स्वीकार कर मुस्लिम बन चुकी टोली थी।) बनी कुरैजा को यह विकल्प स्वीकारना पड़ा।
पैगम्बर मुहम्मद ने औस टोली के अपने कट्टर अनुयायी सद् बिन मआज को न्यायाधीश नियुक्त किया। वे हाल ही में हुए खंदक युद्ध में तीर लगने से गंभीर रूप से जख्मी अवस्था में थे और उनका इलाज चल रहा था। सद ने अल्लाह से प्रार्थना की कि, सजा सुनाने तक उन्हें जीवित रहने दिया जाए। सद् ने फैसला सुनाया ""इनके जो पुरूष लड़ने योग्य है, उन सबको कत्ल कर दिया जाए, इनकी औरतों और बच्चों को कैद कर लिया जाए और इनके माल बांट लिए जाएँ।"" इस पर पैगम्बर मुहम्मद ने फरमाया ''तुमने अल्लाह के आदेशानुकूल निर्णय लिया।'' (दअ्वतुल कुर्आन खंड 3 का भाष्य पृ. 1464) डॉ. रफीक जकरिया ने अपनी पुस्तक Mohammad and The Quran के पृ.36 पर मार डाले गए यहूदियों की संख्या 900 बताई है। सर विलयम मूर ने अपनी पुस्तक The Life of Mohammad के पृ. 318 पर इस घटना का वर्णन इस प्रकार किया है। ""इन सभी शवों को दफन किया जा सके इसके लिए बड़े गड्ढे पहले से ही रात में शहर से लगे हुए एक स्थान पर खोदे गए, दूसरे दिन सजा को अमल में लाया गया। उन्हें इन गड्ढों के किनारे पंक्तिबद्ध बैठाया गया। उसके बाद उनके सिर कलम कर शवों को गड्ढों में डालकर गड्ढों को भर दिया गया, मुहम्मद की देखरेख में ही यह कार्य चला दिन भर में भी कार्य समाप्त न होने के कारण प्रकाश की व्यवस्था कर रात भर यह कार्य चला।''
'' बदले की प्यास बुझा लेने के बाद (दयालु !) पैगंबर मुहम्मद ने इस वीभत्स कांड को भुलाने के लिए रेहाना के हुस्न की शरण ली। रेहाना के पति और अन्य रिश्तेदार अभी अभी नृशंस हत्याकांड में मर मिटे थे। उन्होंने रेहाना के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। उसने मना कर दिया। उसने बांदी अथवा रखैल बनना पंसद किया। (वस्तुत: शादी के लिए मना करने पर उसके लिए और कोई चारा भी नहीं था।) अपना धर्म बदलने से भी उसने इंकार कर दिया और अंत तक यहूदी बनी रही।'' (हदीस के माध्यम से इस्लाम का अध्ययन-रामस्वरूप पृष्ठ 121)
सर मूर ने पृ. 320 पर यह भी लिखा है कि ""घेरा डालने के पूर्व ही चार यहूदियों ने समझदारी दिखाते हुए इस्लाम को स्वीकार कर लिया और उन्हें क्षमा कर दिया गया।'' यदि बाकी के यहूदी भी इसी तरह की समझदारी दिखाते तो वे मारे न जाते निश्चय ही कोई चाहे तो इसे पैगम्बर मुहम्मद की दयालुता कह सकता है।
प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार इब्न हिशाम (पृ.834) के अलावा अन्य कई इतिहासकारों ने भी इस प्रसंग से संबंधित और भी कई घटनाओं का उल्लेख अपनी पुस्तकों में किया हुआ है। हदीस (पै. मुहम्मद की उक्तियां और कृतिया) वर्णन के अनुसार: ''युद्ध लूट का पांचवा हिस्सा पै. मुहम्मद ने रख लिया। उनके हिस्से में आई कुछ लड़कियों और औरतों को उन्होंने अपने मित्रों को भेंट के रूप में दिया और बची हुई नज्द क्षेत्र के लोगों को बेचकर उससे राज्य के लिए घोड़े और शस्त्र खरीद लिए। बची हुई लूट तीन हजार सैनिकों में नियमानुसार बांट दी गई।'' (मुस्लिम: 4370)
कुरान की सूर अल अहजाब की आयतें 26 और 27 में लड़ाई और न्याय का वर्णन इस प्रकार से आया हुआ है: ""और अहले किताब (यहूदी) में से जिन लोगों ने उन (हमलावर) गिरोहों की सहायता की थी अल्लाह ने उनके दिलों में ऐसा रोब डाल दिया कि एक गिरोह (पुरूषों) को तुम कत्ल करते रहे और दूसरे गिरोह (स्त्रियों व बच्चों) को तुमने कैद कर लिया और (अल्लाह ने) तुमकों उनकी जमीन, उनके घरों और उनके माल का वारिस बना दिया, और ऐसी(उपजाऊ) जमीन का भी जिस पर अभी तुमने कदम नहीं रखे। अल्लाह हर चीज पर सामर्थ्यवान है।"" अर्थात् यह सब कुछ अल्लाह की मदद से और उसके मार्गदर्शनानुसार तथा इच्छानुसार ही हुआ है।
इस दंड के संबंध में न्यायाधीश सैयद अमीर अली ने 'The Spirit of Islam' में लिखा है : ""थोड़ा सोचिए अगर अरबों की तलवार ने अपना काम अधिक दयालुता से किया होता तो हमारा (मुस्लिमों का) और आकाश तले के अन्य प्रत्येक देश का भविष्य आज क्या होता ? अरबों की तलवार ने, उनके रक्तांकित कृत्यों से संसार के हर कोने के पृथ्वी पर के सभी देशों के लिए दया लाने का काम (Work of Mercy) किया है।'' (पृ. 81,82) उनका अंतिम निष्कर्ष यह है कि: ''किसी भी भूमिका में से हो पूर्वाग्रह रहित मानस को ऐसा ही लगेगा कि, बनी कुरैजा को कत्ल किया था इसलिए पै. मुहम्मद को किसी भी तरह से दोषी ठहराना सम्मत नहीं।'' (पृ.82) हमें लगता है कि इसी दृष्टिकोण को नजर में रखते हुए पै. मुहम्मद और उनके अल्लाह की इसी दया से प्रभावित होकर यह कथन किया गया है कि ""जिसमें दया नहीं है उसमें कोई सदगुण नहीं है।''
इस कथन पर भी गौर कीजिए: "" हर मजहब में जितने संत हुए है उन सबका हृदय एक सा है, उनमें आपस में जो भेद दिखाई देते हैं, वे अन्य लोगों ने पैदा किए हैं, संतों ने नहीं।''- कुरान शरीफ।
यह कथन पूरी तरह मनगढ़ंत, झूठा और समाज को भ्रमित करने वाला है। इस तरह के झूठे, मनगढ़ंत भ्रम फैलाने वाले कथनों से शायद पत्रकारिता के तो नए आयाम स्थापित किए जा सकते हैं, परंतु इससे समाज का अहित ही होता हैं। यह भी शायद कम है इसीलिए तो इस्लाम के सत्य को उजागर करने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों को हेय दृष्टि से देखा जाता है, उनके लेखन का, कथनों का मजाक उड़ाया जाता है। परंतु ये तथाकथित बुद्धिजीवी स्वार्थवश इस बात को समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वास्तविकता को छुपा कर और गलत बयानी के द्बारा वे समग्र समाज और राष्ट्र का कितना अहित कर रहे हैं।
Saturday, January 11, 2014
जनचेतना व मानवधर्म के व्याख्याकार - स्वामी विवेकानंद
जिन दिनों स्वामी विवेकानंद अमरीका के प्रवास पर थे उन दिनों एक अमरीकी पत्रिका 'अपील एग्लांश" ने स्वामीजी की प्रशंसा में लिखा- 'इस समय के सबसे बडे संसार के प्रसिद्ध विचारक विद्वान हैं (वे)।" इस पत्रिका ने जनता से आग्रह किया 'आप लोग स्वामीजी को अवश्य देखने-सुनने जाएं, कारण उनमें पूर्व (भारत) की आत्मिक-मानसिक, आध्यात्मिक संस्कृति का आलोक और तेज संप्राप्त होता है। वस्तुतः स्वामी विवेकानंद, बीच में जो लंबा अंतराल था, उसके पूरक हैं?
अपनी व्याख्यानमाला में विवेकानंद उस दुखी भारत को कभी नहीं भूले जो अन्नाभाव से पीडित, पराधीन था और भूलावे में लाकर विदेशी पादरियों द्वारा ईसाई बनाया जा रहा था। भारत की इस क्षत-विक्षत स्थिति पर जब वे बोलते थे तो आवेश में आ जाते थे और अंग्रेज जो अन्याय भारत की जनता से प्रतिदिन कर रहे थे उसका मर्मांतक चित्रण प्रस्तुत करने से कभी भी नहीं चूकते थे। वे बडी निर्भयता से बोलते थे कि 'अंग्रेज पादरी आज जो बाइबल की पोथियां बांटकर उन्हें जो धर्मशिक्षा देने का प्रयत्न कर रहे हैं, वास्तव में भारत को इस समय उसकी कतई आवश्यकता नहीं है। भारतवासियों को आज चाहिए रोटी और कपडा। इसलिए इंग्लैंड भारत को अपने पादरी भेजने की बजाए राशन भेजे। भारत कृतघ्न नहीं है वह इंग्लैंड को उसके बदले में अपना जीवन दर्शन, योगविद्या, अध्यात्मिक ज्ञान देकर उसे लाभान्वित करेगा।" और स्वामीजी अमरीका को भारत के इस ज्ञान-सम्मुज्वल रुप से परिचित कराने में यशस्वी भी रहे।
उनका दर्शन था ''परोपदेशे पांडित्य कभी नहीं होने दो। हम जग के गुरु नहीं, शिष्य तथा सेवक हैं।"" यह थी उस त्यागनिष्ठ संत की लोकभावना जो मानवधर्म का पक्ष निरंतर प्रकट करती है। 1902 में जब वे बेलूर मठ में ही रहा करा करते थे तथा मठ के घरेलू कार्यों की देखरेख करते हुए कभी-कभी कोई कार्य स्वयं के हाथों से करते हुए समय बीताते थे तब वहां मठ की भूमि की स्वच्छता तथा मिट्टी खोदने प्रतिवर्ष ही कुछ संथाल कुली आया करते थे। उन संथालों में एक व्यक्ति का नाम था केष्टा जो स्वामीजी को बडा प्रिय था। एक दिन स्वामीजी ने केष्टा से कहा ''अरे तुम लोग हमारे यहां खाना खाओगे?"" केष्टा बोला, ''हम अब और तुम लोगों का छुआ नहीं खाते हैं, अब ब्याह जो हो गया है। तुम्हारा छुआ नमक खाने से जात जाएगी रे बाप।"" स्वामीजी बोले, ''नमक क्यों खाएगा रे? बिना नमक डाले तरकारी पका देंगे, तब तो खाएगा ना?"" केष्टा उस बात पर राजी हो गया। इसके बाद स्वामीजी के आदेश पर सब संथालों के लिए पूरी, तरकारी, मिठाई, दही आदि का प्रबंध किया गया और वे उन्हें बिठाकर खिलाने लगे। खाते-खाते केष्टा बोला, ''हां रे स्वामी बाप, तुमने ऐसी चीजें कहां से पाई हैं-हम लोगों ने कभी ऐसा नहीं खाया।"" स्वामीजी ने उन्हें संतोषपूर्वक भोजन कराकर कहा, ''तुम तो नारायण हो-आज मैंने नारायण को भोग दिया।""
स्वामीजी जो दरिद्रनारायण की सेवा की बात कहा करते थे, उसे उन्होंने इसप्रकार से स्वयं करके दिखाया है । वे विदेश में धर्मप्रचारार्थ गए ही इसलिए थे कि, इस देश के लिए अन्न का प्रबंध कर सकें।
मद्रास प्रांत में जो हजारों पेरिया ईसाई बने जा रहे थे उनके संबंध में उनका कहना था कि ऐसा न समझना कि वे केवल पेट के लिए ईसाई बनते हैं। वास्तव में हमारी सहानुभूति न पाने के कारण वे ईसाई बनते हैं। हम दिन-रात उन्हें यही कहते रहे हैं कि, ''छुओ मत छुओ मत।" देश में अब क्या दया-धर्म है भाई? केवल छुआछूतपंथियों का दल रह गया है। ऐसे आधार के मुख पर मार झाडू, मार लात। इच्छा होती है तेरे छुआछूत पंथ की सीमा को तोडकर अभी चला जाऊं-जहां कहीं भी पतित-गरीब, दीन-दरिद्र हों, आ जाओ, यह कहकर उन सभी को श्रीरामकृष्ण के नाम पर बुला लाऊं। इन लोगों के बिना उठे मां नहीं जागेगी। हम यदि इनके लिए अन्न-वस्त्र की सुविधा न कर सके तो फिर हमने क्या किया? हाय! ये लोग दुनियादारी कुछ भी नहीं जानते हैं। इसलिए तो दिनरात परिश्रम कर के भी अन्न-वस्त्र का प्रबंध नहीं कर पाते। आओ हम सब मिलकर इनकी आंखे खोल दें- मैं दिव्य दृष्टि से देख रहा हूं, इनके और मेरे भीतर एक ही ब्रह्म-एक ही शक्ति विद्यमान है, केवल विकास की न्यूनाधिकता है। सभी अंगों में रक्त का संचार हुए बिना किसी भी देश को कभी उठते देखा है? एक अंग के दुर्बल हो जाने पर दूसरे अंग के सबल होने से भी उस देह से कोई बडा काम फिर नहीं होता इस बात को निश्चित जान लेना।""
एक प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा था- ''भाइयों! कहो कि नंगा भारतीय, अशिक्षित भारतीय, हरिजन भारतीय मेरा भाई है। बहनों! अपनी आवाज और ऊंची उठाकर कहो कि भारत में सिर्फ मानव ही आराध्य है। भारत के लिए मानव संस्कृति का विकास बहुत जरुरी है। और दिनरात प्रार्थना करो कि हे गौरीपति! हे महाशक्ति! मेरी निर्बलता को दूर करो और मुझमें संघर्ष करते रहने की निरंतर शक्ति दो।"" इन पंक्तियों मे स्वामीजी की मानवधर्म की सच्ची व्याख्या स्पष्ट है। और इसमें से यह भी दृष्टिगोचर होता है कि, स्वामीजी के मन में सामान्यजनों के लिए कितना अनुराग, समादर था।
एक बार उनसे पूछा गया आपका राष्ट्रीय उद्देश्य क्या है? मुक्ति की व्यापक परिभाषा आप किसे कहते हैं? स्वामीजी का उत्तर था- मुक्ति वही है जिसने अपना सब कुछ दूसरों के लिए त्याग दिया। अंतःकरण की निर्मलता ही सबसे बडी शुद्धि है। सबसे पहले उस विराट पुरुष की पूजा करो, जो हमारे चारों ओर विराजमान है। ये सब मनुष्य और पशु ही हमारे देवता हैं। इनमें भी सबसे पहले पूजा करो, अपने देशवासियों की और यही हमारा सच्चा राष्ट्रीय उद्देश्य है।
स्वामीजी के उक्त विचारों को दृष्टि में रख यदि वर्तमान पर नजर डालें तो परिस्थितियां आज भी कुछ विशेष बदली नहीं हैं। हम अंतर्बाह्य अंतर्द्वंद से ग्रस्त हैं, स्वामीजी के बताए लक्ष्यप्राप्ति से कोसो दूर होकर कुंठित हुए जा रहे हैं और समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं ऐसी परिस्थिति में हमें स्वामीजी के यह वचन मार्गदर्शन कर सकते हैं- ''मैंने जो कुछ कहा है उन बातों को मन में गूंथकर रखना। कहीं भूल न जाना।""
गंभीरतेने विचार करा राज साहेब !
गेल्या बरेच दिवसांपासून राज ठाकरे आणि त्यांच्या मनसे ने हिंदी आणि हिंदीभाषी उत्तरप्रदेश-बिहारच्या लोकांचा विरोध आणि छळवाद मांडला आहे. त्यांच्या मुंबई मध्ये उपजीवेके करीता येण्यावर त्यांचा आक्षेप असून त्यांना प्रताडित केले जात आहे. याला योग्य कसे म्हटता येईल. हे देशाच्या घटनेकडून प्रत्येक नागरिकाला मिळालेल्या शिक्षा, व्यवसाय, उपजीवेके करीता पूर्ण देशात कुठेही येण्या-जाण्याच्या अधिकाराचा हनन आहे. आम्ही मुंबईकरांच्या या दृष्टीकोणाशी सहमत आहोत की जर हे असेच येत राहिले तर आम्ही आणि आमची मुले कुठे जाणार. मुंबईत जागा मर्यादित आहे; तीनही बाजूने समुद्र आहे; इतकी लोक इथे कशी सामावतील याचा पण काही विचार केला गेला पाहिजे. इथली नागरी-व्यवस्था कोलमडत आहे.
उ.प्र. बिहार या प्रदेशांनी उन्नती केली नाही म्हणून त्या लोकांना इतक्या दूर आपले घर-दार सोडून परक्या ठिकाणी कष्ट उपसायला यावे लागत आहे. जिथे पोट-पाण्याची व्यवस्था होऊ शकते तिथेच जाऊन लोक वसतात. त्यांना वाटते की ही सोय मुंबईला होऊ शकते म्हणून ते तिथे येतात आणि त्यांची सोय होते ही. सकृत दर्शनी यात मुंबईकरांचाच हलगर्जीपणा दिसून येत आहे. कां बरे? एक शतकापूर्वी युती म्हणजे भाजप-शिवसेनेच सरकार होत आणि त्या वेळेस राज ठाकरे त्या युतीच्या शिवसेनेचे एक प्रमुख घटक होते. त्या वेळेस कोंकण (मुंबई पण कोंकणाचाच एक भाग आहे) शिवसेनेचा गढ़ होता. तिथे गरीबी; बेकारी पण भयंकर आहे, च्या लोकांना जर एखाद्य मोहिम सारखे चालवून, जसकी वीर सावरकरांनी, ज्यांना हिंदुत्ववादी असल्या कारणाने युतीचे नेते मोठ्या सन्मानाच्या दृष्टीने बघतात, दुसऱ्या विश्वयुद्धाच्या वेळेस सैनिकीकरणाची मोहिम राबवून त्यांत यश पण मिळविले होते, आपल्या लोकांना व्यवसायिक शिक्षण देऊन त्यांना मुंबईत आणून कामास लावून व्यवस्थितशीर वसवले असते तर त्यांचे पण भले झाले असते आणि ज्यांना ते समस्या समजून राहिले आहेत, ज्यांच्या मुळे त्यांची भाषायी आणि प्रादेशिक अस्मिता त्यांना धोक्यात दिसून राहिली आहे, उभी राहिली नसती. ते तर आपण केले नाही आणि आता जेव्हा ते उ.प्र.-बिहारचे भैया त्या (सेवाक्षेत्राच्या) जागेला भरण्याकरीता येऊन राहिले आहेत, कां की पोकळी कुठेच राहू शकत नाही. तर, आपल्याला अडचण होत आहे आणि आपण देशतोडक-घातक कामें आपल्या व्होट बॅंक बनविण्या, राखण्यासाठी मराठी अस्मितेच्या नावावर करीत आहात.
कदाचित् राज साहेब आपण वरील कार्य संगतीच्या प्रभावामुळे करु शकला नसाल. आपली युती भाजप बरोबर होती. भाजप जेव्हा विपक्षात असते तेव्हा 370चे कलम, समान नागरिक संहिता, राममंदिर सारखे मुद्दे उचलते, आपल्या घोषणा-पत्रात ठेवते आणि जेव्हा सत्तेत येते तेव्हा सगळे विसरुन जाते आणि आड घेते एनडीएच्या घोषणा-पत्राची. की काय करणार? आमच 'ऍलायन्स" आहे जेव्हा पूर्णपणे भाजपच सरकार येईल तेव्हा करु! मानले की आपण (म्हणजे भाजप) असहाय होता. पण आपण बांग्लादेशींची घुसखोरी तर थांबवू शकत होता. पण नाही! आपण गोहत्या बंदी तर करु शकता होता. परंतु, ते ही आपण केले नाही. निष्क्रीय राहिलात. आणि आता गो-यात्रा काढ़ल्या जाऊन राहिल्या आहेत. याचाच अर्थ की तडजोड केवळ आणि केवळ सत्ते करीताच होती.
आता संघ पण उ.प्र. बिहारच्या लोकांच्या रक्षकाची भूमीका घेऊन पुढ़े आला आहे आणि त्यानी आपल्या स्वयंसेवकांना त्यांचे रक्षण करण्याची आज्ञा दिली आहेे. तथा भाजपचे अध्यक्ष श्री नीतिन गडकरींनी सुद्धा आम्ही संघाशी सहमत आहोत असे म्हटले आहे. संघपरिवाराची ही भूमीका एकात्मतेच्या दृष्टीने निश्चितच वाखाखण्या सारखी आहे आणि या प्रकारे त्यांनी आपला हिंदू व्होट बॅंक राखून घेतला आहे. पण शिवसेनेची 'आमची मुंबई"ची भूमीका, मराठी प्रेम आणि स्वतःला मराठी भाषिकांच्या रक्षणकर्त्याच्या भूमीकेत उपस्थित करणे हे काही नवीन नाही. यापूर्वी पण ते दक्षिण भारतीयांच्या विरुद्ध अशीच मोहिम राबवून चूकले आहेत. पण त्यावेळेस मात्र संघ चुप्प राहिला. याच प्रकारे 'गुरुजी जन्म शताब्दी वर्ष"च्या दरम्यान पूर्ण वर्षभर 'संघ परिवार" एकाच गोष्टीची पुनरावृत्ती करीत राहिला की शीखधर्म धर्म नाही; जैनधर्म धर्म नाही; बौद्धधर्म धर्म नाही. हे सगळे सम्प्रदाय आहेत. धर्म केवळ हिंदूधर्म आहे. आता हे ठरवण्याचा-सांगण्याचा अधिकार संघ परिवाराला कोणी दिला की शीखधर्म धर्म आहे की सम्प्रदाय? संघाकडून वारंवार या अशा प्रकाराची वक्तव्ये दिल्या जात राहिल्यामुळे शीखांनी म्हटले की संघ प्रमुख सुदर्शनांनी पंजाबच्या भूमीवर येऊन असे भाष्य करण्याची हिंमत करु नये, नाही तर परिणाम भोगावे लागतील. तरी पण हा आलाप चालूच राहिला. परंतु, जशा पंजाबच्या निवडणूका समोर दिसू लागल्या तसेच भाजप-अकाली गठबंधनाच्या आवश्यकतेला बघून तत्काल शताब्दी समारंभाच्या समारोपाच्या वेळेस श्री सुदर्शन यांनी मंचावरुन सूर बदलून शीखधर्माला सम्प्रदायाच्या स्थानावर धर्म म्हटले. अशा प्रकारची स्वार्थी, व्होट बॅंकेची भूमीका योग्य कशी म्हणता येईल! योग्य तर हे राहील की संघानी केवळ आणि केवळ राष्ट्रहिताच्या एकात्मते वरच स्थिर राहवे. त्यास स्वार्थ आणि व्होट बॅंकेच्या राजकारणा करीता दूषित करु नये.
आम्ही राज ठाकरे बरोबरच मुंबईकरांवरही बोट उचलले आहे. ते या करीता की जेव्हा हे उ.प्र. बिहारवाले सुरवातीला 'आमची मुंबई" मध्ये उपजीविकेच्या शोधात आले तेव्हा ते कुठे आपल्या मराठीचा विरोध करीत होते, टिंगल करीत होते. जर का तेव्हाच आपण त्यांना मराठी शिकविली असती, त्यांच्याशी मराठीतच बोलला असता तर त्यांनी पण विचार केला असता की जर आपल्याला येथे राहवयाचे असेल तर ज्या प्रकारे आपण वडा-पावास स्वीकारले; त्याप्रमाणेच मराठीस पण स्वीकारावे लागेल, आपल्याला मराठी शिकावेच लागेल. या शिवाय काही पर्याय नाही. तर, ते मराठी शिकले असते. त्यांच्या आणि तुमच्या मध्ये समरसता निर्माण झाली असती. मुंबई मध्ये जी समस्या आहे ती पुण्याला किंवा नागपूरला तर दिसत नाही. पण तुम्ही तर 'बम्बईया भाषेलाच" जन्म देऊन दिला आणि आता मराठीच्या नावाने रडत आहात. आणि आता फालतूचे चाळे तुम्हा लोकांस सूचत आहेत. जसे की टेक्सी चालविण्या करीता मराठीचे बंधन. अगदी साधी सरळ गोष्ट आहे जर का एखाद्या पंजाबी भाषिकाला बंगाल मध्ये टेक्सी चालवायची असेल तर त्याला बंगालीतच बोलाव लागेल, पंजाबीनी काम चालणार नाही. कारण बंगालचे लोक आग्रहपूर्वक बंगालीतच बोलतील. पण आज एवढ्याशा छोट्याशा गोष्टी करीता आपण कायदा बनवू इच्छिता आणि टीकेचा शिकार बनित आहात.
आणि आता तर हद्द झाली की एक उच्चस्तरीय कमेटी आपल्यास सल्ला देत आहे की 'राज्याच्या मंत्री-अधिकाऱ्यांनी राज्याच्या बाहेरून येणाऱ्या गैर-मराठी किंवा परदेशी पाहुण्यांशी पण मराठीतच बोलावे". तर्क हा दिला जात आहे की 'मराठीचा उपयोग केल्याने मराठी भाषा वाढ़ेल, त्या बरोबरच दुभाषिकांच्या रुपात कित्येक लोकांस काम पण मिळेल." हा तर्क निश्चितच चांगला आहे. पण राष्ट्र-राज्याचे हित सर्वोपरी आहेत. जर आपण परदेशी पाहुण्यांशी राष्ट्र-राज्याच्याहिता करीता इंग्रजीत बोलू शकतो, परदेशात जाऊन इंग्रजीत भाषण देऊ शकतो, त्याकरीता इंग्रजी शिकू शकतो तर हिंदी कां म्हणून शिकू शकत नाही, बोलू शकत नाही? कां की हिंदी ही संपूर्ण राष्ट्राकरीता समन्वयाची भाषा म्हणून मानावीच लागेल. या बाबतीत आपण श्रीमती सोनिया गांधीचा ज्या एक परदेशी मूळाच्या आहेत, आदर्श समोर ठेऊ शकतो. ज्यांनी या देशाची सून बनण्याकरीता या देशाची संस्कृती स्वीकारली, हिंदी शिकल्या. तसेच ज्यांना हिंदी येते ते तर निश्चितच बोलू शकतात. त्यांच्या करीता हा अट्टहास कां की त्यांनी पण दुभाषियाच्याच माध्यमाने बोलावे. हं जे ग्रामीण भागातील असल्या कारणांमुळे हिंदी चांगल्या तऱ्हेने समजू-बोलू शकत नाहीत त्यांनी जर दुभाषियांची मदत घेतली तर त्यात काहीच गैर नाही. आमच्या दृष्टीने तर वरील प्रकारचा मराठी प्रेम कुचकाम्या आणि राजकारणा शिवाय आणखिन काहीही नाही.
या प्रकारेच राज ठाकरेच्या मनसे ने पण '40 दिवसात मराठी शिका किंवा मुंबई सोडा"चा एक नवीन फरमान काढ़ला आहे. उ.प्र. बिहारची लोक परदेशी आहेत कां? जे त्यांना बाहेर काढ़ण्याच्या गोष्टी केल्या जात आहेत, आम्ही याचा विरोध करतो आणि म्हटतो की हिंमत असेल तर बांग्लादेशी घुसखोऱ्यांना जे मुंबईत ठाण मांडून बसले आहेत त्यांना हाकलून दाखवा. वस्तुतः झाले हे पाहिजे की आपण तेथल्या आपल्या मराठी भाषिकांना सांगावे की त्यांनी केवळ मराठीतच संभाषण करावे. जर उ.प्र.च्या भैया आपल्या लंगडा किंवा दशहरी आंब्याची किंमत शंभर रुपये सांगतो तर आपण मराठीत बोलावे की मी शंभर नाही पन्नासच देईन. त्याला समजो ना समजो तो आपला व्यापार चालविण्याकरीता 'पचहत्तर" म्हणेल आपण म्हणावे की चल 'साठ" देईन. 'साठ" तर हिंदी-मराठी दोन्ही भाषेत म्हटल जात. जर उ.प्र.च्या भैयाला तिथे राहून आपली उपजीविका चालवायची असेल, दोन पैशे कमवायचे असतील तर तो झक्कत मराठी शिकेल, बोलेल. त्याकरीता मारा-कूटी करायची काय गरज आहे?
राज ठाकरेच मराठी प्रेम आणि हिंदी विरोध जेव्हा विधानसभेच्या निवडणूकीत थोड्याशा यशानंतर विधानसभेच्या शपथविधि समारंभापर्यंत जाऊन पोहोचले तेव्हा त्यांना आपल्या मराठी प्रेमाचे प्रदर्शन करण्याच माध्यम एक 'सभासद विशेष"च हिंदी मध्ये शपथ घेण्याचे दिसले, इंग्रजीत शपथ घेण्याचा विरोध करण्याची हिंमत मात्र त्यांना एकटविता आली नाही. पण ते हे विसरुन गेले की हिंदी देशाची राष्ट्रभाषा झाली पाहिजे ही बाब सगळ्यात आधी उचलणारे लोकमान्य टिळक होते. आणि त्यांचेच शिष्य वीर सावरकरांचा तर महान मंत्रच होता 'हिंदी हिंदू हिंदुस्थान" वा त्यांनी ना केवळ हिंदी ही राष्ट्रभाषा झाली पाहिजेची मोहिम राबविली तर भाषा-शुद्धिची मोहिम सुद्धा राबविली होती. सर्वमान्य आणि सर्वज्ञात शब्द 'महापौर"चे सृजन करणारे या शिवाय आपरेशनला 'शल्यक्रिया", फिल्मला 'चित्रपट" सारखे नव-नवे शब्द हिंदीला देणारे-रचणारे वीर सावरकरच होते. हिंदीत सगळ्यात पहिली कथा लिहणारे मराठी भाषी माधवराव सप्रे होते. ज्यांच्या नावावर भोपाळ मध्ये एक संग्रहालय आहे ज्याची स्वर्णजयंती आता काही वर्षापूर्वीच साजरी केली गेली. तसेच त्या काळातील हिंदीचे मान्यवर पत्रकार श्री ग. वा. पराडकर होते हे लक्षात घ्यायला हवे.
जर का राज ठाकरे यांचे मराठी प्रेम खरे असेल तर त्यांनी हिंदीचा उगीचचा विरोध करणे सोडून सगळ्यात आधी मराठी-हिंदीचा शब्दकोश उचलून बघावा की त्यांच्या मराठीत किती परदेशी शब्द घुसून बसले आहेत. त्या शब्दांची घुसखोरी इतकी व्यापक आहे की ते धार्मिक कर्मकांडांमधून पण उच्चारले जात आहेत. उदा. छबीना-(फा. शबीनः)-रात्री निघणारी मूर्तिची देवाची यात्रा. या प्रमाणेच महाराष्ट्रीय लोकांत आपल्यापेक्षा मोठ्या, आदरणीय लोकांकरीता सगळ्यात जास्त वापरले जाणारे शब्द आहेत आबासाहेब, बाबासाहेब. आबा आणि बाबा हे वडिल किंवा आजोबांंकरीता अरबीत वापरले जातात. या प्रमाणेच बायको (धर्मपत्नी) हा तुर्की शब्द आहे जो सगळेचजण सर्रास आपल्या सौभाग्यवतींकरीता वापरतात.
ज्या छत्रपतींचा उत्तराधिकार आपण चालवित आहात, जे आपले आदर्श आहेत. त्यांनी हे जाणूनच की ''संस्कृत आणि मराठीचे नाते माय-लेकीचे आहे. त्यामुळे श्री रघुनाथ पंडितांकडून लिहवून घेतलेला राज्यव्यवहारकोश स्वराज्याच्या दैनंदिन व्यवहाराशी चटकन एकरुप झाला. फार्सी व अरबी शब्द जाऊन सहज सामान्य जनतेलाही समजणारे संस्कृत प्रचुर शब्द जीवनात मिसळून गेले. पेशवा, सुरनीस, सरनौबत, मुजुमदार असे असंख्य परकीय शब्द विरघळून त्या एवजी पंतप्रधान, सचिव, सेनापती, अमात्य असे आपले शब्द रुढ़ होत गेले. भाषा-शुद्धिचे मूळ व वर्म महाराजांना अचूक उमगले होते. एकदा संज्ञा बदलल्या की संवेदनाही बदलतात. स्वत्वाचा आविष्कार आपोआपच होतो. त्याचा परिणाम मन राष्ट्रीय आणि जागृत होण्यात होत असतो. महाराजांनी महाराष्ट्राच्या संवेदना जाग्या केल्या. मातृभाषा हा राष्ट्राचा प्राण असतो. भाषा म्हणजे संजीवनीच.""
पण राज ठाकरे यांनी तर आता अतिरेकाचा कळसच गाठला आहे. त्यांचे म्हटणे आहे की 'फक्त मराठी बोलण्या, लिहण्या आणि वाचण्यानी चालणार नाही. नौकऱ्या त्यांनाच मिळाल्या पाहिजेत ज्यांचा जन्म महाराष्ट्रात झाला असेल. ही तर एका प्रकारे वेगळ्या राष्ट्रीयतेची सुरवातच म्हणावी लागेल. आता त्यांचा आक्षेप त्यांच्याच मनसेचा 40 दिवसात मराठी शिकाच्या फरमानावर पण आहे. हा या देशाच्या मातीशी द्रोह आहे. महाराष्ट्रातच जन्मलेल्या वीर सावरकरांनी तर आयुष्यभर या देशाला-राष्ट्रालाच आपले देव मानले आणि राष्ट्राकरीताच जगले. राज ठाकरे यांनी हे विसरु नये की आधी राष्ट्र मग महाराष्ट्र.
मराठी प्रमाणेच हिंदीचा जन्म पण संस्कृत मधूनच झाला आहे. ही हिंदी शुद्ध अवस्थेत संस्कृत प्रचुर राहवी या करीता उत्तरेतील पंडितांनी पण अविरतपणे प्रयत्न केले होते. म्हणूनच तर हिंदी हिंदी राहिली. हिंदुस्तानी होऊ शकली नाही. राजर्षि पुरषोत्तमदास टण्डन यांनी म्हटले होते - ''मला संस्कृतनिष्ठ हिंदीच्या चळवळीची प्रेरणा वीर सावरकरांकडूनच प्राप्त झाली होती."" आपण पण असच काही तरी महान कार्य आपल्या माय बोली प्रिय मराठीकरीता करावे. आणि आपण करु पण शकता. म्हणूनच आमच आपल्यास असे म्हटणे आहे की 'गंभीरतेने विचार करा राज साहेब". का की आमच्या विचारा प्रमाणे हीच आपल्याकडून आपल्या आराध्य वीर शिवाजी, लोकमान्य टिळक आणि वीर सावरकरांना खरी आदरांजली राहील. आता इतके मात्र खरे की सापेक्षतया उन्नत राज्यांवर बाहेरच्यांचा हा जो भार वाढ़त आहे त्या विषयी केंद्रशासनानी विचार करण्याची आवश्यकता आहे.
गंभीरता से विचार करें राज साहब !
एक लम्बे समय से राज ठाकरे और उनकी मनसे द्वारा हिंदी और हिंदीभाषी उ.प्र., बिहारवासियों का विरोध, उत्पीडन किया जा रहा है, उनके मुंबई में उपजीविका के लिए आने पर उन्हें प्रताडित किया जा रहा है। निश्चित ही यह अनुचित है। पूरे देश के नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदत्त शिक्षा, व्यवसाय, उपजीविका के लिए पूरे देश में कहीं भी आ-जा सकने, बसने के अधिकारों का हनन है। मुंबईवासियों के इस दृष्टिकोण से हम सहमत हैं कि यदि ये इसी प्रकार आते रहे तो, हम और हमारे बच्चे कहां जाएंगे। मुंबई में स्थान सीमित है; तीनों ओर समुद्र है; इतने लोग इसमें कैसे समाएंगे। यहां की नागरिक व्यवस्था चरमरा रही है।
उ.प्र., बिहार इन प्रदेशों ने उन्नति नहीं की इसलिए उन लोगों को इतनी दूर अपना घर-बार छोडकर पराए स्थान पर कष्ट उठाने के लिए आना पड रहा है। जहां दो वक्त की रोजी-रोटी की व्यवस्था हो वहीं जा कर लोग बसते हैं। उन्हें लगता है कि यह व्यवस्था मुंबई में हो सकती है इसलिए वे वहां आते हैं और पाते भी हैं। हमारा कहना तो यह है कि इस संबंध में सबसे बडी गलती मुंबईवासियों और उनके राज जैसे नेताओं की ही है। कैसे? आज से एक दशक पूर्व युती यानी भाजपा-शिवसेना की सरकार थी और उस समय राज ठाकरे उस युती की शिवसेना के एक प्रमुख घटक थे। उस समय कोंकण (मुंबई भी उसीका हिस्सा है) जो शिवसेना का गढ़ था, वहां गरीबी, बेरोजगारी भी बहुत है, के लोगों को यदि एक मुहिम जैसा चलाकर, जैसाकि वीर सावरकर ने, जिन्हें हिंदुत्ववादी होने के कारण युती के बडे नेता बडे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, द्वितीय विश्व युद्ध के समय सैनिकीकरण का अभियान चलाया था और अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता भी पाई थी, अपने लोगों को रोजगारमूलक शिक्षा देकर उन्हें मुंबई में लाकर काम-धंदे से लगाकर व्यवस्थित ढ़ंग से बसाया होता तो, उनका भी भला होता और जिन्हें वे समस्या मान रहे हैं, जिनके कारण उनकी भाषायी, प्रादेशिक अस्मिता उन्हें खतरे में नजर आ रही है, खडी न होती। परंतु, यह तो उन्होंने किया नहीं किया। और आज जब वे उ.प्र., बिहार के लोग उस (सेवाक्षेत्र) जगह को भरने के लिए आ रहे हैं क्योंकि, निर्वात कहीं भी रह नहीं सकता। तो, आपको अडचन हो रही है। और आप देशतोडक-घातक कार्यवाही केवल अपना वोट बैंक बनाए रखने-बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। शायद आप उपर्युक्त कार्य संगत के असर के कारण न कर पाए हों। आपकी युती भाजपा के साथ थी, जो विपक्ष में रहती है तो धारा 370, समान नागरिक संहिता, राम मंदिर जैसे मुद्दे उठाती है अपने घोषणा-पत्र में रखती है। और जब सत्ता में आती है तो सब भूल जाती है तथा आड लेती है एनडीए के घोषणा-पत्र की कि क्या करें गठबंधन सरकार है जब पूरी तरह से हमारी सरकार आएगी तब करेंगे। मानाकि आप (भाजपा) असहाय थे। परंतु, आप बांग्लादेशी घुसपैठियों को तो रोक सकते थे। परंतु, नहीं! आप गोहत्या बंदी तो कर सकते थे। परंतु, वह भी आपने नहीं किया. निष्क्रिय रहे। और आज गो-यात्राएं निकाली जा रही हैं। इसका अर्थ यह है कि समझौता केवल और केवल सत्ता के लिए ही था।
अब संघ भी मैदान में रक्षक की भूमिका में कूद पडा है और अपने स्वयंसेवकों को महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों की रक्षा का निर्देश दिया है। तथा भाजपा के अध्यक्ष नीतिन गडकरी ने भी हम संघ से सहमत हैं ऐसा कहा है। संघ परिवार की यह भूमिका एकात्मता की दृष्टि से निश्चिय ही प्रशंसनीय है और इस प्रकार से उन्होंने अपना हिंदू वोट बैंक सुरक्षित कर लिया है। परंतु, शिवसेना की 'आमची मुंबई" की भूमिका, मराठी प्रेम और स्वयं को मराठी भाषीयों के रक्षक के रुप में प्रस्तुत करना भी कोई नया नहीं है। इसके पूर्व वे दक्षिण भारतीयों के खिलाफ अभियान चला चूके हैं। लेकिन तब संघ चुप्पी साधे रहा। इसी प्रकार से 'गुरुजी जन्म शताब्दी वर्ष" के दौरान पूरे वर्ष भर संघ परिवार एक ही बात बार-बार दोहराता रहा कि सिक्खधर्म नहीं है, जैनधर्म नहीं है, बौद्धधर्म नहीं है। ये सब सम्प्रदाय हैं। धर्म केवल हिंदूधर्म है। अब यह अधिकार संघ को किसने दिया कि वह यह तय करे कि सिक्खधर्म धर्म नहीं सम्प्रदाय है? संघ द्वारा इस प्रकार के वक्तव्य बार-बार दिए जाने पर सिक्खों द्वारा यहां तक कहा गया कि संघ प्रमुख सुदर्शन पंजाब की भूमि पर इस प्रकार के वक्तव्य देने की जुर्रत न करें वरना ठीक नहीं होगा। तब भी यह आलाप चलता ही रहा। परंतु, जैसे ही पंजाब के विधानसभा चुनावों को निकट आते देखा तो भाजपा-अकाली गठबंधन की आवश्यकता को देख तत्काल शताब्दी समारोह के समारोप के समय सुदर्शनजी ने मंच से सूर बदलते हुए सिक्खधर्म को सम्प्रदाय के स्थान पर धर्म करार दिया। क्या इस प्रकार की वोट बैंकवाली स्वार्थी एकात्मता उचित है। उचित तो यह होगा कि संघ केवल और केवल राष्ट्रहित वाली एकात्मता पर ही अडिग रहे। उसे स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति से दूषित न करे।
हमने राज ठाकरे के साथ-साथ मुंबईवासियों पर भी जो ऊंगली उठाई है वह इसलिए कि जब ये उ.प्र. बिहारवाले शुरुवात में 'आमची मुंबई" में काम-धंदे की तलाश में आए तब कहां वे आपकी मराठी का विरोध कर रहे थे, मजाक उडा रहे थे। अगर उसी समय आपने उन्हें मराठी सीखाई होती, उनसे मराठी में ही बोले होते तो वे भी सोचते कि यहां रहना है तो, जिस प्रकार से हमने वडा-पाव को अपनाया है वैसे ही मराठी को भी अपनाना होगा; मराठी सीखना पडेगी; वे सीखते और आपमें समरसता पैदा हो जाती। आपके मुंबई में जो समस्या है वह पूणे-नागपूर में तो नजर नहीं आती। लेकिन आपने तो 'बंबईया भाषा" को ही जन्म दे दिया और आज मराठी का रोना रो रहे हैं। और टेक्सी चलाने के लिए मराठी का बंधन डालने का प्रयत्न कर रहे हैं। सीधी सी बात है यदि कोई पंजाबी भाषी को बंगाल में टेक्सी चलाना हो तो उसे बंगाली में ही बोलना पडेगा, पंजाबी से काम नहीं चलेगा। क्योंकि, बंगाल के लोग आग्रहपूर्वक बंगाली में ही बोलेंगे। परंतु, आज इतनी छोटी सी बात के लिए आप कानून बनाने की इच्छा रखते हैं और आलोचना का शिकार हो रहे हैं।
अब तो हद हो गई कि आपको एक उच्चस्तरीय समिति सलाह दे रही है कि 'राज्य के मंत्रियों, अधिकारियों को राज्य के बाहर से आनेवाले गैर-मराठियों व विदेशी मेहमानों से भी मराठी में ही बात करना चाहिए।" तर्क यह दिया जा रहा है कि, 'मराठी का उपयोग करने से इस भाषा को विस्तार मिलेगा, साथ ही इसी बहाने दुभाषियों के रुप में कई लोगों को रोजगार भी प्राप्त होगा। यह तर्क निश्चय ही अच्छा है। परंतु, राष्ट्र-राज्य का हित सर्वोपरी है। यदि आप विदेशी मेहमानों से राष्ट्र-राज्य के हित के लिए अंग्रेजी में बात कर सकते हैं, विदेशों में जाकर अंग्रेजी में भाषण दे सकते हैं, उसके लिए आप बाकायदा अंग्रेजी सीखते भी हैं। तो, हिंदी क्यों नहीं सीख, बोल सकते? क्योंकि, हिंदी को संपूर्ण राष्ट्र के लिए समन्वय की भाषा के रुप में मानना ही पडेगा। इस मामले हम श्रीमती सोनिया गांधी जो एक विदेशी मूल की हैं का आदर्श सामने रख सकते हैं। जिन्होंने इस देश की बहू बनने के लिए इस देश की संस्कृति को स्वीकारा, हिंदी सीखी। उसी प्रकार से जिन्हें हिंदी आती है वे तो निश्चय ही हिंदी बोल सकते हैं उनके लिए भी यह अट्टहास क्यों कि हम तो दुभाषिये के माध्यम से ही बात करेंगे, मराठी में ही बोलेंगे! हां, जो ग्रामीण परिवेश से होने के कारण हिंदी अच्छी तरह से समझ-बोल नहीं पाते वे यदि दुभाषिये की सहायता लें तो कुछ समझ में भी आता है। हमारी दृष्टि में तो उपर्यक्त प्रकार का थोथा मराठी प्रेम सिवाय राजनीति के और कुछ नहीं है।
इसी प्रकार से राज ठाकरे की मनसे ने '40 दिन में मराठी सीखें या मुंबई छोडे" का एक नया फरमान जारी कर दिया है। क्या उ.प्र., बिहारवाले विदेशी हैं जो उन्हें वहां से निकाल बाहर करने की बात की जा रही है, हम इसका विरोध करते हैं। हिम्मत हो तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को जो थोक में वहां रह रहे हैं, उन्हें निकाल बाहर कर दिखाएं। वस्तुतः होना यह चाहिए आप वहां के मराठी भाषीयों से कहें कि वे केवल मराठी में ही बात करें। यदि उ.प्र. का भैया अपने लंगडा या दशहरी आम की कीमत सौ रुपये बतलाता है तो आप मराठी में कहिए ना कि 'पन्नासच देईन"। सौदा पटाने के लिए वह पचहत्तर कहेगा तो आप टूटी-फूटी हिंदी में कहें 'मी तो साठच दूंगा।" 'साठ" तो हिंदी-मराठी दोनो ही भाषाओं में कहा जाता है। यदि उ.प्र. के भैया को वहां रहकर काम-धंदा करना है , दो पैसे कमाना है तो, वह अपने आप मराठी सीखेगा, बोलेगा। उसके लिए मारपीट करने, मुंबई छोडो का फरमान जारी करने की जरुरत क्या है? यह नितांत अनुचित है।
राज ठाकरे का मराठी प्रेम और हिंदी विरोध जब विधानसभा के चुनावों में थोडीसी सफलता के बाद विधानसभा की शपथ विधि समारोह तक जा पहुंचा तो उन्हें अपने मराठी प्रेम के प्रदर्शन का माध्यम एक 'सदस्य विशेष" का हिंदी में शपथ लेना ही नजर आया, अंग्रेजी में शपथ लेने का विरोध करने की हिम्मत वे न जुटा पाए। लेकिन वे भूल गए कि हिंदी राष्ट्रभाषा होना चाहिए की सबसे पहले आवाज उठानेवाले लोकमान्य तिलक थे। उन्हीं के शिष्य वीर सावरकर का तो महान मंत्र ही था 'हिंदी-हिंदू-हिंदुस्थान" तथा उन्होंने न केवल हिंदी राष्ट्रभाषा होना चाहिए का अभियान चलाया था बल्कि भाषा शुद्धि का अभियान भी चलाया था। सर्वमान्य और सर्वज्ञात शब्द 'महापौर" का सृजन के अलावा आपरेशन को 'शल्यक्रिया", फिल्म को 'चित्रपट" जैसे नए-नए शब्द हिंदी को देनेवाले-रचनेवाले भी वीर सावरकर ही थे। हिंदी में सबसे पहली कहानी लिखनेवाले मराठी भाषी श्री माधवराव सप्रे थे। जिनके नाम से भोपाल में एक संग्रहालय है जिसकी स्वर्णजयंती अभी हाल ही में कुछ वर्षों पूर्व मनाई गई। वैसेही उस काल के हिंदी के मान्यवर पत्रकार श्री ग. वा. पराडकर थे, यह भी उन्होंने ध्यान में लेना चाहिए।
अगर राज ठाकरे का मराठी प्रेम सच्चा है तो वे हिंदी का बेजा विरोध छोडकर सबसे पहले मराठी-हिंदी का शब्दकोश उठाकर देखें कि उनकी प्रिय मराठी में कितने विदेशी भाषा के शब्द घुसकर बैठे हैं। उनकी घुसपैठ इतनी व्यापक है कि उनका उच्चारण धार्मिक कर्मकांडों में भी किया जा रहा है। उदा. छबीना-(फा. शबीनः)- रात्री में निकलनेवाली मूर्ति की या देवता की यात्रा। इसी प्रकार से महाराष्ट्रीय लोगों में अपने से बडे, आदरणीय लोगों के लिए सबसे अधिक प्रयोग में लाए जानेवाले शब्द हैं आबासाहेब-बाबासाहेब। आबा और बाबा ये शब्द पिता या नाना-दादा के लिए अरबी में उपयोग में लाए जाते हैं। इसी प्रकार से बायको (धर्मपत्नी) यह तुर्की शब्द है जो सभी लोग धडल्ले से अपनी श्रीमतीयों के लिए उपयोग में लाते हैं।
जिन छत्रपति शिवाजी के उत्तराधिकारी बनते हैं, जो आपके आदर्श हैं। उन्होंने यह जानकर ही कि, ''संस्कृत और मराठी का संबंध मॉं-बेटी का है के कारण श्री रघुनाथ पंडित से लिखवाया हुआ राज्यव्यवहारकोश स्वराज्य के दैनंदिन व्यवहार से तुरत एकरुप हो गया। फारसी और अरबी के शब्द जाकर सहज सामान्य जनता को समझ में आनेवाले संस्कृत प्रचुर शब्द जीवन में घुलमिल गए। पेशवा, सुरनीस, सरनौबत, मुजुमदार ऐसे अनगिनत विदेशी शब्द जाकर उनके स्थान पर पंतप्रधान (प्रधानमंत्री), सचिव, अमात्य, सेनापति जैसे अपने शब्द रुढ़ हो गए। भाषा शुद्धि का मूल और मर्म महाराज अचूक समझे थे। एक बार संज्ञाएं बदली कि संवेदनाएं भी बदल जाती हैं। स्वत्व का आविष्कार अपनेआप हो जाता है। उसका परिणाम मन राष्ट्रीय और जागृत होने में होता है। महाराज ने महाराष्ट्र की संवेदनाएं जगाई। मातृभाषा राष्ट्र का प्राण हैं। भाषा मतलब संजीवनी।""
परंतु, राज ठाकरे का अतिरेक तो अब चरम तक पहुंच चूका है। उनका कहना है कि 'केवल मराठी बोलने, लिखने और पढ़ने से काम नहीं चलेगा। नौकरियां उन्हींको मिलेंगी जिनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ हो। यह तो एक प्रकार से अलग राष्ट्रीयता की शुरुआत ही कही जाएगी। अब उनका आक्षेप उन्हींकी मनसे के 40 दिन में मराठी सीखो के फरमान पर भी है। यह इस देश की मिट्टी से द्रोह है। महाराष्ट्र में जन्मे वीर सावरकर तो आजीवन इस देश-राष्ट्र को ही अपना देवता मानते रहे और राष्ट्र के लिए ही जीए। राज ठाकरे यह न भूलें कि पहले राष्ट्र फिर महाराष्ट्र है।
मराठी के समान ही हिंदी का जन्म भी संस्कृत में से ही हुआ है। यह हिंदी शुद्ध अवस्था में संस्कृत प्रचुर बनी रहे इसके लिए उत्तरभारत के पंडितों ने भी अथक प्रयत्न किए थे। इसीलिए तो हिंदी हिंदी रही हिंदुस्तानी ना बन सकी। राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन ने कहा है - ''मुझे संस्कृतनिष्ठ हिंदी के आंदोलन की प्रेरणा वीर सावरकर से ही प्राप्त हुई थी।"" आप भी ऐसा ही कुछ महान कार्य अपनी माय-बोली मराठी के लिए करें। और आप यह कर भी सकते हैं। इसीलिए हम आपसे कह रहे है कि 'गंभीरता से विचार करें राज साहब!" क्योंकि, हमारे विचार से तो यही आपकी ओर से आपके आराध्य वीर शिवाजी, लोकमान्य तिलक और वीर सावरकर को सच्ची आदरांजली होगी। हॉं, इतना जरुर सच है कि सापेक्षतया उन्नत राज्यों पर बाहर के लोगों का जो भार बढ़ रहा है उस विषय में केंद्रशासन को विचार करने की आवश्यकता है।
Friday, January 10, 2014
आखिर हिंदू गर्व किस बात पर करें ? 2
आखिर हिंदू गर्व किस बात पर करें ? 2
9. विवेकानंद के पश्चात राष्ट्रवादी सुधारक के रुप में वीर सावरकर के सामाजिक कार्यों की दो विशेषताएं थी अस्पृश्योद्धार और विज्ञाननिष्ठ रुढ़िभंजकता। अस्पृश्यता यानी कई वर्षों से दृढ़ हो चूकी विषवल्ली। अस्पृश्यता का निमूर्लन करने के लिए रत्नागिरी की स्थानबद्धता के काल में सावरकर ने पराकाष्ठा के प्रयत्न किए। दिनभर महारों और चमारों की बस्तियों में घूमे। उनमें साक्षरता निर्मित की। स्वच्छता की परिपाटी दी। उनसे गीतापठन, गायत्रीपठन, कीर्तन, सहभोजन के कार्यक्रम गणेशोत्सव में करवाए। पतितपावन मंदिर की स्थापना की और सभी को मंदिर प्रवेश की अनुमतिवाले भारत के पहले मंदिर के रुप में प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने समाज को अंतर्मुख किया और उनमें अभिवृद्धि के लिए ज्ञानामृत का प्रसाद दिया। स्पर्शबंदी, रोटीबंदी, शुद्धिबंदी, आदि नासमझ रुढ़ियों पर प्रखर आक्रमण कर इन बेडियों से मुक्त करने के लिए 'समाजचित्र" पुस्तक की रचना की। निरर्थक रुढ़ियों को तोडने के लिए केवल प्रबोधन ही नहीं किया अपितु स्वयं के आचरण से इन कार्यों में आदर्श निर्मित किया। इस कार्य में वे लीन हो गए थे और कहा था ''मेरी मृत्यु के बाद मेरे शव को ब्राह्मण, महार, मराठा, डोंब आदि सभी जातियों के लोग कंधा दें, ऐसा होने पर ही मेरी आत्मा को शांति मिलेगी।""
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात पंचवर्षीय योजनाएं आयोजित की गई। जब इंदिरागांधी प्रधानमंत्री थी उन्होंने 20 सूत्रीय कार्यक्रम द्वारा आर्थिक कार्यक्रम दिया था। परंतु, बहुत थोडे ही लोगों को मालूम होगा कि, इन दोनो ही कार्यक्रमों के मूल आधार के रुप में जंचे ऐसा 10 सूत्रीय कार्यक्रम 'वर्गहितों का राष्ट्रीय समन्वय" इस नाम से लगभग 75 वर्ष पूर्व ही सावरकर ने देश को दिया था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु की इच्छा थी कि धर्म के नाम पर स्त्रियों और दलितों पर होने वाला अन्याय थमे, इसलिए उन्होंने हिंदू कोड बिल पारित करवाया, बहुत जूझने के बाद ही वह पारित हो सका था। समान नागरिकता कानून को मूलभूत अधिकारों में गिना जाए और इस बाबत न्यायालय में न्याय मांगा जा सके की व्यवस्था की जाए की मांग मीनूमसानी ने की थी। इस मांग को डॉ. आंबेडकर, श्रीमति अमृतकौर और हंसा मेहता आदि का जोरदार समर्थन था। सावरकर भी इसी मांग के समर्थक थे। इस कानून के बिना समान नागरिकत्व भ्रम सिद्ध होगा, ऐसा इन लोगों का प्रतिपादन था। बिल्कूल अल्पमत से यह मांग उस समय नामंजूर हो गई, परंतु सूचकों की नैतिक विजय हुई। क्योंकि, राज्य के निर्देशक तत्त्वों में 44वी धारा सर्वसम्मती से स्वीकृत की गई । यह धारा कहती है 'भारतीय नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।" नेहरुजी को लगता था कि यह समान नागरिकता की दिशा में उठाया हुआ पहला कदम है। परंतु, इस कदम के बाद आगे आज तक कोई कदम नहीं उठाया गया।
उस एक हिंदूकोड बिल से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन आया। वास्तव में हमें इन और इन जैसे हो चूके अनेकानेक समाजसुधारकों पर ही गर्व करना चाहिए जिनके कारण हमारा समाज आधुनिकता के दौर में पहुंचा, हम इतने प्रगत हो सके। परंतु, यह प्रयास तब अधूरे से जान पडते हैं जब हम देखते हैं कि आज भी समाज में भेदभाव, ऊंच-नीच की भावना जीवित है, कट्टरता बढ़ रही है, सहिष्णुता कम हो रही है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने तो 'पाखंड खंडिनी पताका" फहराई थी पर हमारा पाखंड कम होने का नाम नहीं ले रहा। उदाहरणार्थ ः पंढ़रपूर की यात्रा जो पिछले सात सौ वर्षों से चल रही है के दौरान वारकरी संप्रदाय के अनुयायी एक दूसरे के प्रति सम्मान दर्शाने के लिए एक दूसरे के पांव छूते हैं। उधर यात्रा से लौटते ही ऊंच-नीच, जातीय असहिष्णुता पर उतारु हो जाते हैं। आज भी दलित को घोडी चढ़ने से रोकने की घटनाएं होती हैं। 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं" कहना हमारा तभी सार्थक सिद्ध होगा जब हम यह पाखंड छोड उपर्युक्त समाजसुधारकों के बताए मार्ग पर बढ़ेंगे, उनके समाज सुधार के कार्यों को अनवरत आगे बढ़ाते रहेंगे।
यह लेख अधूरा ही रह जाएगा मुस्लिम समाज, जो भारत का एक अविभाज्य भाग है, की चर्चा के बगैर । यदि हम उस 19वी शताब्दी पर दृष्टि डालते हैं तो हमें ज्ञात होगा कि उस शताब्दी के सबसे बडे मुस्लिम नेता सर सय्यद अहमद थे। वे मुसलमानों में सुधार चाहते थे। उन्हें आधुनिक शिक्षा देना उनका ध्येय था। इसके लिए उन्होंने अलीगढ़ कालेज की स्थापना की थी। इस कारण उनकी प्रशंसा शिक्षा महर्षी के रुप में की जाती है। परंतु उनके इस कार्य का परिणाम देशविभाजन के रुप में सामने आया।
मुस्लिम समाज के साथ शोकांतिका यह है कि उनके समाज में समाज सुधार की वह परंपरा ही नहीं है जो हिंदुओं में है जिसके कारण कि वे आधुनिकता के दौर में पहुंच सके। ऐसी बात नहीं है कि उनके यहां आधुनिक बनो, शिक्षाग्रहण करो, स्त्री स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की बात करनेवाले, कुरीतियों का त्याग करो का उपदेश देनेवाले है ही नहीं, ऐसे समाज सुधारक हुए भी हैं और हैं भी लेकिन अल्प। जैसेकि, हमीद दलवाई, असगरअली इंजीनिअर, अब्दुल कादर मुकादम, शाहिर अमरशेख (मेहबूब हसन शेख 1916-1969) आदि। परंतु उनका समाज इतना दकियानूसी है कि वह कुरीतियों का त्याग करना ही नहीं चाहता और इन समाज सुधारकों की उपेक्षा एवं एक प्रकार से बहिष्कार ही करता है। और उनके विचार अरण्यरुदन बनकर रह जाते हैं।
असगरअली इंजीनिअर, आदि जैसे सेक्यूलर, उदारवादी, पुरोगामी, समाजवादी, सुधारवादी, राष्ट्रवादी, मानवतावादी विचारों के लोगों को प्रामाणिकतापूर्वक लगता है कि मुस्लिम परिवर्तनशील बनें, आधुनिक मूल्यों का स्वीकार करें, आधुनिक बनें इसके लिए वे कुरान के नए अर्थ निकालकर उनमें आधुनिक मूल्य हैं दिखाने का प्रयत्न करते रहते हैं। परंतु, उनका समाज ही उनके इन नए विचारों को स्वीकारने को तैयार नहीं। वे अंग्रेजी अखबारों में आजीवन लिखते रहे और पुरोगामी के रुप में हिंदुओं से प्रशंसा प्राप्त करते रहे। उनके समाज ने तो उन पर यहां ही नहीं बल्कि विदेशों में तक प्राणघातक हमले किए। जब वे एक परिषद में काहिरा गए थे तब वहां उनके साथ जबरदस्त मारपीट की गई थी और वे मरते-मरते बचे थे।
हमीद दलवाई जो समाजवादी विचारों के थे। उनके और उनके जैसेही कुछ स्वतंत्र विचारों के मुसलमानों का मत है कि सर्वसामान्य मुस्लिम समाज जिस विचारसरणी का आचरण करता है उससे उनका हित होनेवाला न होकर उनका सच्चा हित इसीमें है कि उन्हें हिंदूसमाज से एकरुप हो जाना चाहिए। दलवाई का कहना था ''हमारे धर्म में हस्तक्षेप मत करो, हमें विशेषाधिकार दो, इन मांगों को मुसलमानों ने छोड देना चाहिए।"" ''इस्लाम की फालतू घोषणाओं के पीछे न लगते मुस्लिम युवाओं को इस्लाम का अर्थ व्यक्तिगत धर्माचरण करने की छूट मानकर व्यवहार करना चाहिए। अधिक लडोगे तो अधिक बिगडेगा और मुस्लिम समाज के साथ सहानुभूति रखनेवाले समाज का विश्वास भी गमा बैठोगे। बहुसंख्यकों का विश्वास संपादन करना यही अल्पसंख्यकों का कर्तव्य है।"" हमीद दलवाई के इन विचारों को सुननेवाला मुस्लिम समाज ना होकर हिंदू समाज हुआ करता था। इसका अर्थ हमीद दलवाई के विचारों से मुस्लिम समाज और उनके नेता कितने दूर थे यह पता चलता है।
गांधीजी की पुनर्जन्म सिद्धांत, कर्म सिद्धांत में आस्था थी और यही जाति व्यवस्था का आधार थी। यह आधार वर्णाश्रम व्यवस्था को खींचता था। हालांकि जीवन के अंतिम दिनों में गांधीजी यह मानने लगे थे कि जाति व्यवस्था से जुडी वर्णाश्रम व्यवस्था, अस्पृश्यता का भाव गलत है और इस विषवृक्ष को हर कीमत पर काट देना चाहिए।
सावरकरजी का कहना था धर्म की पोथी में क्या सत्य है और क्या असत्य, इसका निश्चय हम विवेक की कसौटी पर करें। वर्तमान जातिभेद जन्मजात न होकर पोथी की उपज मात्र है। हमारे धर्मबंधुओं को बिनाकारण पशु से भी अधिक 'अस्पृश्य" मानना यह मनुष्य जाति का ही नहीं अपितु हमारी स्वयं की आत्मा का भी घोर अपमान है। दर्शन मात्र से जो अपवित्र हो जाता है वह ईश्वर ही नहीं। जिस रुढ़ि के कारण तनिक भी सामाजिक लाभ न होते हुए मानवमात्र कष्ट का भागी बनता है वह तो अधर्म है। जिस समाज की जहां होना चाहिए वहां तो आस्था नहीं होती और जहां नहीं होना चाहिए वहां होती है, वह समाज मटियामेट हो जाता है।
डॉ. अंबेडकर जिन्होंने अपने अंतिम समय में बौद्ध धर्म को स्वीकार लिया था, जो हिंदू धर्म का ही संस्कारित संपादित रुप है। बौद्ध चिंतन का मूल बीज भाव है कि बैर बैर का अंत नहीं होता, हो नहीं सकता। अबैर से ही बैर का अंत हो सकता है यही सनातन धर्म है। उनका कहना था हमें भारतीय होने की व्यापक मानववादी भूमि पर सोचने की हर कीमत पर आदत डालनी चाहिए। उनके शब्द हैं 'मुझे अच्छा नहीं लगता जब कुछ लोग कहते हैं कि हम पहले भारतीय हैं और बाद में हिंदू अथवा मुसलमान। मुझे यह स्वीकार नहीं है। धर्म, संस्कृति, भाषा आदि की प्रतिस्पर्धा, निष्ठा के रहते हुए भारतीयता के प्रति निष्ठा नहीं पनप सकती। मैं चाहता हूं कि लोग पहले भी भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहें, भारतीय के अलावा कुछ नहीं।"
आखिर हिंदू गर्व किस बात पर करें ? 1
स्वामी विवेकानंद ने हिंदुओं का अस्मिता बोध जगे, हिंदुओं में आत्मसम्मान, आत्मगौरव का भाव वृद्धिंगत हो के लिए 'गर्व से कहो हम हिंदू हैं" का उद्घोष किया था। परंतु, इस नारे को परवान चढ़ाने का श्रेय संघ-परिवार को जाता है। हिंदुओं के लिए तो यह उद्घोष प्राणप्रिय है। परंतु साथ ही यह भी एक कटु सत्य है कि इस नारे का जयकारा लगानेवाले कइयों से यदि यह पूछा जाए कि क्यों कहें हम गर्व से हिंदू हैं तो, इसका उत्तर वे दे नहीं पाते, बगले झांकने लगते हैं। वास्तव में अधिकांश नारा लगानेवाले लोग मात्र यांत्रिक ढ़ंग से नारा लगाते रहते हैं, कुछ लोग अवश्य अज्ञानी होते हैं तो, कुछ लोग अपनी भाव-भावनाओं को शब्दों में अभिव्यक्त करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं इसलिए उत्तर दे नहीं पाते। कुछ लोग अवश्य इसका उत्तर अपनी-अपनी पद्धति से दे देते हैं।
मेरा स्वयं का मत यह है कि, एक समाज के सातत्य और शाश्वत अनुजीवन के लिए आधुनिकीकरण एक निश्चित एवं आवश्यक उपचार है। इसके अंतर्गत समाज सुधार, आचरण संहिता में तालमेल बैठाना आता है, राष्ट्रीय समाज के भिन्न-भिन्न घटकों में पारस्परिक संबंधों को अनुशासित करनेवाले नियमों में संशोधन, समय-समय पर सामाजिक संगठनों के कार्यकलापों का नियमन करनेवाली विधियों का परिष्कार और जहांकहीं-जबकभी विकृति उत्पन्न हो जाए तो उसे दूर करना आता है। इस दृष्टि से विचार किया जाए तो, 19वी शताब्दी में जब भारत में आधुनिक युग का सूत्रपात हुआ, हिंदू समाज-सुधारकों राजाराममोहन राय और स्वामी विवेकानंद तथा स्वामी दयानंद ने अनुभव किया कि परंपरागत हिंदुत्व अव्यवस्थित था एवं प्रगति तथा परिवर्तन से मेल नहीं खाता था और हिंदुत्व का आधारभूत संशोधन इसके पुनरुत्थान के लिए आवश्यक था। मेरी दृष्टि में हमें गर्व हमारे इस प्रकार के समाजसुधारकों पर होना चाहिए जिन्होंने कि इस परिपाटी को उस काल में भी और बाद में भी आगे बढ़ाया।
इस कडी में कई समाज सुधारक हुए हैं। महाराष्ट्र में तो इसकी अखंड परंपरा सी ही है। जिसमें विष्णुबुआ ब्रह्मचारी, ज्योतिबा फुले, न्यायमूर्ति रानडे, लोकमान्य तिलक, आगरकर, वीर सावरकर, डॉ. आंबेडकर, शाहू महाराज, बाबा आमटे, आदि हुए हैं। इन समाज सुधारकों की प्रचुरता के कारण इनका वर्गीकरण तक किया गया है। 1. धर्मश्रद्ध सुधारक, 2. धर्मश्रद्धाहीन सुधारक, 3. कर्मयोगी सुधारक, 4. सुधारकों के सुधारक, 5. राष्ट्रवादी सुधारक, 6. समाजशास्त्रज्ञ सुधारक। महाराष्ट्र के बाहर ईश्वरचंद्र विद्यासागर, पंडित मदनमोहन मालवीय, ठक्कर बापा, महात्मा हंसराज आदि हुए हैं। शताब्दियों के कालखंड में इस देश में अनेकानेक समाज सुधारक हुए हैं। परंतु, हम केवल 19वी और 20वी शताब्दी के कुछ चुनिंदा समाज सुधारकों के कार्यों पर ही विषय समझने की दृष्टि से संक्षेप में विचार करेंगे।
1. सर्वप्रथम हम भारतीय प्रबोधन के आद्य शिल्पकार बंगाल के राजा राममोहनरॉय (1772-1833) जिन्होंने स्वयं के वैचारिक कार्य की शुरुआत धर्मचिकित्सा से की और मूर्तिपूजा पर आघात करनेवाली एक पुस्तिका आयु के 16वे वर्ष में लिखी जिसका पर्यवसान घर-त्याग के रुप में सामने आया के कार्यों से शुरु करेंगे। अपनी धर्मचिकित्सा से वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वेद-पुराण, उपनिषद, स्मृतियां सभी मनुष्य निर्मित हैं तथा इनकी आलोचना की जा सकती थी। इन पुराणों में आधुनिकता को अपनाने की कोई गुंजाइश नहीं। उन्होंने किसी भी सुधार के लिए सार्वभौमिक मूल्यों के मानदंडों की सिफारिश की। वे धर्मांतरण विरोधी होकर ईसाई मिशनरियों के कटु आलोचक भी थे। उनके विशाल मानवतावादी दृष्टिकोण से ही उनकी उदारमनस्क आधुनिकता निर्मित हुई थी। उनकी आधुनिकता यूरोपीयन बुद्धिवाद पर आधारित न होकर धर्मश्रद्धा से स्फुरित नीतितत्त्वों पर थी और इनसे निष्पन्न हुई मानवता ने ही स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व इन अभिजात तत्त्वों का समर्थन किया था।
सतीप्रथा की वीभत्स रीति के विरुद्ध उन्होंने जो प्रखर शस्त्र उठाया था उसका उद्गम उनकी संस्कारित मानवता में ही था। ब्रिटिश भी इस रीति के विरुद्ध थे परंतु, अपने विरुद्ध विद्रोह ना हो जाए के भय से चुप थे, किंतु राममोहन रॉय सतत प्रयत्नशील रहे और अंततः 1829 में सर विल्यम बैंटिक ने सतीप्रथा कानून लागू किया। सती, विधवा पुनर्विवाह या मुद्रण स्वतंत्रता बाबत किए हुए उनके यत्नों का जो महत्व है उससे अधिक महत्व उनके शिक्षाविषयक किए गए कार्यों का है। घातक परंपराओं से जकडे भारत और सारी घातक परंपराओं को फेंक देनेवाले भारत के मध्य का पुल उन्हें कहा जाता है। राजा की उपाधि उन्हें मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने दी थी।
2. महाराष्ट्र के बाहर के अधिकांश लोगों के लिए विष्णुबुवा ब्रह्मचारी (1825-1871) का नाम अनजान है। इस उपेक्षित पहले हिंदू मिशनरी ने मार्क्सवाद प्रसृत होने के पूर्व ही साम्यवाद पर आधारित स्वतंत्र निबंधमाला लिखकर खलबली मचा दी थी। वह भी इतनी कि 'इलेक्सट्रेटेड लंदन न्यूज" में उनका फोटो हिंदुस्थान का क्रांतिकारी कहकर छापा गया था। उनके सामाजिक मत भी इसी प्रकार से प्रगतिशील थे। जातिभेद नष्ट हों, संबंध-विच्छेद एवं पुनर्विवाह कुछ मर्यादा में योग्य माना जाए। उनके ये मत उस काल में क्रांतिकारी ही थे। वे अस्पृश्यता नहीं मानते थे। उनका प्रतिपादन था शाकाहार ही सच्चा आहार है परंतु, मांसाहार को निषिद्ध नहीं माना था। अंधश्रद्धा द्वारा लादे हुए निर्बंध उन्हें मान्य ना थे। वेद-पुराण पर उनकी पूर्ण श्रद्धा थी परंतु, बुद्धिप्रामाण्य पर उनका विश्वास था। 1850 से 1857 तक मुंबई की चौपाटी पर चले उनके व्याख्यान इतने प्रभावी थे कि ईसाई मिशनरियों को अपना बाडबिस्तर समेटना पडा था। परिणाम सरकार ने उनके भाषणों पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद वे कलकत्ता, मद्रास आदि स्थानों पर प्रचारार्थ गए।
3. एक जाति, एक धर्म, एक भगवान के उपदेष्टा केरल के लोकप्रिय संत श्रीनारायण गुरु (1854) ने समाज की अव्यवहारिक, घातक और अनिष्टकारी प्रवृतियों को समाप्त किया, जिससे हिंदू समाज को खंडित होने से रोका जा सका। श्रीनारायण गुरु ने निम्न जाति के स्थाई विकास के लिए शिक्षा पर बल दिया। निम्न जातियों में आत्मसम्मान की भावना जागृत की इसके लिए संगठित व सबल होने का मंत्र दिया। अनेक कुरीतियों से समाज को मुक्त करने की दिशा में प्रयास किया। भूत-प्रेतों की मादक पदार्थों द्वारा पूजन की पद्धति को समाप्त किया। उन रुढ़ियों को समाप्त कर दिया जिनकी उपयोगिता समाज के लिए नहीं थी। उनका विशेष ध्यान इस ओर था कि निम्न जातियों के हिंदुओं में उच्च जातियों द्वारा दुर्व्यवहार के फलस्वरुप परस्पर मनोमालिन्य निर्मित ना हो जिससे कि हिंदू समाज ही खंडित हो जाए। उन्होंने सफलतापूर्वक अपने अनुयायियों को धर्मांतरित होने से रोका।
4. दूसरी ओर स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883) ने वेदों को छोडकर सभी हिंदू पुराणों के अवमूल्यन का सुझाव दिया। उन्होंने स्त्री शिक्षा और स्त्री-पुरुष समानता पर प्रमुख बल दिया। समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अभियान चलाया। देश में जाति-पाति, ऊंच-नीच, छूआछूत, सतीप्रथा, बाल विवाह, नरबलि, गौहत्या, अंधश्रद्धा, धार्मिक संकीर्णता, पाखंड आदि समस्याओं से मुक्ति के लिए एक नए स्वर्णिम समाज की स्थापना के उद्देश्य से आर्यसमाज की स्थापना की। पट्टाभिसीतारमैया ने उन्हें राष्ट्रपितामह की उपाधि दी थी।
5. साधारणतया महामना पंडित मदनमोहन मालवीय की जो छवि जनमानस में बसी हुई है वह है राजनीति के मंच पर 'नरम" और धर्म तथा समाज के आंगन में 'कट्टर रुढ़िवादी"। परंतु, उनकी यह छवि एकपक्षीय व एकांगी है। उनके जीवन-चित्रपट में विविध रंगों से सराबोर झांकियों की कमी नहीं जिनमें हम उन्हें अपनी 'नरम नीति" व कट्टरवादिता को क्षणभर में एकओर रख एकदम 'गरम" व क्रांतिकारी 'सुधारवादी" के रुप में परिणत होते हुए भी पाते हैं। उदाहरणार्थ, जो मालवीयजी 1922 में देशभावना की परवाह ना करते हिंदू-विश्वविद्यालय के प्रांगण में 'प्रिंस ऑफ वेल्स" को माला पहनाते दिख पडते हैं वही मालवीयजी 1930 के स्वतंत्रता की लडाई में मुंबई की सडकों पर बरसते पानी में रातभर सशस्त्र पुलिस के सम्मुख सीना तानकर डटे दिख पडते हैं। जिन्हें गोलमेज परिषद के लिए गंगाजल ले जाते हम पाते हैं वही मालवीयजी काशी के धर्मध्वजियों को ललकारते हुए 'अछूत" कहे जाने वाले तिरस्कृत अपने देशबंधुओं को सह्रदयता से धार्मिक मंत्रदीक्षा देते हुए भी हमने पाया है।
मालवीयजी के सनातन धर्मसिद्धांतों के प्रति आस्थावान होने का अर्थ यह नहीं कि वे सुधार एवं प्रगतिविरोधी थे। वे ही तो थे जिन्होंने अकेले ही अपनी हिंदूजाति को शिक्षा का धनी बनाने हेतु, 'हिंदू विश्व-विद्यालय" जैसी आधुनिक संस्था खडी कर दी थी। क्या ऐसे महामना पर स्वप्न में भी इस पुण्यभूमि की प्रगति की राह रोकने का आरोप लगाया जा सकता है। वस्तुतः उनकी तथाकथित 'कट्टर रुढ़िवादिता" की तह में दृढ़ सिद्धांतवादिता थी जो 'प्रगति" के नाम पर इस प्राचीन भूमि के सांस्कृतिक उत्तराधिकार के आधारभूत सिद्धांतों का व्यापार कर उसे बेच डालने को तैयार नहीं थी। मालवीयजी देश के अनेक अन्य सुधारवादी विचारकों की भांति पुरातन की नींव पर पुनर्निर्माण और पुनर्संस्कार द्वारा पुनरोदय के पोषक थे वह विध्वंस और आमूलचूल परिवर्तन द्वारा एक सर्वथा अपरिचित संस्कृति को देश पर लाद देने के समर्थक नहीं थे। वह हमारी जीवनधारा में बाद को उत्पन्न विकृतियों को दूर करने की आतुरता के संकोच से रंचमात्र भी पीछे ना थे।
6. गांधीजी का उन धर्मशास्त्रों में विश्वास नहीं था, जो जातिप्रथा को पवित्र घोषित करते हैं। इस संबंध में उन्होंने कहा ''यह दुख का विषय है कि आज धर्म का मतलब क्या खाना है और क्या नहीं है के अर्थ में लिया जाता है। कौन बडा है कौन छोटा इसीकी व्याख्या की जाती है। इससे बडी नादानी और कुछ नहीं हो सकती। जन्म और आचार किसीकी श्रेष्ठता नहीं नाप सकते। चरित्र ही एकमात्र मापदंड है। कोई भी शास्त्र जो जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को छोटा या अछूत घोषित करता है, हमारी श्रद्धा का पात्र नहीं हो सकता। यह ईश्वर की अवहेलना है।""
7. शक्ति-सामर्थ्य के उपासक स्वामी विवेकानंद ने धर्म हिंदुस्थान का प्राण है का उद्घोष करते हुए कहा था- अपन हिंदू हैं। 'हिंदू" शब्द से मुझे कोईसा भी बुरा अर्थ ध्वनित नहीं करना है। इसमें कुछ बुरा अर्थ है इससे मैं सहमत नहीं। भूतकाल में सिंधू के एक ओर रहनेवाले वे हिंदू इतना ही इसका अर्थ है। जो अपना द्वेष करते आए हैं उन्होंने इस शब्द को बुरा अर्थ चिपकाया होगा। परंतु उसका क्या! हिंदू शब्द में जो उज्जवल है, जो आध्यात्मिक है उसका निर्देश हो; अथवा जो लज्जास्पद है, जो पांवोंतले कुचले गए हैं, जो दीन हैं इस प्रकार का बोध हो यह अपने पर निर्भर करता है। हिंदू शब्द को किसी भी भाषा का अधिकाधिक गौरवपूर्ण अर्थ अपनी कृति से ला देने के लिए अपन सिद्ध हो जाएं। आगे वे कहते हैं ः अपन भारतवासी हैं इस पर गर्व करो और गर्व से कहो ः
''मैं भारतवासी हूं। प्रत्येक भारतवासी मेरा भाई है। अज्ञानी भारतवासी, दरिद्र और दलित भारतवासी, ब्राह्मण भारतवासी और भंगी भारतवासी ये सारे मेरे भाई हैं।"" कमर में कौपीन हो तो भी उच्चरव में घोषणा कर ः ''प्रत्येक भारतवासी मेरा बंधु है। भारतीयत्व ही मेरा जीवन, भारत के देवी-देवता मेरे भी देवी-देवता। यह विशाल भारतीय समाज यानी मेरे बाल्यकाल का हिंडोला, यौवन का नंदनवन, और वृद्धावस्था की वाराणसी।"" ऊठ बोल ः ''हिंदुस्थान की धूली ही मेरा स्वर्ग। हिंदुस्थान का सद्भाग्य ही मेरा सद्भाग्य।"" अरे भाई दिनरात इसीका जयजयकार कर।
उनका कहना था ः उदार बनो। मतांध, एकांतिक मत बनो, आत्मपरीक्षण करो। ध्यान रखो, जीवन का एकमात्र चिंह है गति और विकास। अपने को अभी बहुत कुछ सीखना है। मरने तक नई और श्रेष्ठ बातें सीखने के लिए प्रयत्नशील रहना है। अन्यों के पास जो जो अच्छा है उसे सीखो, योग्य पद्धति से आत्मसात करो, धोखा है तो पाश्चात्यों के अंधाधुनिकीकरण का। पाश्चात्य देशों का आधुनिकीकरण तभी हो पाया जब शिक्षा और संस्कृति सफेदपोशों तक ही मर्यादित न रहते समाज के सभी स्तरों तक पहुंची। ब्रिटिशों द्वारा हिंदुस्थान को जीतना इसलिए आसान रहा क्योंकि उनकी राष्ट्रभावना जागृत थी और हमारी नहीं। क्योंकि उनके यहां निचले स्तर तक शिक्षा और संस्कृति थी। शिक्षा, केवल शिक्षा के कारण ही आत्मश्रद्धा का जन्म होता है।
उनकी दृष्टि में बाल-विवाह घृणास्पद है, छूआछूत, गूढ़वाद, अंधश्रद्धा अवनति व साक्षात मृत्यु चिंह हैं। अंतरजातिय विवाह की आवश्यकता है। बहुजनों की शिक्षा लोकभाषा में होना चाहिए। शिक्षा के सिवाय स्त्रियों का सच्चा विकास होगा नहीं। स्त्री पुरुष समान हैं। स्त्रियों का अभ्युदय हुए बगैर भारत का कल्याण होना असंभव है।
इस प्रकार से यदि हम देखें तो जितने भी समाज सुधारक इन प्रमुख उदाहरणों के सिवाय भी हुए हैं सभी ने प्रमुखता से स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के साथ ही साथ धर्मचिकित्सा कर स्त्री शिक्षा-स्वतंत्रता-अधिकार, स्त्री-पुरुष समानता का बोध जगाया। छूआछूत, ऊंच-नीच, अंधविश्वास आदि पर कडे प्रहार कर कुरीतियों को नष्ट करने, समाज को सबल बनाने, हिंदू अस्मिता जगाने के लिए भगीरथी प्रयास किए। परंतु, इन सामाजिक सुधारों में कम से कम महाराष्ट्र में तो भी एक कमी रह गई थी और वह यह कि आंदोलनों का सारा जोर व विस्तार नगरीय क्षेत्र तक ही मर्यादित था। परंतु, 80% ग्रामीण भाग जो किसानी-मजदूरी से संबंधित हैं कीसमस्याओं को प्रधानता ना मिल सकी।
8. इस वैचारिक खाई को पाटने महात्मा फुले, कर्मवीर शिंदे, प्रा. श्री. म. माटे, वीर सावरकर आगे आए। इनमें महात्मा फुले आद्य समाज सुधारक हैं। उन्होंने किसानों के सर्वांगीण विकास के लिए कितना सुक्ष्म और चौतरफा अध्ययन किया था यह उनके ग्रंथ 'शेतकऱ्याचा आसूड" (किसान का कोडा) से दिख पडता है। उन्होंने अनाथ निर्दोष बच्चों के पालन-पोषण के लिए पहला अनाथाश्रम खोला। उन्होंने अपना पूरा जीवन शोषित-पीडित और दलित सर्वहारा की मुक्ति के लिए सतत संघर्ष करते हुए गुजार दिया। प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए लार्ड लिंटन ने एक्ट लागू किया था, उसके विरोध में उनके साप्ताहिक दीनबंधु ने ही आवाज उठाई थी। .........
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